आर्द्रभूमियां (Wetlands) वे क्षेत्र हैं जहां जल भूमि से मिलता है — स्थायी या मौसमी रूप से, प्राकृतिक या कृत्रिम रूप से। आर्द्रभूमियों पर रामसर सम्मेलन (1971) इनकी परिभाषा में दलदल, बाढ़ के मैदान, नदियां, झीलें, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां तथा अन्य समुद्री क्षेत्र शामिल करता है — जहां निम्न ज्वार पर गहराई 6 मीटर तक हो — साथ ही अपशिष्ट जल उपचार तालाब एवं जलाशय जैसी मानव-निर्मित आर्द्रभूमियों को भी। इस प्रकार यह शब्द दलदल की रोज़मर्रा की छवि से कहीं अधिक व्यापक है।
आर्द्रभूमियां पृथ्वी के सर्वाधिक उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्रों में से हैं। वे जल का निस्पंदन करती हैं, भूजल पुनर्भरण करती हैं, बाढ़ को रोकती हैं, अवसाद रोकती हैं, तटों को स्थिर करती हैं, जलवायु को नियंत्रित करती हैं तथा विश्व की लगभग 40% ज्ञात पादप एवं प्राणी प्रजातियों को आश्रय देती हैं। भारत में अंतर्राष्ट्रीय महत्व की 75 अधिसूचित आर्द्रभूमियां हैं (2025 तक — अद्यतन संख्या नीचे दी गई है), तथा राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर हज़ारों छोटी आर्द्रभूमियां हैं।
आर्द्रभूमियां क्या करती हैं
| सेवा | योगदान |
|---|---|
| जल आपूर्ति | सतही एवं भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण |
| जल शुद्धिकरण | अवसादों को रोकना, नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस का अवशोषण |
| बाढ़ नियमन | बाढ़-जल को धीमा करना एवं फैलाना |
| कटाव नियंत्रण | जड़-जाल तटों एवं किनारों को स्थिर करते हैं |
| जलवायु नियमन | कार्बन भंडारण (विशेषतः पीटलैंड्स); शहरी सूक्ष्म-जलवायु को ठंडा करना |
| भोजन एवं रेशा | मछली, धान, सरकंडे, औषधीय पौधे |
| जैवविविधता आवास | प्रवासी पक्षी, उभयचर, मछलियां, जलीय स्तनधारी |
| सांस्कृतिक मूल्य | पवित्र उपवन, तीर्थयात्रा, आजीविकाएं |
भारतीय आर्द्रभूमियों को खतरे
शहरीकरण
शहरी केंद्रों के निकट की आर्द्रभूमियां आवासीय, औद्योगिक एवं वाणिज्यिक विकास के निरंतर दबाव में हैं। बेंगलुरु ने तीन दशकों में अपनी 79% आर्द्रभूमियां खो दीं। चेन्नई की 2015 तथा 2023 की बाढ़ें आंशिक रूप से पल्लीकरणई दलदल तथा Buckingham नहर पर निर्मित अतिक्रमण का परिणाम थीं। दिल्ली की यमुना बाढ़-तल अवैध निर्माणों से व्याप्त है।
मानवजनित परिवर्तन
अनियोजित कृषि, उद्योग, सड़कें, बंधोदय (impoundments), ड्रेजिंग, बालू-खनन तथा ठोस कचरा डंपिंग ने विशाल क्षेत्रों को सूखाया एवं रूपांतरित किया है।
कृषि दबाव
हरित क्रांति के बाद पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु की आर्द्रभूमियां धान के खेतों में बदल दी गईं। सिंचाई हेतु निर्मित जलाशयों, नहरों एवं बांधों ने अनुप्रवाह आर्द्रभूमियों की जल-विज्ञान को बदल दिया।
जल-विज्ञानीय परिवर्तन
जल-स्थानांतरण हेतु — जलग्रहण से कमांड क्षेत्रों तक — नहर निर्माण एवं नदी मोड़ ने प्राकृतिक जल-निकासी को बाधित किया है तथा आर्द्रभूमियों में जल-प्रवाह कम किया है।
वनोन्मूलन
जलग्रहणों में वनस्पति की हानि से अनुप्रवाह आर्द्रभूमियों में मृदा क्षरण एवं अवसाद-भार बढ़ता है।
प्रदूषण
अनियंत्रित मलजल एवं औद्योगिक बहिःस्राव का निर्वहन। वेम्बनाड (केरल) तथा दीपोर बील (असम) जैसी आर्द्रभूमियां पारिस्थितिकीय निगरानी सूचियों में हैं।
लवणीकरण
तटों के निकट भूजल के अति-दोहन से लवणीय अंतःक्षेप होता है, जो मीठे जल की आर्द्रभूमियों को ह्रासित करता है।
जलकृषि (Aquaculture)
व्यावसायिक झींगा एवं मछली पालन ने मैंग्रोव तथा खाड़ी आर्द्रभूमियों के बड़े क्षेत्रों को बदल दिया है, विशेषतः आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवं गुजरात में।
रामसर सम्मेलन
आर्द्रभूमियों पर रामसर सम्मेलन पर रामसर, ईरान (1971) में हस्ताक्षर हुए तथा यह 1975 में लागू हुआ। भारत 1982 में पक्षकार बना। यह विश्व की सबसे पुरानी अंतर्सरकारी पर्यावरण संधि है। इसका मिशन: “स्थानीय एवं राष्ट्रीय कार्यों तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से सभी आर्द्रभूमियों का संरक्षण एवं विवेकपूर्ण उपयोग, ताकि विश्व भर में सतत विकास प्राप्त किया जा सके।”
