UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

एलिफेंटा की गुफाएं: महेशमूर्ति, तारीख पर बहस और पत्थर का हाथी

एलिफेंटा की गुफाएं: शिव की महेशमूर्ति, कलचुरी तारीख पर विवाद, स्तूप पहाड़ी की बौद्ध गुफाएं और 1987 में UNESCO की सूची में जगह।

The three-headed Trimurti sculpture of Shiva carved into the rock inside the main Elephanta cave

एलिफेंटा की गुफाएं मुंबई बंदरगाह में बसे एलिफेंटा द्वीप पर चट्टान काटकर बनाई गई 7 गुफाएं हैं। मराठी में इस द्वीप को घारापुरी कहते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के हिसाब से यह अपोलो बंदर से करीब 11 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। मुख्य समूह शैव है, जिसे ज्यादातर 6ठी सदी ईस्वी के आसपास तराशा गया। इसकी महागुफा (Great Cave) में शिव की तीन चेहरों वाली विशाल प्रतिमा है। इसी प्रतिमा का हवाला देकर UNESCO ने 1987 में एलिफेंटा गुफाएं विश्व धरोहर स्थल घोषित कीं। द्वीप की पूर्वी पहाड़ी पर बनी दो छोटी गुफाएं बौद्ध मानी जाती हैं।

एलिफेंटा के बारे में तीन बातें अक्सर गलत बताई जाती हैं। पहली, बड़ी अर्धप्रतिमा को त्रिमूर्ति कहा जाता है। यह शब्द हिंदू त्रिदेव की ओर इशारा करता है, जबकि इसका हर चेहरा शिव का है। दूसरी, द्वीप के नाम को हाथियों की नक्काशी से जोड़ दिया जाता है। असल में पुर्तगालियों ने इसका नाम घाट के पास खड़े पत्थर के एक हाथी पर रखा था, और वह हाथी आज मुंबई में एक संग्रहालय के दरवाजे पर खड़ा है। तीसरी, गुफाओं को एक पक्की तारीख और एक पक्का निर्माता दे दिया जाता है। लेकिन जो अकेला अभिलेख ये दोनों बातें तय कर सकता था, उसे उठाकर ले जाया गया और वह खो गया। ये तीन बातें सीधी कर लीजिए, बाकी पूरा स्थल अपने आप समझ में आने लगेगा।

एलिफेंटा की गुफाएं क्या हैं और कहां हैं

एलिफेंटा एक छोटा द्वीप है, जिसमें दो पहाड़ियां हैं और उनके बीच एक संकरी घाटी है। गुफाएं दोनों पहाड़ियों में काटी गई हैं। पश्चिमी पहाड़ी पर शैव गुफाएं हैं, और महागुफा भी इन्हीं में है। पूर्वी पहाड़ी को स्तूप पहाड़ी कहते हैं। यहां बौद्ध अवशेष हैं, जो इनसे भी पुराने हैं।

तथ्यविवरण
स्थानएलिफेंटा द्वीप (घारापुरी), मुंबई बंदरगाह; उरण तालुका, रायगढ़ जिला, महाराष्ट्र
दूरीअपोलो बंदर से करीब 11 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और मुख्य भूमि के तट से 7 किलोमीटर (ASI)
गुफाएंचट्टान काटकर बनी 7 खुदाइयां (ASI): पश्चिमी पहाड़ी पर शैव समूह और पूर्वी पहाड़ी पर 2 बौद्ध गुफाएं
कालविवादित; UNESCO 5वीं सदी के मध्य से 6ठी सदी ईस्वी बताता है, ASI करीब 6ठी से 7वीं सदी
संभावित संरक्षकसिक्कों के आधार पर आरंभिक कलचुरी राजा कृष्णराज; कोई अभिलेख नहीं बचा
मुख्य स्मारकगुफा 1, यानी महागुफा: सामने के प्रवेश से पीछे तक 39 मीटर, भीतर चार दरवाजों वाला लिंग मंदिर
सबसे मशहूर प्रतिमामहेशमूर्ति, जिसे सदाशिव और आम बोलचाल में त्रिमूर्ति भी कहते हैं: शिव के तीन चेहरे
पुराने अवशेषपूर्वी पहाड़ी पर बौद्ध स्तूप; 2री सदी ईसा पूर्व जितनी पुरानी बसावट (UNESCO)
दर्जाASI से संरक्षित; 1987 से UNESCO विश्व धरोहर स्थल, मानदंड (i) और (iii) के तहत

घारापुरी द्वीप के दक्षिणी हिस्से में बसे गांव का नाम है, और इसके दो अर्थ निकाले जाते हैं। कला इतिहासकार दुलारी कुरैशी इसे पहाड़ी बस्ती मानती हैं। वहीं विद्वान ए.पी. जामखेडकर इसे अग्रहारपुरी से जोड़ते हैं, यानी ब्राह्मण विद्वानों की ऐसी बस्ती जो राजा के सौंपे गए राजस्व पर गुजारा करती थी। समझदारी इसी में है कि नाम याद कर लीजिए, लेकिन अपने उत्तर को किसी एक व्युत्पत्ति पर मत टिकाइए।

