यह व्यवस्था द्विध्रुवीयता से गुज़री, फिर एकध्रुवीयता के एक अंतराल से, और अब एक बेतरतीब वर्तमान में है। काम का सवाल यह नहीं कि आज के दौर को क्या नाम दें। काम का सवाल यह है कि एकध्रुवीय दौर की कौन-सी संस्थाएँ आज भी सबकी रज़ामंदी पर टिकी हैं।
यह PSIR Optional Notes का 41वाँ अध्याय है, जो पेपर II के अंतरराष्ट्रीय संबंध वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था: महाशक्तियों का उदय, रणनीतिक और वैचारिक द्विध्रुवीयता, हथियारों की होड़ और शीत युद्ध, परमाणु ख़तरा; गुटनिरपेक्ष आंदोलन: लक्ष्य और उपलब्धियाँ; सोवियत संघ का विघटन, एकध्रुवीयता और अमेरिकी वर्चस्व, आज की दुनिया में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता।
एक पन्ने में
- शीत युद्ध एक साथ रणनीतिक भी था और वैचारिक भी: क्षमताओं का द्विध्रुवीय बँटवारा, और समाज को गढ़ने के दो ऐसे मॉडलों की लड़ाई जो दोनों ही ख़ुद को सबके लिए सही मानते थे।
- इसका ढाँचा: ट्रूमैन सिद्धांत और रोकथाम (1947), मार्शल योजना, NATO (1949) और वारसा पैक्ट (1955); और हथियारों की ऐसी होड़ जो भारी जवाबी कार्रवाई से लचीले जवाब तक और वहाँ से पक्की आपसी तबाही तक पहुँची।
- शीत युद्ध की शुरुआत किसकी वजह से हुई, इस पर रूढ़िवादी, संशोधनवादी और उत्तर-संशोधनवादी इतिहास-लेखन आपस में झगड़ते हैं, और इस बहस का नाम लेना ही नंबर दिलाता है।
- 1970 के दशक की तनाव-शैथिल्य (détente) से SALT I, ABM संधि और हेलसिंकी अंतिम अधिनियम निकले; 1979 से दूसरा शीत युद्ध शुरू हो गया।
- 1991 में सोवियत विघटन की वजहें ढाँचागत थीं: अर्थव्यवस्था का ठहराव, अपनी हैसियत से ज़्यादा फैलाव, पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त का ग़लत क्रम में आना, और राष्ट्रीयताओं का दबाव।
- एकध्रुवीय दौर में अमेरिकी बढ़त चारों तरफ़ फैली और मानवीय हस्तक्षेप हुए। फिर इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में वही फैलाव हद से बाहर चला गया।
- आज की व्यवस्था को अलग-अलग नाम दिए जाते हैं: बहुध्रुवीय, अध्रुवीय, मल्टीप्लेक्स (आचार्य) या असंतुलित बहुध्रुवीयता। सब इस पर सहमत हैं कि अमेरिका आज भी अकेला सबसे ताक़तवर देश है, पर अकेले नतीजे तय नहीं करा सकता।
- अमेरिकी वर्चस्व पर अड़चनें, जो 2023 में पूछी गईं, बाहरी भी हैं (चीन, रूस, मँझोली ताक़तें, संस्थाओं का विरोध) और भीतरी भी (पैसे की तंगी, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युद्ध से थकान)। भीतरी अड़चनें अब ज़्यादा भारी पड़ रही हैं।
शीत युद्ध
शुरुआत, और इतिहासकारों की बहस
