सिंधुदुर्ग किला: शिवाजी का समुद्री किला, उसका छिपा दरवाजा और UNESCO दर्जा
सिंधुदुर्ग किला समझिए: मालवण के पास शिवाजी का द्वीप-किला, उसका छिपा दरवाजा, सीसे से जमाई गई नींव, शिवाजी मंदिर और 2025 की UNESCO सूची में उसकी जगह।
सिंधुदुर्ग किला वह द्वीप-किला है जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में मालवण के पास कुरटे द्वीप पर बनवाया था। कुरटे समुद्र में एक छोटा-सा चट्टानी टापू है। किले की नींव का पहला पत्थर 25 नवंबर 1664 को रखा गया और काम 1667 में पूरा हुआ। यह शिवाजी की नौसेना का मुख्यालय रहा, और आगे चलकर इसी के नाम पर जिले का नाम पड़ा। जुलाई 2025 में यह UNESCO की सूची में दर्ज भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य (Maratha Military Landscapes of India) के 12 किलों में से एक बन गया।
इस किले के साथ दो गलतफहमियाँ हमेशा चलती हैं। पहली जंजीरा को लेकर है। जो द्वीप-किला शिवाजी के सामने डटा रहा, वह सिद्दियों का था और तट पर काफी उत्तर में, मुरुड के पास है। सिंधुदुर्ग तो शिवाजी ने उसी जंजीरा को न जीत पाने के बाद बनवाया। दूसरी गलतफहमी हाल की है। नौसेना दिवस 2023 पर जिस शिवाजी प्रतिमा का अनावरण हुआ और जो अगस्त 2024 में ढह गई, वह सिंधुदुर्ग के अंदर नहीं थी। वह मालवण की मुख्य भूमि पर बने छोटे-से राजकोट किले में खड़ी थी। इन दोनों बातों को अलग-अलग रखिए, फिर बाकी सब अपने आप खुलता जाएगा: छिपे दरवाजे से लेकर उस मंदिर तक, जहाँ खुद शिवाजी की पूजा होती है।
एक नजर में सिंधुदुर्ग किला
सिंधुदुर्ग एक द्वीप-किला है, और यह श्रेणी “समुद्री किले” से ज्यादा सीमित है। द्वीप-किला ऐसे टापू पर खड़ा होता है जिसके चारों ओर पानी हो। विजयदुर्ग ऐसा नहीं है, क्योंकि वह मुख्य भूमि से जुड़े एक अंतरीप पर बना है। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| प्रकार | कुरटे द्वीप पर बना द्वीप-किला; UNESCO सीरीज के तीन द्वीप-किलों में से एक |
| स्थान | मालवण के पास, सिंधुदुर्ग जिला, महाराष्ट्र; स्रोत के हिसाब से किनारे से लगभग 1 से 1.6 किलोमीटर दूर |
| किसने बनवाया | छत्रपति शिवाजी महाराज; पहला पत्थर 25 नवंबर 1664 को रखा गया, काम 1667 में पूरा हुआ |
| किसलिए बना | मराठा नौसेना का मुख्यालय, और जंजीरा के सिद्दियों, अंग्रेजों और पुर्तगालियों पर लगाम |
| आकार | लगभग 48 एकड़ (19 हेक्टेयर); आधुनिक गिनती में 42 बुर्ज |
| बाद के कब्जेदार | 1713 से कोल्हापुर के छत्रपति; 1765 में थोड़े समय के लिए अंग्रेज, फोर्ट ऑगस्टस के नाम से; 1812 से ब्रिटिश |
| संरक्षण | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक |
| UNESCO दर्जा | भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य का घटक 11, जो 11 जुलाई 2025 को सूची में दर्ज हुआ; मानदंड (iv) और (vi) |
| किसलिए मशहूर | छिपा दरवाजा, सीसे से जमाई गई नींव, शिवाजी मंदिर, और हाथ-पैर के निशान |
सिंधुदुर्ग किला किसने बनवाया, और मालवण ही क्यों
शिवाजी ने सिंधुदुर्ग को नए सिरे से बनवाया था। यह सुवर्णदुर्ग या विजयदुर्ग की तरह कोई पुराना किला नहीं था, जिसे कब्जे में लेकर मजबूत किया गया हो। और इसे बनवाने की वजह थी जंजीरा से मिली हार। रत्नागिरी का 1880 का गजेटियर यह बात साफ-साफ कहता है: लगभग 1665 में, सिद्दी से जंजीरा छीनने में नाकाम रहने के बाद, शिवाजी ने तट पर अपने मुख्यालय के लिए मालवण को चुना। मालवण के पास चट्टानी टापू थे, और उसका बंदरगाह समुद्र में डूबी चट्टानों (reefs) से घिरा हुआ था।
जंजीरा की घेराबंदियाँ इसकी वजह समझा देती हैं। 1661 से शिवाजी हर मौसम में सिद्दी के इस द्वीप पर हमला करते रहे, लेकिन उसे खरोंच तक नहीं आई। उनके पास न तो उसकी दीवारें तोड़ने लायक तोपें थीं, न उसकी रसद काटने लायक बेड़ा। कमी एक ही चीज की थी: अपनी नौसेना, जो किसी सुरक्षित बंदरगाह से काम कर सके।