एलिफेंटा की गुफाएं किसने बनवाईं, और कब

पक्का कोई नहीं जानता, और इसकी वजह एक खोया हुआ पत्थर है। पुर्तगाली इतिहास-लेखक डिओगो दे कूटो ने दर्ज किया है कि जब पुर्तगालियों ने बसीन (वसई) और उसके अधीन इलाके जीते, तो उन्होंने गुफा के प्रवेश के ऊपर से एक पत्थर निकाल लिया। उस पर एक बड़ा और साफ-सुथरा खुदा हुआ अभिलेख था, और पत्थर राजा के पास भेज दिया गया। न भारत में पुर्तगाली गवर्नर को, न राजा जॉन तृतीय को, कोई ऐसा आदमी मिला जो उसे पढ़ सके। आज उस पत्थर का कोई निशान नहीं बचा। इसमें हैरानी की बात नहीं है। ब्राह्मी लिपि को जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में जाकर पढ़ा, जबकि वह पत्थर उससे बहुत पहले जा चुका था।

इसलिए एलिफेंटा की हर तारीख शैली या सिक्कों से निकाला गया एक तर्क है। दोनों सरकारी संस्थाएं भी एकमत नहीं हैं: UNESCO 5वीं सदी के मध्य से 6ठी सदी ईस्वी कहता है, जबकि ASI करीब 6ठी से 7वीं सदी। विद्वानों की राय तो और भी फैली हुई है:

  • कलचुरी, 6ठी सदी का मध्य: वॉल्टर स्पिंक। उनका आधार कलचुरी राजा कृष्णराज के तांबे के सिक्के हैं, जो द्वीप पर बड़ी संख्या में मिले हैं। इसमें वे इन सिक्कों पर शोभना गोखले के अध्ययन के पीछे चलते हैं।
  • कलचुरी, 7वीं सदी की शुरुआत: वी.वी. मिराशी। उनका तर्क था कि स्थानीय कोंकण मौर्य इतने छोटे सामंत थे कि ऐसी गुफा का खर्च नहीं उठा सकते थे। उधर चालुक्य वैष्णव थे, इसलिए उनका शिव मंदिर बनवाना कम संभव था।
  • चालुक्य: आर.एस. गुप्ते। उन्होंने मोतियों वाले जनेऊ (मणियज्ञोपवीत) और कीर्तिमुख बाजूबंदों की ओर इशारा किया, जो ऐहोल, बादामी और पट्टदकल में जाने-पहचाने हैं।
  • राष्ट्रकूट, 8वीं सदी: स्टेला क्रैमरिश, जैसा सहपीडिया ने उनके मत का सार दिया है। जेम्स फर्ग्युसन ने गुफाओं को करीब 750 ईस्वी में रखा, और जेम्स बर्जेस ने इससे भी बाद में।

मिराशी के अपने ब्योरे के मुताबिक बादामी के चालुक्यों ने 7वीं सदी में घारापुरी जीता था, और राष्ट्रकूटों ने बाद में एलोरा का कैलाश मंदिर तराशा। दिक्कत शैली की है। जामखेडकर बताते हैं कि ऐहोल, बादामी और पट्टदकल की मूर्तिकला एलिफेंटा से बहुत अलग दिखती है।

कलचुरी पक्ष के पास सबसे ठोस भौतिक आधार है। आरंभिक कलचुरी नर्मदा किनारे माहिष्मती से राज करते थे। वे वाकाटकों के उत्तराधिकारी बनकर उभरे, यानी उस वंश के, जिसके दौर में अजंता की गुफाओं का दूसरा चरण बना।

सिक्के सबूत जैसे लगते हैं, इसलिए यहां रुककर देखिए कि वे क्या दिखा सकते हैं और क्या नहीं। द्वीप पर कृष्णराज के तांबे के ढेर सारे सिक्के बताते हैं कि 6ठी सदी के मध्य में उनका पैसा वहां चलता था, यानी उनका राज्य वहां मौजूद था। लेकिन सिक्के पर किसी को समर्पण नहीं लिखा होता। इसीलिए कलचुरी तारीख सबसे मजबूत मत है, पक्का तथ्य नहीं।

उत्तर में यह लिखना हर मत के हिसाब से सही रहेगा: “करीब 6ठी सदी ईस्वी, सबसे संभावित रूप से आरंभिक कलचुरियों के दौर में, हालांकि तारीख विवादित है।” साथ में कोई एक विरोधी मत उसके विद्वान के नाम के साथ जोड़ दीजिए।

एलिफेंटा द्वीप का इतिहास, दौर-दर-दौर

गुफाएं द्वीप की लंबी कहानी की बस एक परत हैं। एलिफेंटा पहले बौद्ध स्थल था, फिर बंदरगाह और शायद एक राजधानी बना। उसके बाद यह शैव केंद्र बना, और बहुत बाद में औपनिवेशिक दौर के लोगों के लिए कौतूहल की चीज।

