गुटनिरपेक्षता कभी तटस्थता नहीं थी। यह दावा था कि एक ग़रीब, नया-नया आज़ाद हुआ देश हर मुद्दे को उसके अपने गुण-दोष पर परख सकता है। आज इसकी प्रासंगिकता पर जो बहस होती है, वह असल में इस बात की बहस है कि उस दावे को टिकाए रखने के लिए किसी आंदोलन की ज़रूरत है या नहीं।
यह PSIR Optional Notes का 47वाँ अध्याय है, जो पेपर II के भारत और विश्व वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत का योगदान: अलग-अलग दौर; आज की भूमिका।
एक पन्ने में
- गुटनिरपेक्षता न तटस्थता है, न दुनिया से कट जाना, न दोनों से बराबर दूरी। तटस्थता युद्ध के वक़्त की एक क़ानूनी हैसियत है; गुटनिरपेक्षता हर मुद्दे को अपने हिसाब से परखने वाली सक्रिय नीति है।
- भारत के लिए इसकी चार वजहें थीं: फ़ैसले लेने की आज़ादी बचाना, ताक़त विकास पर लगाना, ऐसी लड़ाई में न फँसना जो भारत की बनाई नहीं थी, और नए आज़ाद हुए देशों के बीच एकजुटता खड़ी करना।
- पंचशील (1954), जो तिब्बत को लेकर चीन के साथ हुए समझौते में आया, इस नीति की आचार-संहिता बना: एक-दूसरे की संप्रभुता और भू-अखंडता का सम्मान, आक्रमण न करना, अंदरूनी मामलों में दख़ल न देना, बराबरी और आपसी फ़ायदा, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
- बांडुंग (1955) एफ़्रो-एशियाई पूर्व-चरण था; आंदोलन की नींव बेलग्रेड (1961) में नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो और एन्क्रूमा ने रखी।
- इसकी उपलब्धियाँ: उपनिवेशवाद का ख़ात्मा, रंगभेद का विरोध, निरस्त्रीकरण की पैरवी, NIEO का एजेंडा, और छोटे देशों के लिए कूटनीतिक जगह बनाना।
- इसकी सीमाएँ: सदस्य आपस में बहुत अलग-अलग, आपस की लड़ाइयाँ रोक न पाना, अपने ही सिद्धांतों को चुन-चुनकर लागू करना, और दबाव बनाने के लिए दो-ध्रुवीय दुनिया पर निर्भर रहना।
- ख़ुद भारत का अमल सिद्धांत से बार-बार हटा: 1971 की सोवियत संघ के साथ संधि, 1956 में हंगरी पर चुप्पी, और 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर रुख़।
- आज का सवाल यह है कि गुटनिरपेक्षता रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-गुटीय रिश्तों की शक्ल में ज़िंदा है या नहीं — 2023 का सवाल इसी की परीक्षा ले रहा था, जिसमें आंदोलन के नैतिक स्वभाव और भारत की सॉफ़्ट पावर की बात थी।
अवधारणा और वजह
यह क्या नहीं है
तटस्थता किसी एक युद्ध में ली गई क़ानूनी हैसियत है, जिसमें किसी का पक्ष न लेना और अलग रहना शामिल है। तटस्थतावाद का मतलब है ताक़त की राजनीति से हमेशा के लिए दूर रहना। अलगाववाद का मतलब है दुनिया से हट जाना। गुटनिरपेक्षता इनमें से कुछ नहीं है: यह दुनिया के मामलों में सक्रिय हिस्सेदारी है, बस किसी खेमे से बँधे बिना। नेहरू बार-बार कहते रहे कि इसका मतलब बाड़ पर बैठ जाना नहीं है, न ही सही और ग़लत के बीच बेपरवाह हो जाना।
भारत ने इसे क्यों चुना
- फ़ैसले लेने की आज़ादी। जो देश अभी-अभी बाहरी क़ाबू से निकला था, वह उसका कोई नया रूप मानने को तैयार नहीं था। नेहरू का कहना था कि किसी खेमे में जाने का मतलब होगा वही आज़ादी सौंप देना जो अभी-अभी मिली है।
- विकास पहले। ताक़त योजना बनाने और उद्योग खड़े करने में लगनी थी, गठबंधन की शर्तें निभाने में नहीं। गुटनिरपेक्षता से दोनों खेमों से मदद और तकनीक लेने का रास्ता खुला रहा, जो भारत को मिली भी।
