भ्रष्टाचार भारत के प्रशासन, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक गंभीर चुनौती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) में भारत 180 देशों में 85वें स्थान के आसपास रहता है। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए भारत में कई स्तरों पर उपाय किए गए हैं।
संस्थागत उपाय
लोकपाल और लोकायुक्त
2013 में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पास हुआ। 2019 में पूर्व न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को पहले लोकपाल के रूप में नियुक्त किया गया। यह प्रधानमंत्री सहित सभी लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें सुन सकता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)
CVC एक स्वतंत्र जाँच संस्था है जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें देखती है। यह CBI को भी अनुशंसाएँ दे सकता है।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
CBI भ्रष्टाचार के बड़े मामलों की जाँच करती है। इसे “पिंजरे में बंद तोता” भी कहा गया है क्योंकि यह सरकार के नियंत्रण में रहती है।
कानूनी उपाय
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 — संशोधित 2018 में।
- सूचना का अधिकार (RTI), 2005 — पारदर्शिता का सशक्त हथियार।
- मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA), 2002।
- व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम, 2014।
- बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 — संशोधित 2016।
प्रशासनिक सुधार
- ई-गवर्नेंस — डिजिटल सेवाओं से मानव-संपर्क और भ्रष्टाचार के अवसर कम।
- DBT (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) — लाभार्थियों को सीधे धन, बिचौलियों की समाप्ति।
- GeM पोर्टल — सरकारी खरीद में पारदर्शिता।
- PFMS — सरकारी खर्च की डिजिटल निगरानी।
- नागरिक चार्टर — सेवा मानकों का प्रकटीकरण।
चुनौतियाँ
- राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
- CBI और ED की स्वायत्तता पर प्रश्न।
- RTI में रुकावटें और कार्यकर्ताओं पर हमले।
- निचले स्तर पर छोटे भ्रष्टाचार की निरंतरता।
यूपीएससी प्रासंगिकता
GS IV में “सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी” और GS II में “भ्रष्टाचार-विरोधी संस्थाएँ” पर प्रश्न आते हैं। लोकपाल, RTI, CVC, डिजिटल पारदर्शिता और व्हिसलब्लोअर संरक्षण सभी प्रासंगिक हैं।