Anantam IASHindi Note · 4 September 2026

पी.वी. नरसिम्हा राव: वे 9वें प्रधानमंत्री जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था नए सिरे से लिखी

पी.वी. नरसिम्हा राव का जीवन, 1991 का भुगतान संतुलन संकट, LPG सुधार, लुक ईस्ट नीति, पोखरण की तैयारी, बाबरी विध्वंस और JMM मामला, और 2024 का भारत रत्न — UPSC के लिहाज़ से पूरी कहानी।

पी.वी. नरसिम्हा राव 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक भारत के 9वें प्रधानमंत्री रहे और उन्होंने देश को आज़ादी के बाद के सबसे बड़े आर्थिक मोड़ से गुज़ारा। जब पी.वी. नरसिम्हा राव ने शपथ ली, भारत के पास मुश्किल से दो हफ़्ते के आयात लायक़ विदेशी मुद्रा भंडार बचा था, सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा जा रहा था, और भुगतान संतुलन का ऐसा संकट सामने था जिससे देश के डिफ़ॉल्ट होने का ख़तरा था। कुछ ही महीनों में उनकी अल्पमत कांग्रेस सरकार ने लाइसेंस राज ख़त्म किया, रुपये का अवमूल्यन किया, कई क्षेत्र निजी और विदेशी पूँजी के लिए खोले, और दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की जगह नए सिरे से तय की।

उन्हें याद तो “हिचकिचाते सुधारक” के तौर पर किया जाता है, लेकिन पी.वी. नरसिम्हा राव में पढ़ाई की गहराई, राजनीति की समझ और कठिन अर्थशास्त्र एक ग़ैर-राजनीतिक टेक्नोक्रेट — मनमोहन सिंह — को सौंप देने की तैयारी, तीनों थीं, और इसी मेल से एक चुपचाप हुई क्रांति निकली। आलोचक उन्हें दिसंबर 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस, झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत मामले और उस रूखे निजी अंदाज़ के लिए कठघरे में खड़ा करते हैं जिसने कांग्रेस संगठन को बेसहारा छोड़ दिया। तीन दशक बाद 2024 में मरणोपरांत मिले भारत रत्न ने उन्हें आधुनिक भारत के शिल्पकार की जगह वापस दिला दी है।

शुरुआती जीवन और राजनीति की ट्रेनिंग

पी.वी. नरसिम्हा राव

पामुलापर्ति वेंकट नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून 1921 को लकनेपल्ली गाँव (तब हैदराबाद राज्य, आज का तेलंगाना) में एक नियोगी ब्राह्मण किसान परिवार में हुआ। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से क़ानून में एमए किया, स्पेनिश और फ़ारसी समेत दस भाषाएँ सीखीं, और राजनीति के साथ-साथ तेलुगु और मराठी साहित्य का अनुवाद भी करते रहे।

वे 1948 में निज़ाम के ख़िलाफ़ चले पुलिस एक्शन के दौरान हैदराबाद स्टेट कांग्रेस से जुड़े, आंध्र प्रदेश विधानसभा में तीन कार्यकाल रहे, और इंदिरा गांधी के दौर में 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री रहते उन्होंने भूमि सीमा क़ानून और मुल्की नियम लागू कराए, लेकिन जय आंध्र आंदोलन के बाद पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद राव 1977 में लोकसभा पहुँचे और इंदिरा तथा राजीव गांधी की सरकारों में विदेश, गृह, रक्षा और मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाले — प्रधानमंत्री बनने तक ऐसा तजुर्बा किसी और के पास शायद ही था।

7 रेस कोर्स रोड तक का रास्ता

राव 1991 के आम चुनाव से पहले ही चुनावी राजनीति से रिटायर हो चुके थे और दिल्ली में अपनी किताबें बाँध रहे थे। 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या ने सब बदल दिया। कांग्रेस 244 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी — बहुमत से कम — और नेतृत्व का ख़ालीपन ऐसे नाम की तरफ़ झुका जिस पर किसी गुट का ठप्पा नहीं था। पी.वी. नरसिम्हा राव 20 जून 1991 को कांग्रेस संसदीय दल के नेता चुने गए और अगले दिन शपथ ले ली। बाद में उन्होंने नंदयाल उपचुनाव लड़कर जीता और लोकसभा में पहुँचे।