बौद्ध स्तूप और एक पुराना बंदरगाह

UNESCO यहां सबसे पुरानी बसावट 2री सदी ईसा पूर्व तक ले जाता है। इसकी पहचान उन स्तूपों से होती है जो अब द्वीप के पूर्वी हिस्से में दबे पड़े हैं। जामखेडकर पास की सादी कोठरियों को एक बौद्ध भिक्षु समुदाय के घर मानते हैं, और उनके आगे पहाड़ी पर स्तूप है। यह उसी तरह का अवशेषों वाला टीला है, जैसा आप सांची स्तूप में देखते हैं। वे मोरा बंदर और शेत बंदर के अवशेषों को पुराने घाटों की जगह मानते हैं, जहां जहाज आकर लगते थे।

पुरी, पश्चिमी समुद्र का बंदरगाह

ASI बताता है कि घारापुरी की पहचान पुरी से की जाती है। यह वह नगर है जिसका नाम चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में आता है। कोलाबा जिले का गजेटियर द्वीप के उत्तर-पूर्वी कोने पर बने मोरा घाट को पुरी की सबसे संभावित जगह मानता है, और पुरी कोंकण शिलाहारों की राजधानी थी। इसे संभावित मानिए, साबित नहीं।

ASI उन ताकतों की सूची देता है, जिनके हाथ में सदियों तक यह द्वीप रहा:

  • कोंकण मौर्य और त्रैकूटक;
  • बादामी के चालुक्य;
  • शिलाहार और राष्ट्रकूट;
  • कल्याणी के चालुक्य और देवगिरि के यादव;
  • गुजरात के सुल्तान, जो अहमदाबाद से राज करते थे;
  • पुर्तगाली, फिर मराठा और आखिर में अंग्रेज।

पुर्तगाली और द्वीप का नाम

पुराने घाट के पास पत्थर का एक बड़ा हाथी खड़ा था, और पुर्तगालियों ने उसी के नाम पर द्वीप का नाम रख दिया। यह मूर्ति आज डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय के पास है। संग्रहालय के मुताबिक यह हाथी राजाबंदर घाट पर आने वाले राजसी मेहमानों का स्वागत करता था, और संग्रहालय इसे 5वीं सदी ईस्वी का बताता है।

गुफाओं के भीतर हुए ज्यादातर नुकसान का दोष भी पुर्तगाली दौर पर डाला जाता है। ज्यादातर सर्वेक्षणों में दोहराया जाने वाला किस्सा, जिसमें सहपीडिया भी शामिल है, कहता है कि सैनिकों ने नक्काशीदार पैनलों पर निशानेबाजी का अभ्यास किया। लेकिन बिना किसी शक के दर्ज अकेला नुकसान वही अभिलेख वाला पत्थर है, जिसका ब्योरा दे कूटो देते हैं।

हाथी कहां गया

हाथी द्वीप पर नहीं रहा। 1864 में अंग्रेजों ने उसे इंग्लैंड ले जाने की कोशिश की, और वह गिरकर कई टुकड़ों में टूट गया। संग्रहालय के क्यूरेटर सर जॉर्ज बर्डवुड की मदद से टुकड़े विक्टोरिया गार्डन्स ले जाए गए, जिसे अब वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान कहते हैं। फिर 1914 में सेसिल बर्न्स ने उन्हें दोबारा जोड़ा। तब से यह हाथी डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय के प्रवेश पर खड़ा है। इसीलिए ASI लिखता है कि यह मूर्ति मुंबई के जीजामाता उद्यान में रखी है।

यानी जिस अकेले हाथी ने एलिफेंटा को उसका नाम दिया, वह अब एलिफेंटा पर है ही नहीं।

महागुफा: नक्शा और भीतर का एक चक्कर

गुफा 1, यानी महागुफा, पहाड़ी में काटकर बनाया गया मंदिर है, पहाड़ी पर खड़ा किया गया नहीं। UNESCO के मुताबिक यह सामने के प्रवेश से पीछे तक 39 मीटर है। इसका मुख्य हिस्सा करीब 27 मीटर का वर्ग है, जो छह-छह खंभों की कतारों पर टिका है। UNESCO और ASI, दोनों कहते हैं कि इसका नक्शा एलोरा की गुफा 29 से काफी मिलता है, जिसे दुमार लेना कहते हैं। मुख्य प्रवेश उत्तर में है। इसके अलावा पूर्व और पश्चिम में दो और द्वार हैं।

इस नक्शे के पीछे एक विचार है। गुफा उत्तर-दक्षिण धुरी पर बनी है, जिसे सहपीडिया का सर्वेक्षण शिव मंदिर के लिए असामान्य बताता है। फिर भी भीतर के लिंग मंदिर तक पूर्व-पश्चिम रेखा पर भी पहुंचा जा सकता है। जामखेडकर इसकी वजह समझाते हैं। पूर्व की ओर से भीतर जाइए तो सामने लिंग है, यानी निराकार शिव। उत्तर की ओर से भीतर जाइए तो सामने महेशमूर्ति है, यानी वे शिव जो आधे आकार में उभर आए हैं। एक गुफा, दो रास्ते, और एक ही देवता के दो स्तर।

