कार्ल्सबर्ग रिज: चुंबकीय पट्टियाँ, सल्फाइड वेंट और भारत का ISA अनुबंध
कार्ल्सबर्ग रिज: भारत-सोमालिया प्लेट सीमा, वाइन और मैथ्यूज के पीछे का सर्वे, इसके हाइड्रोथर्मल वेंट और भारत का सल्फाइड अनुबंध।
कार्ल्सबर्ग रिज (कार्ल्सबर्ग कटक) उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर का मध्य-महासागरीय कटक है। यह समुद्र की तली पर वह सिलाई है, जहाँ भारतीय प्लेट और सोमाली प्लेट एक-दूसरे से दूर जाती हैं और नया समुद्री तल बनता है। यह भूमध्य रेखा के ठीक उत्तर से अदन की खाड़ी की ओर जाता है और अरब सागर को सोमाली बेसिन से अलग करता है। कार्ल्सबर्ग रिज दो वजहों से अहम है। पहली, 1962 में इसके ऊपर हुए एक चुंबकीय सर्वे ने फ्रेडरिक वाइन और ड्रमंड मैथ्यूज को समुद्र तल प्रसरण (seafloor spreading) का सबूत दिया। दूसरी, सितंबर 2025 से भारत के पास इसके सल्फाइड खनिजों की खोज का 15 साल का अनुबंध है।
इसके बारे में दो धारणाएँ सुधारनी जरूरी हैं। पहली धारणा यह है कि यह तय सिरों वाली एक अलग पर्वत श्रृंखला है। कुछ अध्ययन इसे ऐसे ही देखते हैं, लेकिन कुछ दूसरे अध्ययन इसे मध्य भारतीय कटक का उत्तरी हिस्सा मानते हैं। दूसरी धारणा यह है कि भारत के अनुबंध से यह रिज भारत का हो गया। ऐसा नहीं है। अनुबंध वाला इलाका अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल में है, जो किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। भारत के पास खोज का अधिकार है, मालिकाना हक नहीं।
कार्ल्सबर्ग रिज क्या है और कहाँ है?
कार्ल्सबर्ग रिज अरब सागर और हिंद महासागर की तली पर फैला समुद्र के भीतर का एक कटक है। यह एक प्रसारी कटक है, यानी अपसारी प्लेट सीमा का शिखर। ब्रिटानिका के अनुसार इसका विस्तार 2°07’N 66°30’E से शुरू होता है, जहाँ यह मध्य-हिंद कटक (यानी मध्य भारतीय कटक) से जुड़ता है। वहाँ से यह उत्तर-पश्चिम में अदन की खाड़ी तक जाता है। कार्ल्सबर्ग रिज की स्थिति और इससे जुड़े मुख्य तथ्य नीचे की तालिका में हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| यह क्या है | उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर में एक मध्य-महासागरीय कटक और अपसारी प्लेट सीमा |
| विस्तार | 2°07’N 66°30’E से, जहाँ यह मध्य-हिंद कटक से मिलता है, उत्तर-पश्चिम में अदन की खाड़ी तक (ब्रिटानिका) |
| प्लेटें | उत्तर-पूर्व में भारतीय प्लेट; दक्षिण-पश्चिम में सोमाली प्लेट, जिसे पुराने स्रोत अफ्रीकी प्लेट कहते हैं |
| किसे अलग करता है | उत्तर-पूर्व के अरब सागर को दक्षिण-पश्चिम के सोमाली बेसिन से |
| गहराई | शिखर की औसत गहराई 1,800 से 3,600 मीटर, और आसपास की तली से लगभग 2,100 मीटर ऊँचा (ब्रिटानिका) |
| प्रसरण दर | धीमी: लगभग 3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष, पूरी दर (मर्टन और साथी, 2006) |
| नाम | कार्ल्सबर्ग फाउंडेशन के नाम पर, जिसने 1928-1930 के डेनिश डाना अभियान का खर्च उठाया |
| ऐतिहासिक सर्वे | HMS ओवेन, नवंबर 1962; वाइन और मैथ्यूज ने इसे 7 सितंबर 1963 को नेचर पत्रिका में इस्तेमाल किया |
| भारत की हिस्सेदारी | 10,000 वर्ग किलोमीटर में बहुधात्विक सल्फाइड की खोज का ISA अनुबंध, 15 सितंबर 2025 से, 15 साल के लिए |
