भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (Female Labour Force Participation Rate — FLFPR) दशकों से विश्व के निचले स्तरों में रही है। यद्यपि हाल के वर्षों में इसमें उल्लेखनीय सुधार हुआ है, फिर भी लैंगिक समानता, आर्थिक विकास और मानव पूँजी की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न बना हुआ है।
FLFPR के आँकड़े
PLFS (Periodic Labour Force Survey) 2022-23 के अनुसार:
- महिला LFPR (UPSS आधार): लगभग 37% (2022-23) — 2017-18 के 24% से उल्लेखनीय सुधार।
- पुरुष LFPR: लगभग 78%।
- ग्रामीण महिला LFPR > शहरी महिला LFPR।
U-आकार की परिकल्पना
अर्थशास्त्री अक्सर U-आकार परिकल्पना का उल्लेख करते हैं: जैसे-जैसे आय और शिक्षा बढ़ती है, FLFPR पहले घटती है (परिवार की आय बढ़ने पर महिलाएँ घर रहती हैं) और फिर फिर से बढ़ती है (उच्च शिक्षा के साथ उच्च वेतन रोजगार)। भारत अभी U के निचले हिस्से में है।
बाधाएँ
| बाधा | विवरण |
|---|---|
| सामाजिक मानदंड | लिंग भूमिकाएँ, गतिशीलता प्रतिबंध, पर्दा प्रथा |
| देखभाल कार्य | घर और बच्चों की देखभाल — अवैतनिक और महिलाओं पर |
| सुरक्षा चिंता | कार्यस्थल और आवागमन में सुरक्षा |
| कौशल बेमेल | शिक्षा और उद्योग माँग में खाई |
| श्रम बाजार भेदभाव | वेतन अंतर, काँच की छत |
सरकारी पहलें
- महिला शक्ति केंद्र: ग्रामीण महिलाओं को कौशल और सेवाएँ।
- PM उज्ज्वला योजना: LPG से घरेलू वायु प्रदूषण कम — महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार।
- मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम 2017: 26 सप्ताह के भुगतान अवकाश।
- MGNREGA: ग्रामीण महिलाओं को रोजगार का अधिकार।
- SHG-बैंक लिंकेज: स्व-सहायता समूह महिलाओं की उद्यमशीलता को बढ़ावा देते हैं।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS II (महिला सशक्तीकरण, लिंग समानता) और GS III (श्रम बाजार, समावेशी विकास) दोनों में FLFPR प्रासंगिक है। U-आकार परिकल्पना, PLFS डेटा, U-आकार में भारत की स्थिति, और देखभाल अर्थव्यवस्था — ये UPSC में बारम्बार पूछे जाते हैं।