मराठी विश्वकोश, यानी महाराष्ट्र सरकार का प्रकाशित विश्वकोश, उन ताकतों के नाम गिनाता है जिन पर लगाम लगाने के लिए यह किला बना था:
- जंजीरा का सिद्दी;
- उत्तर में बंबई के अंग्रेज;
- दक्षिण में लगभग 130 किलोमीटर दूर गोवा के पुर्तगाली।
तो सिंधुदुर्ग किसी एक दुश्मन के सामने खड़ी सीमा चौकी नहीं था। यह कोंकण तट के एक खुले हिस्से पर जहाजों का अड्डा था, और इसकी जगह ऐसी चुनी गई कि तीनों पर नजर रखी जा सके। समुद्री चट्टानों ने भी इसमें मदद की। 19वीं सदी के एक ब्रिटिश लेखक, अलेक्जेंडर नैर्न, ने तो बंदरगाह के मुश्किल रास्ते को इस बात का संकेत माना कि शिवाजी मालवण को एक शरण-स्थल (place of refuge) की तरह देखते थे। गजेटियर इसे एक मान्यता के रूप में दर्ज करता है, और इसे मान्यता के रूप में ही दोहराना ठीक है।
काम की देखरेख किसने की
किला किसके आदेश पर बना, यह पक्का है; काम की देखरेख किसने की, यह पक्का नहीं है। सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज एंड ट्रेनिंग (CCRT), जो संस्कृति मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक संस्था है, इसका श्रेय हिरोजी इंदुलकर को देता है। CCRT के मुताबिक उन्होंने गोवा से आए 100 पुर्तगाली विशेषज्ञों और लगभग 3,000 मजदूरों के साथ तीन साल तक काम किया, और इसका खर्च सूरत की लूट से मिले धन से निकला। मराठी विश्वकोश इसकी जगह गोविंद विश्वनाथ प्रभु का नाम लेता है। दोनों ही सरकारी प्रकाशन हैं। इसलिए उत्तर में सबसे संतुलित वाक्य यह होगा: “किला शिवाजी ने बनवाया; एक विवरण काम का श्रेय हिरोजी इंदुलकर को देता है और दूसरा गोविंद विश्वनाथ प्रभु को”।
नींव में वह ब्योरा छिपा है जो परीक्षकों को पसंद आता है। राज्य पर्यटन निगम के वर्णन के मुताबिक नींव के पत्थरों के लिए खाँचे काटे गए, और पत्थरों को जमाने के लिए उनमें पिघला हुआ सीसा डाला गया। विश्वकोश बताता है कि दस्तावेजों में कई खंडी सीसे का जिक्र है; खंडी वजन की एक पुरानी माप थी। इसे धातु का ऐसा मसाला समझिए जिसने पत्थर को पत्थर से जकड़ दिया। सीसे के जो कुल आँकड़े ऑनलाइन घूमते हैं, वे किसी तारीख वाले स्रोत तक नहीं पहुँचते, इसलिए उन्हें छोड़ दीजिए। गजेटियर यह भी दर्ज करता है कि कहा जाता है, शिवाजी ने अपने हाथों से किले के काम में हिस्सा लिया। यह परंपरा है, और इसे परंपरा की तरह ही लिखना चाहिए।
सिंधुदुर्ग का इतिहास, दौर-दर-दौर
सिंधुदुर्ग किले का इतिहास इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है कि मालवण का बंदरगाह किसके हाथ में था। नियंत्रण शिवाजी से कोल्हापुर शाखा के पास गया। फिर 1765 के छोटे-से अंग्रेजी दौर के बाद, 1812 में यह ब्रिटिशों के हाथ में चला गया।
1664 से 1680: शिवाजी का नौसैनिक मुख्यालय
ICOMOS, यानी सांस्कृतिक स्थलों पर UNESCO को सलाह देने वाली संस्था, सिंधुदुर्ग को मराठा नौसेना का मुख्यालय कहती है। शिवाजी ने इसके बंदरगाह के चारों ओर छोटे किलों का घेरा बनाया:
- पद्मगड, किनारे के ज्यादा पास वाले छोटे टापू पर, जो मुख्य किले की आड़ बनता था और जहाज बनाने का कारखाना भी था;
- राजकोट, मालवण शहर के अंदर एक ऊँची जमीन पर;
- सरजेकोट, लगभग डेढ़ मील उत्तर में खाड़ी के मुहाने पर।
राजकोट को याद रखिए। यह नाम 2023 में फिर सामने आता है।
यह नौसेना तटीय नौसेना थी, और CCRT इस बारे में खुलकर बात करता है। शिवाजी ने मराठा नौसेना की नींव रखी, लेकिन उनके पास न इतने साधन थे, न इतना समय कि बड़े जहाज बनवाते और तट से आगे खुले समुद्र की ओर देखते। सिंधुदुर्ग ऐसी ही नौसेना के लिए ठीक बैठता था: छोटे जहाजों का ऐसा बंदरगाह, जिसमें दुश्मन का बेड़ा आसानी से घुस न सके।
1680 से 1713: मंदिर और रानी का तट
