शेल गैस: फ्रैकिंग कैसे काम करती है, भारत के बेसिन और गायब उत्पादन
शेल गैस को समझिए: क्षैतिज ड्रिलिंग और फ्रैकिंग, भारत के बेसिन और भंडार के अनुमान, 2013, 2016 और 2018 की नीतियाँ, और व्यावसायिक उत्पादन अब तक क्यों नहीं आया।
शेल गैस वह प्राकृतिक गैस है जो शेल चट्टान के भीतर फँसी रहती है। शेल महीन दानों वाली चट्टान है, और इतनी कसी हुई होती है कि गैस अपने आप बाहर नहीं निकल पाती। इसे निकालने के लिए चट्टान के भीतर बगल की दिशा में ड्रिलिंग की जाती है, और फिर तेज दबाव वाले तरल से चट्टान को चटकाया जाता है। इसी गैस ने अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा गैस उत्पादक बना दिया। भारत 2011 में दुर्गापुर के पास ONGC के पहले शेल कुएँ के बाद से ही इसका अध्ययन कर रहा है। 2013 के बाद से भारत तीन बार अपने कानून और लाइसेंस शेल के लिए खोल चुका है।
ज्यादातर पाठकों के मन में एक गलतफहमी बैठी रहती है। उन्हें लगता है कि भारत शेल के एक साबित हो चुके खजाने पर बैठा है और बस नीति ने उसे रोक रखा है। आँकड़े कुछ और कहते हैं। भारत की शेल गैस के सरकारी अनुमान 6.1 से 584 ट्रिलियन क्यूबिक फीट (tcf) तक जाते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि गिनती किसने की और किस चीज की गिनती की। और रिकॉर्ड पर मौजूद आखिरी सरकारी आँकड़ा अब भी कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं दिखाता। यह नोट साफ करता है कि शेल गैस क्या है, फ्रैकिंग कैसे काम करती है, भारत को असल में क्या मिला और गैस अब तक क्यों नहीं आई।
शेल गैस एक नजर में
शेल गैस वही मीथेन-भरपूर गैस है जो किसी पारंपरिक कुएँ से निकलती है। फर्क उस चट्टान में है जो इसे पकड़े रखती है, और उस तरीके में जिससे इसे बाहर निकाला जाता है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| यह क्या है | कम पारगम्यता वाली, जैविक पदार्थ से भरपूर शेल में रुकी प्राकृतिक गैस; यही शेल स्रोत चट्टान भी है और भंडार चट्टान भी |
| उत्पादन कैसे होता है | क्षैतिज ड्रिलिंग के साथ हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग (“फ्रैकिंग”) |
| अमेरिका में हिस्सा | EIA के अनुसार 2023 में अमेरिका के ड्राई गैस उत्पादन का लगभग 78% |
| भारत की पहली शेल गैस | ONGC का कुआँ RNSG-1, दुर्गापुर के पास इच्छापुर, पश्चिम बंगाल; 25 जनवरी 2011 को गैस मिली |
| पहली भारतीय नीति | नामांकन ब्लॉकों में ONGC और OIL के लिए शेल दिशानिर्देश, 14 अक्टूबर 2013 |
| मौजूदा लाइसेंसिंग | HELP (2016) का एकसमान लाइसेंस; मौजूदा अनुबंधों के लिए 2018 का फ्रेमवर्क |
| अनुमान | 6.1 tcf निकालने योग्य (USGS) से 584 tcf जगह पर मौजूद (EIA, 2013) |
| मुख्य बेसिन | खंभात (कैम्बे), कृष्णा-गोदावरी, कावेरी, दामोदर |
| अब तक का उत्पादन | कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं, 17 दिसंबर 2018 के लोकसभा जवाब के अनुसार |
शेल गैस क्या है
शेल गैस वह प्राकृतिक गैस है जो कभी उस चट्टान से बाहर ही नहीं निकली जिसमें वह बनी थी। यही एक बात इसके बारे में लगभग सब कुछ समझा देती है।
ज्यादातर गैस तब बनती है जब कीचड़ में दबा जैविक पदार्थ लाखों वर्षों तक गर्मी और दबाव में पकता रहता है। वही कीचड़ सख्त होकर शेल बन जाता है। पारंपरिक गैस क्षेत्र में गैस धीरे-धीरे शेल से ऊपर की ओर खिसकती है और बलुआ पत्थर जैसी छिद्रों वाली चट्टान में पहुँच जाती है। वहाँ वह ऊपर पड़ी एक अभेद्य चट्टान की परत के नीचे जमा हो जाती है। इस जाल में ड्रिल कीजिए, और गैस अपने आप कुएँ तक बहकर आ जाती है।
शेल गैस वह गैस है जो पीछे रह गई। शेल में छिद्र तो होते हैं, लेकिन वे बहुत छोटे होते हैं और आपस में ठीक से जुड़े नहीं होते। इसलिए इस चट्टान की पारगम्यता बहुत कम (low permeability) होती है, यानी तरल पदार्थ इसके भीतर मुश्किल से ही हिल पाते हैं। स्पंज और ईंट के बारे में सोचिए। दोनों में पानी भरा रह सकता है, लेकिन दबाने पर पानी सिर्फ एक ही छोड़ता है। शेल ईंट है। यह तुलना एक जगह टूटती है: ईंट में खोलने लायक कोई छिपी दरारें नहीं होतीं, जबकि शेल को कृत्रिम रूप से चटकाया जा सकता है। उत्पादन की पूरी तरकीब यही है।
