भारत विश्व के सर्वाधिक आपदा-प्रवण देशों में से एक है। चक्रवात, बाढ़, भूकंप, सूखा और भूस्खलन — इन प्राकृतिक आपदाओं के साथ औद्योगिक और मानव-निर्मित आपदाएँ भी देश की चुनौतियाँ हैं। 2004 की सुनामी के बाद भारत ने आपदा प्रबंधन को एक व्यवस्थित राष्ट्रीय ढाँचे में रखा।
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
2004 की सुनामी के बाद 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम बना। इसने त्रिस्तरीय संस्थागत ढाँचा स्थापित किया।
संस्थागत ढाँचा
NDMA — राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में NDMA नीति-निर्माण, समन्वय और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया का नेतृत्व करता है। यह राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP) तैयार करता है।
SDMA — राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में। राज्य स्तर पर नीति और समन्वय।
DDMA — जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
जिलाधिकारी की अध्यक्षता में। ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वयन।
NDRF — राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल
12 बटालियन — खोज, बचाव और राहत के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित। वायु, जल और भूकंप सभी आपदाओं में तैनाती।
आपदा प्रतिक्रिया चक्र
- न्यूनीकरण (Mitigation): आपदा की संभावना और प्रभाव कम करना
- तैयारी (Preparedness): पूर्व चेतावनी, प्रशिक्षण, संसाधन
- प्रतिक्रिया (Response): तत्काल राहत और बचाव
- पुनर्निर्माण (Recovery): दीर्घकालिक पुनर्वास
वित्त व्यवस्था
NDRF (National Disaster Response Fund): केंद्रीय निधि — बड़ी आपदाओं के लिए। SDRF (State Disaster Response Fund): राज्य स्तर — केंद्र और राज्य दोनों का योगदान (3:1)।
प्रमुख पहलें
- CDRI (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure): 2019 में भारत की पहल, G20 समर्थित
- सेंदाई फ्रेमवर्क 2015-2030: आपदा जोखिम न्यूनीकरण का वैश्विक ढाँचा
- Aapda Mitra योजना: समुदाय आधारित आपदा स्वयंसेवक
चुनौतियाँ
- शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन से आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति
- अंतिम-मील (Last-mile) कनेक्टिविटी की कमी
- आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे में निवेश की कमी
यूपीएससी की दृष्टि से
आपदा प्रबंधन GS-III का एक प्रमुख अध्याय है। DM Act 2005, NDMA, NDRF, सेंदाई फ्रेमवर्क, CDRI — इन सबको एक समग्र चित्र में समझें।