तीन स्तंभ
- प्रत्येक संविदाकारी पक्षकार के क्षेत्र की सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग।
- अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची — रामसर सूची — हेतु उपयुक्त आर्द्रभूमियों का नामांकन।
- सीमा-पार आर्द्रभूमियों एवं साझा प्रजातियों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
विवेकपूर्ण उपयोग (Wise Use)
रामसर का केंद्रीय विचार। “विवेकपूर्ण उपयोग” का अर्थ है सतत विकास के संदर्भ में आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिकीय चरित्र का अनुरक्षण। यह किसी अदूषित अवस्था में संरक्षण नहीं है; यह पारिस्थितिकीय अखंडता और संवेदनशील मानव उपयोग दोनों है।
मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (Montreux Record)
उन रामसर स्थलों का रजिस्टर जहां प्रौद्योगिकीय विकास, प्रदूषण या मानवीय हस्तक्षेप के कारण पारिस्थितिकीय चरित्र बदला है, बदल रहा है, या बदलने की संभावना है। मॉन्ट्रो रिकॉर्ड में दो भारतीय स्थल हैं: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर, राजस्थान) तथा लोकटक झील (मणिपुर)।
भारत के रामसर स्थल
2020 से भारत त्वरित गति से रामसर स्थल नामांकित कर रहा है। 2020 के 26 स्थलों से बढ़कर 2023 तक 13.3 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में 75 स्थल हो चुके हैं — यह नेटवर्क दक्षिण एशिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में से एक बन गया है। किसी भी भारतीय राज्य में सर्वाधिक रामसर स्थल तमिलनाडु में हैं।
प्रमुख रामसर स्थलों में चिल्का झील (ओडिशा), लोकटक झील (मणिपुर), केवलादेव (राजस्थान), वुलर झील (जम्मू-कश्मीर), सुंदरबन (पश्चिम बंगाल), भीतरकनिका मैंग्रोव (ओडिशा), हरिके (पंजाब), प्वाइंट कैलिमेर (तमिलनाडु), नलसरोवर (गुजरात), अष्टमुडी एवं वेम्बनाड (केरल), तथा होकेरा (कश्मीर) शामिल हैं।
भारत में विधिक एवं संस्थागत ढांचा
आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत अधिसूचित ये नियम:
- विनियमित गतिविधियों को परिभाषित करते हैं (बहिःस्राव निर्वहन, ठोस कचरा डंपिंग, अतिक्रमण निषिद्ध)।
- प्रत्येक राज्य में राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण गठित करते हैं।
- एकीकृत प्रबंधन योजनाओं का प्रावधान करते हैं।
- कुछ गतिविधियों को सर्वथा निषिद्ध करते हैं।
जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय योजना (NPCA)
- 2015 में राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना एवं राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम को मिलाकर बनाई गई।
- MoEFCC के अधीन एक केंद्र-प्रायोजित योजना।
- राज्यों को आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु तकनीकी एवं वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- झीलों एवं आर्द्रभूमियों के लिए अलग-अलग कार्यक्रमों के बजाय एक एकीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है।
अमृत धरोहर
आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017 के अंतर्गत 2023 में प्रारंभ अमृत धरोहर, सामुदायिक भागीदारी, इको-पर्यटन, पारंपरिक ज्ञान तथा आजीविका अवसरों के माध्यम से रामसर स्थलों के संरक्षण पर केंद्रित है।
मिष्टी पहल (MISHTI)
बजट 2023 में घोषित तटरेखा आवासों एवं मूर्त आय हेतु मैंग्रोव पहल (MISHTI), तटरेखाओं तथा नमकीन भूमियों पर मैंग्रोव रोपण को बढ़ावा देती है।
आर्द्रभूमि संरक्षण की चुनौतियां
- बहु क्षेत्राधिकार: कृषि, मत्स्य, सिंचाई, राजस्व, पर्यटन, जल संसाधन तथा स्थानीय सरकारें — सभी आर्द्रभूमियों से जुड़ती हैं, अक्सर परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं के साथ।
- वन विभाग का मैंग्रोव पर प्रत्यक्ष क्षेत्राधिकार है।
- राज्य एवं स्थानीय स्तर पर विनियामक ढांचे का दुर्बल प्रवर्तन।
- कई प्रांतों में राज्य सरकार की सीमित प्रतिबद्धता।
