UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारत में आरक्षण: वे छह बहसें जो अदालतें आज तक तय नहीं कर पाईं

रोहिणी आयोग के आँकड़े बताते हैं कि असली होड़ आरक्षित श्रेणियों के भीतर है। दबदबे वाली जातियों की माँग, उप-वर्गीकरण और 50 प्रतिशत सीमा की उलझन को समझिए।

Students at work in an Indian classroom

2,633 समुदायों में से सिर्फ़ दस ने केंद्र की कुल OBC नौकरियों और दाखिलों का करीब एक-चौथाई ले लिया। नौ सौ तिरासी को कुछ भी नहीं मिला। रोहिणी आयोग का यह निष्कर्ष, जो 2023 में सौंपा गया, भारत में आरक्षण की बहसों के लगभग हर तर्क का ढाँचा बदल देता है, क्योंकि यह दिखाता है कि सबसे तीखी होड़ आरक्षित और अनारक्षित समूहों के बीच नहीं, बल्कि आरक्षित श्रेणियों के भीतर है।

छह बहसें एक साथ चल रही हैं, और वे अलग-अलग दिशाओं में खींचती हैं।

बहस 1: दबदबे वाली जातियों का आरक्षण

जाट, पाटीदार, मराठा और कापू ऐतिहासिक रूप से ज़मीन के मालिक समुदाय हैं, जो अब कोटा माँग रहे हैं।

माँग क्यों उठती है।

  • कृषि संकट। खेती से घटती आमदनी और ज़मीन के टुकड़े होते जाने से इन समुदायों के युवा सरकारी नौकरी की तरफ़ धकेले जा रहे हैं।
  • रोज़गार रहित विकास का विरोधाभास। उदारीकरण ने आकांक्षाएँ बढ़ाईं, सरकारी नौकरियाँ नहीं। जिस क्षेत्र पर ये समूह बिना आरक्षण के भी हावी थे, वह 1991 से सिकुड़ रहा है, और इसी से बची हुई आरक्षित सीटों के लिए छीना-झपटी शुरू हुई।
  • पहचान का बदलता रूप। जातीय पहचान उसी के मुताबिक ढल जाती है जिसे राज्य मान्यता देता है। जैसे ही आरक्षण मान्यता का सबसे बड़ा ज़रिया बना, पिछड़ेपन का दावा करना राजनीतिक रूप से समझदारी बन गया।
  • तुलनात्मक वंचना। समुदाय भले पूरा पिछड़ा न हो, उसके भीतर बड़ी गरीबी मौजूद है।

इस पर विवाद क्यों है।

शोध बताते हैं कि मराठों में गरीबी का स्तर ब्राह्मणों जैसा ही है, पाटीदारों में गरीबी OBC से कम है, और जाटों के पास ज़मीन होने की संभावना ब्राह्मणों समेत दूसरे सामाजिक समूहों से 30 से 77 प्रतिशत अंक तक ज़्यादा है।

आँकड़ों से परे भी बात है। जिन समुदायों के पास ज़मीन, स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक ताकत रही हो, उन्हें आरक्षण देना पुनर्वितरण के पूरे तर्क को उलट देता है। महाराष्ट्र का मराठा आरक्षण सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इसलिए रद्द किया कि उसने बिना असाधारण परिस्थितियों के इंद्रा साहनी की सीमा तोड़ी, और इसका सिलसिला साफ़ दिखता है: मराठा और पाटीदार आंदोलनों के बाद राजस्थान में गुर्जर आंदोलन और आंध्र प्रदेश में कापू आंदोलन खड़े हुए।

बहस 2: OBC और SC के भीतर उप-वर्गीकरण

पक्ष में। रोहिणी आयोग के आँकड़े ही तर्क हैं। छोटे, संख्या में कमज़ोर और भौगोलिक रूप से बिखरे अति पिछड़ा वर्ग समुदाय हर बार बड़े और राजनीतिक रूप से संगठित समूहों से पिछड़ जाते हैं। अनुसूचित जातियों के भीतर पंजाब के वाल्मीकि और मज़हबी सिख आज भी चमार और रविदासिया समुदायों की तुलना में बहुत कम प्रतिनिधित्व पाते हैं।