अपने पड़ोसियों से यह कैसे अलग है
शेल गैस कई अपरंपरागत हाइड्रोकार्बनों में से एक है। यह शब्द उस तेल और गैस के लिए है जो सामान्य ड्रिलिंग से चट्टान से बाहर नहीं बहते। ये भाई-बहन अक्सर आपस में गड्डमड्ड हो जाते हैं:
- पारंपरिक गैस छिद्रों वाली, पारगम्य भंडार चट्टान में खिसककर पहुँच चुकी होती है, और एक सीधे खड़े कुएँ तक अपने आप बहती है।
- कोल-बेड मीथेन (CBM) वह गैस है जो कोयले की परतों की भीतरी सतहों पर टिकी रहती है। आमतौर पर इसे निकालने के लिए परत से पानी पंप करके बाहर किया जाता है, ताकि दबाव घटे। भारत के CBM ब्लॉकों के बारे में इस साइट का कोल-बेड मीथेन वाला नोट विस्तार से बताता है।
- टाइट गैस बहुत कम पारगम्यता वाले बलुआ पत्थर या चूना पत्थर में रहती है, शेल में नहीं।
- शेल ऑयल भी इसी तरह शेल में रुका हुआ तरल तेल है, और इसे भी इन्हीं तरीकों से निकाला जाता है।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के 2011 के भारत आकलन से पता चलता है कि स्रोत चट्टान क्यों मायने रखती है। उसने भारतीय शेल को जैविक कार्बन की मात्रा, तापीय परिपक्वता और मोटाई के पैमाने पर परखा। नतीजा यह निकला कि गुजरात की कैम्बे शेल जैविक कार्बन में सबसे अमीर है। बेसिन के सबसे गहरे हिस्सों में इसमें वजन के हिसाब से 4 प्रतिशत से ज्यादा जैविक कार्बन है।
शेल गैस का उत्पादन कैसे होता है
शेल गैस दो तकनीकों को जोड़कर निकाली जाती है: क्षैतिज ड्रिलिंग और हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग (फ्रैकिंग)। इन दोनों ने मिलकर ही शेल को फायदे का सौदा बनाया।
कदम-दर-कदम देखिए कि होता क्या है:
- पहले शेल की परत तक सीधा नीचे कुआँ खोदा जाता है। भारत के पहले शेल कुएँ में यह परत 985 से 1,843 मीटर के बीच थी।
- फिर ड्रिल बिट मुड़ता है और शेल के भीतर ही लंबी दूरी तक क्षैतिज दिशा में चलता है। इससे कुआँ किसी सीधे छेद के मुकाबले कहीं ज्यादा गैस वाली चट्टान को छू लेता है।
- क्षैतिज हिस्से को चरणों में चटकाया जाता है। रेत और रसायन मिले पानी को बहुत तेज दबाव पर अंदर पंप किया जाता है, जिससे चट्टान में दरारें पड़ जाती हैं।
- यह रेत, जिसे प्रॉपेंट (proppant) कहते हैं, दरारों में फँस जाती है। दबाव हटने पर यही दरारों को खुला रखती है।
- नई दरारों से होकर गैस कुएँ में बहती है। उसके साथ “फ्लोबैक” पानी भी ऊपर आता है, जिसे साफ करना या ठिकाने लगाना पड़ता है।
पानी का खर्च बहुत बड़ा है। USGS कहता है कि कोई एक सामान्य फ्रैक्चर किया गया कुआँ होता ही नहीं, क्योंकि पानी की खपत चट्टान, ऑपरेटर और चरणों की संख्या पर निर्भर करती है। फिर भी वह इसकी सीमा प्रति कुआँ लगभग 1.5 मिलियन से 16 मिलियन गैलन बताता है। लीटर में यह प्रति कुआँ मोटे तौर पर 5.7 मिलियन से 60 मिलियन बैठता है। यही आँकड़ा आगे भारत की समस्या से जुड़ता है, जिस पर हम बाद में आएँगे।
अमेरिकी शेल क्रांति
अमेरिकी शेल क्रांति ही वह वजह है जिसके चलते बाकी दुनिया ने, भारत समेत, शेल को गंभीरता से लिया। अमेरिका के ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) की तारीखें पूरी कहानी कम शब्दों में बता देती हैं:
- अमेरिका ने 2009 में रूस को पीछे छोड़ दिया और दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक बन गया। इस बढ़त के पीछे शेल गैस थी।
- 2017 में अमेरिका ने जितनी गैस आयात की, उससे ज्यादा निर्यात की। 1957 के बाद यह पहला साल था जब वह शुद्ध गैस निर्यातक बना।
- 2023 में अमेरिका के ड्राई गैस उत्पादन का लगभग 78 प्रतिशत, यानी 37.87 ट्रिलियन क्यूबिक फीट, शेल परतों से आया।
2011 में जब ONGC ने दुर्गापुर वाली खोज का ऐलान किया, तब उसके अपने नोट में शेल का हिस्सा अमेरिकी गैस उत्पादन का लगभग 17 प्रतिशत बताया गया था। बारह साल बाद यह 78 प्रतिशत हो गया। इसी बदलाव की वजह से शेल एक ऐसा मॉडल लगने लगा जिसे दूसरे देश भी अपना सकते थे।
