आर्कटिक की समुद्री बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर नहीं बढ़ता। वह बर्फ पहले से ही पानी पर तैर रही है, और तैरती हुई बर्फ अपने ही वजन जितना पानी हटाती है। समुद्र का स्तर ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर (Greenland Ice Sheet) से बढ़ता है, क्योंकि वह जमीन पर टिकी है। आर्कटिक के पिघलने की पूरी समस्या समझने की शुरुआत इसी फर्क से होती है, और ज्यादातर सतही विश्लेषण ठीक यहीं मात खा जाता है।
भारत के लिए आर्कटिक बर्फ की वजह से मायने नहीं रखता, संचरण यानी हवा और समुद्र के प्रवाह (circulation) की वजह से रखता है। ध्रुवीय जेट स्ट्रीम के साथ जो होता है, वही मानसून के साथ होता है।
वैश्विक फीडबैक
एल्बिडो प्रभाव और आर्कटिक प्रवर्धन। परावर्तक समुद्री बर्फ घटने पर नीचे का गहरे रंग का समुद्री पानी खुल जाता है, जो सूरज की किरणें लौटाने के बजाय सोख लेता है। जितना ज्यादा सोखना, उतना ज्यादा पिघलना, और उतना ही ज्यादा पानी खुलना। इसी वजह से आर्कटिक बाकी दुनिया के औसत से तेज गर्म हो रहा है।
समुद्र स्तर में बढ़ोतरी। ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर का तेजी से पिघलना वैश्विक समुद्र स्तर बढ़ाने में बड़ा योगदान देता है, क्योंकि यह समुद्र में वह पानी जोड़ता है जो पहले उसमें था ही नहीं।
समुद्री धाराएं। मीठे पानी के आने से समुद्री पानी का खारापन और घनत्व घटता है, जिससे अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) कमजोर पड़ता है और दुनिया भर में गर्मी का बंटवारा गड़बड़ा जाता है।
मौसम की चरम घटनाएं। आर्कटिक का गर्म होना वायुमंडलीय संचरण को बदल देता है, जिससे लंबी चलने वाली लू, कड़ाके की ठंड, सूखा और बहुत तेज बारिश जैसी घटनाएं बनती हैं।
जेट स्ट्रीम की अस्थिरता। आर्कटिक और मध्य अक्षांशों के बीच तापमान का अंतर घटने से ध्रुवीय जेट स्ट्रीम कमजोर होती है, ज्यादा लहरदार रास्ता लेती है, और मौसम प्रणालियां एक ही जगह ज्यादा देर टिकी रहती हैं।
पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना। हजारों साल से जमी हुई जमीन पिघलने पर उसमें बंद कार्बनिक कार्बन से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। यह दूसरा सकारात्मक फीडबैक है।
समुद्री जैव विविधता। समुद्री बर्फ घटने से ध्रुवीय भालू, वालरस, सील और बर्फ पर निर्भर प्लवक (plankton) खतरे में हैं, और इससे आर्कटिक की पूरी खाद्य श्रृंखला जड़ से बदल रही है।
समुद्री अम्लीकरण। ठंडा आर्कटिक पानी ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है, जिससे अम्लीकरण तेज होता है और खोल बनाने वाले जीवों और मछली पालन पर असर पड़ता है।
प्रजातियों का पलायन। गर्मी बढ़ने पर समशीतोष्ण इलाकों की प्रजातियां उत्तर की ओर बढ़ जाती हैं, जिससे मुकाबला, बाहरी आक्रामक प्रजातियों का दबाव और बीमारियों का फैलाव तीनों बढ़ते हैं।
जंगल की आग। ज्यादा गर्म और सूखे हालात ने बोरियल जंगलों और टुंड्रा में आग की घटनाएं बढ़ा दी हैं, जिससे जमा कार्बन हवा में लौट रहा है।
इनमें से दो, एल्बिडो और पर्माफ्रॉस्ट, खुद को ही बढ़ाने वाले हैं। यही चीज आर्कटिक के बदलाव को बाकी जगहों की सीधी-सादी गर्मी से अलग बनाती है: एक हद पार करने के बाद यह सिस्टम बिना किसी बाहरी धक्के के भी आगे चलता रहता है।
भारत के लिए इसका मतलब
मानसून की अनियमितता। आर्कटिक का गर्म होना रॉस्बी तरंगों और जेट स्ट्रीम को प्रभावित करता है, जिससे मानसून की शुरुआत अनियमित होती है, बारिश का बंटवारा असमान रहता है और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ती हैं। नतीजा बारिश का सीधे बढ़ना या घटना नहीं, बल्कि उतार-चढ़ाव है, और इन दोनों में से किसी की तुलना में उतार-चढ़ाव की योजना बनाना ज्यादा मुश्किल है।
