प्राचीन भारत के राजा, तिथियाँ और वंश समझने का सबसे ठोस आधार पत्थर, धातु और मिट्टी पर खुदा लेख है। सिक्के, स्मारक और ग्रंथ उपयोगी हैं, लेकिन साहित्य सदियों तक नकल और संपादन से बदल सकता है। अभिलेख खुदने के क्षण में स्थिर हो जाता है। उसमें उस समय की भाषा-लिपि, शासक का नाम और कभी ठीक वर्ष मिलता है। इसलिए अभिलेखविद्या (epigraphy) प्राचीन इतिहास की नींव है।
अभिलेख केवल तिथि नहीं बताते। उनमें युद्ध के बाद अशोक का पछतावा, विदेशी मूल के शासक का संस्कृत में बाँध सुधार का दावा और दरबारी कवि की विजय-प्रशंसा मिलती है। प्रशासन, धर्म, सिंचाई, भूमि अनुदान, सैन्य अभियान और भाषा-लिपि का बदलाव भी दर्ज है। इन्हें सूची की तरह नहीं, भारत द्वारा अपना इतिहास लिखने की क्रमिक कहानी की तरह पढ़ें।
अभिलेखविद्या क्या है और अभिलेख क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
अभिलेखविद्या टिकाऊ सतह पर जानबूझकर उकेरे लेखों का अध्ययन है। पुरालिपिविज्ञान (palaeography) अक्षरों के बदलते आकार का अध्ययन करके बिना तिथि वाले लेख की आयु तय करने में मदद करता है। समकालीन, टिकाऊ और बदलना कठिन होने के कारण ये प्राचीन काल के सबसे भरोसेमंद स्रोतों में हैं।
शैलादेश और गुफा लेख सार्वजनिक घोषणा के लिए प्राकृतिक चट्टान पर, स्तंभ लेख स्वतंत्र एकाश्म स्तंभ पर और ताम्रपत्र कानूनी भूमि अनुदान के लिए ताँबे की चादर पर होते थे। गुप्त काल से ताम्रपत्र सामान्य हुए और उनमें गाँव, खेत, सीमा, कर तथा अधिकार लिखे गए। मंदिर दीवार, प्रतिमा, मुहर और मृद्भांड पर भी लेख मिलते हैं। हर प्रकार अलग जानकारी देता है।
इनसे शासकों के नाम, उपाधि और विजय; भूमि अनुदान, कर छूट व दान; बौद्ध, जैन और ब्राह्मण परंपराओं का संरक्षण; तथा प्राकृत से संस्कृत और ब्राह्मी से क्षेत्रीय लिपियों का विकास पता चलता है। लेकिन राजकीय प्रशस्ति विजय बढ़ा-चढ़ाकर और हार छिपा सकती है। इसलिए सिक्कों, ग्रंथों और पुरातत्त्व से मिलान जरूरी है।
प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख
तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व के अशोक अभिलेख उपमहाद्वीप के सबसे पुराने पढ़े जा चुके लेख और प्रजा से सीधे संवाद का पहला बड़ा उदाहरण हैं। प्रमुख व लघु शैलादेश तथा स्तंभादेश अधिकतर प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं। उत्तर-पश्चिम में खरोष्ठी तथा कंधार सीमा पर यूनानी और अरामाईक रूप मिले। इनमें धम्म, कलिंग युद्ध का पश्चात्ताप, लोक-कल्याण और सहिष्णुता है। जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) ने 1837 में ब्राह्मी पढ़ी और भूला प्राचीन इतिहास फिर खुला।
ओडिशा में भुवनेश्वर के पास उदयगिरि गुफा का हाथीगुम्फा अभिलेख दूसरी या पहली शताब्दी ईसा-पूर्व में प्राकृत-ब्राह्मी में है। इसकी 17 घिसी पंक्तियाँ जैन कलिंग राजा खारवेल के अभियान और सार्वजनिक कार्य बताती हैं। लगभग 150 ईस्वी का पश्चिमी क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ लेख मानक संस्कृत का पहला लंबा अभिलेख माना जाता है। इसमें चंद्रगुप्त मौर्य काल की सुदर्शन झील की मरम्मत है। उसी गिरनार चट्टान पर अशोक, रुद्रदामन और बाद में स्कंदगुप्त के लेख हैं।


गुप्त काल और संस्कृत की प्रतिष्ठा
गुप्त काल तक संस्कृत राजकीय अभिलेख की मुख्य भाषा बनी। हरिषेण द्वारा समुद्रगुप्त, लगभग 335-375 ईस्वी, के लिए रची प्रयाग प्रशस्ति या इलाहाबाद स्तंभ लेख इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। शास्त्रीय संस्कृत और गुप्तकालीन ब्राह्मी में यह उसी स्तंभ पर है जिस पर अशोक के आदेश थे। इसमें उत्तर-दक्षिण की विजय सूची है और चौथी शताब्दी के राजनीतिक मानचित्र का सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। प्रशस्ति का अर्थ स्तुति है।
दिल्ली के महरौली लौह स्तंभ की छह पंक्तियाँ संस्कृत और गुप्तकालीन ब्राह्मी में “चंद्र” नाम के राजा की विजय बताती हैं, जिसे अधिकतर इतिहासकार चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य मानते हैं। लगभग सोलह शताब्दी से जंग का विरोध करता स्तंभ प्राचीन लौह तकनीक भी दिखाता है। वस्तु और लेख मिलकर राजकीय यश व तकनीकी कौशल बताते हैं।
कर्नाटक का 634 ईस्वी का ऐहोल अभिलेख जैन कवि रविकीर्ति ने चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय की प्रशंसा में मेगुती मंदिर पर लिखा। संस्कृत में इसमें नर्मदा किनारे हर्षवर्धन को रोकने सहित विजय हैं। इससे मौर्य सार्वजनिक घोषणा का माध्यम बाद के राज्यों की दरबारी काव्य-कला बनता दिखता है। ताम्रपत्रों और प्रशस्तियों से क्षेत्रीय इतिहास अधिक विस्तार से बनता है।
अभिलेख इतिहासकार को क्या बताते हैं?