भारत पर EIA की वही रिपोर्ट चेताती है कि नकल करना मुश्किल क्यों है। वह उन “जमीन के ऊपर वाले” फायदों की सूची देती है जो अमेरिका और कनाडा को मिले हुए हैं, लेकिन शायद दूसरी जगहों पर लागू न हों:
- जमीन के नीचे जो कुछ है, उस पर अधिकार का निजी मालिकाना हक, जिससे जमीन मालिकों को ड्रिलिंग का स्वागत करने की वजह मिलती है;
- रिग और हुनर वाले बहुत सारे स्वतंत्र ऑपरेटर और ठेकेदार;
- पहले से बिछी गैदरिंग लाइनें और पाइपलाइनें;
- फ्रैक्चरिंग के लिए काफी पानी।
भारत में शेल गैस: नीति की समयरेखा
भारत का रास्ता एक अकेले पायलट कुएँ से शुरू होकर ऐसे लाइसेंस तक पहुँचा जो सभी हाइड्रोकार्बनों पर लागू होता है। नीचे की समयरेखा संसद में दिए गए जवाबों और कैबिनेट के फैसलों पर जारी PIB विज्ञप्तियों से ली गई है।
| तारीख | कदम |
|---|---|
| 26 सितंबर 2010 | ONGC ने पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर के पास RNSG-1 की खुदाई शुरू की |
| 6 नवंबर 2010 | शेल गैस संसाधन आकलन पर भारत-अमेरिका MoU |
| 25 जनवरी 2011 | RNSG-1 में लगभग 1,700 मीटर पर बैरन मेजर शेल से गैस बहने लगी |
| 14 अक्टूबर 2013 | नीति दिशानिर्देशों ने ONGC और OIL को नामांकन ब्लॉकों में शेल खोजने की अनुमति दी |
| 10 मार्च 2016 | कैबिनेट ने सभी हाइड्रोकार्बनों के लिए एकसमान लाइसेंस वाली HELP को मंजूरी दी |
| 20 अगस्त 2018 | मौजूदा अनुबंधों में अपरंपरागत हाइड्रोकार्बनों के लिए फ्रेमवर्क अधिसूचित |
| 12 मार्च 2025 | लोकसभा ने तेलक्षेत्र (विनियमन और विकास) संशोधन विधेयक, 2024 पास किया |
2013 के दिशानिर्देश जान-बूझकर सीमित रखे गए थे। ये सिर्फ राष्ट्रीय तेल कंपनियों, यानी ONGC और ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL), पर लागू होते थे। और वह भी सिर्फ उन जमीनी ब्लॉकों में, जो उनके पास पहले से नामांकन व्यवस्था के तहत थे। नामांकन व्यवस्था वह पुरानी प्रणाली थी, जिसमें सरकार बिना बोली के सीधे सरकारी कंपनियों को ब्लॉक दे देती थी। नवंबर 2016 के लोकसभा जवाब के मुताबिक पहले चरण में ONGC ने 50 ब्लॉक चिह्नित किए और OIL ने 6। जुलाई 2015 के एक जवाब में OIL का आँकड़ा 5 बताया गया था, इसलिए सरकारी गिनती में एक का फर्क है।
2016 की हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति (HELP) ने लाइसेंस देने की इकाई ही बदल दी। इससे पहले तेल और गैस का लाइसेंस पाने वाला ठेकेदार उसी ब्लॉक में CBM को हाथ नहीं लगा सकता था। और CBM वाला ठेकेदार किसी दूसरी चीज को नहीं छू सकता था। HELP ने पारंपरिक और अपरंपरागत, दोनों तरह के संसाधनों के लिए एक ही लाइसेंस दिया। इसमें शेल गैस, शेल ऑयल, CBM, टाइट गैस और गैस हाइड्रेट सब शामिल हैं। इसके साथ ओपन एकरेज भी आया, यानी कंपनियाँ खुद वे ब्लॉक चुनती हैं जो उन्हें चाहिए। लागत वसूली की जगह राजस्व साझेदारी आ गई।
2018 के फ्रेमवर्क ने बची हुई कमी दूर कर दी। HELP से पहले दिए गए ब्लॉक अब भी एक ही तरह के संसाधन से बँधे थे। इसलिए कैबिनेट ने पुराने उत्पादन-साझेदारी अनुबंधों के तहत 72,027 वर्ग किलोमीटर और CBM अनुबंधों के तहत 5,269 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अपरंपरागत काम के लिए खोल दिया। वहाँ होने वाली नई खोजों पर सरकार को मुनाफे में 10 प्रतिशत का अतिरिक्त हिस्सा देना होता है।
भारत में शेल गैस भंडार
भारत में शेल गैस भंडार कोई एक संख्या नहीं है, और अनुमानों के बीच का फासला ही असली सबक है। 31 जुलाई 2015 के राज्यसभा जवाब में ऐसे पाँच अनुमान एक साथ रखे गए थे।
| एजेंसी | अनुमान | दायरा |
|---|---|---|
| श्लमबर्जर | 300 से 2,100 tcf | पूरा देश, “सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार” |
| EIA, अमेरिका (2013) | 584 tcf गैस, 87 अरब बैरल शेल ऑयल | खंभात, दामोदर, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी के जमीनी बेसिन |
| ONGC | 187.5 tcf | खंभात, गंगा घाटी, असम और असम-अराकान, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी के जमीनी बेसिन |
