UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारत में नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय: शक्तियाँ, स्वतंत्रता और जवाबदेही की खाई

भारत के नियामक और अर्ध-न्यायिक निकायों की पूरी समझ — नौकरशाही से इनका फ़र्क़, 1991 के बाद की ढाँचागत ज़रूरत, स्वतंत्रता की चार व्यवस्थाएँ, और प्रशासनिक प्रक्रिया का क़ानून न होने से बनी जवाबदेही की खाई।

The glass frontage of a regulatory authority's office

SEBI नियम बनाता है, उल्लंघनों की जाँच करता है और विवादों पर फ़ैसला भी सुनाता है। यही काम TRAI, CCI और IRDAI भी करते हैं। हर एक के पास विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक, तीनों तरह की शक्ति एक ही संस्था में है — ठीक वही जमावड़ा जिसे रोकने के लिए शक्तियों का पृथक्करण बना है। नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय फिर भी सही ठहराए जा सकते हैं, और जो वजह इन्हें सही ठहराती है, वही वजह उस निगरानी की माँग भी करती है जो भारत ने अब तक खड़ी नहीं की।

नियामक बनाम नौकरशाही निकाय

पहलूनौकरशाही निकायनियामक निकाय
स्वरूपसरकार की कार्यपालिका शाखाग़ैर-कार्यपालिका, स्वतंत्र
कामनीति लागू करनानीति का नियमन और साथ में फ़ैसला सुनाना
शक्तियाँसिर्फ़ कार्यपालिका शक्तिअर्ध-विधायी, अर्ध-कार्यपालिका और अर्ध-न्यायिक
रुझानसामान्यज्ञ; नियम और प्रक्रियाविशेषज्ञ; नवाचार और पहल
नियंत्रणसरकार के कड़े नियंत्रण मेंराजनीतिक दख़ल से बचाया हुआ
लक्ष्यव्यवस्था और स्थिरताबदलाव और बाज़ार की कार्यक्षमता

दो तरह के निकाय। वैधानिक नियामक प्राधिकरण संसद बनाती है, ये कार्यपालिका से अलग होते हैं और बनावट से ही स्वतंत्र होते हैं: SEBI, TRAI, RBI, CCI, IRDAI। स्व-नियामक प्राधिकरण अपने ही पेशे का नियमन करते हैं और शिक्षा, लाइसेंस और नैतिक आचरण देखते हैं: भारतीय विधिज्ञ परिषद, ICAI और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग। दूसरे समूह के पास स्वतंत्रता कम है और अपने समुदाय के प्रति जवाबदेही ज़्यादा।

स्वतंत्र नियामक क्यों बनाए जाते हैं

बाज़ार की विफलता।

  • प्राकृतिक एकाधिकार। बिजली, पानी और टेलीकॉम जैसी उपयोगिता सेवाओं में एक ही प्रदाता आर्थिक रूप से कारगर होता है, इसलिए जहाँ प्रतिस्पर्धा नहीं पहुँच सकती वहाँ उपभोक्ता की रक्षा नियामक को करनी होती है।
  • सूचना की विषमता। उपभोक्ता न दवा की सुरक्षा आँक सकता है, न किसी वित्तीय उत्पाद का जोखिम; यह खाई नियामक भरता है।
  • बाह्यताएँ। प्रदूषण और प्रणालीगत वित्तीय जोखिम ऐसी लागतें थोपते हैं जिनकी क़ीमत बाज़ार नहीं लगाता। मानक और जुर्माने उन्हें हिसाब में लाते हैं।

प्रतिस्पर्धा-विरोधी बर्ताव। सीमेंट, टायर और दवा उद्योग में कार्टेल बनाना, और दबदबे का दुरुपयोग — जैसे कोल इंडिया पर लगा भारी जुर्माना और ऑनलाइन सर्च में गूगल की स्थिति पर हुई कार्रवाई।