रूढ़िवादी विवरण ज़िम्मेदारी सोवियत फैलाव पर और साम्यवाद फैलाने की वैचारिक ललक पर डालते हैं; सबूत है पूर्वी यूरोप में थोपी गई सरकारें। संशोधनवादी विवरण, विलियम्स और कोल्को के, इसे अमेरिकी आर्थिक फैलाव और खुले बाज़ारों की तलाश पर डालते हैं, और परमाणु बम गिराए जाने को कुछ हद तक मॉस्को के लिए दिया गया संदेश मानते हैं। उत्तर-संशोधनवादी विवरण, ख़ासकर गैडिस का, इसे सुरक्षा दुविधा मानता है, जिसमें हर पक्ष के बचाव वाले क़दम दूसरे को हमलावर लगते थे, और तात्कालिक वजह थी मध्य यूरोप में बना ख़ाली मैदान। यही विद्वानों का चलता हुआ पक्ष है और अपनाने के लिहाज़ से सबसे सुरक्षित भी — बस बाक़ी दोनों का नाम ज़रूर लीजिए।
ढाँचा और दौर
- 1947–53, बनने का दौर. ट्रूमैन सिद्धांत (मार्च 1947) और केनन की रोकथाम; मार्शल योजना (1947); बर्लिन नाकेबंदी और हवाई पुल (1948–49); NATO (1949); सोवियत परमाणु परीक्षण (1949); चीनी क्रांति (1949); कोरिया युद्ध (1950–53); NSC-68 वाली सैन्य रोकथाम।
- 1953–62, टकराव और संकट. वारसा पैक्ट (1955); हंगरी (1956); स्वेज़ (1956); स्पूतनिक (1957); U-2 (1960); बर्लिन दीवार (1961); क्यूबा मिसाइल संकट (1962), जो परमाणु युद्ध के सबसे क़रीब पहुँचा। इसी से हॉटलाइन और आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि (1963) निकलीं।
- 1962–79, तनाव-शैथिल्य. परमाणु अप्रसार संधि (1968); SALT I और ABM संधि (1972); हेलसिंकी अंतिम अधिनियम (1975), जिसका मानवाधिकार वाला हिस्सा आगे चलकर बहुत असरदार साबित हुआ; और 1971–72 से चीन-अमेरिका की नज़दीकी, जो इस दौर की सबसे बड़ी रणनीतिक घटना है।
- 1979–85, दूसरा शीत युद्ध. अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत दख़ल (1979); यूरोमिसाइल संकट; रणनीतिक रक्षा पहल (1983)।
- 1985–91, अंत. गोर्बाचेव की ग्लासनोस्त, पेरेस्त्रोइका और नई सोच; INF संधि (1987); अफ़ग़ानिस्तान से वापसी (1989); पूर्वी यूरोप की क्रांतियाँ (1989); जर्मनी का एकीकरण (1990); सोवियत संघ का विघटन (दिसंबर 1991)।
परमाणु पहलू
सिद्धांत कैसे बदला: डलेस के ज़माने में भारी जवाबी कार्रवाई, जिसकी आलोचना यह थी कि इसमें दो ही रास्ते बचते थे — घुटने टेक देना या सर्वनाश। फिर केनेडी से लचीला जवाब, जिसमें पारंपरिक और सीमित परमाणु विकल्प भी जुड़े। फिर पक्की तबाही, और जब दोनों पक्षों के पास पहला हमला झेलकर जवाब देने वाली ताक़त आ गई तो पक्की आपसी तबाही।
हथियार नियंत्रण: आंशिक परीक्षण प्रतिबंध 1963, NPT 1968, SALT I और ABM 1972, SALT II 1979 (दस्तख़त हुए, मंज़ूरी नहीं), INF 1987, START I 1991 और START II, CTBT 1996 (लागू नहीं हुई), न्यू START 2010। हाल की दिशा उलटी है: अमेरिका 2002 में ABM संधि से बाहर निकला, 2019 में दोनों पक्ष INF संधि से बाहर हो गए, और हथियार नियंत्रण का ढाँचा अब 1960 के दशक के बाद से सबसे पतला है।