प्लेट सीमा के रूप में कार्ल्सबर्ग रिज कैसे काम करता है
कार्ल्सबर्ग रिज के साथ-साथ भारतीय प्लेट सोमाली प्लेट से दूर खिसकती है। इस दरार में नीचे से मेंटल की गर्म चट्टान ऊपर उठती है, थोड़ी पिघलती है और ठंडी होकर बेसाल्ट की नई परत बना देती है। अपसारी सीमा का यही मतलब है: ऐसी रेखा जहाँ समुद्री तल नष्ट नहीं होता, बल्कि बनता है। पूरी प्रक्रिया प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत वाले नोट में समझाई गई है, और यह बेसाल्ट वही लावा है जिसकी बात ज्वालामुखी और उसकी भू-आकृतियाँ वाले नोट में हुई है।
पश्चिमी तरफ कौन-सी प्लेट है, यह इस पर निर्भर करता है कि आप कौन-सा स्रोत पढ़ रहे हैं। ब्रिटानिका, ज्यादातर सामान्य किताबों की तरह, अफ्रीकी प्लेट का नाम लेता है। लेकिन डीमेट्स और मर्कुरिएव (2021) जैसे प्लेट-गति के अध्ययन एक अलग सोमाली प्लेट मानते हैं। यह पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट के पार अफ्रीका का पूर्वी खंड है। ये अध्ययन कार्ल्सबर्ग और उत्तरी मध्य भारतीय कटकों पर चुंबकीय उत्क्रमण (magnetic reversal) की रेखाओं को लगभग 9,000 जगह पार करने के आँकड़ों से भारत-सोमालिया गति का हिसाब दोबारा लगाते हैं। दोनों नाम एक ही समुद्री तल के हैं। सोमाली नाम बस ज्यादा सटीक है, और इसी से समझ आता है कि सोमालिया वाले देश-नोट और इस रिज में प्लेट का नाम एक ही क्यों है।
रिज का आकार
ब्रिटानिका इस रिज के मुख्य आयाम और उसका उत्तरी रास्ता ऐसे बताता है:
- इसका शिखर समुद्र की सतह से औसतन लगभग 1,800 से 3,600 मीटर नीचे है;
- यह दोनों तरफ की समुद्री तली से लगभग 2,100 मीटर ऊपर उठा हुआ है;
- यह सोकोत्रा द्वीप के पास पश्चिम की ओर मुड़ता है और फिर अदन की खाड़ी के रास्ते पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट तंत्र से जुड़ जाता है;
- यह हिंद महासागर की भूकंप पट्टी के साथ-साथ चलता है।
इसकी धुरी के साथ एक रिफ्ट घाटी चलती है। यह रिज के बीचों-बीच एक गर्त है, जहाँ प्लेटें असल में अलग होती हैं। मिस्र के जहाज मबाहिस पर गए जॉन मरे अभियान ने 1933-34 में इस अक्षीय घाटी का नक्शा बनाया। अब हम जानते हैं कि ऐसी घाटियाँ अपसारी सीमाओं की आम पहचान हैं। प्रसारी सीमा पर भूकंप क्यों आते हैं, यह भूकंप के कारण और प्रकार वाले नोट में समझाया गया है।
धीमा प्रसरण और ओवेन ट्रांसफॉर्म
कार्ल्सबर्ग रिज एक धीमी गति से फैलने वाला कटक (slow-spreading ridge) है। ब्रैमली मर्टन और उनके साथियों ने 2006 में जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में इसकी पूरी दर 3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष बताई। पूरी दर का मतलब है दोनों प्लेटों का कुल मिलाकर फैलाव। इसलिए हर किनारा धुरी से इसकी लगभग आधी रफ्तार से दूर जाता है। इसे आँकड़ों में देखिए: 3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से दस लाख साल में 30 किलोमीटर नया समुद्री तल जुड़ जाता है। भूगर्भीय समय मिल जाए, तो धीमा कटक भी इसी तरह पूरा महासागर बना देता है।