| CMPDI | 45 tcf | झरिया, बोकारो, उत्तर और दक्षिण करनपुरा, रानीगंज और सोहागपुर उप-बेसिन |
| USGS | 6.1 tcf तकनीकी रूप से निकालने योग्य | खंभात, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी के जमीनी बेसिन |
ये संख्याएँ अलग-अलग चीजें नापती हैं, इसीलिए इनमें इतना बड़ा फर्क है। EIA तीन परतें अलग करता है:
- जगह पर मौजूद गैस (gas in-place) वह सारी गैस है जो चट्टान में भौतिक रूप से मौजूद है।
- तकनीकी रूप से निकालने योग्य गैस वह हिस्सा है जिसे मौजूदा तकनीक निकाल सकती है, कीमत चाहे जो हो।
- आर्थिक रूप से निकालने योग्य गैस वह हिस्सा है जिसे आज की लागत और कीमतों पर निकालना फायदेमंद है।
अब इसे EIA के भारत वाले आँकड़ों पर लागू कीजिए। उसका 584 tcf जोखिम-समायोजित जगह पर मौजूद गैस है। वही रिपोर्ट तकनीकी रूप से निकालने योग्य गैस 96 tcf बताती है, जो उसका लगभग छठा हिस्सा है। USGS का 6.1 tcf पहले से ही निकालने योग्य गैस का अनुमान है, और यह EIA के 96 का लगभग सोलहवाँ हिस्सा है। तो सबसे ज्यादा दोहराई जाने वाली संख्या 584 और सबसे सतर्क संख्या 6.1 असल में एक-दूसरे से टकराती नहीं हैं। दोनों अलग-अलग सवालों का जवाब देती हैं। इनमें से कोई भी आर्थिक रूप से निकालने योग्य आँकड़ा नहीं है, और कोई ड्रिल करेगा या नहीं, यह वही आँकड़ा तय करता है।
दामोदर घाटी बेसिन, जिसमें दामोदर नदी के किनारे रानीगंज कोयला क्षेत्र फैला है, इसलिए अहम है क्योंकि RNSG-1 यहीं खोदा गया था। यह कुआँ पर्मियन युग की बैरन मेजर शेल में उतरा, जो कोयले वाली परतों के बीच पड़ी है। पहले चरण के 56 ब्लॉक छह राज्यों में फैले थे: गुजरात 28, आंध्र प्रदेश 10, तमिलनाडु 9, असम 6, अरुणाचल प्रदेश 2 और राजस्थान 1।
भारत की खोज में क्या मिला
सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से भारत की खोज में शेल में गैस तो मिली, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन नहीं हुआ। यह कहानी तीन बयानों से होकर गुजरती है।
- नवंबर 2016 तक ONGC शेल गैस और तेल के लिए 20 आकलन कुएँ खोद चुकी थी। OIL ने भूवैज्ञानिक और भू-रासायनिक अध्ययन पूरे कर लिए थे, और राजस्थान के एक कुएँ में पारंपरिक कोर भी निकाला था।
- दिसंबर 2018 तक ONGC 23 कुएँ खोद चुकी थी और OIL 4। मंत्री ने लोकसभा को बताया कि खोज “शुरुआती चरण में” है और कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं हुआ है।
- EIA के भारत वाले अध्याय में लिखा है कि खंभात बेसिन के दो सीधे कुओं से कैम्बे ब्लैक शेल की “मामूली” शेल गैस और तेल का उत्पादन हुआ था।
15 साल के हिसाब से यह बहुत पतला रिकॉर्ड है। 2018 का जवाब यहाँ रिकॉर्ड पर मौजूद कुओं की सबसे ताजा सरकारी गिनती है। इसके बाद का कोई भी आँकड़ा अपने स्रोत के साथ ही आना चाहिए।
भारत में शेल गैस क्यों नहीं चल पाई
भारत में शेल गैस इसलिए नहीं चल पाई क्योंकि यहाँ की चट्टान ज्यादा मुश्किल है और जमीन के ऊपर के हालात अमेरिका से कमजोर हैं। वजह यह नहीं है कि नीति एक जगह ठहरी रही। नीति का दरवाजा 2013, 2016 और 2018 में खोला गया, और 2025 में कानून बनाकर और चौड़ा किया गया। फिर भी उत्पादन पीछे-पीछे नहीं आया। इसके कारण EIA की अपनी सूची से मेल खाते हैं।
पहला कारण भूविज्ञान है। EIA भारतीय शेल बेसिनों को “भूवैज्ञानिक रूप से बेहद जटिल” कहता है। खंभात और कावेरी हॉर्स्ट और ग्रैबेन खंडों में टूटे हुए हैं। ये भ्रंशों के बीच उठे हुए और धँसे हुए भूपर्पटी के टुकड़े होते हैं। इसलिए संभावना वाली शेल एक लगातार चादर की तरह नहीं, बल्कि अलग-थलग जेबों में पड़ी है। EIA कुछ भारतीय शेलों में मिट्टी की मात्रा मध्यम से ऊँची भी बताता है, और मिट्टी से भरी चट्टान साफ-साफ चटकने के बजाय मुड़ने-पिचकने लगती है। USGS का 6.1 tcf निकालने योग्य वाला आँकड़ा भी इसी सावधानी को दिखाता है।
दूसरी रुकावट पानी है। प्रति कुआँ 1.5 मिलियन से 16 मिलियन गैलन के हिसाब से, सैकड़ों कुओं वाला ड्रिलिंग कार्यक्रम पानी के लिए खेतों और कस्बों से होड़ करेगा। गुजरात का खंभात जैसा बेसिन तो पहले से ही पानी की कमी वाले इलाके में है। इस साइट का भारत में जल संकट वाला नोट दिखाता है कि यहाँ गुंजाइश कितनी कम है।