गुटनिरपेक्षता
भारत के नज़रिए से इस पर पूरी बात अध्याय 47 में है। यहाँ इसकी वह भूमिका ज़रूरी है जो पूरी व्यवस्था से जुड़ती है। गुटनिरपेक्षता बांडुंग (1955) से निकली और बेलग्रेड (1961) में नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो और एनक्रूमा के नेतृत्व में इसे संस्था की शक्ल मिली। व्यवस्था के लिहाज़ से इसका महत्व: इसने दोनों खेमों को नए आज़ाद हुए देशों का अपने आप मिल जाने वाला साथ नहीं लेने दिया; इसने ऐसी कूटनीतिक जगह बनाई जहाँ उपनिवेशवाद से मुक्ति, निरस्त्रीकरण और आर्थिक इंसाफ़ की बात दबाव के साथ रखी जा सके; और इसने वे नंबर दिए जिनके दम पर महासभा दक्षिण की माँगों का मंच बनी, जिसमें 1974 की NIEO भी शामिल है।
इसकी हदें: सदस्यों में आपसी फ़र्क़, क्योंकि कोई सचमुच दोनों से बराबर दूरी पर था तो कोई किसी खेमे के काफ़ी क़रीब; सदस्यों के आपसी झगड़े रोक न पाना; और एक ध्रुव के ख़त्म होते ही इसका बुनियादी तर्क ही चला जाना।
सोवियत विघटन और एकध्रुवीय दौर
सोवियत संघ क्यों टूटा
- आर्थिक। 1970 के दशक से बढ़त थम गई; कमान वाली अर्थव्यवस्था न उलझी हुई ज़रूरतें सँभाल पाई, न नई खोजें कर पाई; कुल उत्पादन का बहुत बड़ा हिस्सा सैन्य ख़र्च खा जाता था; और 1980 के दशक के बीच में तेल से होने वाली कमाई गिर गई।
- हैसियत से ज़्यादा फैलाव। अफ़ग़ानिस्तान, पूर्वी यूरोप-क्यूबा-वियतनाम को दी जाने वाली मदद, और अमेरिकी तकनीकी कार्यक्रमों की बराबरी करने का ख़र्च।
- सुधारों का ग़लत क्रम। ग्लासनोस्त पहले आई और पेरेस्त्रोइका से आगे निकल गई: राजनीतिक खुलेपन ने राष्ट्रीयताओं और सुधारवादियों का दबाव तब छोड़ दिया जब आर्थिक फेरबदल से कोई फ़ायदा सामने आया ही नहीं था। नतीजा — व्यवस्था की साख चली गई और नतीजे मिले नहीं।
- राष्ट्रीयताएँ। संघीय ढाँचे ने संघ के गणराज्यों को वे संस्थाएँ और सरहदें दे रखी थीं, जो आगे चलकर अलग होने का ज़रिया बन गईं।
- वैचारिक थकान, और निर्णायक रूप से ब्रेझनेव सिद्धांत का छोड़ा जाना, जिससे पूर्वी यूरोप की सरकारों को साफ़ हो गया कि अब उन्हें बचाने कोई नहीं आएगा।
एकध्रुवीयता और उसके आलोचक
चार्ल्स क्राउथैमर ने 1990–91 में इसे एकध्रुवीय दौर नाम दिया; फ़ुकुयामा के इतिहास के अंत (1989) ने इसे वैचारिक रंग दिया; वोलफ़ोर्थ की दलील थी कि एकध्रुवीयता टिकाऊ है, क्योंकि फ़ासला इतना बड़ा है कि उसके ख़िलाफ़ संतुलन बन ही नहीं सकता। इसके उलट वॉल्ट्ज़ ने कहा था कि संतुलन बनेगा ही, और हंटिंगटन का कहना था कि आने वाली व्यवस्था सभ्यताओं के टकराव से तय होगी, और इस व्यवस्था को एक-बहुध्रुवीय कहना ज़्यादा सही है।