उत्तरी सिरे पर यह रिज सीधे मुड़कर अदन की खाड़ी में नहीं चला जाता। वहाँ एक ट्रांसफॉर्म फॉल्ट काम संभाल लेता है। ट्रांसफॉर्म फॉल्ट ऐसी दरार है, जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के बगल से खिसकती हैं। जैनिन और साथी (EGU, 2021) ओवेन ट्रांसफॉर्म फॉल्ट को 300 किलोमीटर लंबी संरचना बताते हैं, जो कार्ल्सबर्ग प्रसरण केंद्र को अदन की खाड़ी के शेबा रिज से जोड़ती है। उनके अनुसार यह फॉल्ट कार्ल्सबर्ग रिज के साथ मिलकर भारत और सोमालिया के बीच की सक्रिय प्लेट सीमा बनाता है। तो रिज, फॉल्ट और शेबा रिज एक ही सीमा की तीन कड़ियाँ हैं, जो अरब सागर के पश्चिमी किनारे पर ऊपर की ओर जाती हैं।
कार्ल्सबर्ग रिज को यह नाम कैसे मिला
इस रिज का नाम किसी व्यक्ति या जगह पर नहीं, बल्कि एक फाउंडेशन पर है। डेनमार्क के वैज्ञानिक योहानेस श्मिट ने 1928-1930 में शोध जहाज डाना पर दुनिया का चक्कर लगाने वाली यात्रा की अगुवाई की। उन्होंने इस रिज को Carlsbergryggen नाम दिया, जो डेनिश भाषा में कार्ल्सबर्ग रिज है। यह नाम कार्ल्सबर्ग फाउंडेशन के नाम पर था, जिसने यात्रा का खर्च उठाया था। डेनमार्क के वैज्ञानिक ए. वेडल टॉनिंग ने अक्टूबर 1934 में नेचर पत्रिका में यह बात दर्ज की। वे एक प्रस्ताव का जवाब दे रहे थे, जिसमें कहा गया था कि रिज का नाम बदलकर श्मिट के नाम पर रख दिया जाए। तब तक श्मिट का निधन हो चुका था।
नाम से एक काम की बात पता चलती है। इस रिज का पहला नक्शा एक वैज्ञानिक अभियान ने बनाया था, इसलिए इसका इतिहास सीधे समुद्र विज्ञान के इतिहास से जुड़ जाता है। तीन यात्राएँ इस रास्ते के पड़ाव हैं:
- 1929: डाना अपनी विश्व-परिक्रमा के दौरान इस रिज को दर्ज करता है।
- 1933-34: मबाहिस इसकी अक्षीय घाटी का नक्शा बनाता है और वहाँ से ऐसे बेसाल्ट निकालता है जो भारत के दक्कन लावा से अलग हैं। उस समय के वैज्ञानिकों ने इसे भारत और अफ्रीका के बीच किसी पुराने स्थल-सेतु (land bridge) के खिलाफ सबूत माना।
- नवंबर 1962: ब्रिटेन की रॉयल नेवी का जहाज HMS ओवेन अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान के लिए रिज के एक मध्य हिस्से के ऊपर चुंबकीय क्षेत्र का नक्शा बनाता है।
मबाहिस पर सवार कोई भी इन नतीजों को प्लेटों की गति के रूप में नहीं पढ़ सकता था। 1930 के दशक में महाद्वीपीय विस्थापन का विचार चलन से बाहर था। घाटी और बेसाल्ट का असली मतलब 1960 के दशक में प्लेट विवर्तनिकी आने के बाद ही साफ हुआ।
समुद्र तल प्रसरण के लिए कार्ल्सबर्ग रिज क्यों अहम है
कार्ल्सबर्ग रिज ने ही वह सर्वे दिया, जिससे वाइन और मैथ्यूज ने 1963 में समुद्र तल प्रसरण को परखा। उनका शोधपत्र “महासागरीय कटकों के ऊपर चुंबकीय विसंगतियाँ” (नेचर, खंड 199, 7 सितंबर 1963) अपना नया तर्क HMS ओवेन के आँकड़ों पर खड़ा करता है। यह 50 गुणा 40 समुद्री मील का इलाका था, जिसका केंद्र 5°25’N 61°45’E पर था और जहाँ गहराई 900 से 2,200 फैदम तक थी।
सर्वे ने क्या दिखाया, इसे कदम-दर-कदम देखिए:
- समुद्री तल पहाड़ी था, और उसकी चोटियाँ कार्ल्सबर्ग रिज की दिशा के समानांतर चलती थीं।
- चुंबकीय नक्शे में यही बनावट और भी साफ दिखी: मध्य घाटी के ऊपर ऋणात्मक विसंगतियों का एक गर्त, और उसके दोनों ओर धनात्मक विसंगतियों के दो इलाके।
- आम व्याख्या यह थी कि घाटी के नीचे असामान्य रूप से ज्यादा चुंबकित चट्टान का एक खंड है। लेकिन इससे एक सवाल खुला रह गया: वहीं क्यों, रिज के नीचे और कहीं क्यों नहीं?