- फँसने से बचना। शीत युद्ध यूरोप और पूर्वी एशिया के दाँव पर लड़ा जा रहा था, यह भारत का झगड़ा नहीं था। किसी खेमे में जाने का मतलब होता उसे दक्षिण एशिया में खींच लाना।
- एकजुटता और आवाज़। एक साझा मंच से नए आज़ाद हुए देशों को वह वज़न मिला जो अकेले किसी के पास नहीं था, ख़ासकर महासभा में।
- सिद्धांत की पक्की धारणा। आज़ादी की लड़ाई का उपनिवेशवाद-विरोध और नस्लभेद-विरोध, खेमेबाज़ी के विरोध को उसी इतिहास का अगला क़दम बना देता था।
पंचशील
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत 1954 में भारत और चीन के बीच तिब्बत क्षेत्र से व्यापार और आवाजाही पर हुए समझौते की प्रस्तावना में रखे गए थे: एक-दूसरे की भू-अखंडता और संप्रभुता का आपसी सम्मान; एक-दूसरे पर आक्रमण न करना; एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में दख़ल न देना; बराबरी और आपसी फ़ायदा; और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। 1955 में बांडुंग में इन पर मुहर लगी और ये आंदोलन के नैतिक केंद्र बन गए।
जो आम आलोचना है, उससे बचा नहीं जा सकता और उसे उत्तर में लिखना भी चाहिए: जिस समझौते में ये सिद्धांत आए, उसी में तिब्बत पर चीन की संप्रभुता मान ली गई और सीमा का सवाल खुला छोड़ दिया गया — आठ साल बाद 1962 का युद्ध हुआ। इससे पंचशील की नैतिक क़ीमत ख़त्म नहीं होती, लेकिन किसी गारंटी के तौर पर उसका रिकॉर्ड कमज़ोर है।
अलग-अलग दौर
- बनने का दौर, 1947–55. दोनों खेमों से इनकार; जनवादी गणराज्य चीन को मान्यता; कोरिया युद्ध को फैलने से रोकने की कोशिश और तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन आयोग में भूमिका; 1955 में बांडुंग और एफ़्रो-एशियाई मंच।
- संस्था बनने का दौर, 1955–64. 1961 का बेलग्रेड पहला शिखर सम्मेलन, जहाँ नेहरू सदस्यता को सचमुच गुटनिरपेक्ष देशों से आगे बढ़ाने के ख़िलाफ़ थे; 1964 में क़ाहिरा। ज़ोर उपनिवेशवाद के ख़ात्मे, निरस्त्रीकरण और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर था।
- आर्थिक मोड़, 1964–79. केंद्र राजनीतिक गुटनिरपेक्षता से खिसककर आर्थिक माँगों पर आ गया: UNCTAD, G-77, और 1974 का NIEO। 1973 के तेल झटके ने दक्षिण के देशों की ताक़त दिखाई और सदस्यों को बाँट भी दिया।
- संकट और भटकाव, 1979–89. 1979 के हवाना शिखर सम्मेलन में कास्त्रो की यह दलील कि समाजवादी खेमा आंदोलन का स्वाभाविक साथी है, भारत समेत कई देशों ने ठुकरा दी — दरार यहीं पड़ी। दिसंबर 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत दख़ल ने आंदोलन के सिद्धांतों की परीक्षा ली और उसका जवाब आम तौर पर कमज़ोर माना गया। 1983 के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से भारत ने अध्यक्षता सँभाली।
- शीत युद्ध के बाद, 1991 से आगे। आंदोलन की बुनियादी वजह ही ख़त्म हो गई। इसके बाद के शिखर सम्मेलनों का रुख़ विकास, वैश्विक शासन में सुधार और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की तरफ़ मुड़ा। भारत के प्रधानमंत्री 2016 और 2019 के सम्मेलनों में नहीं गए, जिस पर काफ़ी टिप्पणी हुई; 2020 के वर्चुअल सम्मेलन में भारत शीर्ष स्तर पर शामिल हुआ। भारत जुड़ा हुआ तो है, पर इस आंदोलन को अपना मुख्य ज़रिया नहीं मानता।
उपलब्धियाँ और सीमाएँ
| उपलब्धियाँ | सीमाएँ | |
|---|---|---|
