अलवणीकरण (Desalination) समुद्री या खारे पानी से नमक निकालकर पीने योग्य पानी बनाने की प्रक्रिया है। जल-संकट वाले तटीय क्षेत्रों के लिए यह एक प्रमुख समाधान है। UPSC GS III के लिए अलवणीकरण जल सुरक्षा, नवाचार और पर्यावरण नीति से जुड़ता है।
अलवणीकरण की मुख्य प्रौद्योगिकियाँ
रिवर्स ऑस्मोसिस (RO)
सबसे प्रचलित प्रौद्योगिकी। उच्च दबाव पर पानी को अर्धपारगम्य झिल्ली से गुज़ारकर नमक और अशुद्धियाँ हटाई जाती हैं। ऊर्जा कुशल, लचीला, मॉड्यूलर।
बहु-चरण फ्लैश आसवन (MSF)
खाड़ी देशों में सामान्य। पानी को बहु-चरण गर्म करके वाष्प बनाकर संघनित करते हैं। अधिक ऊर्जा गहन।
भारत में अलवणीकरण
- चेन्नई: भारत का पहला बड़े पैमाने का अलवणीकरण संयंत्र — मिंजुर (2010), क्षमता 100 MLD; दूसरा नेम्मेली (2013), 100 MLD।
- Mumbai, Goa, Gujarat तटों पर प्रस्तावित संयंत्र।
चुनौतियाँ
- उच्च ऊर्जा खपत: ~3-5 kWh प्रति घन मीटर।
- उच्च लागत: ₹60-80/kL बनाम पारंपरिक स्रोतों से ₹5-15/kL।
- ब्राइन (नमकीन अपशिष्ट) निपटान: समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान।
UPSC प्रासंगिकता
GS III: जल सुरक्षा, अलवणीकरण प्रौद्योगिकी (RO बनाम MSF), चेन्नई के संयंत्र और लागत-ऊर्जा चुनौतियाँ। प्रश्न: “अलवणीकरण भारत की जल सुरक्षा में कितना योगदान कर सकता है? इसकी सीमाएँ बताएँ।”
सामान्य प्रश्न
रिवर्स ऑस्मोसिस कैसे काम करता है?
उच्च दबाव पर पानी को अर्धपारगम्य झिल्ली से गुज़ारकर नमक और अशुद्धियाँ हटाई जाती हैं।
चेन्नई का पहला बड़े पैमाने का अलवणीकरण संयंत्र कहाँ है?
मिंजुर (2010) में — 100 MLD क्षमता। नेम्मेली (2013) में दूसरा संयंत्र।
अलवणीकरण की मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
उच्च ऊर्जा खपत (~3-5 kWh/m³), उच्च लागत और ब्राइन (नमकीन अपशिष्ट) निपटान की पर्यावरणीय समस्या।