उनका जवाब दो तथ्यों पर टिका था। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र कई बार उलट चुका है। और रिज पर निकलने वाले बेसाल्ट में मैग्नेटाइट होता है, जो चट्टान के ठंडा होते समय उस दौर के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में सध जाता है। अगर समुद्री तल फैल रहा है, तो नई परत की हर पट्टी अपने समय का चुंबकीय क्षेत्र लेकर धुरी से दूर जाती है। इस तरह महासागर की तली पर सामान्य और उलटी चुंबकीय पट्टियाँ बन जाती हैं, जो रिज के दोनों ओर दर्पण की तरह एक जैसी होती हैं। वाइन और मैथ्यूज ने बारी-बारी से सामान्य और उलटे चुंबकित खंडों वाली परत के मॉडल बनाए, जिनमें से एक कार्ल्सबर्ग रिज के लिए था। उन्होंने दिखाया कि देखी गई विसंगतियों का मूल रूप इन्हीं मॉडलों से निकल आता है।
आम तौर पर इसे टेप रिकॉर्डर से समझाया जाता है, और यह तुलना काफी हद तक ठीक बैठती है: रिज चुंबकीय क्षेत्र का इतिहास चट्टान में लिख देता है, और फिर वह चट्टान दूर चली जाती है। लेकिन यह तुलना दो जगह टूटती है। टेप एक ही दिशा में चलता है, जबकि रिज दो प्रतियाँ लिखता है जो उलटी दिशाओं में जाती हैं। और यह रिकॉर्डिंग धुंधली होती है, क्योंकि बाद के लावा प्रवाह और ज्वालामुखी पुरानी पट्टियों पर नई, अलग तरह से चुंबकित चट्टान बिछा देते हैं। इसीलिए असली प्रोफाइल मॉडलों से ज्यादा उलझे हुए दिखते हैं।
जियोलॉजिकल सोसाइटी इस नतीजे को समुद्र तल प्रसरण की पहली वैज्ञानिक जाँच कहती है। वह कनाडा के भूवैज्ञानिक लॉरेंस मॉर्ली को भी श्रेय देती है, जो अपने दम पर इसी विचार तक पहुँचे थे। इसीलिए इसे वाइन-मैथ्यूज-मॉर्ली परिकल्पना भी कहते हैं। ब्रिटानिका में इस परिकल्पना का विवरण 1961 में ओरेगन और कैलिफोर्निया के तट के पास आर्थर रैफ और रोनाल्ड मेसन के सर्वे से शुरू होता है, इसलिए कहानी का हिंद महासागर वाला हिस्सा आसानी से छूट जाता है।
कार्ल्सबर्ग रिज पर हाइड्रोथर्मल वेंट और बहुधात्विक सल्फाइड
शोधकर्ताओं को कार्ल्सबर्ग रिज पर सक्रिय हाइड्रोथर्मल वेंट के सबूत मिले हैं, और इसकी चट्टानों में सल्फाइड खनिज हैं। यही मेल वह वजह है, जिसके कारण भारत इसकी खोज करना चाहता था।
हाइड्रोथर्मल वेंट समुद्र की तली पर एक गर्म झरना है। रिज की धुरी के पास दरारों से समुद्र का पानी नीचे रिसता है, नीचे के मैग्मा से गर्म होता है, चट्टान से धातुएँ घोल लेता है और फिर वापस बाहर निकलता है। जब यह गर्म, धातुओं से भरा द्रव ठंडे समुद्री पानी से मिलता है, तो धातुएँ सल्फाइड के रूप में नीचे बैठ जाती हैं। PIB बहुधात्विक सल्फाइड को संक्षेप में ऐसे अवक्षेप बताता है, जो महासागरीय परत से निकले गर्म हाइड्रोथर्मल द्रवों से बनते हैं और जिनमें लोहा, तांबा, जस्ता, चाँदी, सोना और प्लैटिनम होते हैं।
कार्ल्सबर्ग रिज के बारे में यह जानकारी तीन कदमों में जुड़ी है:
- 1993: बनर्जी और अय्यर जर्नल ऑफ द जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में रिज पर 3°35’N से मिले पिलो बेसाल्ट का वर्णन करते हैं। इनमें चाल्कोपाइराइट, पाइराइट और मैग्नेटाइट बिखरे हुए मिले, और इनमें से पहले दो क्रमशः तांबा-लोहे और लोहे के सल्फाइड हैं।
- 2006: मर्टन, बेकर, सैंड्स और जर्मन रिज के ऊपर एक इवेंट प्लूम की रिपोर्ट देते हैं, यानी हाइड्रोथर्मल पानी का अचानक बड़े पैमाने पर निकलना। यह 70 किलोमीटर लंबा था और इसका आयतन 4,540 घन किलोमीटर तक था। धीमी गति से फैलने वाले किसी कटक के ऊपर पकड़ा गया यह ऐसा पहला प्लूम था।
- 2012: गोवा के CSIR-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की एक टीम, NOAA के वैज्ञानिकों के साथ, 2007 और 2009 के जल-स्तंभ सर्वे की रिपोर्ट देती है। इन सर्वे में दो अलग वेंट क्षेत्रों के सबूत मिले, एक 3°42’N 63°40’E के पास और दूसरा 3°41.5’N 63°50’E के पास, लगभग 3,600 मीटर या उससे कम गहराई पर।