| महासभा में लगातार दबाव बनाकर उपनिवेशवाद के ख़ात्मे को रफ़्तार दी; रंगभेद का लगातार विरोध, जिसमें भारत की भूमिका 1946 से है, यानी आंदोलन से भी पहले; निरस्त्रीकरण की पैरवी, जिसमें व्यापक परीक्षण प्रतिबंध का प्रस्ताव भी शामिल है; NIEO और UNCTAD का एजेंडा; छोटे देशों के लिए कूटनीतिक जगह बचाना; और संप्रभु बराबरी और दख़ल न देने के ऐसे मानक खड़े करना जो आज भी चार्टर के अमल में ज़िंदा हैं | आपसी अलगाव: सदस्यों में कोई सचमुच बराबर दूरी रखता था तो कोई असल में किसी खेमे के साथ था, इसलिए साझा रुख़ हमेशा सबसे कमज़ोर साझा बिंदु पर आकर रुक जाता; कोई अमल कराने की ताक़त नहीं, और सदस्यों के आपस के झगड़े रोकने में नाकामी — भारत और चीन, भारत और पाकिस्तान, ईरान और इराक़; अपने ही सिद्धांतों को चुन-चुनकर लागू करना, ख़ासकर 1956 में हंगरी और 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर; दबाव बनाने के लिए दो-ध्रुवीय दुनिया पर निर्भरता; और संस्था के तौर पर कमज़ोरी, क्योंकि कोई स्थायी सचिवालय ही नहीं है |
ख़ुद भारत सिद्धांत से कहाँ-कहाँ हटा, यह किसी ईमानदार उत्तर में लिखना ही होगा: 1956 में हंगरी में सोवियत दमन पर दबी-सी प्रतिक्रिया, जबकि स्वेज़ में एंग्लो-फ़्रेंच कार्रवाई की जमकर आलोचना हुई; अगस्त 1971 की भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि, जो नाम भर को छोड़कर हर लिहाज़ से एक गठबंधन थी और जिसे चीन-अमेरिका-पाकिस्तान की नज़दीकी का ज़रूरी जवाब बताकर सही ठहराया गया; और 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत दख़ल की निंदा से इनकार। उस वक़्त जो सफ़ाई दी गई — कि गुटनिरपेक्षता हर मुद्दे को उसके गुण-दोष पर परखने की छूट देती है, जिसमें भारत के अपने हित भी आते हैं — वह अपने आप में सही बैठती है, और यही दिखाती भी है कि यह सिद्धांत कितनी छूट देता है।
आज की प्रासंगिकता
2023 के प्रश्नपत्र ने आंदोलन के नैतिक स्वभाव की प्रासंगिकता पूछी थी, यानी वह भारत की सॉफ़्ट पावर को कितना बढ़ाता है। यह “NAM प्रासंगिक है या नहीं” से कहीं ज़्यादा सटीक सवाल है।
प्रासंगिक बने रहने के पक्ष में।
- सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता की शक्ल में ज़िंदा है, जो आज की नीति का असली रूप है। बहु-गुटीय रिश्ते बहुध्रुवीय दुनिया के हिसाब से ढली हुई गुटनिरपेक्षता ही हैं: बाहर बैठना नहीं, बल्कि किसी एक के हो जाने से इनकार।
- साथ देने वालों का दायरा बचा भी है और बढ़ा भी है। एक सौ बीस सदस्यों के साथ NAM संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह है, ग्लोबल साउथ का आज का एजेंडा — क़र्ज़, जलवायु वित्त, टीकों में बराबरी, संस्थाओं में सुधार — वही पुराना एजेंडा है, बस आज की भाषा में।
- नैतिक स्वभाव — संप्रभु बराबरी, दख़ल न देना, एकतरफ़ा दबाव वाले क़दमों का विरोध, ताक़त की जगह बातचीत — ठीक वही चीज़ है जिससे भारत की बात उन देशों में चलती है जो वाशिंगटन और बीजिंग में से किसी एक को चुनने से इनकार करते हैं। यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख़, जिसमें न निंदा है न समर्थन और बातचीत की माँग है, इसी मुहावरे में समझ आता है — और इसी वजह से दोनों पक्षों ने भारत की सुनी।