चरम मौसम। वायुमंडलीय संचरण में बदलाव से उपमहाद्वीप पर लू, शीत लहर और बादल फटने की घटनाएं ज्यादा देर तक और ज्यादा तीव्रता से टिकती हैं।
हिमालयी हिममंडल। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों का पीछे हटना तेज होता है, जिसका असर बारहमासी नदी तंत्रों पर पड़ता है।
जल सुरक्षा। छोटी अवधि में ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी बढ़ता है। लंबी अवधि में ग्लेशियर सिकुड़ने पर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटियों में सूखे मौसम का पानी खतरे में पड़ जाता है। जाल यहीं है: नजदीकी संकेत भरोसा दिलाता है और लंबी अवधि का संकेत डराता है।
समुद्र स्तर में बढ़ोतरी। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और सुंदरबन जैसे घनी आबादी वाले तटों पर कटाव और डूब का खतरा है।
जैव विविधता। हिमालय, पश्चिमी घाट और तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों में प्रजातियों के फैलाव के बदलने से विलुप्ति का खतरा बढ़ता है।
कृषि। अनियमित बारिश और तापमान की चरम स्थितियां फसल की पैदावार घटाती हैं और खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका दोनों पर खतरा बनती हैं।
समुद्री मत्स्य पालन। समुद्र के गर्म होने से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में मछलियों का पलायन और समुद्री उत्पादकता बदल जाती है।
आपदा जोखिम। बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ की घटनाएं ज्यादा बार होती हैं।
वह कड़ी जिसे याद रखना जरूरी है
आर्कटिक की बर्फ से भारतीय किसान तक कारण की कड़ी इस तरह चलती है: समुद्री बर्फ का घटना, फिर आर्कटिक प्रवर्धन, फिर तापमान के अंतर का कमजोर पड़ना, फिर जेट स्ट्रीम का धीमा और लहरदार होना, फिर मौसम को रोक देने वाले ब्लॉकिंग पैटर्न, फिर मानसून की अनियमित शुरुआत और एक ही जगह अटकी बारिश, और आखिर में फसल का नुकसान या बाढ़।
उत्तर में असर गिनाने से बेहतर है इसे एक कड़ी की तरह लिखना, क्योंकि तब आप सिर्फ यह नहीं कहते कि ध्रुवीय घटना उष्णकटिबंधीय मानसून तक पहुंचती है, बल्कि यह भी बताते हैं कि क्यों पहुंचती है।
ईमानदार अनिश्चितता
इस स्तर पर किसी घटना का कारण तय करना सचमुच कठिन है। आर्कटिक और मानसून का रिश्ता दिशा के मामले में साफ है और मात्रा के मामले में बहुत ढीला। जलवायु मॉडल इस पर सहमत नहीं हैं कि मानसून के दिखाई देने वाले उतार-चढ़ाव में कितना हिस्सा आर्कटिक का है और कितना हिंद महासागर के गर्म होने, एरोसोल या भूमि उपयोग में बदलाव का।
यह अनिश्चितता देर करने का नहीं, अनुकूलन में निवेश करने का तर्क है, क्योंकि जितने भी संभावित नतीजे हैं उनमें सबसे हल्का नतीजा भी बड़ी उथल-पुथल ही है।
आगे का रास्ता
- सिंचाई और फसल की योजना बनाते समय औसत बारिश नहीं, मानसून के उतार-चढ़ाव को आधार मानें।
- हिमालयी हिममंडल की निगरानी में निवेश करें, जहां भारत का निगरानी नेटवर्क अब भी बहुत पतला है।
- हिमालयी राज्यों में ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ के लिए पूर्व चेतावनी क्षमता खड़ी करें।
- सुंदरबन, मुंबई और कोलकाता की तटीय सुरक्षा के लिए लंबी अवधि वाले समुद्र स्तर के परिदृश्यों के हिसाब से पैसा दें।
- हिमाद्री स्टेशन के जरिए आर्कटिक में वैज्ञानिक मौजूदगी बनाए रखें, क्योंकि आर्कटिक के शासन में आवाज शोध में हिस्सेदारी से ही मिलती है।
सामान्य प्रश्न
आर्कटिक प्रवर्धन क्या है?