2012 का शोधपत्र यह भी बताता है कि ये खोजें क्यों अहम थीं। रॉड्रिग्ज ट्रिपल जंक्शन के उत्तर में हिंद महासागर के कटकों की खोजबीन बहुत कम हुई थी, और 25°S के उत्तर में सिर्फ दो सक्रिय स्थल पक्के हुए थे। बाद में चीन के समुद्री अभियानों ने भी इस रिज पर वेंट क्षेत्रों का वर्णन किया है, जिनमें दाशी वेंट फील्ड भी शामिल है।
एक सीमा साफ-साफ कहनी जरूरी है। प्लूम से बस इतना पता चलता है कि कुछ किलोमीटर के भीतर कोई वेंट है। इससे यह पता नहीं चलता कि सल्फाइड का भंडार कितना बड़ा है। यहाँ इस्तेमाल किए गए किसी भी स्रोत में कार्ल्सबर्ग रिज के सल्फाइड का टन में कोई आँकड़ा नहीं है, और बिना सर्वे के बताया गया कोई भी आँकड़ा बस अंदाजा है। ऐसे भंडारों का खनन होना चाहिए या नहीं, इस बड़ी बहस पर गहरे समुद्र में खनन वाला नोट है।
कार्ल्सबर्ग रिज और भारत: आज की स्थिति
15 सितंबर 2025 से भारत के पास अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (ISA) का 15 साल का अनुबंध है, जिसके तहत वह कार्ल्सबर्ग रिज के 10,000 वर्ग किलोमीटर में बहुधात्विक सल्फाइड की खोज कर सकता है। ISA के रजिस्टर में यह 14 सितंबर 2040 तक वैध दर्ज है। यह ISA के साथ भारत का तीसरा खोज अनुबंध है, और सल्फाइड के लिए दूसरा।
हर कदम की तारीख दर्ज है:
- 18 जनवरी 2024: भारत “हिंद महासागर रिज (कार्ल्सबर्ग रिज)” में सल्फाइड की खोज के लिए ISA को आवेदन देता है। यह 10,000 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो 10 किलोमीटर गुणा 10 किलोमीटर के 100 खंडों से बना है। उसी दिन भारत मध्य हिंद महासागर के अफानासी-निकितिन सीमाउंट पर कोबाल्ट से भरपूर फेरोमैंगनीज परतों के लिए भी आवेदन देता है, जो 150 खंडों में 3,000 वर्ग किलोमीटर है।
- 15 सितंबर 2025: ISA की महासचिव लेटिसिया कार्वाल्हो और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन नई दिल्ली में अनुबंध पर दस्तखत करते हैं।
- 20 सितंबर 2025: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक PIB विज्ञप्ति बताती है कि भारत ISA के साथ सल्फाइड खोज के दो अनुबंध रखने वाला पहला देश है, और इनके लिए सबसे बड़ा आवंटित इलाका भी उसी के पास है।
भारत के दो पुराने अनुबंध हिंद महासागर में दूसरी जगहों पर हैं:
- मध्य हिंद महासागर बेसिन में बहुधात्विक पिंड (polymetallic nodules): 25 मार्च 2002 को दस्तखत हुए, 2017 और 2022 में अवधि बढ़ाई गई, और यह 24 मार्च 2027 को खत्म होना है;
- मध्य भारतीय और दक्षिण-पश्चिम भारतीय कटकों में बहुधात्विक सल्फाइड: 26 सितंबर 2016 को दस्तखत हुए, और यह 25 सितंबर 2031 को खत्म होना है।
नियम समुद्री कानून से आते हैं। ISA खुद को ऐसी संस्था बताता है, जिसे समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि (UNCLOS) से यह जिम्मेदारी मिली है। इसका काम राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के समुद्र तल के खनिज संसाधनों को संभालना है, जिसे यह संधि “एरिया” (the Area) कहती है, और यह काम पूरी मानवता के साझा फायदे के लिए होता है। अनुबंध पर दस्तखत के समय महासचिव ने कहा कि वहाँ भारत का काम UNCLOS और 1994 के कार्यान्वयन समझौते के दायरे में आता है। यह ढाँचा UNCLOS, महासागरों का संविधान वाले नोट में समझाया गया है। PIB के मुताबिक भारत की ओर से अनुबंध पर दस्तखत करने वाला संस्थान मंत्रालय का स्वायत्त राष्ट्रीय ध्रुवीय और समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR), गोवा है।