- सॉफ़्ट पावर के तौर पर यह स्वभाव भारत के इस दावे को मज़बूत करता है कि वह एक अलग रास्ता है: ऐसा लोकतंत्र जो पश्चिमी नहीं है, ऐसी उभरती ताक़त जिसने गठबंधन नहीं खोजे, और ऐसा देश जो ग्लोबल साउथ की बात करता है पर किसी खेमे की अगुवाई का दावा नहीं करता। वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन और भारत की अध्यक्षता में G20 में अफ़्रीकी संघ का शामिल होना, इसके ठोस रूप हैं।
विपक्ष में।
- संगठन के तौर पर आंदोलन के पास कोई क्षमता नहीं है: न सचिवालय, न अमल कराने की ताक़त, और एक सौ बीस बेहद अलग-अलग सदस्यों के बीच सर्वसम्मति से फ़ैसले।
- जिस दो-ध्रुवीय दुनिया पर यह खड़ा था, वह रही ही नहीं, इसलिए अब ऐसे खेमे भी नहीं बचे जिनके बीच निरपेक्ष रहा जाए।
- भारत के अपने सबसे अहम रिश्ते — अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ़्रांस और खाड़ी देशों के साथ — इस आंदोलन से बाहर चलते हैं।
- एकजुटता की भाषा भारत की बड़ी ताक़त बनने की कोशिश के साथ ठीक बैठती नहीं, न ही अपने इलाक़े में उसकी बढ़त के साथ, जिसे छोटे पड़ोसी ग़ैर-बराबरी की तरह महसूस करते हैं।
संतुलित निष्कर्ष। सिद्धांत संस्था से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है। गुटनिरपेक्षता का बुनियादी दावा — कि कोई देश किसी संरक्षक को माने बिना मुद्दे-दर-मुद्दे रुख़ ले सकता है — बहुध्रुवीय दुनिया में दो-ध्रुवीय दुनिया से भी ज़्यादा क़ीमती है, क्योंकि अब चाहने वाले ज़्यादा हैं और इसलिए बिना बिके रहने में फ़ायदा भी ज़्यादा है। आंदोलन का नैतिक स्वभाव सचमुच एक सॉफ़्ट पावर की पूँजी है। उसका संगठनात्मक ढाँचा एक पुरानी विरासत है, जिसे भारत बनाए तो रखता है, पर उस पर टिकता नहीं।
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- गुटनिरपेक्षता को तटस्थता मान लेना। तटस्थता युद्ध के वक़्त की क़ानूनी हैसियत है; गुटनिरपेक्षता सक्रिय नीति है, और नेहरू ने यह साफ़ कहा भी था।
- आंदोलन की शुरुआत बांडुंग से बता देना। बांडुंग (1955) एफ़्रो-एशियाई था; आंदोलन की नींव 1961 में बेलग्रेड में पड़ी।
- भारत का रिकॉर्ड एकदम एकरूप दिखा देना। 1956 का हंगरी, 1971 की संधि और 1979 का अफ़ग़ानिस्तान — ये तीनों हटाव हैं, और इन्हें लिखने से उत्तर कमज़ोर नहीं, मज़बूत होता है।
- सिद्धांत और संगठन में फ़र्क़ किए बिना NAM को अप्रासंगिक कह देना। पहला रणनीतिक स्वायत्तता की शक्ल में ज़िंदा है; दूसरा कमज़ोर है।
- पंचशील लिख देना, पर यह न बताना कि जिस 1954 के समझौते में वह आया, उसने 1962 नहीं रोका।
पहले पूछा जा चुका है
- आज के रणनीतिक परिदृश्य में अपने राष्ट्रीय हित की पूर्ति के लिए भारत की सॉफ़्ट पावर बढ़ाने में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नैतिक स्वभाव की प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए। टिप्पणी कीजिए। (2023, पेपर II, 20 अंक)
उत्तर का ढाँचा
आज के रणनीतिक परिदृश्य में भारत की सॉफ़्ट पावर बढ़ाने में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नैतिक स्वभाव की प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए। (20 अंक, 350 शब्द)
शुरुआत। शुरू में ही तीन चीज़ें अलग कर दीजिए: संगठन के तौर पर आंदोलन, सिद्धांत के तौर पर गुटनिरपेक्षता, और साख की पूँजी के तौर पर उसका नैतिक स्वभाव। सवाल तीसरी चीज़ के बारे में है।