अशोक तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व, उसके बाद खारवेल, लगभग 150 ईस्वी रुद्रदामन, चौथी शताब्दी के समुद्रगुप्त-चंद्रगुप्त द्वितीय और सातवीं के पुलकेशिन द्वितीय की तिथिबद्ध शृंखला बनती है। समकालीन लेख बाद के साहित्य से अधिक निश्चित आधार देता है।
भूमि अनुदान संपत्ति, राजस्व और धार्मिक संस्थाओं की शक्ति; स्तूप-गुफा दान लेख व्यापारी, श्रेणी, भिक्षु और महिलाओं जैसे सामान्य दाता; तथा संरक्षण से बौद्ध, जैन व ब्राह्मण धर्म की स्थिति दिखाते हैं। प्राकृत से संस्कृत और ब्राह्मी से आधुनिक भारतीय लिपियों के पूर्वजों तक बदलाव सांस्कृतिक इतिहास है।
भारत में यूनानी या चीनी शैली के निरंतर तिथिबद्ध वृत्तांत नहीं लिखे गए। अभिलेख इस कमी को भरते हैं। प्रिंसेप द्वारा अशोक के अक्षर पढ़ने से लेकर ताम्रपत्रों से वंश जोड़ने तक भारत ने पत्थरों से अपना अतीत वापस पाया।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में कैसे लिखें?
यह सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (GS Paper 1) के भारतीय संस्कृति, साहित्य और प्राचीन इतिहास से जुड़ा है। स्रोत, अशोक, लिपि विकास या गुप्तकालीन संस्कृत के प्रश्न में सही अभिलेख, शासक, भाषा, लिपि और सूचना लिखना सबसे महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर की रचना
परिभाषा और विश्वसनीयता से शुरू करें। फिर क्रम में अशोक के प्राकृत-ब्राह्मी आदेश, खारवेल का हाथीगुम्फा, रुद्रदामन का पहला लंबा संस्कृत जूनागढ़ लेख, हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति, महरौली स्तंभ और पुलकेशिन की ऐहोल प्रशस्ति दें। अंत में राजनीतिक कालक्रम, प्रशासन, धर्म, भाषा बदलाव और प्रशस्ति की पक्षधरता लिखें।
आम गलतियाँ
अशोक की भाषा प्राकृत और रुद्रदामन व गुप्त अभिलेखों की संस्कृत है। जूनागढ़ को पालि न कहें। जूनागढ़ चट्टान और प्रयाग स्तंभ पर कई शासकों के लेख हैं। प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त ने नहीं, हरिषेण ने रची। प्रशस्ति को निष्पक्ष तथ्य न मानें।
संक्षिप्त उत्तर-ढाँचा
अभिलेखविद्या = टिकाऊ समकालीन स्रोत → अशोक, तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व, प्राकृत-ब्राह्मी, प्रिंसेप 1837 → हाथीगुम्फा: खारवेल → जूनागढ़ लगभग 150 ईस्वी: रुद्रदामन, पहला लंबा संस्कृत गद्य, सुदर्शन झील → प्रयाग: हरिषेण-समुद्रगुप्त → महरौली: चंद्र → ऐहोल 634: रविकीर्ति-पुलकेशिन → महत्त्व: तिथि, प्रशासन, धर्म, भाषा बदलाव; आलोचनात्मक पढ़ाई।
आरेख कैसे बनाएँ?