इस अनुबंध का एक नीतिगत आधार भी है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने इसे डीप ओशन मिशन के लक्ष्य की ओर एक अहम कदम बताया। उनके अनुसार यह मिशन समुद्र तल में खनिजों की खोज, खनन तकनीक और भारत की ब्लू इकोनॉमी से जुड़ी पहलों पर केंद्रित है। मिशन के बारे में डीप ओशन मिशन और समुद्रयान वाले नोट में पढ़िए। लेकिन यह अनुबंध रिज को भारत के समुद्री क्षेत्र का हिस्सा नहीं बनाता। यह रिज देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से बाहर है, बड़े हिंद महासागर की तली के उस हिस्से में, जिस पर किसी एक देश का मालिकाना हक नहीं है।
परीक्षा के लिए कार्ल्सबर्ग रिज कैसे पढ़ें
कार्ल्सबर्ग रिज GS पेपर I के भौतिक भूगोल में आता है, महासागरीय तली, प्लेट विवर्तनिकी और समुद्र तल प्रसरण वाले हिस्से में। गहरे समुद्र के खनिजों और डीप ओशन मिशन के जरिए यह GS पेपर III से जुड़ता है। UNCLOS और ISA के जरिए यह GS पेपर II से भी जुड़ता है। मुख्य परीक्षा नाम नहीं, प्रक्रिया परखती है। मुख्य परीक्षा 2018 के GS पेपर I में पूछा गया था: “मेंटल प्लूम को परिभाषित कीजिए और प्लेट विवर्तनिकी में इसकी भूमिका समझाइए।” ऐसे उत्तर को सिद्धांत से सबूत तक ले जाने वाला उदाहरण कार्ल्सबर्ग सर्वे ही है। प्रीलिम्स स्थिति पर और भारत के अनुबंधों से जुड़े कथन वाले प्रश्नों पर जोर देता है। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 82 भूगोल के हैं।
दोहराने लायक तथ्य ये हैं:
- स्थिति: उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर; उत्तर-पूर्व में अरब सागर और दक्षिण-पश्चिम में सोमाली बेसिन।
- सीमा: भारतीय और सोमाली (अफ्रीकी) प्लेटों के बीच अपसारी सीमा, जो ओवेन ट्रांसफॉर्म फॉल्ट के जरिए शेबा रिज से जुड़ती है।
- दर: धीमा प्रसरण, पूरी दर लगभग 3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष।
- नाम: कार्ल्सबर्ग फाउंडेशन से, जिसने 1928-1930 के डाना अभियान का खर्च उठाया।
- 1962-63: HMS ओवेन सर्वे, जिसे वाइन और मैथ्यूज ने 1963 में नेचर पत्रिका में इस्तेमाल किया।
- वेंट: 2007 और 2009 में NIO के नेतृत्व वाले सर्वे से 3°42’N के पास दो वेंट क्षेत्रों के सबूत।
- ISA: आवेदन 18 जनवरी 2024, दस्तखत 15 सितंबर 2025, 10,000 वर्ग किलोमीटर, 15 साल के लिए; सल्फाइड के लिए भारत का दूसरा अनुबंध।
तीन उलझनें नंबर कटवाती हैं। पहली, कार्ल्सबर्ग रिज और मध्य भारतीय कटक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कई स्रोत पहले को दूसरे का उत्तरी हिस्सा मानते हैं, इसलिए उत्तर में यह बात लिखनी चाहिए। दूसरी, पिंड और सल्फाइड एक ही संसाधन नहीं हैं। पिंड मध्य हिंद महासागर बेसिन की तली पर पड़े हैं, जबकि सल्फाइड कटकों पर वेंट के पास बनते हैं। तीसरी, खोज का अनुबंध संप्रभुता नहीं है; वह इलाका भारत के अधिकार क्षेत्र से बाहर ही रहता है।
भारत की समुद्र तल वाली कहानी से जुड़ी बाकी संरचनाओं की तुलना ऐसे है:
| संरचना | यह क्या है | भारत का ISA संबंध |
|---|---|---|
| कार्ल्सबर्ग रिज | भारत-सोमालिया सीमा पर धीमी गति से फैलने वाला कटक | सल्फाइड खोज अनुबंध, 10,000 वर्ग किलोमीटर, 2025 |
| मध्य भारतीय और दक्षिण-पश्चिम भारतीय कटक | हिंद महासागर में और दक्षिण के कटक | सल्फाइड खोज अनुबंध, 2016 |
| मध्य हिंद महासागर बेसिन | गहरी बेसिन तली | पिंड खोज अनुबंध, 2002 |
| अफानासी-निकितिन सीमाउंट | मध्य हिंद महासागर में एक सीमाउंट | परत (क्रस्ट) खोज का आवेदन, जनवरी 2024 |
| शेबा रिज | अदन की खाड़ी में प्रसरण केंद्र, जो ओवेन ट्रांसफॉर्म से जुड़ा है | कोई नहीं |
तैयारी के लिहाज से कार्ल्सबर्ग रिज सिलेबस में अपने छोटे आकार से कहीं ज्यादा काम का है। यह एक ऐसा उदाहरण है जो भूगोल, विज्ञान और समुद्री कानून, तीनों तरह के उत्तरों में काम आता है। जो अभ्यर्थी 1962 के सर्वे को पाँच पंक्तियों में समझा सकता है, उसके पास प्लेट विवर्तनिकी के किसी भी सवाल के लिए समुद्र तल प्रसरण का सबसे मजबूत सबूत तैयार रहता है।
सामान्य प्रश्न
कार्ल्सबर्ग रिज कहाँ है?