तीसरी रुकावट जमीन और जमीन के नीचे के अधिकार हैं। EIA जमीन के नीचे के अधिकारों के निजी मालिकाने को अमेरिका का एक फायदा बताता है। भारत में तेल और गैस के पट्टे तेलक्षेत्र (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1948 के तहत दिए जाते हैं। लेकिन ऊपर की जमीन फिर भी उसके मालिकों से अधिग्रहित करनी पड़ती है या पट्टे पर लेनी पड़ती है। इन मालिकों के पास वह प्रोत्साहन नहीं होता जो अमेरिका में अधिकार रखने वाले के पास होता है। शेल के लिए बहुत सारे वेल पैड चाहिए, इसलिए यह खींचतान कई गुना बढ़ जाती है।
चौथी वजह बुनियादी ढाँचा और उद्योग की गहराई है। जब शेल ने रफ्तार पकड़ी, तब अमेरिका के पास हजारों रिग, स्वतंत्र ऑपरेटर और गैदरिंग पाइपलाइनें तैयार थीं। भारत के जमीनी शेल बेसिनों को यह पूरा सेवा उद्योग ज्यादातर शेल के लिए ही खड़ा करना पड़ेगा।
पाँचवीं वजह कीमत और राजकोषीय शर्तें हैं। 2016 में HELP आने तक भारतीय ब्लॉकों की गैस को बेचने और कीमत तय करने की वह आजादी नहीं थी जो HELP लेकर आई। और 2018 के फ्रेमवर्क में भी नामांकन ब्लॉक अपनी पुरानी शर्तों पर ही चलते हैं। शेल की ड्रिलिंग महँगी है, इसलिए उसे ऐसी कीमत चाहिए जो यह लागत निकाल सके। ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख बाधाएँ वाला नोट इसे भारत के बड़े गैस अर्थशास्त्र में रखकर समझाता है।
सही फैसला बीच का है। शेल को खारिज कर देना जल्दबाजी होगी, क्योंकि लगभग 23 कुओं का डेटा इतना कम है कि किसी अच्छे स्वीट स्पॉट की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इसे आयात पर निर्भरता का जल्दी मिलने वाला हल मानना भी समझदारी नहीं है, क्योंकि हर सरकारी आँकड़ा धीमी, महँगी और अनिश्चित गैस की ओर इशारा करता है।
फ्रैकिंग से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएँ
फ्रैकिंग के खिलाफ पर्यावरण का पक्ष चार जोखिमों पर टिका है, और हर एक के पीछे के सबूत की ताकत अलग-अलग है।
- पानी की खपत। प्रति कुआँ 1.5 मिलियन से 16 मिलियन गैलन की USGS वाली सीमा ही दर्ज आँकड़ा है। पानी की कमी वाले बेसिनों में यही सबसे सीधा टकराव है।
- पानी का प्रदूषण। अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के 2016 के अंतिम आकलन में पाया गया कि फ्रैक्चरिंग से जुड़ी गतिविधियाँ “कुछ परिस्थितियों में” पीने के पानी के स्रोतों पर असर डाल सकती हैं, जैसे रिसाव या खराब बने कुओं के मामले में। लेकिन डेटा की कमी की वजह से वह यह अंदाजा नहीं लगा पाई कि ऐसा कितनी बार होता है। जलभृतों पर इस खतरे को समझने के लिए इस साइट का भूजल प्रदूषण वाला नोट देखिए।
- प्रेरित भूकंपीयता। इसका मतलब है इंसानी गतिविधियों से आने वाले भूकंप। USGS कहता है कि खुद फ्रैक्चरिंग से महसूस होने लायक भूकंप आने की खबरें “बेहद दुर्लभ” हैं। बड़ा खतरा गंदे पानी को गहरे डिस्पोजल कुओं में डालने से है, क्योंकि इससे ज्यादा बड़े इलाके में, ज्यादा लंबे समय तक दबाव बढ़ता है। भ्रंश और तनाव की पूरी प्रक्रिया भूकंप के कारण और प्रकार में समझाई गई है।
- मीथेन रिसाव। कुओं और पाइपलाइनों से निकलने वाली गैस ज्यादातर मीथेन होती है। EPA के मुताबिक गर्मी रोकने में मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से 28 गुना से भी ज्यादा ताकतवर है। अमेरिका में इंसानों से होने वाले मीथेन के सबसे बड़े स्रोतों में तेल और गैस प्रणालियाँ शामिल हैं। ग्लोबल मीथेन प्लेज वाला नोट बताता है कि इन रिसावों को रोकना जलवायु के लिए प्राथमिकता क्यों है।
भारत के नियम इन जोखिमों को मंजूरी के सामान्य रास्ते से गुजारते हैं। 2018 के लोकसभा जवाब के अनुसार उत्पादन शुरू होने से पहले पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण प्रभाव आकलन और पर्यावरणीय मंजूरी जरूरी है। संक्षिप्त नाम पर ध्यान दीजिए: भारतीय दस्तावेजों में “EIA” का मतलब आमतौर पर यही पर्यावरण प्रभाव आकलन होता है, जबकि ऊर्जा आँकड़ों में इसका मतलब अमेरिका का ऊर्जा सूचना प्रशासन होता है।