तीसरी शताब्दी ईसा-पूर्व से सातवीं ईस्वी तक छह अभिलेखों की समयरेखा बनाकर हर एक के साथ शासक, भाषा और लिपि लिखें। दूसरी छोटी पंक्ति में अशोक के प्राकृत से गुप्तकालीन संस्कृत तक बदलाव दिखाएँ।
संतुलित निष्कर्ष
प्राचीन भारत ने औपचारिक इतिहास कम लिखा, लेकिन अपना बहुत कुछ पत्थर और धातु पर छोड़ा। इन लेखों को उनकी प्रशंसा के विरुद्ध सावधानी से पढ़कर ही आरंभिक कालक्रम और समाज पुनः बनाया गया है।
आँकड़ों का सही उपयोग
अशोक और 1837 का प्रिंसेप, लगभग 150 ईस्वी का रुद्रदामन, हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति और 634 ईस्वी का ऐहोल पर्याप्त आधार हैं। हर एक के साथ भाषा-लिपि जोड़ें।
सामान्य प्रश्न
अभिलेखविद्या और पुरालिपिविज्ञान में क्या अंतर है? पहला टिकाऊ सतह के लेख का विषय व अर्थ पढ़ता है, दूसरा अक्षरों के आकार और बदलाव से लिपि व तिथि समझता है। दोनों साथ मिलकर बिना वर्ष वाले लेख को भी काल में रखते हैं।
अभिलेख सबसे भरोसेमंद स्रोत क्यों हैं? वे घटनाओं के समकालीन, टिकाऊ और बाद में बदलना कठिन हैं। सदियों की नकल से बदलते साहित्य के विपरीत खुदाई के क्षण पर स्थिर रहते हैं। निरंतर तिथिबद्ध इतिहास की कमी वाले भारत में राजवंश कालक्रम इन पर निर्भर है।
पहला लंबा संस्कृत अभिलेख कौन-सा है? लगभग 150 ईस्वी में गुजरात की गिरनार चट्टान पर पश्चिमी क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ लेख मानक संस्कृत का पहला लंबा अभिलेख माना जाता है। इसमें सुदर्शन झील की मरम्मत है।
प्रयाग प्रशस्ति क्या है? हरिषेण द्वारा समुद्रगुप्त, लगभग 335-375 ईस्वी, की शास्त्रीय संस्कृत स्तुति है। गुप्त ब्राह्मी में अशोक वाले स्तंभ पर खुदी विजय सूची चौथी शताब्दी का सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज है।
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न
- अशोक के आदेश मुख्यतः किस भाषा-लिपि में हैं?
(a) संस्कृत-गुप्त (b) प्राकृत-ब्राह्मी (c) पालि-खरोष्ठी (d) तमिल-ग्रंथ
उत्तर: (b) उत्तर-पश्चिम में खरोष्ठी और सीमा पर यूनानी-अरामाईक अपवाद हैं। - गिरनार चट्टान पर किन शासकों के लेख हैं?
(a) अशोक, खारवेल, हर्ष (b) अशोक, रुद्रदामन, स्कंदगुप्त (c) चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, पुलकेशिन (d) रुद्रदामन, हरिषेण, रविकीर्ति
उत्तर: (b) एक चट्टान पर तीन युग हैं। - प्रयाग प्रशस्ति किसने रची?
(a) रविकीर्ति (b) खारवेल (c) हरिषेण (d) बाणभट्ट
उत्तर: (c) वह समुद्रगुप्त का कवि-मंत्री था। - हाथीगुम्फा लेख किस शासक से जुड़ा है?
(a) पुलकेशिन (b) खारवेल (c) रुद्रदामन (d) चंद्रगुप्त द्वितीय
उत्तर: (b) यह कलिंग के जैन राजा का प्राकृत-ब्राह्मी लेख है। - 634 ईस्वी का ऐहोल लेख किसने किसके लिए रचा?
(a) हरिषेण-समुद्रगुप्त (b) रविकीर्ति-पुलकेशिन द्वितीय (c) प्रिंसेप-अशोक (d) रुद्रदामन-स्कंदगुप्त
उत्तर: (b) मेगुती मंदिर पर संस्कृत प्रशस्ति है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “अभिलेख प्राचीन भारतीय इतिहास की सबसे दृढ़ नींव हैं।” प्रमुख लेखों के संदर्भ में समीक्षा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- राजकीय अभिलेखों की भाषा में प्राकृत से संस्कृत बदलाव को उदाहरण सहित समझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
- अभिलेखों के प्रकार और उनसे राजनीति, अर्थव्यवस्था व धर्म की जानकारी पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- मौर्य इतिहास के स्रोत के रूप में अशोक आदेशों का महत्त्व मूल्यांकित कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- प्रयाग और ऐहोल जैसी राजकीय प्रशस्तियाँ उपयोगी, फिर भी समस्यापूर्ण स्रोत हैं। आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)