ढाँचागत वजह, जो असल में सबसे अहम है। 1991 के उदारीकरण के बाद सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ज़रिये एक साथ नीति बनाने वाली भी बन गई और बाज़ार में खिलाड़ी भी। कोई मंत्रालय उस क्षेत्र का भरोसेमंद नियमन नहीं कर सकता जिसमें सरकार ख़ुद प्रतिस्पर्धा कर रही हो। TRAI इसीलिए बना, क्योंकि दूरसंचार विभाग टेलीकॉम सेवा भी दे रहा था और उसका नियमन भी कर रहा था।

स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाती है

  • कार्यकाल की सुरक्षा, यानी तय अवधि और हटाने के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया
  • पारदर्शी नियुक्ति
  • नेकनीयती से की गई नियामक कार्रवाई पर दीवानी दायित्व से छूट
  • वित्तीय स्वतंत्रता, यानी ख़र्च अपने संसाधनों या संचित निधि से पूरा करना, न कि उस सालाना विनियोग से जो कार्यपालिका को दबाव बनाने का मौक़ा देता है

आख़िरी व्यवस्था पर सबसे कम बात होती है, जबकि वह सबसे अहम में से एक है। जिस नियामक का बजट हर साल वही मंत्रालय पास करता हो जिसका वह नियमन करता है, वह क़ानून में चाहे जो लिखा हो, स्वतंत्र नहीं है।

दिक़्क़तें

कोई सर्वव्यापी नियामक क़ानून नहीं है। भारत में अमेरिका के 1946 के प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (Administrative Procedure Act) जैसा कुछ नहीं है। प्रक्रिया, परामर्श, प्रकाशन या अपील के लिए कोई एक जैसा मानक नहीं है, इसलिए हर नियामक अपनी प्रक्रिया ख़ुद गढ़ता है। एक जैसा काम करने वाले नियामकों के बीच यह असमानता नियामक मध्यस्थता (regulatory arbitrage) पैदा करती है।

विशेषज्ञों के पद ख़ाली हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में लगभग 20 प्रतिशत पद ख़ाली हैं, और SEBI, CCI और TRAI, तीनों तकनीकी स्टाफ़ की कमी झेल रहे हैं। नियामक जटिल तकनीकी फ़ैसले ग़ैर-विशेषज्ञ कर्मियों के भरोसे ले रहे हैं।

अधिकार क्षेत्र आपस में टकराते हैं। TRAI और दूरसंचार विभाग, दोनों टेलीकॉम का नियमन करते हैं, जिससे देरी और रस्साकशी होती है। यूनिट-लिंक्ड बीमा योजनाओं पर SEBI और IRDA का अधिकार क्षेत्र विवाद में रहा, और तब तक निवेशकों का पैसा अधर में लटका रहा। NSEL संकट ने SEBI, वायदा बाज़ार आयोग और उपभोक्ता मामलों की निगरानी के बीच की खाई उजागर कर दी।

क़ानून पुराने पड़ चुके हैं। 1997 का TRAI अधिनियम स्मार्टफ़ोन, ओवर-द-टॉप सेवाओं और AI से पहले का है। 1992 का SEBI अधिनियम एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग और क्रिप्टो संपत्तियों से पहले का है। नियामक 2026 के बाज़ारों को 1990 के दशक के अधिकार-पत्र से चला रहे हैं।

जाँच सिर्फ़ संकट के समय। विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ नियामकों को तब देखती हैं जब कुछ गड़बड़ हो जाए — जैसे 2024 के हिंडनबर्ग आरोपों के बाद SEBI, या स्पेक्ट्रम विवादों के बाद TRAI। नियमित समीक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है।

नियामक अभिग्रहण (regulatory capture)। यानी यह ख़तरा कि नियामक जनता के बजाय उद्योग की सेवा करने लगे। अगस्त 2024 का SEBI विवाद भारत में इस चिंता के उठने का सबसे चर्चित हालिया उदाहरण है।

भीतर छिपा तनाव

स्वतंत्रता और जवाबदेही एक-दूसरे को उलटी दिशा में खींचती हैं, और इस बात से आँख चुराने पर सुधार के प्रस्ताव ख़राब बनते हैं।