आज शेल गैस कहाँ खड़ी है
आज भारत में शेल गैस की खोज पूरी तरह कानूनी है, लेकिन यह अब भी एक संभावना भर है, सप्लाई का स्रोत नहीं। तीन हाल की घटनाएँ इसकी स्थिति तय करती हैं।
- तेलक्षेत्र (विनियमन और विकास) संशोधन विधेयक, 2024 को राज्यसभा ने 3 दिसंबर 2024 को और लोकसभा ने 12 मार्च 2025 को पास किया। यह “खनिज तेलों” की परिभाषा को बढ़ाकर इसमें कोई भी प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला हाइड्रोकार्बन, CBM, शेल गैस और शेल तेल शामिल करता है। कोयला, लिग्नाइट और हीलियम इससे बाहर रखे गए हैं, और खनन पट्टे की जगह पेट्रोलियम पट्टा लाया गया है।
- HELP की ओपन एकरेज लाइसेंसिंग नीति के तहत राउंड I से IX तक 3,78,652 वर्ग किलोमीटर में फैले 172 खोज ब्लॉक दिए जा चुके थे। 25 ब्लॉकों वाला राउंड X 15 अप्रैल 2025 को शुरू हुआ। यह जानकारी 11 अगस्त 2025 की एक PIB विज्ञप्ति में है। इन सभी ब्लॉकों पर एकसमान लाइसेंस लागू है, इसलिए कोई भी विजेता शेल की खोज कर सकता है।
- सभी आवंटित ब्लॉकों में खोज की अनुमति है। मंत्रालय ने यह बात अपने दिसंबर 2018 के लोकसभा जवाब में कही थी, और “कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं” वाला बयान भी वहीं दर्ज है।
इस बीच भारत की गैस सुरक्षा अब भी आयातित LNG पर टिकी है। हाल में पश्चिम एशिया में आई रुकावटों के दौरान यह कमजोरी खुलकर सामने आ गई, जैसा कि करंट अफेयर्स का LNG सप्लाई में रुकावट और भंडारण वाला नोट समझाता है। इसीलिए उत्पादन न होने के बावजूद शेल बार-बार नीति की चर्चा में लौट आती है।
परीक्षा के लिए शेल गैस कैसे पढ़ें
शेल गैस पाठ्यक्रम में तीन जगह बैठती है: GS पेपर I के भूगोल में संसाधनों का वितरण, GS पेपर III में ऊर्जा और बुनियादी ढाँचा, और दोनों में पर्यावरण पर असर। इस पर सीधी परिभाषा से ज्यादा “उपलब्धता और मुद्दे” वाले सवाल पूछे जाते हैं। मुख्य परीक्षा 2013 के GS पेपर I में पूछा गया था: “कहा जाता है कि भारत के पास शेल तेल और गैस के बड़े भंडार हैं, जो चौथाई सदी तक देश की जरूरतें पूरी कर सकते हैं। फिर भी इस संसाधन का दोहन प्राथमिकता में ऊपर नहीं दिखता। उपलब्धता और इससे जुड़े मुद्दों की आलोचनात्मक चर्चा कीजिए।” प्रीलिम्स के लिए, इस साइट के 2013 से 2026 तक के प्रीलिम्स प्रश्नों के बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 249 पर्यावरण में और 82 भूगोल में हैं। शेल इन्हीं दो क्षेत्रों से जुड़ती है।
वे तथ्य जिन्हें इतना दोहराइए कि वे जुबान पर चढ़ जाएँ:
- दो तकनीकें: क्षैतिज ड्रिलिंग और हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग, दोनों एक साथ।
- RNSG-1: ONGC, दुर्गापुर के पास इच्छापुर, दामोदर बेसिन, 25 जनवरी 2011 को गैस, बैरन मेजर शेल।
- 14 अक्टूबर 2013: नामांकन ब्लॉकों में ONGC और OIL के लिए शेल दिशानिर्देश; पहले चरण में 50 और 6 ब्लॉक।
- HELP, 10 मार्च 2016: सभी हाइड्रोकार्बनों के लिए एकसमान लाइसेंस, ओपन एकरेज, राजस्व साझेदारी।
- अनुमान: EIA 2013 के 584 tcf जगह पर मौजूद और 96 tcf निकालने योग्य; USGS के 6.1 tcf निकालने योग्य, खंभात, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी में।
- स्थिति: दिसंबर 2018 तक ONGC के 23 और OIL के 4 कुएँ; कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं।
- 2025 का संशोधन: शेल गैस और तेल अब खनिज तेलों की परिभाषा के भीतर।
इन उलझनों को अलग-अलग रखिए:
- जगह पर मौजूद बनाम निकालने योग्य। 584 tcf का जिक्र हमेशा “जगह पर मौजूद” शब्दों के साथ ही कीजिए। निकालने योग्य आँकड़े 96 tcf (EIA) और 6.1 tcf (USGS) हैं।
- फ्रैकिंग बनाम गंदे पानी से आने वाले भूकंप। USGS ज्यादातर प्रेरित भूकंपों को गंदे पानी के निपटान से जोड़ता है, खुद फ्रैक्चरिंग वाले कदम से नहीं।