1680 में शिवाजी की मृत्यु के बाद, उनके छोटे बेटे छत्रपति राजाराम (1689-1700) के शासनकाल में किले के बीचोंबीच उनका एक मंदिर बनाया गया। दक्षिणी दीवार के नीचे रेत की एक छोटी-सी अर्धचंद्राकार पट्टी है, जिसे राणीची वेळा कहते हैं, यानी रानी के नहाने की जगह। CCRT इसे राजाराम की रानी ताराबाई से जोड़ता है। यह परंपरा है; कोई तारीख वाला दस्तावेज इसे पक्का नहीं करता।
1713 से 1812: कोल्हापुर और फोर्ट ऑगस्टस
1713 तक मराठा राज्य के कोल्हापुर और सातारा घरानों के बीच शिवाजी के इलाके बँट चुके थे, और मालवण कोल्हापुर के सरदारों के हिस्से आया। उस दौर के अंग्रेजी दस्तावेज मालवण को तट के सबसे सक्रिय “समुद्री लुटेरों” का अड्डा बताते हैं। लेकिन वही दस्तावेज यह भी दर्ज करते हैं कि राजा के सिवा कोई और जहाजों को तैयार नहीं करता था। यानी ये एक शासक के हथियारबंद जहाज थे, और “लुटेरा” वह शब्द था जो इनके निशाने पर रहने वाले अंग्रेज इस्तेमाल करते थे।
1765 में बंबई से मेजर गॉर्डन और बॉम्बे मरीन के जॉन वॉटसन की अगुवाई में एक अभियान आया। उसने किला जल्दी ही जीत लिया और उसका नाम फोर्ट ऑगस्टस रख दिया। लेकिन अंग्रेजों को यह किला घाटे का सौदा लगा, और इसे गिराना भी मुश्किल था। इसलिए उन्होंने इसे कुछ शर्तों पर कोल्हापुर के सरदार को लौटा दिया:
- व्यापार को न छेड़ने का वादा;
- अच्छे आचरण की जमानत और नकद भुगतान;
- मालवण में एक अंग्रेजी कोठी (factory) खोलने की इजाजत।
यह समझौता टिका नहीं। 1812 में एक बड़े समझौते के हिस्से के रूप में कोल्हापुर ने मालवण का बंदरगाह, किले और द्वीप समेत, ब्रिटिशों को सौंप दिया। उसी साल कर्नल लायनल स्मिथ की अगुवाई में एक टुकड़ी ने मालवण के बेड़े का सफाया कर दिया।
1812 के बाद: फौजी चौकी से संरक्षित स्मारक तक
ब्रिटिश रिपोर्टें दिखाती हैं कि जिस किले के लिए कोई लड़ नहीं रहा, उसे समुद्र कितनी जल्दी खाने लगता है। 1828 तक मानसून की लहरें पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से की ज्यादातर मुंडेर बहा ले गई थीं, और पश्चिमी दीवार की नींव खोखली कर चुकी थीं। 1862 तक, मरम्मत के बाद, दीवारें ठीक-ठाक हालत में थीं। तब वहाँ कोई फौजी टुकड़ी नहीं थी, और उन्नीस पुरानी तोपें पड़ी थीं। 1981 में इसी किले के नाम पर नया सिंधुदुर्ग जिला बना, जिसे 1 मई को रत्नागिरी से अलग किया गया। आज ASI इसकी रक्षा करता है।
सिंधुदुर्ग की सुरक्षा कैसे काम करती है: उसी क्रम में, जिसमें हमलावर उससे टकराता है
सिंधुदुर्ग की सुरक्षा पानी में ही शुरू हो जाती है। इसे उसी क्रम में देखिए जिसमें किसी दुश्मन जहाज का दल इससे टकराता, तो हर खूबी किसी खास समस्या का जवाब नजर आएगी।
समुद्री चट्टानें और संकरा रास्ता
मालवण की खाड़ी लगभग पूरी तरह चट्टानों की कतारों से बंद है। नावें किले तक एक संकरे रास्ते (channel) से पहुँचती हैं, जो धोंतरा और पद्मगड नाम के दो छोटे टापुओं के बीच से गुजरता है। यह खतरा मराठों के बाद भी बना रहा। 1865 में जॉन्स्टन कैसल नाम का भाप-जहाज द्वीप के उत्तरी सिरे से चौथाई मील दूर एक डूबी चट्टान से टकराकर टूट गया।
किनारे के साथ चलती दीवार
दीवार द्वीप की तटरेखा के साथ-साथ चलती है। इसलिए इसकी रूपरेखा बहुत टेढ़ी-मेढ़ी है, जिसमें बहुत-से बाहर निकले कोने और गहरे अंदर धँसे हिस्से हैं। 1828 के एक ब्रिटिश सर्वे ने इसका फायदा साफ शब्दों में बताया: परकोटे के बाहर एक भी ऐसा बिंदु नहीं है, जिसे अंदर के किसी न किसी बिंदु से निशाने पर न लिया जा सके।
इसे बगल से मार (flanking fire) कहते हैं, यानी दीवार से बाहर निकले किसी हिस्से से, दीवार के सामने वाले हिस्से के साथ-साथ गोलाबारी। जो नाव दीवार की जड़ तक पहुँच गई, वह तोपों से बची नहीं है; वह बस अगले बाहर निकले हिस्से की मार की सीध में आ गई है। हर बाहर निकले हिस्से को कार के साइड मिरर की तरह समझिए, जो अपने बगल की दीवार का हिस्सा दिखाता है। यह तुलना सिर्फ देखने तक ठीक है, क्योंकि इन आईनों पर तोपें लगी थीं।