1991 का भुगतान संतुलन संकट

जब पी.वी. नरसिम्हा राव ने कुर्सी संभाली, अर्थव्यवस्था के सारे काँटे लाल निशान पर थे। विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर क़रीब 1.2 अरब डॉलर रह गया था — यानी दो से तीन हफ़्ते के आयात लायक़। राजकोषीय घाटा GDP के 8 प्रतिशत से ऊपर चला गया था। चंद्रशेखर सरकार पहले ही 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास गिरवी रखने के लिए भेज चुकी थी। स्टैंडर्ड एंड पूअर्स ने भारत की रेटिंग घटाकर जंक कर दी थी। खाड़ी युद्ध के बाद तेल के दाम चढ़ गए थे और कुवैत में काम कर रहे भारतीयों से आने वाला पैसा रुक गया था।

राव का पहला फ़ैसला रणनीति वाला था। उन्होंने मनमोहन सिंह को — जो RBI के पूर्व गवर्नर और वित्त सचिव रह चुके थे और उस वक़्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मुखिया थे — वित्त मंत्री बनाया। इस जोड़ी ने एक साथ दो संदेश दिए: राजनीतिक ज़िम्मेदारी भी और तकनीकी भरोसा भी। इसके बाद जो नीतिगत पैकेज आया, उसे गहराई से समझने के लिए 1991 के आर्थिक सुधारों पर हमारा लेख LPG ढाँचे को विस्तार से खोलता है।

उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण

जुलाई 1991 और 1996 के लोकसभा चुनाव के बीच राव-सिंह जोड़ी ऐसे सुधार लाई जिन्होंने ज़्यादातर क्षेत्रों में औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था ख़त्म कर दी, रुपये का दो किस्तों में क़रीब 18 प्रतिशत अवमूल्यन किया, एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार क़ानून की निवेश सीमा हटाई, ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम, बिजली, बैंकिंग और बीमा को निजी पूँजी के लिए खोला, सबसे ऊँची सीमा शुल्क दर 150 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत की ओर लाई, और विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय शेयर बाज़ार में आने दिया। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को 1992 में वैधानिक दर्जा मिला। 24 जुलाई 1991 की नई औद्योगिक नीति — जो मनमोहन सिंह के पहले बजट वाले ही दिन आई — ने सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सिर्फ़ 18 उद्योग सुरक्षित रखे, जबकि पहले 17 पूरी तरह सुरक्षित थे।

पी.वी. नरसिम्हा राव इसमें चुपचाप बैठे रहने वाले नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस के भीतर का राजनीतिक जोखिम ख़ुद उठाया, वाम दलों और मज़दूर संगठनों को हड़ताल की धमकी से पीछे हटाया, और हर क़दम को संसद से मंज़ूर कराया। 1992 में जब हर्षद मेहता घोटाला सामने आया, तब भी उनकी सरकार ने पूँजी बाज़ार खोलने का फ़ैसला वापस नहीं लिया — उल्टे SEBI को मज़बूत किया।

विदेश नीति: लुक ईस्ट और उससे आगे

सोवियत संघ के बिखरने के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव ने भारतीय कूटनीति को नए सिरे से सेट किया। उन्होंने 1992 में लुक ईस्ट नीति शुरू की, ASEAN के साथ क्षेत्रीय संवाद साझेदारी बनाई और दक्षिण-पूर्व एशिया से तीन दशक की ठंडी दूरी ख़त्म की। जनवरी 1992 में उन्होंने इज़राइल के साथ पूरे राजनयिक रिश्ते खोले — एक फ़ैसला जो घरेलू राजनीति की हिचक की वजह से लंबे समय से टलता आ रहा था। 1993 में उन्होंने चीन का दौरा किया और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने का ऐतिहासिक समझौता किया, जो 1962 के बाद इस तरह का पहला द्विपक्षीय विश्वास-बहाली उपाय था।

परमाणु तैयारी

कम दिखने वाली बात यह है कि पी.वी. नरसिम्हा राव ने दिसंबर 1995 में पोखरण में परमाणु परीक्षण की तैयारियों को मंज़ूरी दी थी। अमेरिकी उपग्रहों ने यह हलचल पकड़ ली और तैयारी रोकनी पड़ी। 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 दिन के लिए शपथ ली, तो कहा जाता है कि राव ने उन्हें एक पर्चा थमाया था: “सामग्री तैयार है।” इस तरह मई 1998 का पोखरण-II उसी सिलसिले का हिस्सा है जो राव के समय शुरू हुआ था।

घरेलू उपलब्धियाँ और विवाद

राव के कार्यकाल में 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992-93) आया, जिसने पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों को पक्का ढाँचा दिया; राष्ट्रीय शेयर बाज़ार (1994 में शुरू) खड़ा हुआ; और 1994 की दूरसंचार नीति आई जिसने मोबाइल सेवाएँ खोलीं। उन्होंने उस विशिष्ट पहचान वाली बहस को रफ़्तार दी जो बाद में मनमोहन सिंह के दौर में आधार बनकर खिली, और योजना का वह ढाँचा भी बोया जो योजना आयोग से होते हुए आज के नीति आयोग तक पहुँचा।