लिंग मंदिर एक अलग खड़ी वर्गाकार कोठरी है, जिसकी चारों दीवारों में एक-एक दरवाजा है। ऐसे नक्शे को सर्वतोभद्र कहते हैं, यानी चार दरवाजों वाला गर्भगृह, जिसे हर तरफ से देखा जा सके। आम तौर पर मंदिर का गर्भगृह एक ही दरवाजे वाला होता है। दक्षिणी दीवार पर अर्ध-स्तंभ हैं, जिन पर विशाल द्वारपाल यानी दरवाजे के रक्षक बने हैं। ये अर्ध-स्तंभ दीवार को 3 आलों में बांटते हैं। बीच वाले आले में महेशमूर्ति है, और उसके पूरब में अर्धनारीश्वर।

पैनल, उसी क्रम में जिसमें आप उनसे मिलते हैं

UNESCO लिंग मंदिर के चारों ओर पंद्रह बड़े उभरे हुए शिल्प-पैनल गिनता है। मुख्य पैनलों को याद रखने का सबसे आसान तरीका वह रास्ता है, जो दुलारी कुरैशी अपने सहपीडिया सर्वेक्षण में सुझाती हैं। उत्तरी प्रवेश के बाईं ओर वाले पैनल से शुरू कीजिए और घड़ी की सुई की दिशा में चलिए, जैसे कोई भक्त मंदिर की परिक्रमा करता है।

  1. योगीश्वर: शिव पद्मासन यानी कमल की मुद्रा में एक कमल-नाल पर बैठे हैं, जिसे दो नाग थामे हुए हैं। कुछ विद्वान उन्हें लकुलीश मानते हैं, जो पाशुपत परंपरा के केंद्रीय व्यक्ति हैं। कुछ दूसरे उन्हें दक्षिणामूर्ति का एक रूप मानते हैं।
  2. रावणानुग्रह: रावण कैलाश पर्वत को हिला रहा है और शिव अपने पैर से उसे दबा देते हैं, फिर उसे वरदान देते हैं। सहपीडिया का सर्वेक्षण इस दृश्य के एलोरा वाले रूप को इससे कहीं ऊपर रखता है।
  3. उमा-महेश्वर: शिव और पार्वती कैलाश पर साथ बैठे हैं, नीचे नंदी है; यह पैनल बुरी तरह टूटा हुआ है।
  4. अर्धनारीश्वर: शिव आधे पुरुष और आधी स्त्री के रूप में हैं, और चारों ओर अपने वाहनों पर सवार देवता जुटे हैं।
  5. महेशमूर्ति: दक्षिणी दीवार के बीच में तीन चेहरों वाली अर्धप्रतिमा, जिसका मुख उत्तरी प्रवेश की ओर है।
  6. गंगाधर: शिव अपनी जटाओं में उतरती गंगा को थामते हैं, और ऊपर बने तीन छोटे सिर तीन पवित्र नदियों के प्रतीक हैं।
  7. कल्याणसुंदर: शिव और पार्वती का विवाह, जिसमें ब्रह्मा पुरोहित बने हैं।
  8. अंधकासुरवध: अपने उग्र रूप में शिव अंधक असुर का वध कर रहे हैं, और असुर का खून थामने के लिए खोपड़ी का प्याला आगे बढ़ाए हुए हैं।
  9. नटराज: नृत्य करते शिव, यानी उत्तरी प्रवेश के दाईं ओर वाला पैनल, जिस पर परिक्रमा पूरी होती है।

इस क्रम में पढ़ें तो पैनल शिव के सौम्य और भयानक पहलुओं के बीच झूलते दिखते हैं: विवाह के बगल में संहार, और नृत्य के बगल में स्थिरता। जामखेडकर की व्याख्या में यही फैलाव मूल विषय है। पैनल महाकाव्यों और पुराणों से कथाएं लेकर रुद्र-शिव को कल्याणकारी और भयंकर, दोनों रूपों में दिखाते हैं।

छोटी गुफाएं और बौद्ध गुफाएं

पश्चिमी पहाड़ी पर महागुफा के बगल वाली छोटी गुफाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं, और इसकी बड़ी वजह भीतर जमा होने वाला मानसून का पानी है। खाई के उस पार पूर्वी पहाड़ी पर वे दो गुफाएं हैं जिन्हें बौद्ध माना जाता है। ये दबे हुए स्तूपों के पास की सादी खुदाइयां हैं। ज्यादातर आधुनिक गाइड इन्हें गुफा 6 और 7 कहते हैं, लेकिन उस पहाड़ी की छपी हुई नंबरिंग एक जैसी नहीं है। इसलिए इन्हें नंबर से नहीं, जगह से याद कीजिए, यानी स्तूप पहाड़ी। इनकी बौद्ध पहचान स्तूपों और सादे विहार वाले नक्शे पर टिकी है, किसी अभिलेख पर नहीं।