दविंदर सिंह (2024) में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की 1975 की उस अधिसूचना को सही ठहराया जो इन दोनों समूहों को प्राथमिकता देती है, और कहा कि अनुच्छेद 14 एक जैसा बर्ताव नहीं माँगता, और अनुसूचित जातियों के भीतर असमान स्थिति वाले समूहों के साथ एक जैसा बर्ताव खुद समानता से इनकार है।

विपक्ष में। उप-वर्गीकरण दलित और आदिवासी समुदायों के बीच और दरारें डालता है, और वंचितों की एकजुटता में बाधा बनता है, क्योंकि उप-श्रेणियाँ राज्य से मिलकर ज़्यादा माँगने के बजाय आपस में लड़ने लगती हैं। और अनुसूचित जातियों पर क्रीमी लेयर लागू करना जातिगत भेदभाव को समझने में चूक है: आर्थिक तरक्की उस जमे हुए सामाजिक पूर्वाग्रह को नहीं मिटाती जो अनुसूचित जाति की पहचान से जुड़ा है।

दोनों तर्क मज़बूत हैं। यही वजह है कि यह बहस आज तक तय नहीं हो पाई।

नीचे दबा हुआ असली सवाल

ये सारे विवाद घूम-फिरकर एक ही अनुत्तरित सवाल पर आ जाते हैं: आरक्षण किसकी भरपाई है, जाति आधारित सामाजिक भेदभाव की या आर्थिक वंचना की?

अगर जवाब सामाजिक भेदभाव है, तो कृषि संकट चाहे जितना गहरा हो, दबदबे वाली जातियों के दावे टिकते नहीं, और अनुसूचित जातियों पर क्रीमी लेयर वैचारिक रूप से बेमेल है। अगर जवाब आर्थिक वंचना है, तो इन जातियों के दावों में दम है, और आय के आधार पर बाहर रखने का नियम सब पर लागू होगा।

भारतीय कानून ने यह कभी तय नहीं किया। अलग-अलग फैसले अलग-अलग जवाब मान लेते हैं, इसीलिए एक ही संवैधानिक प्रावधान से बार-बार उलटे नतीजे निकलते हैं, और हर नया आयोग वही ज़मीन दोबारा खोद देता है जिसे पिछला बंद कर चुका लगता था।

ढाँचागत अड़चन

इंद्रा साहनी वाली 50 प्रतिशत की सीमा ही वह जगह है जहाँ छहों बहसें आपस में टकराती हैं। लगभग हर नई माँग या तो इस सीमा को तोड़ने की माँग करती है या किसी मौजूदा लाभार्थी को हटाने की। इससे यह सवाल कि मदद किसे मिलनी चाहिए, बदलकर एक शून्य-योग होड़ बन जाता है, और ऐसी होड़ में इनाम वंचना के सबूत को नहीं, राजनीतिक गोलबंदी को मिलता है।

एक आपूर्ति की समस्या भी है जिसे कोटा बढ़ाकर इस बहस में कोई ठीक नहीं कर सकता। सरकारी क्षेत्र में रोज़गार तीन दशक से घट रहा है। छोटे होते तालाब में बड़ा हिस्सा वह नहीं देता जिसकी उम्मीद दावेदार करते हैं, यानी इनाम सिकुड़ता रहेगा और माँग की तीव्रता फिर भी बढ़ती जाएगी।

आगे का रास्ता

  • रोहिणी पर अमल हो। OBC के भीतर उप-वर्गीकरण दर्ज हो चुके कब्ज़े का इलाज है और सबूत के लिहाज़ से यही सबसे मज़बूत सुधार है।
  • जातिवार प्रतिनिधित्व के आँकड़े प्रकाशित हों, सभी सेवाओं और संस्थानों के, क्योंकि यह बहस अभी काफ़ी हद तक आँकड़ों के बिना चल रही है।
  • बुनियादी सिद्धांत तय हो, संविधान पीठ के ज़रिए, न कि हर विवाद को उसके अपने तथ्यों पर अलग-अलग निपटाकर।
  • आर्थिक मदद को जाति आधारित आरक्षण से अलग किया जाए, और समुदाय के भीतर की गरीबी के लिए छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण और ऋण का इस्तेमाल हो, जिसके लिए आरक्षण बना ही नहीं था।
  • अवसरों का दायरा बढ़े। सिकुड़ते सरकारी क्षेत्र को बँटवारे का कोई नियम ठीक नहीं कर सकता; दावेदारों के लिए कोटा के गणित से ज़्यादा मायने निजी क्षेत्र की वृद्धि और अच्छी उच्च शिक्षा रखती है।

सामान्य प्रश्न

जाट, पाटीदार और मराठा जैसी दबदबे वाली जातियाँ आरक्षण क्यों माँग रही हैं?