- शेल ऑयल बनाम ऑयल शेल। शेल ऑयल शेल में मौजूद तरल तेल है। ऑयल शेल में केरोजन होता है, जो एक ठोस जैविक पदार्थ है और तेल देने के लिए उसे गर्म करना पड़ता है। 2025 का संशोधन दोनों का नाम अलग-अलग लेता है।
- 2013 की नीति बनाम HELP। 2013 के दिशानिर्देश सिर्फ नामांकन ब्लॉकों में सरकारी कंपनियों पर लागू थे; HELP ने शेल को हर बोली लगाने वाले के लिए खोल दिया।
| संसाधन | गैस कहाँ रहती है | उत्पादन कैसे होता है | भारत में स्थिति |
|---|---|---|---|
| पारंपरिक गैस | जाल के नीचे छिद्रों वाली भंडार चट्टान में | सीधे कुएँ, प्राकृतिक बहाव | मुख्य घरेलू स्रोत |
| शेल गैस | शेल स्रोत चट्टान के भीतर | क्षैतिज ड्रिलिंग और फ्रैकिंग | खोज हुई, रिकॉर्ड पर कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं |
| कोल-बेड मीथेन | परतों में कोयले की सतहों पर | कोयले की परत से पानी निकालना | CBM ब्लॉकों से उत्पादन होता है |
| टाइट गैस | कम पारगम्यता वाले बलुआ पत्थर या चूना पत्थर में | फ्रैक्चरिंग, अक्सर क्षैतिज कुएँ | HELP लाइसेंस में शामिल |
| गैस हाइड्रेट | समुद्र तल या पर्माफ्रॉस्ट के नीचे बर्फ जैसा ठोस | दुनिया भर में अभी प्रयोग के स्तर पर | HELP लाइसेंस में शामिल |
आपकी तैयारी के लिहाज से शेल गैस ऐसा विषय है जहाँ सटीकता से अंक मिलते हैं। जो उत्तर जगह पर मौजूद और निकालने योग्य गैस को अलग करता है, बेसिनों के नाम लेता है और नीतियों की तारीखें बताता है, वह एक ही भंडार का आँकड़ा दोहराने वाले उत्तर से अलग दिखेगा। और असली विश्लेषण वाली बात यह है कि उत्पादन न आने की वजह नीति नहीं, बल्कि भूविज्ञान और जमीन के ऊपर के हालात हैं। “आलोचनात्मक चर्चा कीजिए” वाले सवाल में परीक्षक इसी तरह के आकलन को इनाम देते हैं।
सामान्य प्रश्न
आसान शब्दों में शेल गैस क्या है?
शेल गैस वह प्राकृतिक गैस है जो शेल के भीतर फँसी रहती है। शेल महीन दानों वाली चट्टान है, जिसके छिद्र आपस में इतने कम जुड़े होते हैं कि गैस अपने आप बाहर नहीं निकल पाती। इसे निकालने के लिए शेल में क्षैतिज ड्रिलिंग की जाती है, और तेज दबाव वाले पानी, रेत और रसायनों से चट्टान को चटकाया जाता है। रासायनिक रूप से यह वही मीथेन-भरपूर गैस है जो पारंपरिक कुएँ से आती है।
शेल गैस प्राकृतिक गैस से कैसे अलग है?
शेल गैस प्राकृतिक गैस का ही एक प्रकार है, इसलिए फर्क गैस में नहीं, चट्टान और तरीके में है। पारंपरिक गैस छिद्रों वाली भंडार चट्टान में खिसककर पहुँच चुकी होती है और अपने आप कुएँ तक बहती है। शेल गैस कभी अपनी स्रोत चट्टान से बाहर नहीं निकली, इसलिए उसे बाहर लाने के लिए क्षैतिज ड्रिलिंग और फ्रैकिंग चाहिए।
क्या भारत के पास शेल गैस के भंडार हैं?
भारत के पास शेल गैस संसाधन हैं, लेकिन अनुमानों में बहुत फर्क है। अमेरिकी EIA ने 2013 में जोखिम-समायोजित जगह पर मौजूद गैस 584 ट्रिलियन क्यूबिक फीट बताई थी, जिसमें से 96 tcf तकनीकी रूप से निकालने योग्य थी। वहीं USGS ने खंभात, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिनों में सिर्फ 6.1 tcf निकालने योग्य गैस का अनुमान लगाया। इनमें से कोई भी साबित हो चुका व्यावसायिक भंडार नहीं है।
भारत में पहली शेल गैस कहाँ मिली थी?
भारत की पहली शेल गैस 25 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर के पास इच्छापुर में ONGC के कुएँ RNSG-1 से निकली थी। यह गैस दामोदर बेसिन की बैरन मेजर शेल से लगभग 1,700 मीटर की गहराई पर आई थी। ONGC के मुताबिक इससे भारत अमेरिका और कनाडा के बाहर शेल में गैस खोजने वाला पहला एशियाई देश बन गया।
हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग या फ्रैकिंग क्या है?
हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग, यानी फ्रैकिंग, वह तरीका है जिसमें रेत और रसायन मिले पानी को बहुत तेज दबाव पर चट्टान में पंप करके उसे चटकाया जाता है। रेत दरारों को खुला रखती है, ताकि फँसी हुई गैस या तेल कुएँ तक बह सके। क्षैतिज ड्रिलिंग के साथ मिलकर इसी तरीके ने अमेरिका में शेल उत्पादन को व्यावसायिक बनाया।
भारत में शेल गैस का उत्पादन क्यों नहीं हो रहा है?