त्रिमूर्ति या महेशमूर्ति: तीन चेहरे क्या दिखाते हैं

दोनों नाम एक ही पैनल के हैं, यानी उस प्रतिमा के जिसे लोग एलिफेंटा की त्रिमूर्ति कहते हैं। लेकिन सटीक नाम महेशमूर्ति है। त्रिमूर्ति का आम अर्थ सृष्टि रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले तीन देवताओं का त्रिदेव होता है। जाल यहीं है: इस पैनल का हर चेहरा शिव का है। ASI इसे महेश-मूर्ति कहता है, यानी महेश, महान ईश्वर की प्रतिमा। UNESCO का अपना विवरण एक पैराग्राफ में इसे सदाशिव कहता है और दूसरे में त्रिमूर्ति। इससे पता चलता है कि ये नाम कितनी ढील के साथ चलते हैं।

ASI तीनों चेहरों के नाम बताता है:

  • बाईं ओर का चेहरा अघोर है, जिसे भैरव भी कहते हैं, उग्र और उथल-पुथल भरा;
  • बीच का चेहरा तत्पुरुष है, यानी महादेव, शांत और ध्यान में डूबा हुआ;
  • दाईं ओर का चेहरा वामदेव है, सौम्य और स्त्री-भाव वाला, जिसे UNESCO उमा भी मानता है।

तीन ही चेहरे क्यों, पांच क्यों नहीं? इस पैनल के पीछे का रूप सदाशिव है, यानी पांच चेहरों वाले शिव। जामखेडकर यह परंपरा समझाते हैं: सदाशिव की प्रतिमा में ज्यादा से ज्यादा चार चेहरे दिखाए जाते हैं। पांचवां चेहरा, ईशान, सबसे ऊपर होता है। वह मौजूद माना जाता है, लेकिन कभी तराशा नहीं जाता। एलिफेंटा में तीन चेहरे दिखते हैं, और चौथा पीछे की ओर समझ लिया जाता है।

जामखेडकर, स्टेला क्रैमरिश के पीछे चलते हुए, इसे नक्शे से जोड़ते हैं। उनकी व्याख्या में एलिफेंटा शिव को तीन स्तरों पर दिखाता है:

  • निष्कल, यानी निराकार: चार दरवाजों वाले मंदिर के भीतर का लिंग;
  • सकल-निष्कल, यानी आंशिक आकार वाला: महेशमूर्ति, जिसके चेहरे चट्टान से उभर रहे हैं;
  • सकल, यानी पूरे आकार वाला: कथा वाले पैनल, जहां शिव विवाह करते हैं, नाचते हैं और लड़ते हैं।

इस विचार को पकड़ने का एक तरीका यह है: एक ही मंच पर तीन मुखौटे पहने एक ही अभिनेता, तीन अलग-अलग अभिनेता नहीं। यह तुलना एक हद तक ही काम करती है। अभिनेता के मुखौटे उसके एक असली चेहरे के ऊपर पहनी गई पोशाक भर हैं। जबकि शैव धर्मशास्त्र में उग्र और सौम्य, दोनों चेहरे एक ही देवता के बराबर असली पहलू हैं।

यह योजना संरक्षकों के संप्रदाय की ओर भी इशारा करती है। क्रैमरिश और इतिहासकार चार्ल्स कॉलिन्स का तर्क था कि महागुफा पाशुपत शिक्षाओं की जरूरतें पूरी करती है। पाशुपत एक शैव संप्रदाय था, जिसके दीक्षित साधक कई चरणों से गुजरते थे। इन चरणों में गुफा में रहना और शिव के पांच चेहरों पर ध्यान लगाना भी शामिल था। योगीश्वर पैनल, जिसे कुछ विद्वान लकुलीश मानते हैं, इसी व्याख्या में फिट बैठता है।

UNESCO सदाशिव की ऊंचाई करीब 7 मीटर बताता है, जबकि सहपीडिया का सर्वेक्षण 18 फुट, यानी करीब 5.5 मीटर देता है; उत्तर में UNESCO का आंकड़ा ही लिखिए।

एलिफेंटा की गुफाएं आज: UNESCO का दर्जा और संरक्षण

एलिफेंटा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से संरक्षित है और 1987 से विश्व धरोहर स्थल है। इसे 7-11 दिसंबर 1987 को पेरिस में हुए विश्व धरोहर समिति के 11वें सत्र में सूची में शामिल किया गया। UNESCO का रिकॉर्ड आज भी इस स्थल को कोलाबा जिले के तहत दिखाता है, जो रायगढ़ जिले का पुराना नाम है। सूची में शामिल करने की UNESCO की वजहें बिल्कुल साफ हैं:

  • मानदंड (i), मानव की रचनात्मक प्रतिभा की उत्कृष्ट कृति: लिंग मंदिर के चारों ओर के पंद्रह बड़े उभरे पैनल, जिन्हें UNESCO शिव उपासना के सबसे अहम संग्रहों में से एक कहता है।
  • मानदंड (iii), किसी सांस्कृतिक परंपरा का असाधारण साक्ष्य: ये गुफाएं पश्चिमी भारत की शैल वास्तुकला की सबसे ऊंची उपलब्धि हैं, और UNESCO के उद्धरण में त्रिमूर्ति का नाम लिया गया है।