जो नियामक मंत्री के दबाव को झेलने लायक़ बचाया गया है, वही संसद की सुधारात्मक पकड़ से भी बचा हुआ है। स्वतंत्रता की चारों व्यवस्थाएँ — कार्यकाल की सुरक्षा, दायित्व से छूट, अपनी फ़ंडिंग और नियुक्ति में बचाव — हर एक उस रास्ते को थोड़ा और सँकरा करती है जिससे नियामक को जवाबदेह ठहराया जा सकता था।

इसका हल स्वतंत्रता घटाना नहीं है। हल है प्रक्रियागत जवाबदेही: नियामक को इससे बाँधिए कि वह फ़ैसला कैसे करेगा, इससे नहीं कि वह क्या फ़ैसला करेगा। प्रशासनिक प्रक्रिया क़ानून ठीक यही देता है, और भारत में ठीक यही नहीं है।

आगे का रास्ता

  • एक प्रशासनिक प्रक्रिया क़ानून बनाइए, जो सभी नियामकों के लिए परामर्श, तर्कयुक्त आदेश, प्रकाशन और अपील के एक जैसे मानक तय करे।
  • नियमित संसदीय समीक्षा शुरू कीजिए, जिसमें हर नियामक किसी घोटाले के बाद नहीं, बल्कि हर साल अपनी स्थायी समिति के सामने आए।
  • वैधानिक अधिकार-पत्र अद्यतन कीजिए, क्योंकि नियामक आज के बाज़ार उन क़ानूनों से नहीं चला सकते जो इन तकनीकों के आने से पहले लिखे गए थे।
  • तकनीकी पद भरिए, क्योंकि इस काम को मंत्रालय से बाहर निकालने का पूरा औचित्य ही विशेषज्ञता है।
  • अधिकार क्षेत्र के टकराव क़ानून से सुलझाइए, ताकि सीमा-विवाद संकट के दौरान नहीं, उससे पहले तय हो जाएँ।

सामान्य प्रश्न

नियामक निकाय नौकरशाही निकायों से किस तरह अलग हैं?

नौकरशाही निकाय सरकार की कार्यपालिका शाखा है, जो सरकार के कड़े नियंत्रण में नीति लागू करता है, जिसका स्टाफ़ सामान्यज्ञ होता है और जिसका रुझान व्यवस्था और स्थिरता की तरफ़ रहता है। नियामक निकाय ग़ैर-कार्यपालिका और स्वतंत्र होता है, नियमन के साथ फ़ैसला सुनाने का काम भी करता है, इसके पास अर्ध-विधायी, अर्ध-कार्यपालिका और अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ होती हैं, इसमें विशेषज्ञ काम करते हैं और इसका रुझान बाज़ार की कार्यक्षमता की तरफ़ होता है।

नियामक निकाय कितने तरह के होते हैं?

दो तरह के। वैधानिक नियामक प्राधिकरण, जिन्हें संसद क़ानून बनाकर खड़ा करती है और जो कार्यपालिका से अलग होते हैं — जैसे SEBI, TRAI, RBI, CCI और IRDAI — और इनके पास तीनों तरह की शक्ति होती है। और स्व-नियामक प्राधिकरण, जो अलग-अलग क़ानूनों के तहत अपने ही पेशे का नियमन करते हैं — जैसे भारतीय विधिज्ञ परिषद, ICAI और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग — जिनके पास स्वतंत्रता कम और अपने समुदाय के प्रति जवाबदेही ज़्यादा होती है।

बाज़ार की कौन-सी विफलताएँ स्वतंत्र नियामकों को सही ठहराती हैं?

प्राकृतिक एकाधिकार, जहाँ आर्थिक रूप से एक ही प्रदाता कारगर होता है और प्रतिस्पर्धा के बिना उपभोक्ता को सुरक्षा चाहिए। सूचना की विषमता, जहाँ उपभोक्ता न दवा की सुरक्षा आँक सकता है, न किसी वित्तीय उत्पाद का जोखिम। और बाह्यताएँ, जैसे प्रदूषण और प्रणालीगत वित्तीय जोखिम, जहाँ निजी पक्ष ऐसी लागतें थोपते हैं जिनकी क़ीमत बाज़ार नहीं लगाता।

भारत में स्वतंत्र नियामकों के पीछे ढाँचागत वजह क्या है?