समुद्र वाली तरफ ऊँचाई का महत्व कम था। गजेटियर के मुताबिक दीवारें औसतन 29 से 30 फुट ऊँची और 12 फुट मोटी हैं। फिर भी समुद्र की ओर एक जगह वे ज्वार के ऊँचे पानी के लगभग बराबर लगती हैं। वहाँ जो काम बाकी जगह ऊँचाई करती है, वह समुद्री चट्टानों ने किया।
किले के आकार पर स्रोत एकमत नहीं हैं, इसलिए कोई संख्या लिखने से पहले पूरा दायरा जान लीजिए:
| माप | 1880 का गजेटियर | मराठी विश्वकोश | CCRT |
|---|---|---|---|
| दीवारों का घेरा | 2 मील से थोड़ा कम (लगभग 3.2 किलोमीटर) | लगभग 3.5 किलोमीटर | 4 किलोमीटर |
| बुर्ज | लगभग 32 बुर्ज | 42 | 42 |
| दीवार की ऊँचाई | 29 से 30 फुट (लगभग 9 मीटर) | लगभग 10 मीटर | 9 मीटर |
| क्षेत्रफल | 48 एकड़ | 19 हेक्टेयर | 48 एकड़ |
सबसे सुरक्षित उत्तर है: “आधुनिक गिनती में 42 बुर्ज, और लगभग 3 से 4 किलोमीटर लंबी दीवार”। कोई भी स्रोत नहीं बताता कि 1880 की गिनती कम क्यों है। इसलिए इसे सुलझाने की कोशिश मत कीजिए, इसे मतभेद की तरह ही लिखिए।
बुर्ज
बुर्ज किले के तोप-मंच हैं: दीवार से बाहर निकली अर्धगोल मीनारें, जो एक-दूसरे से 40 से 130 गज की दूरी पर हैं। इनमें तोप-झरोखे (embrasures) बने हैं, यानी मुंडेर के वे खुले हिस्से जिनसे तोप दागी जाती है, जबकि उसे चलाने वाले पत्थर के पीछे सुरक्षित रहते हैं। अंदर से पतली सीढ़ियाँ दीवार के ऊपर तक जाती हैं।
छिपा हुआ दरवाजा
प्रवेश-द्वार वह हिस्सा है जो सबको याद रहता है, और यहाँ यह शोहरत जायज भी है। यह उत्तर-पूर्वी कोने पर है, जहाँ भाटे के समय भी दरवाजे के पास गहरा पानी रहता है, और बाहर से यह आसानी से दिखता नहीं। CCRT के मुताबिक दरवाजा दो बुर्जों के पीछे है, और ICOMOS इसे छिपा हुआ अर्धवृत्ताकार प्रवेश-द्वार कहता है। किसी नाव को दोनों बुर्जों की तोपों के नीचे काफी पास आना पड़ता, तब कहीं जाकर उसके दल को दिखता कि दरवाजा है कहाँ।
दरवाजे के ऊपर एक टूटा-फूटा नगारखाना है, यानी रस्मी बाजे वालों के लिए बना नगाड़ा-घर। ठीक अंदर द्वार के रक्षक के रूप में हनुमान का एक छोटा मंदिर है। 1880 का गजेटियर ऐसे मंदिर को उन किलों की एक पहचान बताता है, जिन्हें शिवाजी ने बनवाया या फिर से बनवाया।
दीवारों के भीतर: पानी और निकलने का रास्ता
घेराबंदी में फँसा समुद्री किला अपने मीठे पानी के सहारे जिंदा रहता है, और खारे समुद्र के बीच सिंधुदुर्ग के कुएँ मीठा पानी देते हैं:
- दूधबाव, यानी दूध का कुआँ;
- दहीबाव, यानी दही का कुआँ;
- साखरबाव, यानी शक्कर का कुआँ।
विश्वकोश एक ऐसी खूबी और जोड़ता है जो घेरा डालने वाले को नहीं दिखती। किले के अंदर एक आड़ी दीवार (cross wall) है, और मुसीबत के वक्त नाव से चुपचाप निकल भागने का इंतजाम भी।
शिवाजी मंदिर और हाथ-पैर के निशान
सिंधुदुर्ग के बीचोंबीच बना मंदिर खुद शिवाजी को समर्पित है, और यह राजाराम के शासनकाल में, 1689 से 1700 के बीच बना था। इसे शिवराजेश्वर मंदिर कहते हैं, और यहाँ किले के संस्थापक ही देवता हैं। विश्वकोश इसका बारीकी से वर्णन करता है:
- बलुआ पत्थर की एक मूर्ति, जो वीरासन में बैठी है, यानी वीर के बैठने की मुद्रा में;
- सिर पर नाविक की टोपी जैसा पहनावा, और चेहरे पर दाढ़ी नहीं;
- मंदिर में रखी म्यान में बंद एक तलवार;
- 13 गुणा 7 मीटर का मूल मंदिर, जिसके आगे का सभामंडप 1907 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने जुड़वाया।
यहाँ की पूजा पुरानी है और बिना रुके चलती आई है। 1880 में गजेटियर ने देखा कि पत्थर की मूर्ति पर चाँदी का मुखौटा चढ़ा रहता है, और त्योहारों पर सोने का। इस पूजा के लिए 1812 में कोल्हापुर के सरदार ने 1,522 रुपये का सालाना भत्ता तय किया था। कोल्हापुर के छत्रपति आज भी हर साल मंदिर में जिरेटोप, यानी कलगी वाली मराठा पगड़ी, और कपड़े भेजते हैं।