कानूनी सुरक्षा प्राचीन स्मारक, पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 से मिलती है, साथ में इसके 1959 के नियम और 2010 का संशोधन भी। सहपीडिया का सर्वेक्षण 1985 की एक अधिसूचना का जिक्र भी करता है, जो पूरे द्वीप को संरक्षित करती है। इसके तहत तट से 1 किलोमीटर बाहर तक एक प्रतिबंधित पट्टी तय है।

UNESCO का अपना आकलन समस्याओं को साफ-साफ गिनाता है:

  • खारेपन का असर और चट्टान की सतह का आम क्षरण, जो समुद्र के बीच बसे द्वीप की कीमत है;
  • पास का औद्योगिक विकास, एक खतरा जिसकी ओर सूची में शामिल करते समय ही इशारा कर दिया गया था;
  • 1960 के दशक में हुई खंभों की मरम्मत, जिसमें दरारें आ गई हैं और जिसे खोलकर दोबारा करना होगा;
  • एक संरक्षण प्रबंधन योजना, जिसे अभी पूरा करना, मंजूर करना और लागू करना बाकी है।

2026 की खुदाई में क्या मिला

अप्रैल 2026 में ASI ने द्वीप पर हुई खुदाई से नई खोजों की जानकारी दी। इनमें एक सीढ़ीदार जलाशय और कलचुरी राजा कृष्णराज के तांबे के कई सिक्के शामिल थे। 17 जुलाई 2026 को द वीक में छपे एक कॉलम ने इस काम का और ब्योरा दिया, जो डेक्कन कॉलेज के साथ मिलकर किया गया था:

  • T आकार का एक सीढ़ीदार जलाशय;
  • रोमन एम्फोरा के टुकड़े और पश्चिम एशियाई टॉरपीडो जार, यानी लंबी दूरी के समुद्री व्यापार में सामान रखने वाले मर्तबान;
  • बाहर से आए मिट्टी के बर्तन, पत्थर के लंगर और लोहे की सिल्लियां।

इससे दो बातें निकलती हैं। सिक्के उस कलचुरी मौजूदगी को और वजन देते हैं, जिसके पक्ष में स्पिंक ने तर्क दिया था। हालांकि वे अब भी मौजूदगी ही दिखाते हैं, निर्माण का श्रेय नहीं। दूसरी बात, व्यापार से जुड़ी खोजें उस पुराने विचार को सहारा देती हैं कि घारापुरी एक चालू बंदरगाह था, और यह पुरी वाली पहचान से मेल खाता है। भारत के सूचीबद्ध स्थलों में एलिफेंटा की जगह समझने के लिए भारत के UNESCO विश्व धरोहर स्थलों की पूरी सूची देखिए।

परीक्षा के लिए एलिफेंटा की गुफाएं कैसे पढ़ें

एलिफेंटा GS पेपर I के भारतीय संस्कृति वाले हिस्से में, कला रूपों और वास्तुकला के तहत आता है। साथ ही यह गुप्तोत्तर मूर्तिकला का मानक उदाहरण भी है, यानी गुप्त काल की शास्त्रीय कला के बाद वाली पीढ़ी का। प्रीलिम्स की बात करें तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति के हैं।

यह विषय किसी एक स्थल के तौर पर नहीं, बल्कि शैलकृत वास्तुकला के तौर पर पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2020, GS पेपर I में पूछा गया: “शैलकृत वास्तुकला प्रारंभिक भारतीय कला और इतिहास की हमारी जानकारी के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। चर्चा कीजिए।” एलिफेंटा इस प्रश्न के कला वाले हिस्से का जवाब देता है, और कृष्णराज के सिक्के इतिहास वाले हिस्से का। इतिहास वैकल्पिक विषय 2015, पेपर I में पूछा गया: “एलोरा में बना कैलाश मंदिर भारत में शैलकृत वास्तुकला का चरम बिंदु है। स्पष्ट कीजिए।” दुमार लेना से मेल की मदद से आप एलिफेंटा को मौर्यकालीन बराबर गुफाओं से कैलाश तक के सफर में सही जगह रख सकते हैं।

इन्हें तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएं:

  • स्थान: एलिफेंटा द्वीप, जिसे घारापुरी कहते हैं, मुंबई बंदरगाह में; उरण तालुका, रायगढ़ जिला।
  • गुफाएं: कुल 7; पश्चिमी पहाड़ी पर शैव समूह और स्तूप पहाड़ी पर 2 बौद्ध गुफाएं।
  • काल: विवादित, करीब 6ठी सदी ईस्वी, सबसे संभावित रूप से कृष्णराज के दौर में आरंभिक कलचुरी।
  • महागुफा: 39 मीटर गहरी, उत्तर-दक्षिण धुरी, और एलोरा के दुमार लेना वाले नक्शे पर बना चार दरवाजों वाला सर्वतोभद्र लिंग मंदिर।
  • महेशमूर्ति: अघोर, तत्पुरुष और वामदेव, तीनों शिव; आम बोलचाल में त्रिमूर्ति।
  • नाम: पत्थर के एक हाथी से, जो 1864 में टूटा, 1914 में दोबारा जोड़ा गया और अब डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय में है।
  • UNESCO: 1987, 11वां सत्र, मानदंड (i) और (iii)।

तीन उलझनें नंबर कटवाती हैं:

  • त्रिमूर्ति और महेशमूर्ति। एक ही पैनल। लिखिए “महेशमूर्ति, जिसे आम तौर पर त्रिमूर्ति कहा जाता है”, और साफ बताइए कि तीनों चेहरे शिव के हैं।
  • एलिफेंटा और एलोरा। एलोरा की गुफा 29 का नक्शा महागुफा जैसा है, लेकिन एलोरा तीन धर्मों का 34 गुफाओं वाला स्थल है। वहीं एलिफेंटा बौद्ध अवशेषों वाला एक शैव द्वीप-स्थल है।
  • एलिफेंटा और कान्हेरी। दोनों मुंबई के दायरे में हैं, लेकिन संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर बसा कान्हेरी करीब 109 गुफाओं वाला बौद्ध परिसर है।

इसे महाराष्ट्र के इसके दो बड़े सगे स्थलों के साथ रखकर देखिए:

स्थलधर्ममुख्य काल (UNESCO)पहचानUNESCO सूची में
अजंताबौद्ध2री से 1ली सदी ईसा पूर्व, फिर 5वीं से 6ठी सदी ईस्वी30 गुफाएं; चित्रकारी; चैत्य और विहार1983; मानदंड (i), (ii), (iii) और (vi)
एलोराबौद्ध, ब्राह्मण धर्म और जैन6ठी से 12वीं सदी ईस्वी34 गुफाएं; कैलाश मंदिर (गुफा 16)1983; मानदंड (i), (iii) और (vi)
एलिफेंटाशैव, बौद्ध अवशेषों के साथ5वीं सदी के मध्य से 6ठी सदी ईस्वीमहागुफा और महेशमूर्ति1987; मानदंड (i) और (iii)

एलिफेंटा उस अभ्यर्थी को इनाम देता है, जो किसी अनिश्चितता को धुंधला किए बिना थाम सके। नाम उस हाथी से आया है जो अब वहां नहीं है। मशहूर त्रिमूर्ति एक ही देवता है। और निर्माता किसी हस्ताक्षर से नहीं, सिक्कों से निकाला गया एक मजबूत अनुमान है। जो उत्तर यह सब साफ-साफ कहे और एक विद्वान का नाम ले, वह गढ़ी हुई पक्की तारीख वाले उत्तर से ज्यादा भरोसेमंद लगता है।

सामान्य प्रश्न

एलिफेंटा की गुफाएं किसने बनवाईं?

कोई अभिलेख निर्माता का नाम नहीं बताता, इसलिए हर जवाब एक अनुमान है। सबसे मजबूत मत वॉल्टर स्पिंक का है, जो इसका श्रेय 6ठी सदी ईस्वी के मध्य के आरंभिक कलचुरी राजा कृष्णराज को देते हैं, क्योंकि उनके तांबे के सिक्के द्वीप पर बड़ी संख्या में मिलते हैं। दूसरे विद्वानों ने बादामी के चालुक्यों या राष्ट्रकूटों के पक्ष में तर्क दिए हैं।

इसे एलिफेंटा क्यों कहते हैं?

पुर्तगालियों ने द्वीप का नाम पत्थर के उस बड़े हाथी पर रखा, जो इसके पुराने घाट के पास खड़ा था। द्वीप का स्थानीय मराठी नाम घारापुरी है, जो इसके दक्षिणी हिस्से के गांव से आया है। 1864 में टूटने के बाद हाथी को मुंबई ले जाया गया।

एलिफेंटा की मूर्ति त्रिमूर्ति है या महेशमूर्ति?

यह दो नामों वाला एक ही पैनल है, और सटीक नाम महेशमूर्ति है। तीनों चेहरे शिव के हैं। ASI इन्हें बाईं ओर अघोर, बीच में तत्पुरुष और दाईं ओर वामदेव के रूप में पहचानता है। त्रिमूर्ति वाला आम नाम गलत ढंग से तीन अलग-अलग देवताओं के हिंदू त्रिदेव की ओर इशारा करता है।

एलिफेंटा की कौन-सी गुफाएं बौद्ध हैं?

पूर्वी पहाड़ी, जिसे स्तूप पहाड़ी कहते हैं, पर बनी दो छोटी और सादी गुफाएं बौद्ध मानी जाती हैं, और उनके पास दबे स्तूप भी। ज्यादातर गाइड इन्हें गुफा 6 और 7 कहते हैं, हालांकि अलग-अलग सर्वेक्षणों में नंबरिंग बदलती रहती है। महागुफा समेत सारी शैव गुफाएं पश्चिमी पहाड़ी पर हैं।

एलिफेंटा की गुफाओं को UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया?

UNESCO ने 1987 में, पेरिस में हुए विश्व धरोहर समिति के 11वें सत्र में, एलिफेंटा की गुफाओं को सूची में शामिल किया। इन्हें मानदंड (i) और (iii) के तहत चुना गया: शिव के बड़े उभरे पैनलों के लिए, और पश्चिमी भारत की सबसे बेहतरीन शैल वास्तुकला के तौर पर।

एलिफेंटा के हाथी की मूर्ति अब कहां है?