कार्ल्सबर्ग रिज उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर की तली पर है। ब्रिटानिका इसे 2°07’N 66°30’E से, जहाँ यह मध्य-हिंद कटक से मिलता है, उत्तर-पश्चिम में अदन की खाड़ी तक बताता है। यह उत्तर-पूर्व के अरब सागर को दक्षिण-पश्चिम के सोमाली बेसिन से अलग करता है।
कार्ल्सबर्ग रिज किन प्लेटों को अलग करता है?
यह भारतीय प्लेट को सोमाली प्लेट से अलग करता है, जिसे पुराने और सामान्य स्रोत अफ्रीकी प्लेट कहते हैं। दोनों प्लेटें इस रिज के साथ-साथ एक-दूसरे से दूर जाती हैं, इसलिए यह एक अपसारी सीमा है। उत्तरी सिरे पर ओवेन ट्रांसफॉर्म फॉल्ट इसे अदन की खाड़ी के शेबा रिज से जोड़ता है।
इसे कार्ल्सबर्ग रिज क्यों कहते हैं?
इसका नाम डेनमार्क के कार्ल्सबर्ग फाउंडेशन पर है, जिसने 1928-1930 में शोध जहाज डाना पर योहानेस श्मिट की दुनिया भर की यात्रा का खर्च उठाया था। श्मिट ने इसे Carlsbergryggen नाम दिया, जो डेनिश में कार्ल्सबर्ग रिज है। डेनमार्क के वैज्ञानिक ए. वेडल टॉनिंग ने 1934 में नेचर पत्रिका में इस नाम की कहानी दर्ज की।
कार्ल्सबर्ग रिज का समुद्र तल प्रसरण से क्या संबंध है?
नवंबर 1962 में HMS ओवेन ने इस रिज के ऊपर एक चुंबकीय सर्वे किया, और फ्रेडरिक वाइन और ड्रमंड मैथ्यूज ने 1963 के अपने नेचर शोधपत्र में इसी के आँकड़े इस्तेमाल किए। उन्होंने दिखाया कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र पलटने के साथ रिज पर बनी सामान्य और उलटी चुंबकित परत की पट्टियाँ इस पैटर्न को समझाती हैं। जियोलॉजिकल सोसाइटी इसे समुद्र तल प्रसरण की पहली वैज्ञानिक जाँच कहती है।
कार्ल्सबर्ग रिज तेजी से फैलता है या धीरे?
यह धीमी गति से फैलने वाला कटक है। मर्टन और साथियों ने 2006 में इसकी पूरी प्रसरण दर लगभग 3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष बताई, यानी हर किनारा धुरी से लगभग इसकी आधी रफ्तार से दूर जाता है। 2006 तक इवेंट प्लूम सिर्फ प्रशांत महासागर के मध्यम दर वाले कटकों के ऊपर पकड़े गए थे, इसलिए इस रिज के ऊपर मिला प्लूम खास था।
कार्ल्सबर्ग रिज पर कौन-से खनिज मिलते हैं?
इस रिज पर बहुधात्विक सल्फाइड मिलते हैं, जो तब बनते हैं जब महासागरीय परत से निकले गर्म हाइड्रोथर्मल द्रव ठंडे समुद्री पानी से मिलते हैं। PIB इनमें मौजूद धातुओं में लोहा, तांबा, जस्ता, चाँदी, सोना और प्लैटिनम गिनाता है। रिज से निकाले गए बेसाल्ट में भी चाल्कोपाइराइट और पाइराइट जैसे सल्फाइड खनिज मिले हैं।
क्या कार्ल्सबर्ग रिज भारत का है?
नहीं। यह रिज राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल में है, जिसे ISA, UNCLOS के तहत संभालता है। भारत के पास 15 सितंबर 2025 का 15 साल का अनुबंध है, जो उसे इसके 10,000 वर्ग किलोमीटर में सिर्फ बहुधात्विक सल्फाइड की खोज का अधिकार देता है।
कार्ल्सबर्ग रिज पर भारत का अनुबंध क्या है?