गजेटियर इतिहासकार ग्रांट डफ से जुड़ी एक बात भी दोहराता है: मराठों के लिए सिंधुदुर्ग शिवाजी का स्मृति-स्मारक (cenotaph) है, यानी ऐसे व्यक्ति का स्मारक जिसका दाह-संस्कार या दफन कहीं और हुआ हो। यह शब्द बिलकुल सटीक है, क्योंकि उनकी समाधि, यानी उनके दाह-संस्कार की जगह पर बना स्मारक, रायगढ़ में है, जहाँ 1680 में उनकी मृत्यु हुई थी।
निशानों की परंपरा अलग है। मुख्य दरवाजे के दाईं ओर की दीवार में दो छोटे आले हैं, जिनमें एक बाएँ पैर और एक दाएँ हाथ का निशान है। लोकमान्यता है कि ये शिवाजी के हैं। 1880 के गजेटियर ने इन्हें छोटे गुंबदों से ढका पाया, और उसके एक संवाददाता ने चुटकी लेते हुए लिखा कि अगर ये इतने छोटे न होते, तो ये हाथ-पैर के सटीक निशान होते। कोल्हापुर में रोज की पूजा के लिए हाथ के निशान की चाँदी की ढली प्रतिकृति रखी है। मंदिर इतिहास है। निशान परंपरा हैं।
आज का सिंधुदुर्ग किला: UNESCO, ASI और राजकोट वाली गलतफहमी
सिंधुदुर्ग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक है। 11 जुलाई 2025 से यह भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य का घटक 11 है, जिसे पेरिस में विश्व धरोहर समिति के 47वें सत्र में सूची में दर्ज किया गया। इस धरोहर का UNESCO पेज बारह किलों के नाम देता है, और मराठा सैन्य परिदृश्य पर करेंट अफेयर्स नोट पूरी सूची में शामिल होने की कहानी समझाता है।
सिंधुदुर्ग के लिए जो बातें मायने रखती हैं:
- यह सीरीज भारत की 44वीं विश्व धरोहर बनी, जैसा कि संस्कृति मंत्रालय की सूची में शामिल होने पर जारी विज्ञप्ति में दर्ज है; भारत में UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाला नोट इसे बाकी स्थलों के बीच रखकर दिखाता है।
- मानदंड (iv) किसी ऐसी असाधारण इमारत या इमारतों के समूह को मान्यता देता है जो मानव इतिहास के किसी दौर को दिखाता हो; मानदंड (vi) ऐसी घटनाओं, परंपराओं या मान्यताओं से सीधे जुड़ाव को मान्यता देता है, जिनका महत्व पूरी दुनिया के लिए असाधारण हो।
- सिंधुदुर्ग, खांदेरी और सुवर्णदुर्ग द्वीप-किले हैं; विजयदुर्ग अकेला तटीय किला है; तमिलनाडु का जिंजी महाराष्ट्र के बाहर का अकेला किला है।
यहाँ एक पेच है, जिसे ज्यादातर नोट्स छोड़ देते हैं। ICOMOS ने इस सूचीकरण की सिफारिश नहीं की थी। 12 मार्च 2025 को मंजूर हुए उसके मूल्यांकन ने फैसला टालने की सलाह दी, और माना कि मानदंड (vi) साबित नहीं हुआ। फिर भी समिति ने इसे सूची में दर्ज कर लिया। संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक 20 में से 18 सदस्य देशों (State Parties) ने भारत के प्रस्ताव का साथ दिया।
ICOMOS सिंधुदुर्ग की हालत पर भी साफ-साफ बोलता है:
- द्वीप और तटीय किले खारे पानी की फुहार, हवा और लहरों की मार से तेजी से घिसते हैं;
- सिंधुदुर्ग में कुछ जगहों पर हिस्से क्षतिग्रस्त हैं, हालाँकि वहाँ संरक्षण का काफी काम हो चुका है;
- इसके बफर जोन, यानी धरोहर के चारों ओर की संरक्षित पट्टी, में बनी इमारतें और किले की दीवार पर लगा स्टील का एक लैंप नुकसानदेह माने गए हैं।
विश्वकोश जोड़ता है कि समय के साथ लहरों ने कुछ बुर्ज और दीवार के कुछ हिस्से गिरा दिए हैं। यह वही 1828 वाली रिपोर्ट है, बस दो सदी बाद।
सिंधुदुर्ग एक जीवित किला भी है। कुछ परिवार आज भी इसके अंदर रहते हैं, और दीवारों के भीतर एक आंगनवाड़ी और एक प्री-प्राइमरी स्कूल है। CCRT लगभग बीस पुश्तैनी हिंदू और मुस्लिम परिवार गिनता है। 1880 के गजेटियर को वहाँ गाबित भी मिले थे, जो कोंकण का एक समुद्री पेशे वाला समुदाय है; वे किले के नारियल के पेड़ किराए पर लेते थे। कोई भी प्रबंधन योजना उन लोगों को साथ लेकर ही चल सकती है, जिनके घर स्मारक का हिस्सा हैं। मालवण जेटी से नावें चलती हैं, और पार करने में 15 से 20 मिनट लगते हैं। राज्य पर्यटन निगम अक्टूबर से मई के बीच जाने की सलाह देता है।