अमेरिकी बढ़त ज़मीन पर: 1990–91 का खाड़ी युद्ध, जो सामूहिक सुरक्षा की सबसे साफ़ कामयाबी है; 1990 के दशक के मानवीय हस्तक्षेप — सोमालिया, बोस्निया, रवांडा में नाकामी, और कोसोवो; NATO का विस्तार; WTO; और 2001 के बाद आतंक के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध, अफ़ग़ानिस्तान, और 2003 में इराक़ पर हमला, जो सुरक्षा परिषद की मंज़ूरी के बिना हुआ और वैधता के मामले में मोड़ बन गया।
अमेरिकी वर्चस्व पर अड़चनें
2023 के प्रश्नपत्र ने पूछा था कि कौन-सी अड़चनें हैं और कौन-सी आगे बढ़ने वाली हैं, इसलिए उत्तर में दोनों को अलग करना ज़रूरी है।
| आज की अड़चन | आगे की दिशा | |
|---|---|---|
| बाहरी: चीन | अर्थव्यवस्था का आकार बराबरी के क़रीब; सेना का आधुनिकीकरण; तकनीकी होड़; और असर फैलाने के अलग ढाँचे के रूप में बेल्ट एंड रोड | बढ़ रही है; अकेली सबसे भारी अड़चन |
| बाहरी: रूस | परमाणु बराबरी, ऊर्जा का दबाव, ताक़त इस्तेमाल करने की तैयारी, और पश्चिम की एकजुटता की परीक्षा लेता यूक्रेन युद्ध | पारंपरिक ताक़त में घटी, उथल-पुथल मचाने की ताक़त में जस की तस |
| बाहरी: मँझोली ताक़तें | भारत, ब्राज़ील, तुर्की, खाड़ी देश, इंडोनेशिया — सब किसी खेमे में जाने के बजाय सब तरफ़ रास्ते खुले रख रहे हैं; BRICS और उसका विस्तार | बढ़ रही है; अध्याय 46 वाला कई खेमों से एक साथ रिश्ता रखने का तरीक़ा |
| बाहरी: संस्थाएँ और नियम | अकेले क़दम उठाने की वैधता वाली क़ीमत; सुरक्षा परिषद की रोक; हस्तक्षेप का घटता मन | जस की तस |
| भीतरी: पैसा | क़र्ज़ का बोझ, सामाजिक सुरक्षा का दबाव, बजट पर घरेलू माँगों की होड़ | बढ़ रही है |
| भीतरी: राजनीति | ध्रुवीकरण, विदेश नीति पर टूटी सहमति, और हर नई सरकार के साथ बदल जाने वाला रुख़ | बढ़ रही है, और अब सबसे भारी |
| भीतरी: समाज | इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के बाद युद्ध से थकान; जानें गँवाने को तैयार न होना | जस की तस, या बढ़ती हुई |
राय यह देनी चाहिए: बाहरी अड़चनें असली हैं, पर असल में बाँधने वाली अड़चन है घर के भीतर की तैयारी। भौतिक बढ़त आज भी क़ायम है — सैन्य पहुँच, डॉलर, और तकनीक की अगली कतार में जगह। जो घिस गया है वह है किसी व्यवस्था को चलाते रहने की राजनीतिक सहमति। इसीलिए 2025 के प्रश्नपत्र का वह सवाल — कि सहयोगियों से अपनी रक्षा पर ख़ुद ख़र्च करने को कहा जा रहा है — यहीं आता है।
आज की व्यवस्था
आपस में होड़ करती व्याख्याएँ ये हैं, और उत्तर में इन्हें गिनाना नहीं, वजह बताकर एक चुननी चाहिए।
- बहुध्रुवीय: कई बड़ी ताक़तें, कोई सब पर भारी नहीं। आर्थिक वज़न के लिहाज़ से यह सही है, सैन्य पहुँच के लिहाज़ से कम, जहाँ फ़र्क़ आज भी बहुत बड़ा है।
- अध्रुवीय (हास): ताक़त राज्यों, कंपनियों, NGO, शहरों और जालों में बिखरी हुई है, कहीं कोई जमाव है ही नहीं।