भारत में शेल गैस का उत्पादन मुख्य रूप से इन वजहों से नहीं चल पाया: भ्रंशों से भरी जटिल भूगर्भीय बनावट, पानी की भारी जरूरत, जमीन अधिग्रहण की मुश्किल, कमजोर सेवा उद्योग और महँगी ड्रिलिंग। सरकार ने 2013, 2016 और 2018 में शेल को खोज के लिए खोला, लेकिन दिसंबर 2018 में संसद को दिए एक जवाब में कहा गया कि कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं हुआ है।
क्या फ्रैकिंग पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है?
फ्रैकिंग के साथ चार बड़े पर्यावरणीय जोखिम जुड़े हैं: पानी की भारी खपत, पीने के पानी के प्रदूषण की आशंका, गंदे पानी के निपटान से जुड़े भूकंप, और मीथेन का रिसाव, जो एक ताकतवर ग्रीनहाउस गैस है। अमेरिकी EPA ने पाया कि कुछ परिस्थितियों में फ्रैकिंग पीने के पानी पर असर डाल सकती है। USGS कहता है कि खुद फ्रैक्चरिंग वाला कदम शायद ही कभी महसूस होने लायक भूकंप लाता है।
भारत में कौन-सी नीति शेल गैस की खोज की अनुमति देती है?
भारत में शेल गैस की खोज 2016 की हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति के तहत होती है, जो सभी हाइड्रोकार्बनों के लिए एक ही लाइसेंस देती है। इससे पहले 2013 के दिशानिर्देशों ने ONGC और OIL को उनके नामांकन ब्लॉकों में शेल खोजने की अनुमति दी थी। फिर 2018 के एक फ्रेमवर्क ने इसे पुराने अनुबंधों तक बढ़ा दिया।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. शेल गैस के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. शेल गैस बहुत कम पारगम्यता वाली चट्टान में रहती है, इसलिए यह किसी साधारण सीधे कुएँ तक नहीं बहती। 2. शेल गैस रासायनिक रूप से पारंपरिक भंडारों से निकलने वाली प्राकृतिक गैस से अलग है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) शेल गैस वही मीथेन-भरपूर गैस है; फर्क सिर्फ चट्टान और निकालने के तरीके में है।
2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अक्टूबर 2013 के नीति दिशानिर्देशों ने सभी निजी ठेकेदारों को उनके उत्पादन-साझेदारी ब्लॉकों में शेल गैस खोजने की अनुमति दी। 2. हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति पारंपरिक और अपरंपरागत हाइड्रोकार्बनों के लिए एकसमान लाइसेंस देती है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b) 2013 के दिशानिर्देश सिर्फ नामांकन ब्लॉकों में ONGC और OIL पर लागू थे; एकसमान लाइसेंस HELP लेकर आई।
3. भारत की पहली शेल गैस ONGC के एक कुएँ से किस बेसिन में निकली थी?
- (a) खंभात बेसिन
- (b) कृष्णा-गोदावरी बेसिन
- (c) दामोदर बेसिन
- (d) कावेरी बेसिन
उत्तर: (c) दुर्गापुर के पास RNSG-1 ने जनवरी 2011 में दामोदर बेसिन की बैरन मेजर शेल से गैस निकाली।
4. प्रेरित भूकंपीयता के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. USGS के अनुसार, खुद फ्रैक्चरिंग वाला कदम शायद ही कभी महसूस होने लायक भूकंप लाता है। 2. गहरे डिस्पोजल कुओं में गंदा पानी डालने से भूकंप आने की संभावना हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग से ज्यादा है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) USGS फ्रैक्चरिंग से आने वाले महसूस होने लायक भूकंपों को बेहद दुर्लभ बताता है, और ज्यादातर प्रेरित भूकंपों को गंदे पानी के निपटान से जोड़ता है।
5. भारत में 6.1 ट्रिलियन क्यूबिक फीट तकनीकी रूप से निकालने योग्य शेल गैस का USGS अनुमान किन बेसिनों को कवर करता है?
- (a) खंभात, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी
- (b) दामोदर, असम-अराकान और खंभात
- (c) कावेरी, विंध्य और राजस्थान
- (d) कृष्णा-गोदावरी, दामोदर और गंगा घाटी
उत्तर: (a) USGS के 2011 के आकलन में कैम्बे (बॉम्बे), कावेरी और कृष्णा-गोदावरी प्रांत शामिल थे।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- समझाइए कि क्षैतिज ड्रिलिंग और हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग मिलकर शेल गैस का उत्पादन कैसे संभव बनाती हैं, और शेल उद्योग को लगातार ड्रिलिंग की जरूरत क्यों होती है। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत के शेल गैस संसाधनों के अनुमान 6.1 से 584 ट्रिलियन क्यूबिक फीट तक हैं। इस फैलाव के कारण और ऊर्जा योजना पर इसके असर को समझाइए। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत ने 2013 के बाद से अपनी शेल गैस नीति को कई बार उदार बनाया है, फिर भी व्यावसायिक उत्पादन नहीं हुआ। इसके भूवैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- फ्रैकिंग के पर्यावरणीय जोखिमों का परीक्षण कीजिए और भारत के पानी की कमी वाले बेसिनों के लिए उपयुक्त नियामक ढाँचा सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
- “अमेरिकी शेल क्रांति की भारत में सीधी नकल नहीं की जा सकती।” जमीन के नीचे के अधिकारों, पानी की उपलब्धता और उद्योग की बनावट के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)