यह अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ 10,000 वर्ग किलोमीटर में बहुधात्विक सल्फाइड की खोज का अनुबंध है। इस पर सितंबर 2025 में नई दिल्ली में दस्तखत हुए, और यह 14 सितंबर 2040 तक वैध है। यह भारत का तीसरा ISA अनुबंध है और सल्फाइड के लिए दूसरा, जिससे भारत ऐसे दो अनुबंध रखने वाला पहला देश बन गया। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने इसे डीप ओशन मिशन से जोड़ा।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. कार्ल्सबर्ग रिज के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह अरब सागर को सोमाली बेसिन से अलग करता है। 2. यह भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के भीतर है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) यह रिज अरब सागर को सोमाली बेसिन से अलग करता है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल में है, भारत के EEZ में नहीं।
2. कार्ल्सबर्ग रिज का वह विस्तृत चुंबकीय सर्वे, जिसे वाइन और मैथ्यूज ने 1963 में समुद्र तल प्रसरण के सबूत के रूप में इस्तेमाल किया, किसने किया था?
- (a) शोध जहाज डाना
- (b) HMS ओवेन
- (c) मबाहिस
- (d) चैलेंजर
उत्तर: (b) HMS ओवेन ने नवंबर 1962 में अंतरराष्ट्रीय हिंद महासागर अभियान के लिए रिज के एक मध्य हिस्से का सर्वे किया था।
3. अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ भारत के अनुबंधों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत के पास बहुधात्विक सल्फाइड की खोज के दो अनुबंध हैं। 2. भारत का बहुधात्विक पिंड अनुबंध मध्य हिंद महासागर बेसिन में है। 3. कार्ल्सबर्ग रिज अनुबंध भारत को खनिजों के व्यावसायिक दोहन की अनुमति देता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) कार्ल्सबर्ग रिज अनुबंध, जो सल्फाइड के लिए भारत का दूसरा अनुबंध है, सिर्फ खोज के लिए है; पिंड अनुबंध मध्य हिंद महासागर बेसिन में है।
4. कार्ल्सबर्ग रिज का नाम किसके नाम पर रखा गया है?
- (a) डेनमार्क का एक एडमिरल, जिसने सबसे पहले इसकी गहराई नापी
- (b) एक फाउंडेशन, जिसने एक समुद्र विज्ञान अभियान का खर्च उठाया
- (c) एक ब्रिटिश सर्वे जहाज
- (d) वह वैज्ञानिक, जिसने समुद्र तल प्रसरण का प्रस्ताव रखा
उत्तर: (b) योहानेस श्मिट ने इसका नाम कार्ल्सबर्ग फाउंडेशन पर रखा, जिसने 1928-1930 की डाना यात्रा का खर्च उठाया था।
5. कार्ल्सबर्ग रिज जैसे मध्य-महासागरीय कटकों पर मिलने वाले बहुधात्विक सल्फाइड मुख्य रूप से कैसे बनते हैं?
- (a) गहरे समुद्री मैदान पर किसी केंद्रक के चारों ओर धातु की परतों के धीरे-धीरे बढ़ने से
- (b) गर्म हाइड्रोथर्मल द्रवों के ठंडे समुद्री पानी से मिलने पर अवक्षेपण से
- (c) उथले बेसिनों में समुद्री पानी के वाष्पीकरण से
- (d) नदियों द्वारा लाई गई महाद्वीपीय चट्टानों के अपक्षय से
उत्तर: (b) सल्फाइड वेंट पर गर्म, धातुओं से भरे हाइड्रोथर्मल द्रवों से अवक्षेपित होते हैं; विकल्प (a) पिंडों का वर्णन करता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- समझाइए कि कार्ल्सबर्ग रिज के ऊपर हुए चुंबकीय सर्वे ने समुद्र तल प्रसरण के सिद्धांत को स्थापित करने में कैसे मदद की। (10 अंक, 150 शब्द)
- उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर के मध्य-महासागरीय कटक तंत्र और भारत-सोमालिया प्लेट सीमा से उसके संबंध का वर्णन कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- कभी माना जाता था कि कार्ल्सबर्ग रिज जैसे धीमी गति से फैलने वाले कटकों पर हाइड्रोथर्मल गतिविधि कम होती है। ऐसे कटकों पर बहुधात्विक सल्फाइड कैसे बनते हैं और भारत की इनमें रुचि क्यों है, चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- भारत के पास अब अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ खोज के तीन अनुबंध हैं। हिंद महासागर में भारत की गहरे समुद्र की खनिज खोज के रणनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल में खोज का अनुबंध कोई संप्रभुता नहीं देता। UNCLOS के आलोक में भारत के कार्ल्सबर्ग रिज अनुबंध की कानूनी स्थिति पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)