वह परिघटना जिसमें आर्कटिक बाकी दुनिया के औसत से तेज गर्म होता है। परावर्तक समुद्री बर्फ घटने पर नीचे का गहरे रंग का समुद्री पानी खुल जाता है, जो सूरज की किरणें लौटाने के बजाय ज्यादा सोख लेता है। यह अतिरिक्त गर्मी और बर्फ पिघलाती है, जिससे और पानी खुलता है। इसी सकारात्मक फीडबैक चक्र को एल्बिडो प्रभाव कहते हैं।
क्या समुद्री बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ता है?
नहीं। समुद्री बर्फ पहले से पानी पर तैर रही होती है और अपने ही वजन जितना पानी हटाती है, इसलिए उसके पिघलने से स्तर नहीं बढ़ता। स्तर तो जमीन पर टिकी बर्फ के तेजी से पिघलने से बढ़ता है, खासकर ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर से, जो समुद्र में वह पानी जोड़ती है जो पहले उसमें था ही नहीं।
AMOC क्या है और आर्कटिक के पिघलने का उस पर असर क्यों पड़ता है?
अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन वह तंत्र है जो अटलांटिक में गर्मी को इधर से उधर ले जाता है। पिघलती बर्फ से आने वाला मीठा पानी समुद्री पानी का खारापन और घनत्व घटा देता है, जिससे वह डूबने की क्रिया कमजोर पड़ती है जो पूरी धारा को चलाती है। नतीजा दुनिया भर में गर्मी के बंटवारे और जलवायु नियंत्रण में गड़बड़ी है।
आर्कटिक के गर्म होने का जेट स्ट्रीम पर क्या असर होता है?
ध्रुवीय जेट स्ट्रीम आर्कटिक और मध्य अक्षांशों के बीच तापमान के अंतर से चलती है। आर्कटिक तेजी से गर्म होने पर यह अंतर घटता है, जेट धीमी पड़ती है और ज्यादा लहरदार रास्ता लेती है, और मौसम प्रणालियां ज्यादा देर टिकी रहती हैं। प्रणाली के अटक जाने का मतलब है कि लू, शीत लहर या बारिश एक ही जगह ज्यादा दिन चलती है।
पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना चिंता की बात क्यों है?
पर्माफ्रॉस्ट में हजारों साल से जमा कार्बनिक कार्बन जमी हुई हालत में बंद है। पिघलने पर उसमें से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जो वायुमंडल की ग्रीनहाउस गैसों में जुड़ जाती है और एल्बिडो प्रभाव के साथ-साथ दूसरा सकारात्मक फीडबैक बना देती है।
आर्कटिक के पिघलने का भारतीय मानसून पर क्या असर पड़ता है?
आर्कटिक का गर्म होना रॉस्बी तरंगों और जेट स्ट्रीम के व्यवहार को प्रभावित करता है, जो आगे चलकर मानसून की शुरुआत, बारिश के बंटवारे और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं पर असर डालता है। नतीजा बारिश का सीधे बढ़ना या घटना नहीं, बल्कि मानसून में ज्यादा उतार-चढ़ाव है।
भारत की जल सुरक्षा पर इसके क्या नतीजे हैं?
तापमान बढ़ने से हिमालयी ग्लेशियरों का पीछे हटना तेज होता है। छोटी अवधि में ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी बढ़ता है। लंबी अवधि में ग्लेशियर सिकुड़ने पर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटियों में सूखे मौसम का पानी खतरे में पड़ जाता है, और यही वह समय होता है जब उस पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
समुद्र स्तर बढ़ने से भारत के कौन से तटीय इलाके सबसे ज्यादा खतरे में हैं?
मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और सुंदरबन जैसे घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों पर कटाव और डूब का खतरा है। सुंदरबन के सामने तिहरी मुसीबत है: समुद्र स्तर का बढ़ना, खारे पानी का भीतर घुसना, और तट को बचाने वाले मैंग्रोव कवच का खत्म होना।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- आर्कटिक में एल्बिडो प्रभाव का अर्थ है
(a) बादलों का बढ़ना जो सूरज की रोशनी लौटाते हैं
(b) परावर्तक समुद्री बर्फ घटने से गहरे रंग का समुद्र खुलना, जो ज्यादा विकिरण सोखता है
(c) पर्माफ्रॉस्ट से मीथेन का निकलना
(d) मीठे पानी से समुद्र के खारेपन का घटना
उत्तर: (b) खुला गहरा पानी वह विकिरण सोख लेता है जिसे सफेद बर्फ लौटा देती, और इसी से आर्कटिक प्रवर्धन नाम का गर्म करने वाला फीडबैक बनता है। - इनमें से कौन सीधे वैश्विक समुद्र स्तर बढ़ाता है?
(a) आर्कटिक की समुद्री बर्फ का पिघलना
(b) ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर का पिघलना
(c) दोनों बराबर
(d) दोनों में से कोई नहीं
उत्तर: (b) तैरती समुद्री बर्फ अपने ही वजन जितना पानी हटाती है, इसलिए उसके पिघलने से स्तर नहीं बढ़ता; जमीन पर टिकी बर्फ से बढ़ता है। - AMOC के कमजोर पड़ने का मुख्य कारण है
(a) उत्तरी अटलांटिक में खारेपन का बढ़ना
(b) मीठे पानी के आने से समुद्री पानी के खारेपन और घनत्व का घटना
(c) व्यापारिक हवाओं का तेज होना
(d) समुद्री अम्लीकरण
उत्तर: (b) पिघलती बर्फ से आया मीठा पानी घनत्व घटा देता है, जिससे वह डूबने की क्रिया कमजोर पड़ती है जो पूरी धारा को चलाती है। - धीमी और ज्यादा लहरदार ध्रुवीय जेट स्ट्रीम का नतीजा होता है
(a) कम समय तक टिकने वाली मौसम प्रणालियां
(b) ज्यादा देर तक टिकने वाली मौसम प्रणालियां
(c) मानसून के उतार-चढ़ाव में कमी
(d) दुनिया भर में एक जैसा तापमान
उत्तर: (b) आर्कटिक और मध्य अक्षांशों के बीच तापमान का अंतर घटने से जेट धीमी होती है, प्रणालियां अटक जाती हैं और घटनाएं लंबी चलती हैं। - पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना मुख्य रूप से किन गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन में योगदान करता है?
(a) सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड
(b) मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड
(c) क्लोरोफ्लोरोकार्बन
(d) ब्लैक कार्बन
उत्तर: (b) लंबे समय से जमा कार्बनिक कार्बन पिघलने पर सड़ता है, और उससे मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड दोनों निकलती हैं।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- आर्कटिक का पिघलना एक वैश्विक जलवायु समस्या है जिसके भारतीय उपमहाद्वीप पर खास नतीजे हैं। इसके संचरण तंत्रों की जांच कीजिए। (250 शब्द)
- आर्कटिक में काम कर रहे सकारात्मक फीडबैक चक्रों और जलवायु अनुमानों के लिए उनके महत्व को समझाइए। (150 शब्द)
- हिमालयी ग्लेशियरों का पीछे हटना भारत के सामने पानी की उपलब्धता में छोटी अवधि का अधिशेष और लंबी अवधि की कमी दोनों रखता है। चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
- समुद्री जैव विविधता और मत्स्य पालन पर आर्कटिक के गर्म होने के पारिस्थितिक नतीजों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
- क्या भारत को आर्कटिक में अपनी वैज्ञानिक और कूटनीतिक भागीदारी बढ़ानी चाहिए? कारण दीजिए। (250 शब्द)