यह मुंबई में डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय के प्रवेश पर खड़ी है, उन बगीचों में जिन्हें अब वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान कहते हैं। 1864 में अंग्रेजों ने इसे जहाज से इंग्लैंड भेजने की कोशिश की और रास्ते में यह टूट गई; 1914 में सेसिल बर्न्स ने इसके टुकड़े दोबारा जोड़े।

एलिफेंटा की गुफाएं कितनी पुरानी हैं?

ज्यादातर स्रोत शैव गुफाओं को 6ठी सदी ईस्वी के आसपास रखते हैं, लेकिन सटीक तारीख विवादित है। UNESCO 5वीं सदी के मध्य से 6ठी सदी बताता है और ASI करीब 6ठी से 7वीं सदी, जबकि पुराने विद्वान 8वीं सदी तक गए थे। द्वीप के बौद्ध अवशेष इनसे पुराने हैं और 2री सदी ईसा पूर्व तक जाते हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. एलिफेंटा की गुफाओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. UNESCO ने 1987 में इन्हें विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूची में शामिल किया।
2. इन्हें मानदंड (i) और (iii) के तहत शामिल किया गया।
3. महागुफा का नक्शा एलोरा की दुमार लेना गुफा से काफी मिलता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d) UNESCO का रिकॉर्ड 1987 का साल और मानदंड (i) और (iii) बताता है। साथ ही UNESCO और ASI, दोनों महागुफा के नक्शे की तुलना एलोरा की दुमार लेना (गुफा 29) से करते हैं।

2. एलिफेंटा की महागुफा के महेशमूर्ति पैनल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसके तीन चेहरे ब्रह्मा, विष्णु और शिव को दर्शाते हैं।
2. ASI इसके चेहरों की पहचान अघोर, तत्पुरुष और वामदेव के रूप में करता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b) तीनों चेहरे शिव के ही रूप हैं; त्रिमूर्ति नाम प्रचलित है, लेकिन भ्रामक है।

3. पत्थर का वह हाथी, जिसके नाम पर पुर्तगालियों ने एलिफेंटा द्वीप का नाम रखा, अब कहां खड़ा है?

  • (a) घारापुरी गांव का घाट
  • (b) डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय, मुंबई का प्रवेश
  • (c) छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय, मुंबई
  • (d) विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम, लंदन

उत्तर: (b) 1864 में अंग्रेजों की इसे जहाज से इंग्लैंड भेजने की कोशिश में यह टूट गया था, और 1914 में संग्रहालय में इसे दोबारा जोड़ा गया।

4. एलिफेंटा की महागुफा के लिए वॉल्टर स्पिंक की 6ठी सदी के मध्य वाली कलचुरी तारीख मुख्य रूप से किस पर टिकी है?

  • (a) गुफा के प्रवेश के ऊपर लगा एक तिथियुक्त अभिलेख
  • (b) द्वीप पर मिले कलचुरी राजा कृष्णराज के तांबे के सिक्के
  • (c) चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय का एक ताम्रपत्र दान
  • (d) ऐहोल अभिलेख में गुफा का वर्णन

उत्तर: (b) प्रवेश के ऊपर लगा अभिलेख वाला पत्थर पुर्तगाली निकाल ले गए और वह खो गया, इसलिए सिक्के ही मुख्य भौतिक सबूत हैं।

5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. सर्वतोभद्र : ऐसा मंदिर जिसकी चारों दीवारों में एक-एक दरवाजा हो
2. निष्कल : चेहरे और अंगों के साथ दिखाए गए शिव
3. घारापुरी : द्वीप का स्थानीय मराठी नाम
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 1 और 3
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) निष्कल का अर्थ निराकार शिव है, जिनकी पूजा लिंग के रूप में होती है; महेशमूर्ति आंशिक आकार वाली सकल-निष्कल प्रतिमा है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. एलिफेंटा की गुफाओं में कोई अभिलेख नहीं बचा है, फिर भी इतिहासकार इन्हें एक वंश और एक सदी से जोड़ते हैं। इनकी तिथि से जुड़े सबूतों और आपस में टकराते मतों का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. समझाइए कि एलिफेंटा की महागुफा का नक्शा अभिव्यक्ति के अलग-अलग स्तरों पर शिव के विचार को कैसे सामने रखता है। (10 अंक, 150 शब्द)
  3. एलिफेंटा की महेशमूर्ति को अक्सर त्रिमूर्ति कहा जाता है। इस पैनल की प्रतिमा-विज्ञान पर चर्चा कीजिए और समझाइए कि यह प्रचलित नाम भ्रम क्यों पैदा करता है। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. शैव केंद्र बनने से पहले एलिफेंटा एक बौद्ध स्थल और एक बंदरगाह था। हाल की खुदाई समेत पुरातात्विक सबूतों के आधार पर इन चरणों का पता लगाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
  5. भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।

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Written by

Ashish Bharti Sir

Ashish Bharti teaches Modern Indian History at Anantam IAS. He takes students from the Company's expansion through the national movement, keeping the phases, personalities and debates straight so Mains answers on the freedom struggle carry argument rather than a timeline.

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