बाबरी मस्जिद विध्वंस

अयोध्या का विवादित ढाँचा 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया, जबकि BJP की अगुआई वाली उत्तर प्रदेश सरकार उसे रोक नहीं पाई। पी.वी. नरसिम्हा राव पर कुछ न करने का आरोप लगा — पहले ही राष्ट्रपति शासन न लगाने का उनका फ़ैसला आज भी बहस में है। विध्वंस के तुरंत बाद उन्होंने UP, MP, राजस्थान और हिमाचल की BJP सरकारें बर्ख़ास्त कीं और ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम क़ानून के तहत RSS, VHP और बजरंग दल पर पाबंदी लगाई। उनके कार्यकाल में बना लिबरहान आयोग रिपोर्ट देने में 17 साल ले गया। उसके बाद मुंबई और दूसरी जगहों पर हुए सांप्रदायिक दंगों में 2,000 से ज़्यादा लोग मारे गए।

JMM रिश्वत मामला

1993 में राव लोकसभा में 265-251 से अविश्वास प्रस्ताव जीत गए। बाद में आरोप लगे कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए पैसे दिए गए थे। पी.वी. नरसिम्हा राव को 2000 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया, लेकिन 2002 में अपील पर बरी कर दिया गया — अदालतों ने कहा कि अनुच्छेद 105 के तहत संसदीय विशेषाधिकार सांसदों को बचाता है, रिश्वत देने वालों को उनकी निजी हैसियत में नहीं।

विरासत और 2024 का भारत रत्न

आम चुनाव हारने के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव मई 1996 में कुर्सी से हटे। कांग्रेस ने उसके बाद उनके साथ ठंडा बर्ताव किया — 2004 में उनके पार्थिव शरीर को AICC मुख्यालय के भीतर तक नहीं ले जाने दिया गया, यह क़िस्सा मशहूर है। 9 फ़रवरी 2024 को घोषित भारत रत्न ने इतिहास की उस चोट को ठीक किया। आज पी.वी. नरसिम्हा राव को हर पार्टी में उन सुधारों के राजनीतिक मंज़ूरीदाता के तौर पर माना जाता है, जिन्होंने एक दशक में भारत की प्रति व्यक्ति GDP दोगुनी कर दी और 2020 के दशक तक देश को दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया।

UPSC की तैयारी करने वालों के लिए राव के साल आधुनिक इतिहास के उस हिस्से को बाँधते हैं जहाँ गठबंधन की राजनीति, आर्थिक उदारीकरण और विदेश नीति की नई दिशा, तीनों एक जगह मिलते हैं। उनकी पारी को मनमोहन सिंह के कार्यकाल के साथ रखकर देखिए, जिन्होंने 2004-14 में उन दूसरी पीढ़ी के सुधारों को पूरा किया जो पी.वी. नरसिम्हा राव ने 1991 में शुरू किए थे, और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी, जो विनिवेश, राजकोषीय ज़िम्मेदारी और बुनियादी ढाँचे से चलने वाली विकास नीति को NDA-I के सालों में आगे ले गए।

प्रशासनिक सुधार और सांस्कृतिक पक्ष

पी.वी. नरसिम्हा राव ने उच्च शिक्षा और संस्कृति के लिए संस्थागत जगह भी बढ़ाई। इंद्रा साहनी फ़ैसले के बाद उन्होंने 1993 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों का वह ढाँचा फैलाया जो आगे चलकर खिला, और चुपचाप उस सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया में निवेश को मंज़ूरी दी जिसने मोबाइल क्रांति को थामा। कई भाषाएँ जानने वाले और आत्मकथात्मक उपन्यास The Insider लिखने वाले राव इस बात पर अड़े रहे कि साहित्य अकादमी और केंद्रीय विश्वविद्यालय राजनीतिक नियुक्तियों की उठापटक से बचे रहें — संयम का ऐसा रिकॉर्ड जो बाद की सरकारों में हमेशा नहीं दिखा।

सामान्य प्रश्न

पी.वी. नरसिम्हा राव कौन थे और वे अहम क्यों हैं?

पी.वी. नरसिम्हा राव भारत के 9वें प्रधानमंत्री थे और 1991-96 तक इस पद पर रहे। वे इसलिए अहम हैं क्योंकि उन्होंने देश को 1991 के भुगतान संतुलन संकट से बाहर निकाला — LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधार शुरू किए, भारतीय बाज़ार निजी और विदेशी पूँजी के लिए खोले, रुपये का अवमूल्यन किया, औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था ख़त्म की और लुक ईस्ट नीति शुरू की।

नरसिम्हा राव को “हिचकिचाता सुधारक” क्यों कहा गया?