वह स्वभाव, साफ़ शब्दों में। संप्रभु बराबरी, दख़ल न देना, झगड़े शांति से निपटाना, एकतरफ़ा दबाव वाले क़दमों का विरोध, और जो देश कभी उपनिवेश रहे उनके साथ खड़े होना। 1954 का पंचशील इसकी आचार-संहिता, 1955 का बांडुंग और 1961 का बेलग्रेड इसके संस्था बनने के पड़ाव।
यह सॉफ़्ट पावर की तरह कैसे काम करता है। नाय की परिभाषा लीजिए: दूसरों को वही चाहने पर राज़ी कर लेना जो आप चाहते हैं, वह भी खिंचाव और वैधता के दम पर। भारत का खिंचाव तीन बातों पर टिका है — ऐसा लोकतंत्र जो पश्चिमी नहीं है, ऐसी उभरती ताक़त जिसने कोई संरक्षक नहीं चुना, और ग्लोबल साउथ का ऐसा पैरोकार जो किसी खेमे की अगुवाई नहीं चाहता।
यह काम कहाँ आया। यूक्रेन पर रुख़, जिसमें न निंदा थी न समर्थन और बातचीत पर ज़ोर था, इसी मुहावरे में समझ आया और इसी से दोनों पक्षों तक पहुँच बनी रही। वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन और भारत की अध्यक्षता में G20 में अफ़्रीकी संघ का शामिल होना — यहाँ यह स्वभाव एजेंडा तय करने की ताक़त में बदला। महामारी के दौरान टीके भेजना और पड़ोस में आपदा राहत इसके ज़मीनी रूप हैं।
यह कहाँ खिंचता है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ गहराते रक्षा और तकनीक के रिश्ते; अपने इलाक़े की ग़ैर-बराबरी, जिसे छोटे पड़ोसी एकजुटता की भाषा से अलग तरह से महसूस करते हैं; और ख़ुद आंदोलन की संस्था के तौर पर बेबसी — न सचिवालय, और एक सौ बीस सदस्यों के बीच सर्वसम्मति।
रणनीतिक दलील। बहुध्रुवीय दुनिया में बिना बिके रहने की क़ीमत बढ़ जाती है, क्योंकि कई ताक़तें साथ लेने की होड़ में रहती हैं। इसलिए रणनीतिक स्वायत्तता गुटनिरपेक्षता का ढला हुआ सिद्धांत है, और बहु-गुटीय रिश्ते उसका तरीक़ा।
निष्कर्ष। स्वभाव आज भी सचमुच की पूँजी है और संगठन एक विरासत भर। भारत के हित में यही है कि वह नैतिक पूँजी बचाए रखे और अपने अहम रिश्ते दोतरफ़ा या छोटे समूहों में चलाए — ठीक यही वह करता भी है।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- गुटनिरपेक्षता बनाम तटस्थता, तटस्थतावाद और अलगाववाद; नेहरू के कहे शब्द।
- वजहें: फ़ैसले लेने की आज़ादी, विकास, फँसने से बचना, एकजुटता और आवाज़, सिद्धांत की पक्की धारणा।
- पंचशील 1954, पाँच सिद्धांत, भारत-चीन तिब्बत समझौते में; बांडुंग 1955; बेलग्रेड 1961 के संस्थापक नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो, एन्क्रूमा।
- दौर: बनने का दौर 1947–55; संस्था बनने का दौर 1964 तक; आर्थिक मोड़ 1979 तक, जिसमें UNCTAD, G-77 और 1974 का NIEO; संकट 1979–89, जिसमें हवाना 1979 और अफ़ग़ानिस्तान, नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 1983; 1991 के बाद नया रुख़।
- उपलब्धियाँ: उपनिवेशवाद का ख़ात्मा, रंगभेद-विरोध, निरस्त्रीकरण की पैरवी, NIEO, कूटनीतिक जगह। सीमाएँ: आपसी अलगाव, अमल कराने की ताक़त नहीं, चुन-चुनकर लागू करना, दो-ध्रुवीयता पर निर्भरता, कोई सचिवालय नहीं।
- भारत के हटाव: हंगरी 1956, भारत-सोवियत संधि अगस्त 1971, अफ़ग़ानिस्तान 1979।
- आज: सिद्धांत रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-गुटीय रिश्तों की शक्ल में ज़िंदा; स्वभाव सॉफ़्ट पावर के तौर पर; वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन; संगठन कमज़ोर।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।