- मल्टीप्लेक्स (आचार्य): यही वह व्याख्या है जो याद रखनी है। अमेरिकी बढ़त के बाद की व्यवस्था उन्नीसवीं सदी वाली बहुध्रुवीयता की वापसी नहीं है, बल्कि ऐसी दुनिया है जिसमें कई आधुनिकताएँ हैं, कई क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ हैं, संस्थाएँ एक-दूसरे पर चढ़ी हुई हैं और आपसी निर्भरता उलझी हुई है — ठीक उस मल्टीप्लेक्स सिनेमा की तरह जिसमें एक साथ कई फ़िल्में चल रही हों और कोई एक मुख्य शो न हो।
- असंतुलित बहुध्रुवीयता या अधूरी एकध्रुवीयता: अमेरिका आज भी बराबरी वालों में सबसे ऊपर है, पर अकेले नतीजे तय नहीं कर सकता।
जो चीज़ें आँखों से दिख रही हैं: बड़ी ताक़तों की होड़ की वापसी; आपसी निर्भरता का हथियार बन जाना (फ़ैरेल और न्यूमैन का शब्द), जहाँ पैसे, डेटा और सप्लाई के जाल दबाव डालने के औज़ार बन जाते हैं; सबको समेटने वाली संस्थाओं की जगह छोटे समूहों वाली कूटनीति — क्वाड, AUKUS, I2U2, IPEF; सुरक्षा का क्षेत्रीय हो जाना; और साझा नियमों की जगह नियमों पर खींचतान।
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- शीत युद्ध को तारीख़ों की कहानी बना देना। सवाल आम तौर पर विश्लेषण माँगता है, दौर के बँटवारे और इतिहासकारों की बहस, दोनों तारीख़ों से ज़्यादा नंबर दिलाते हैं।
- सोवियत विघटन की एक ही वजह बता देना। आर्थिक ठहराव, हद से ज़्यादा फैलाव, सुधारों का ग़लत क्रम और राष्ट्रीयताएँ — सबका हाथ था, और पूर्वी यूरोप में तात्कालिक चिंगारी थी ब्रेझनेव सिद्धांत का छोड़ा जाना।
- व्यवस्था को सीधे बहुध्रुवीय कह देना। आर्थिक वज़न बँटा हुआ है; सैन्य पहुँच और डॉलर नहीं। बताइए कि आप किस पहलू की बात कर रहे हैं।
- आचार्य की मल्टीप्लेक्स दुनिया छोड़ देना। ग़ैर-पश्चिमी नज़रिए से यही व्याख्या परीक्षक अब ज़्यादा माँगने लगे हैं।
- अमेरिकी ताक़त पर अड़चनों को सिर्फ़ बाहरी मान लेना। पैसे और राजनीति की अड़चनें अब ज़्यादा भारी हैं।
पहले पूछा जा चुका है
- आज अमेरिकी वर्चस्व पर लगी अड़चनों पर चर्चा कीजिए और बताइए कि इनमें से कौन-सी आगे और उभरने वाली हैं। (2023, पेपर II, 15 अंक)
- क्या आप इस बात से सहमत हैं कि अमेरिका NATO को दुनिया में अपना वर्चस्व बनाए रखने के पारंपरिक रणनीतिक औज़ार की तरह इस्तेमाल करता है? (2024, पेपर II, 15 अंक)
उत्तर का ढाँचा
आज अमेरिकी वर्चस्व पर लगी अड़चनों पर चर्चा कीजिए और बताइए कि इनमें से कौन-सी आगे और उभरने वाली हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
शुरुआत। शुरू में ही क्षमता और तैयारी को अलग कर दीजिए। अमेरिका की भौतिक बढ़त उतनी नहीं घिसी जितनी उस बढ़त को नतीजों में बदलने की उसकी राजनीतिक क़ाबिलियत।