- पूर्ववर्ती NWCP के वार्षिक MAP चक्र एकीकृत, बहु-वर्षीय नियोजन के विरुद्ध काम करते थे।
- बहुत कम राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण पूर्ण रूप से क्रियाशील हैं।
- बिल्डरों, झुग्गी बस्तियों एवं सड़कों द्वारा शहरी जलाशयों का अतिक्रमण।
- आर्द्रभूमियों को रूपांतरण के लिए डि-क्लासिफाइ करने के लिए खामियों का उपयोग।
आगे का रास्ता
- संबंधित विभागों में एकीकृत नियोजन, क्रियान्वयन एवं निगरानी।
- उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर आर्द्रभूमियों का नियमित रूप से अद्यतन व्यापक मानचित्रण एवं सूची।
- सशक्त राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरणों के साथ 2017 के नियमों का प्रभावी प्रवर्तन।
- राजस्व अभिलेखों में आर्द्रभूमि की स्पष्ट सीमाओं के माध्यम से अतिक्रमण से सुरक्षा।
- पारिस्थितिकीविदों, जलविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों एवं जलग्रहण विशेषज्ञों के साथ तकनीकी सहयोग।
- स्थानीय विद्यालयों एवं समुदायों में जागरूकता अभियान।
- निरंतर जल गुणवत्ता निगरानी।
- आर्द्रभूमियों को बनाए रखने वाले समुदायों को पारिस्थितिकी सेवाओं हेतु भुगतान (Payment for Ecosystem Services)।
- रामसर स्थलों को जलवायु अनुकूलन एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण के साधनों के रूप में मान्यता देना।
हाल के घटनाक्रम (2024–26)
अद्यतन संदर्भ:
- भारत की रामसर गणना 2024–25 में 85 स्थल तक पहुंच गई (अद्यतन संख्या), जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक है। तमिलनाडु एक दर्जन से अधिक स्थलों के साथ अग्रणी है।
- 2024 से अमृत धरोहर को अतिरिक्त स्थलों एवं सामुदायिक आजीविका घटकों के साथ विस्तारित किया गया है।
- रामसर COP15 (2025 में निर्धारित) 2023–30 की रणनीतिक योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा करेगा।
- ISFR 2023 मैंग्रोव कवर 4,992 वर्ग किलोमीटर बताती है, जो सीमांत वृद्धि है।
- चक्रवात रेमल (2024) तथा चक्रवात दाना (2024) के बाद सुंदरबन तेज़ खारे जल अंतःक्षेप का सामना कर रहा है।
- चेन्नई आर्द्रभूमियां — 2023 की बाढ़ के बाद पल्लीकरणई दलदल का पुनरुद्धार विस्तारित किया गया।
- MoHUA के अंतर्गत शहरी आर्द्रभूमि नीति प्रारूप (2024–25) आर्द्रभूमियों को मूल नीली-हरी अवसंरचना के रूप में मान्यता देते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (2024–25) ने पुनः पुष्टि की है कि पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील आर्द्रभूमियों को वाणिज्यिक उपयोग हेतु डि-नोटिफाई नहीं किया जा सकता।
यूपीएससी प्रासंगिकता
पेपर मानचित्रण: जीएस पेपर III — पर्यावरण, जैवविविधता; जीएस पेपर I — भारतीय भूगोल; आपदा प्रबंधन।
प्रारंभिक संकेतक:
- रामसर सम्मेलन पर रामसर, ईरान (1971) में हस्ताक्षर हुए, यह 1975 से प्रभावी हुआ।
- भारत 1982 में रामसर में शामिल हुआ।
- आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017 में अधिसूचित किए गए।
- NPCA (2015) राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना एवं राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम का विलय करता है।
- मॉन्ट्रो रिकॉर्ड में भारत से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान तथा लोकटक झील सूचीबद्ध हैं।
- किसी भी भारतीय राज्य में सर्वाधिक रामसर स्थल तमिलनाडु में हैं।
- अमृत धरोहर 2023 में प्रारंभ हुआ।
- MISHTI मैंग्रोव रोपण को लक्षित करता है।
- “विवेकपूर्ण उपयोग” (Wise Use) रामसर का केंद्रीय विचार है।
मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण:
- “आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिकीय महत्व पर चर्चा कीजिए तथा उनके संरक्षण हेतु भारत के संस्थागत ढांचे का मूल्यांकन कीजिए।”
- “आर्द्रभूमियां जलवायु अनुकूलन एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारतीय रामसर स्थलों के उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिए।”