चार वजहें एक साथ काम करती हैं। कृषि संकट और ज़मीन के टुकड़े होने ने ज़मींदार समुदायों के युवाओं को सरकारी नौकरी की तरफ़ धकेला है। उदारीकरण ने आकांक्षाएँ बढ़ाईं जबकि 1991 के बाद सरकारी नौकरियाँ घटती गईं। जातीय पहचान लचीली है और उसी के मुताबिक ढल जाती है जिसे राज्य मान्यता देता है, इसलिए पिछड़ेपन का दावा राजनीतिक रूप से समझदारी बन गया। और समुदाय भले पूरा पिछड़ा न हो, उसके भीतर बड़ी गरीबी मौजूद है।

इन दावों पर आँकड़े क्या कहते हैं?

शोध बताते हैं कि मराठों में गरीबी का स्तर ब्राह्मणों जैसा ही है, पाटीदारों में गरीबी OBC से कम है, और जाटों के पास ज़मीन होने की संभावना ब्राह्मणों समेत दूसरे सामाजिक समूहों से 30 से 77 प्रतिशत अंक तक ज़्यादा है। समुदाय के स्तर पर सबूत पिछड़ेपन के दावे को काटते हैं, भले व्यक्तिगत तंगी सच्ची हो।

महाराष्ट्र का मराठा आरक्षण क्यों रद्द हुआ?

सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2021 में इस आधार पर रद्द किया कि इसने बिना असाधारण परिस्थितियों के इंद्रा साहनी में तय 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ी। यह एक ढाँचागत अड़चन है: दबदबे वाली जातियों की माँगें आम तौर पर इस सीमा को तोड़े बिना पूरी नहीं हो सकतीं।

रोहिणी आयोग ने क्या पाया?

2017 में बना और 2023 में रिपोर्ट देने वाला यह आयोग पाया कि केंद्र की 2,633 OBC जातियों में से सिर्फ़ 10 समुदायों ने OBC की केंद्रीय नौकरियों और दाखिलों का करीब 24.95 प्रतिशत हिस्सा ले लिया, जबकि 983 समुदायों का प्रतिनिधित्व शून्य रहा। असली वितरण समस्या समूहों के बीच की होड़ नहीं, OBC के भीतर का कब्ज़ा है।

उप-वर्गीकरण क्या है और दविंदर सिंह 2024 में क्या तय हुआ?

उप-वर्गीकरण का मतलब है आरक्षित श्रेणी के भीतर सुरक्षित उप-कोटा बनाना, ताकि सबसे हाशिये वाले समूह बेहतर संगठित समूहों की भीड़ में दब न जाएँ। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दविंदर सिंह मामले में पंजाब की 1975 की उस अधिसूचना को सही ठहराया जो वाल्मीकि और मज़हबी सिखों को प्राथमिकता देती है, और कहा कि अनुसूचित जातियों के भीतर असमान स्थिति वाले समूहों के साथ एक जैसा बर्ताव खुद समानता से इनकार है।

उप-वर्गीकरण पर क्या आपत्तियाँ हैं?

यह कि इससे दलित और आदिवासी एकजुटता बँटती है और उप-श्रेणियाँ राज्य पर मिलकर दबाव डालने के बजाय आपस में लड़ने लगती हैं, और यह कि क्रीमी लेयर की धारणा अनुसूचित जातियों पर लागू करना जातिगत भेदभाव को समझने में चूक है, क्योंकि आर्थिक तरक्की अनुसूचित जाति की पहचान से जुड़े सामाजिक कलंक को नहीं मिटाती।

50 प्रतिशत की सीमा क्या है?