बाहरी अड़चनें। चीन का आर्थिक आकार, सेना का आधुनिकीकरण और तकनीकी होड़, और असर फैलाने के अलग ढाँचे के रूप में बेल्ट एंड रोड। रूस की परमाणु बराबरी और ताक़त इस्तेमाल करने की तैयारी। मँझोली ताक़तें — भारत, ब्राज़ील, तुर्की, खाड़ी देश — जो किसी खेमे में जाने के बजाय सब तरफ़ रास्ते खुले रखती हैं, और BRICS का विस्तार। संस्थाओं और वैधता की क़ीमत, जो 2003 के इराक़ के बाद तेज़ी से बढ़ी।
भीतरी अड़चनें। पैसे का दबाव और क़र्ज़; राजनीतिक ध्रुवीकरण, जिससे हर नई सरकार के साथ विदेश नीति का भरोसा टूटता है; और अफ़ग़ानिस्तान-इराक़ के बाद समाज की युद्ध से थकान।
कौन-सी बढ़ेंगी। भीतरी वाली, और चीन। ध्रुवीकरण से वादों का भरोसा घटता है, और गठबंधन की असली पूँजी वही भरोसा है; पैसे का दबाव रक्षा और मदद, दोनों से होड़ करता है; और चीन वाली अड़चन उसकी अर्थव्यवस्था और तकनीक के पकने के साथ और भारी होती जाएगी। रूस की पारंपरिक अड़चन घटी है, उथल-पुथल मचाने की उसकी ताक़त नहीं।
कौन-सी नहीं बढ़ेंगी। संस्थाओं वाली अड़चन बढ़ नहीं रही, जस की तस है — क्योंकि जो अमेरिका संस्थाओं से बँधता है, वही उन्हें किनारे भी कर सकता है, जैसा 2003 में दिखा।
निष्कर्ष। वर्चस्व की जगह कोई दूसरा वर्चस्व नहीं ले रहा, आचार्य वाली मल्टीप्लेक्स व्यवस्था ले रही है: कई क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ, एक-दूसरे पर चढ़ी संस्थाएँ, और कोई भी ताक़त अकेले नतीजे तय करने में नाकाम। इसमें अमेरिका अब भी अकेला सबसे बड़ा खिलाड़ी है, पर व्यवस्था चलाने वाला नहीं।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- इतिहास-लेखन: रूढ़िवादी, संशोधनवादी (विलियम्स, कोल्को), उत्तर-संशोधनवादी (गैडिस)।
- दौर: 1947–53 बनना; 1953–62 संकट; 1962–79 तनाव-शैथिल्य; 1979–85 दूसरा शीत युद्ध; 1985–91 अंत।
- मील के पत्थर: ट्रूमैन सिद्धांत 1947, मार्शल योजना 1947, NATO 1949, वारसा पैक्ट 1955, क्यूबा मिसाइल संकट 1962, PTBT 1963, NPT 1968, SALT I और ABM 1972, हेलसिंकी 1975, INF 1987, START I 1991।
- सिद्धांत: भारी जवाबी कार्रवाई, लचीला जवाब, MAD। घिसाव: 2002 में ABM से बाहर, 2019 में INF का ख़त्म होना।
- सोवियत विघटन: आर्थिक ठहराव, हद से ज़्यादा फैलाव, ग्लासनोस्त का पेरेस्त्रोइका से आगे निकल जाना, राष्ट्रीयताएँ, ब्रेझनेव सिद्धांत का छोड़ा जाना।
- एकध्रुवीयता: क्राउथैमर 1990–91, फ़ुकुयामा 1989, वोलफ़ोर्थ का टिकाऊपन, वॉल्ट्ज़ की संतुलन वाली भविष्यवाणी, हंटिंगटन का एक-बहुध्रुवीय और सभ्यताओं का टकराव।
- आज: बहुध्रुवीय, अध्रुवीय (हास), मल्टीप्लेक्स (आचार्य), असंतुलित बहुध्रुवीयता; आपसी निर्भरता का हथियार बनना; छोटे समूहों वाली कूटनीति।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।