नौसेना दिवस 2023 और राजकोट की प्रतिमा
हाल की जिन खबरों में “सिंधुदुर्ग” लिखा है, उनमें से ज्यादातर इस द्वीप-किले के बारे में नहीं हैं:
- 4 दिसंबर 2023 को प्रधानमंत्री सिंधुदुर्ग में नौसेना दिवस समारोह में शामिल हुए। उन्होंने तारकर्ली तट से नौसेना के प्रदर्शन देखे, और राजकोट किले में शिवाजी की एक प्रतिमा का अनावरण किया, जो मालवण शहर में मुख्य भूमि पर बना किला है। उन्होंने नौसेना अफसरों के लिए शिवाजी की विरासत को दिखाने वाले नए एपॉलेट (कंधे पर लगने वाले बैज) की, और भारतीय परंपराओं के हिसाब से नौसेना के रैंकों के नए नामों की घोषणा भी की।
- राजकोट की प्रतिमा अगस्त 2024 में ढह गई, और 29 अगस्त को आकाशवाणी ने बताया कि इसकी जाँच के लिए नौसेना की अगुवाई में एक संयुक्त तकनीकी समिति बनाई जा रही है।
उन रिपोर्टों में “सिंधुदुर्ग” का मतलब जिला है। इनमें से कोई भी घटना कुरटे द्वीप पर नहीं हुई।
परीक्षा के लिए सिंधुदुर्ग किला कैसे पढ़ें
सिंधुदुर्ग वहाँ बैठता है जहाँ सिलेबस के तीन हिस्से मिलते हैं:
- GS पेपर I, संस्कृति: किलों की वास्तुकला और विश्व धरोहर स्थल;
- GS पेपर I और प्रीलिम्स का इतिहास: मराठा, जिन पर पूरी जानकारी छत्रपति शिवाजी महाराज वाले नोट में है;
- GS पेपर III, सुरक्षा: भारत की तटीय सुरक्षा के पीछे का इतिहास।
मुख्य परीक्षा सिंधुदुर्ग का नाम लेकर सवाल नहीं पूछती; वह उन विषयों को परखती है जिन्हें यह किला समझाता है। मुख्य परीक्षा 2018 के GS पेपर I में पूछा गया था: “भारतीय कला विरासत की सुरक्षा इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए।“। मुख्य परीक्षा 2025 के GS पेपर III में पूछा गया: “भारत के समुद्री व्यापार की रक्षा के लिए समुद्री सुरक्षा क्यों जरूरी है? समुद्री और तटीय सुरक्षा की चुनौतियों और आगे की राह पर चर्चा कीजिए।“। सिंधुदुर्ग पहले सवाल को एक ठोस उदाहरण देता है, यानी समुद्र की मार झेलता ऐसा स्मारक जिसमें लोग रहते हैं। दूसरे सवाल को यह एक ऐतिहासिक शुरुआत देता है। प्रीलिम्स में Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति के हैं, और 2025 का सूचीकरण सीधे इसी हिस्से में आता है।
रिवीजन के लिए ये बातें पक्की कर लीजिए:
- 25 नवंबर 1664 को पहला पत्थर रखा गया और 1667 में काम पूरा हुआ, मालवण के पास कुरटे द्वीप पर।
- यह जंजीरा की नाकाम घेराबंदियों के बाद बना और शिवाजी का नौसैनिक मुख्यालय बना; पद्मगड, राजकोट और सरजेकोट इसके सहायक किले थे।
- शिवाजी मंदिर राजाराम के शासनकाल (1689-1700) का है; कोल्हापुर के शाहू ने 1907 में इसका सभामंडप जोड़ा।
- अंग्रेजों ने 1765 में इसे फोर्ट ऑगस्टस कहा; कोल्हापुर ने 1812 में इसे ब्रिटिशों को सौंप दिया।
- 2025 की सीरीज में यह खांदेरी और सुवर्णदुर्ग के साथ द्वीप-किला है; विजयदुर्ग तटीय किला है।
- यह ASI द्वारा संरक्षित है, और सीरीज को ICOMOS की टालने की सलाह के बावजूद मानदंड (iv) और (vi) के तहत सूची में दर्ज किया गया।
जिन गलतफहमियों से नंबर कटते हैं:
- सिंधुदुर्ग और जंजीरा। जंजीरा सिद्दियों का वह किला है जिसे शिवाजी जीत नहीं पाए, और यह 2025 की सीरीज में शामिल नहीं है; सिंधुदुर्ग उसी का जवाब है।
- सिंधुदुर्ग और राजकोट। 2023 की प्रतिमा और 2024 में उसका ढहना राजकोट से जुड़े हैं, और राजकोट किला मालवण शहर में मुख्य भूमि पर बना किला है।
- सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग। सिंधुदुर्ग शिवाजी का नौसैनिक मुख्यालय था; विजयदुर्ग आगे चलकर कुलाबा के साथ कान्होजी आंग्रे के मुख्य अड्डों में से एक बना।