कुल आरक्षण की वह सीमा जो 1992 में इंद्रा साहनी में तय हुई और जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही तोड़ा जा सकता है। इसके बाद के हर आरक्षण विवाद में यही सबसे बड़ी अड़चन रही है, क्योंकि लगभग हर नई माँग या तो इसे पार करने की ज़रूरत रखती है या किसी मौजूदा लाभार्थी समूह को हटाने की।

आरक्षण की बहस अनसुलझी क्यों कही जाती है?

क्योंकि बुनियादी सवाल, कि आरक्षण जाति आधारित सामाजिक भेदभाव को निशाना बनाता है या आर्थिक वंचना को, कभी तय नहीं हुआ। अलग-अलग फैसले और अलग-अलग राजनीतिक माँगें अलग-अलग जवाब मान लेती हैं, इसीलिए एक ही संवैधानिक प्रावधान से बार-बार उलटे नतीजे निकलते रहते हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा किस मामले में तय हुई?
    (a) चंपकम दोराइराजन 1951
    (b) इंद्रा साहनी 1992
    (c) एम. नागराज 2006
    (d) जरनैल सिंह 2018
    उत्तर: (b) इंद्रा साहनी ने 50 प्रतिशत की सीमा तय की, जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही तोड़ा जा सकता है।
  2. रोहिणी आयोग के अनुसार केंद्र की 2,633 OBC जातियों में से कितनी का प्रतिनिधित्व शून्य था?
    (a) 183
    (b) 417
    (c) 983
    (d) 1,540
    उत्तर: (c) 983 समुदायों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, जबकि 10 समुदायों ने OBC नौकरियों और दाखिलों का करीब 24.95 प्रतिशत हिस्सा ले लिया।
  3. दविंदर सिंह (2024) क्यों अहम है?
    (a) सुप्रीम कोर्ट ने पूरा उप-वर्गीकरण रद्द कर दिया
    (b) सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया
    (c) कोर्ट ने क्रीमी लेयर खत्म कर दी
    (d) कोर्ट ने निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू किया
    उत्तर: (b) कोर्ट ने वाल्मीकि और मज़हबी सिखों को प्राथमिकता देने वाली पंजाब की अधिसूचना सही ठहराई और आरक्षित श्रेणी के भीतर सबूत आधारित फ़र्क की इजाज़त दी।
  4. महाराष्ट्र का मराठा आरक्षण 2021 में मुख्य रूप से किस आधार पर रद्द हुआ?
    (a) मराठों को अगड़ा पाया गया
    (b) इसने बिना असाधारण परिस्थितियों के 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ी
    (c) राज्य के पास विधायी क्षमता नहीं थी
    (d) इसने अनुच्छेद 19 का उल्लंघन किया
    उत्तर: (b) असाधारण कारण बताए बिना सीमा तोड़ना ही असली आधार था।
  5. अनुसूचित जातियों पर क्रीमी लेयर लागू करने के विरोध का तर्क किस बात पर टिका है?
    (a) SC में कोई आर्थिक स्तरभेद नहीं है
    (b) आर्थिक तरक्की जातिगत सामाजिक कलंक को नहीं मिटाती
    (c) संविधान किसी भी बहिष्करण से मना करता है
    (d) SC के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं
    उत्तर: (b) आपत्ति यह है कि जातिगत भेदभाव सामाजिक है, विशुद्ध आर्थिक नहीं, इसलिए अकेली आय से वंचना नहीं नापी जा सकती।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. ज़मीन के मालिक दबदबे वाली जातियों की आरक्षण माँग आरक्षण के मूल पुनर्वितरण तर्क को उलट देती है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
  2. रोहिणी आयोग के निष्कर्ष बताते हैं कि आरक्षण में असली वितरण समस्या अब श्रेणी के भीतर का कब्ज़ा है। नीति पर इसके निहितार्थों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  3. उप-वर्गीकरण वास्तविक समानता को आगे बढ़ाता है, पर दलित एकजुटता के बिखरने का खतरा भी पैदा करता है। मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
  4. क्या क्रीमी लेयर का सिद्धांत अनुसूचित जातियों पर लागू होना चाहिए? दोनों पक्षों के तर्कसंगत कारण दीजिए। (150 शब्द)
  5. 50 प्रतिशत की सीमा भारतीय आरक्षण नीति की सबसे बड़ी अड़चन बन चुकी है। इस पर पुनर्विचार होना चाहिए या नहीं, चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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