कुल कारक उत्पादकता (Total Factor Productivity — TFP) वह माप है जो बताता है कि उत्पादन में कितनी वृद्धि श्रम, पूँजी, भूमि जैसे मापे गए आदानों से परे प्रौद्योगिकी, नवाचार और दक्षता सुधार से होती है। इसे सोलो अवशेष (Solow Residual) भी कहते हैं। यूपीएससी GS-III के लिए यह दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि का केंद्रीय विषय है।
TFP का अर्थ और परिकलन
सूत्र: उत्पादन वृद्धि = श्रम योगदान + पूँजी योगदान + TFP वृद्धि
यदि GDP 7% बढ़ती है और आदान 4% योगदान देते हैं, तो TFP = 3%। उच्च TFP का अर्थ है कम संसाधनों से अधिक उत्पादन।
भारत के TFP रुझान
कृषि क्षेत्र
- हरित क्रांति (1960-80): मजबूत TFP।
- 1990-2000: सार्वजनिक निवेश घटने और मृदा अवक्रमण से धीमापन।
- 2010 के बाद: बागवानी, पशुधन और डिजिटल कृषि से मध्यम सुधार (~2.5-3% वार्षिक)।
उद्योग और सेवा क्षेत्र
- 1991 के उदारीकरण के बाद विनिर्माण TFP में सुधार।
- IT सेवाओं में उच्च TFP; MSME में अभी भी कम।
TFP का महत्व
- स्थायी विकास — संसाधन दबाव कम।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण — उत्पादन लागत घटती है।
- प्रतिस्पर्धात्मकता — निर्यात में बढ़त।
- जलवायु लक्ष्य — कार्बन तीव्रता कम।
चुनौतियाँ
- कम R&D निवेश — GDP का ~0.7% (चीन ~2.4%, इज़राइल ~5%)।
- कौशल की कमी।
- लॉजिस्टिक्स लागत — GDP का ~13-14%।
- MSME में तकनीक अपनाव धीमा।
नीतिगत उपाय
- NRF (राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन, 2023) — 50,000 करोड़ रुपये।
- PM गति शक्ति — लॉजिस्टिक्स लागत 2030 तक GDP के 8% तक।
- NEP 2020, कौशल भारत — मानव पूँजी विकास।
- डिजिटल कृषि मिशन (2024) — AgriStack।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- GS-III: आर्थिक वृद्धि, कृषि, उद्योग।
- प्रारंभिक: TFP = सोलो अवशेष।
- मुख्य: “भारत में TFP की भूमिका और चुनौतियाँ।”
TFP भारत के दीर्घकालिक विकास की कुंजी है। R&D, शिक्षा, अवसंरचना और डिजिटलीकरण में निवेश से TFP बढ़ेगी और भारत विकसित राष्ट्र 2047 के लक्ष्य की ओर अग्रसर होगा।