- किला और जिला। 1 मई 1981 को बना सिंधुदुर्ग जिला इसी किले के नाम पर है।
सिंधुदुर्ग को तट पर उसके पड़ोसी किलों के साथ रखकर पढ़ना सबसे अच्छा रहता है:
| किला | प्रकार | किसने किलेबंदी की, और कब | 2025 की UNESCO सीरीज में? |
|---|---|---|---|
| सिंधुदुर्ग | मालवण के पास द्वीप-किला | शिवाजी ने नए सिरे से बनवाया, 1664 से 1667 | हाँ |
| जंजीरा | मुरुड के पास द्वीप-किला | सिद्दी; मौजूदा दीवारें 1694 में शुरू होकर 1707 में पूरी हुईं | नहीं |
| सुवर्णदुर्ग | हर्णै के पास द्वीप-किला | 16वीं सदी में बीजापुर सल्तनत; 1660 में शिवाजी के समय मजबूत किया गया | हाँ |
| खांदेरी | बंबई के टापुओं और जंजीरा के बीच द्वीप-किला | 1679 में शिवाजी ने बनवाया | हाँ |
| विजयदुर्ग | वाघोटन मुहाने के पास एक अंतरीप पर तटीय किला | शिलाहारों ने बनवाया; शिवाजी ने विस्तार किया; बाद में कान्होजी आंग्रे का अड्डा | हाँ |
इसी सीरीज के पहाड़ी किले, जैसे प्रतापगढ़ और शिवनेरी, उल्टी बात साबित करते हैं। वहाँ सुरक्षा ऊँचाई और जंगल से आती है; सिंधुदुर्ग में यह काम समुद्री चट्टानें और एक ऐसा दरवाजा करता है, जो दिखता ही नहीं।
सिंधुदुर्ग छोटा विषय है, लेकिन दोनों पेपरों में काम आता है। प्रीलिम्स के लिए यह तथ्यों का साफ-सुथरा सेट है। मुख्य परीक्षा के लिए यह इस बात का सबूत है कि शिवाजी समुद्र को ऐसी सरहद मानते थे, जिसके लिए अलग से एक किला बनाना जरूरी था। और इसके ढहते बुर्ज और इसमें रहने वाले परिवार दिखाते हैं कि धरोहर को बचाने के रास्ते में असली चुनौतियाँ क्या हैं।
सामान्य प्रश्न
सिंधुदुर्ग किला किसने बनवाया?
छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिंधुदुर्ग किला मालवण के पास कुरटे द्वीप पर बनवाया। यह तब बना, जब सिद्दियों के द्वीप-किले जंजीरा को जीतने की उनकी बार-बार की कोशिशें नाकाम हो गईं। काम की देखरेख किसने की, इस पर स्रोत अलग-अलग हैं: CCRT हिरोजी इंदुलकर का नाम लेता है, जबकि मराठी विश्वकोश गोविंद विश्वनाथ प्रभु का। दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि गोवा के पुर्तगाली कारीगरों ने निर्माण में मदद की।
सिंधुदुर्ग किला कब बना?
पहला पत्थर 25 नवंबर 1664 को रखा गया, और किला लगभग तीन साल बाद, 1667 में पूरा हुआ। सिंधुदुर्ग जिला प्रशासन और मराठी विश्वकोश, दोनों नवंबर 1664 को ही शुरुआत की तारीख बताते हैं। रत्नागिरी का 1880 का गजेटियर शिवाजी के मालवण चुनने को लगभग 1665 का बताता है।
सिंधुदुर्ग किला किसलिए मशहूर है?
यह शिवाजी की नौसेना का मुख्यालय था, और CCRT इसे उन किलों में सबसे मजबूत कहता है जिन्हें शिवाजी ने नए सिरे से बनवाया। इसका दरवाजा दो बुर्जों के पीछे छिपा है, और इसकी नींव के पत्थर पिघले सीसे से जमाए गए थे। यहाँ एक मंदिर भी है, जिसमें खुद शिवाजी की पूजा होती है। 2025 से यह एक UNESCO विश्व धरोहर का हिस्सा भी है।
क्या सिंधुदुर्ग किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?
हाँ। सिंधुदुर्ग भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के 12 घटकों में से एक है, जिन्हें विश्व धरोहर समिति ने 11 जुलाई 2025 को पेरिस में अपने 47वें सत्र में सूची में दर्ज किया। यह सीरीज सांस्कृतिक मानदंड (iv) और (vi) के तहत दर्ज हुई, और सिंधुदुर्ग को इसके तीन द्वीप-किलों में से एक के रूप में दिखाया गया है।
क्या सिंधुदुर्ग और जंजीरा किला एक ही हैं?
नहीं। जंजीरा रायगढ़ जिले में मुरुड के पास सिद्दियों का द्वीप-किला है, जिसे शिवाजी ने घेरा तो सही, पर कभी जीत नहीं पाए। सिंधुदुर्ग वह द्वीप-किला है जो उन्होंने इन घेराबंदियों के नाकाम होने के बाद मालवण के पास बनवाया। जंजीरा 2025 की UNESCO सूची में शामिल नहीं है, और सिंधुदुर्ग शामिल है।
क्या 2024 में ढही शिवाजी प्रतिमा सिंधुदुर्ग किले में थी?