उन्हें समाजवादी दौर की नीतियाँ और एक अल्पमत सरकार विरासत में मिली थी, जिसमें राजनीतिक जोखिम लेने की गुंजाइश कम थी, फिर भी उन्होंने सुधार आगे बढ़ाए। आर्थिक रणनीति उन्होंने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी और कांग्रेस के भीतर की राजनीतिक क़ीमत ख़ुद चुकाई। उनका पढ़ाकू और कम बोलने वाला अंदाज़ यह भ्रम बनाता था कि सुधार उनके आसपास अपने आप हो रहे हैं, जबकि असल में हर बड़े क़दम पर उनकी साफ़ मंज़ूरी थी।

नरसिम्हा राव के दौर में 1991 के मुख्य सुधार क्या थे?

जुलाई 1991 की नई औद्योगिक नीति ने ज़्यादातर उद्योगों से लाइसेंस हटाया, ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम, बिजली और बैंकिंग को निजी निवेश के लिए खोला, रुपये का क़रीब 18 प्रतिशत अवमूल्यन किया, सीमा शुल्क घटाया, शेयर बाज़ार में FII निवेश की इजाज़त दी और 1992 में SEBI को वैधानिक दर्जा दिया। इसी दौर में 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने स्थानीय स्वशासन को पक्का ढाँचा दिया।

बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की क्या भूमिका थी?

6 दिसंबर 1992 को जब ढाँचा गिराया गया, पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे। आलोचक कहते हैं कि ख़ुफ़िया जानकारी मिलने के बावजूद उन्होंने BJP की अगुआई वाली UP सरकार पर पहले से राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया। विध्वंस के बाद उन्होंने BJP की चार राज्य सरकारें बर्ख़ास्त कीं और RSS तथा VHP पर पाबंदी लगाई। उनके समय बना लिबरहान आयोग ज़िम्मेदारी की जाँच करता रहा।

क्या पोखरण परमाणु परीक्षण की योजना नरसिम्हा राव ने बनाई थी?

हाँ। पी.वी. नरसिम्हा राव ने दिसंबर 1995 में पोखरण में तैयारियों को मंज़ूरी दी थी। अमेरिकी उपग्रहों ने हलचल पकड़ ली और कूटनीतिक दबाव में तैयारी रोकनी पड़ी। कहा जाता है कि 1996 में उन्होंने आने वाले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को बता दिया था कि सामग्री तैयार है, जिससे मई 1998 में पोखरण-II मुमकिन हुआ।

नरसिम्हा राव को 2024 में भारत रत्न क्यों मिला?

भारत रत्न 9 फ़रवरी 2024 को मरणोपरांत दिया गया — 1991 के आर्थिक सुधार शुरू करने, लुक ईस्ट नीति, पंचायती राज संशोधनों और आधुनिक भारतीय राजकाज में उनके कुल योगदान के लिए। इस सम्मान को बड़े पैमाने पर उस नेता के साथ दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर सुलह की तरह पढ़ा गया, जिससे कांग्रेस ने 1996 के बाद दूरी बना ली थी।

नरसिम्हा राव से जुड़ा JMM रिश्वत मामला क्या था?

1993 में उनकी सरकार 265-251 से अविश्वास प्रस्ताव जीत गई थी। बाद में आरोप लगे कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए पैसे दिए गए। पी.वी. नरसिम्हा राव को 2000 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया, लेकिन 2002 में अनुच्छेद 105 के संसदीय विशेषाधिकार के तहत बरी कर दिया गया।

दूसरे भारतीय प्रधानमंत्रियों के मुक़ाबले नरसिम्हा राव कहाँ ठहरते हैं?

1990 के बाद के प्रधानमंत्रियों में पी.वी. नरसिम्हा राव इसलिए अलग दिखते हैं कि उन्होंने 1991 से पहले वाली अर्थव्यवस्था से ढाँचागत तौर पर नाता तोड़ा। मनमोहन सिंह ने 2004-14 में सुधारों को पुख़्ता किया, अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998-2004 में विनिवेश और बुनियादी ढाँचे पर ज़ोर दिया, और वी.पी. सिंह ने 1989-90 में मंडल वाली सामाजिक न्याय की दिशा तय की। राव की ख़ासियत यह है कि उन्होंने आर्थिक, विदेश नीति और संघीय ढाँचे, तीनों में एक साथ बदलाव किया, वह भी अल्पमत सरकार से।