नहीं। इस प्रतिमा का अनावरण 4 दिसंबर 2023 को नौसेना दिवस समारोह के दौरान राजकोट किले में हुआ था, जो मालवण शहर में मुख्य भूमि पर बना एक छोटा किला है। यह अगस्त 2024 में ढह गई, और इसकी जाँच के लिए नौसेना की अगुवाई में एक संयुक्त तकनीकी समिति बनाई गई। खबरों में अक्सर ‘सिंधुदुर्ग’ लिखा जाता है, क्योंकि मालवण सिंधुदुर्ग जिले में है।
सिंधुदुर्ग किले के अंदर शिवाजी मंदिर किसने बनवाया?
यह मंदिर, जिसे शिवराजेश्वर मंदिर कहते हैं, शिवाजी के छोटे बेटे छत्रपति राजाराम के शासनकाल में बना, जिन्होंने 1689 से 1700 तक राज किया। इसकी बलुआ पत्थर की मूर्ति में शिवाजी बैठे हुए हैं, और उनके चेहरे पर दाढ़ी नहीं है। मंदिर के सामने का सभामंडप 1907 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने जुड़वाया।
सिंधुदुर्ग किला कैसे पहुँचें?
किले तक मालवण जेटी से नाव से पहुँचा जाता है, और यह सफर लगभग 15 से 20 मिनट का है। राज्य पर्यटन निगम अक्टूबर से मई के बीच जाने की सलाह देता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. सिंधुदुर्ग किले के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह मालवण के पास कुरटे द्वीप पर बनाया गया था। 2. इसे सिद्दियों ने बनवाया था और बाद में शिवाजी ने इस पर कब्जा किया। 3. यह भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के द्वीप-किलों में से एक है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) शिवाजी ने सिंधुदुर्ग खुद बनवाया था, सिद्दियों के किले जंजीरा को न जीत पाने के बाद; इसलिए कथन 2 गलत है।
2. भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य में शामिल निम्नलिखित किलों में से किसे द्वीप-किले के बजाय तटीय किले की श्रेणी में रखा गया है?
- (a) सिंधुदुर्ग
- (b) खांदेरी
- (c) सुवर्णदुर्ग
- (d) विजयदुर्ग
उत्तर: (d) विजयदुर्ग मुख्य भूमि से जुड़े एक अंतरीप पर खड़ा है; बाकी तीनों द्वीप-किले हैं।
3. सिंधुदुर्ग किले के अंदर बने शिवाजी मंदिर के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह छत्रपति राजाराम के शासनकाल में बना था। 2. इसके सामने का सभामंडप 1907 में कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने जोड़ा था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) मंदिर राजाराम के शासनकाल (1689-1700) का है, और कोल्हापुर के शाहू ने 1907 में इसका सभामंडप जोड़ा।
4. 1765 में बंबई से आए एक अंग्रेजी अभियान ने सिंधुदुर्ग पर कब्जा किया और उसका नया नाम रखा:
- (a) फोर्ट जॉर्ज
- (b) फोर्ट ऑगस्टस
- (c) फोर्ट विक्टोरिया
- (d) फोर्ट सेंट डेविड
उत्तर: (b) अंग्रेजों ने इसे फोर्ट ऑगस्टस कहा, लेकिन जल्द ही कुछ शर्तों के साथ इसे कोल्हापुर के सरदार को लौटा दिया।
5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. जंजीरा: सिद्दियों के कब्जे में 2. खांदेरी: 1679 में शिवाजी ने बनवाया 3. विजयदुर्ग: मूल रूप से शिलाहारों ने बनवाया। ऊपर दिए गए युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?
- (a) केवल एक
- (b) केवल दो
- (c) तीनों
- (d) कोई भी नहीं
उत्तर: (c) तीनों युग्म ऐतिहासिक रिकॉर्ड से मेल खाते हैं।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “सिंधुदुर्ग एक गढ़ के रूप में कम, और एक नौसैनिक अड्डे के रूप में ज्यादा बनाया गया था।” इसकी जगह, इसकी बनावट और इसके सहायक किलों के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- चर्चा कीजिए कि शिवाजी के तटीय किले जंजीरा के सिद्दियों और कोंकण तट की यूरोपीय व्यापारिक ताकतों के प्रति उनके जवाब को कैसे दिखाते थे। (15 अंक, 250 शब्द)
- ICOMOS ने मराठा सैन्य परिदृश्य के नामांकन को टालने की सिफारिश की थी, फिर भी विश्व धरोहर समिति ने 2025 में इसे सूची में दर्ज कर लिया। इससे विश्व धरोहर से जुड़े फैसले लेने के तरीके के बारे में क्या पता चलता है? (10 अंक, 150 शब्द)
- सिंधुदुर्ग जैसे द्वीप-किलों को समुद्र और इंसान, दोनों से खतरा है। इनके संरक्षण की चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और उनसे निपटने के उपाय सुझाइए। (10 अंक, 150 शब्द)
- जिन स्मारकों में लोग रहते हैं, उनके प्रबंधन की चुनौती अलग तरह की होती है। सिंधुदुर्ग किले के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)