1991 के उदारीकरण के बाद सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ज़रिये एक साथ नीति बनाने वाली भी बन गई और बाज़ार में भागीदार भी। कोई मंत्रालय उस क्षेत्र का भरोसेमंद नियमन नहीं कर सकता जिसमें सरकार ख़ुद प्रतिस्पर्धी हो। TRAI ठीक इसीलिए बना, क्योंकि दूरसंचार विभाग टेलीकॉम सेवाएँ भी दे रहा था और उनका नियमन भी कर रहा था।

नियामक की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाती है?

चार व्यवस्थाओं से: तय अवधि और निर्धारित प्रक्रिया से ही हटाए जाने वाली कार्यकाल की सुरक्षा; पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया; नेकनीयती से की गई नियामक कार्रवाई पर दीवानी दायित्व से छूट; और वित्तीय स्वतंत्रता, जिसमें ख़र्च नियामक के अपने संसाधनों या संचित निधि से पूरा होता है, न कि उस सालाना विनियोग से जो कार्यपालिका को दबाव का मौक़ा देता है।

प्रशासनिक असंगति की समस्या क्या है?

भारत में अमेरिका के 1946 के प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम जैसा कोई क़ानून नहीं है। नियामक प्रक्रिया, परामर्श, प्रकाशन या अपील के लिए कोई एक जैसा मानक नहीं है, इसलिए हर नियामक अपनी प्रक्रिया ख़ुद गढ़ता है। एक जैसा काम करने वाले नियामकों के बीच इससे पैदा होने वाली असमानता नियामक मध्यस्थता को जन्म देती है।

नियामक अभिग्रहण क्या है?

यह वह स्थिति है जिसमें नियामक जनहित के बजाय उसी उद्योग के हित साधने लगता है जिसका वह नियमन करता है। अगस्त 2024 का SEBI विवाद, जिसमें इसकी अध्यक्ष की अघोषित विदेशी हिस्सेदारी को लेकर आरोप लगे, भारत में इस चिंता के उठने का सबसे चर्चित हालिया उदाहरण है।

नियामकों पर संसदीय निगरानी को कमज़ोर क्यों कहा जाता है?

क्योंकि विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ नियामकों को मुख्यतः तभी देखती हैं जब कोई संकट खड़ा हो जाए — जैसे हिंडनबर्ग आरोपों के बाद SEBI या स्पेक्ट्रम विवादों के बाद TRAI। नियमित समीक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए जाँच लगातार चलने के बजाय छिटपुट और प्रतिक्रियात्मक रहती है।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. इनमें से कौन-सी शक्ति वैधानिक नियामक के पास होती है, पर सामान्य नौकरशाही निकाय के पास नहीं?
    (a) कार्यपालिका शक्ति
    (b) अर्ध-न्यायिक शक्ति
    (c) बजट ख़र्च करने की शक्ति
    (d) कर्मचारी भर्ती करने की शक्ति
    उत्तर: (b) वैधानिक नियामकों में अर्ध-विधायी, अर्ध-कार्यपालिका और अर्ध-न्यायिक, तीनों शक्तियाँ मिलती हैं; नौकरशाही निकायों के पास सिर्फ़ कार्यपालिका शक्ति होती है।
  2. TRAI मुख्य रूप से इसलिए बनाया गया क्योंकि
    (a) टेलीकॉम में ऊँचे टैरिफ़ की ज़रूरत थी
    (b) दूरसंचार विभाग टेलीकॉम सेवा भी दे रहा था और उसका नियमन भी कर रहा था
    (c) संविधान के तहत संसद के लिए यह अनिवार्य था
    (d) विदेशी निवेशकों ने इसकी माँग की थी
    उत्तर: (b) जिस बाज़ार में सरकारी निकाय ख़ुद प्रतिस्पर्धा कर रहा हो, उसी का नियमन करने से पैदा हुए ढाँचागत हितों के टकराव ने एक स्वतंत्र नियामक ज़रूरी बना दिया।
  3. अमेरिका का वह क़ानून, जिसके जैसा भारत में कुछ नहीं है
    (a) शेरमन एंटीट्रस्ट अधिनियम
    (b) प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम 1946
    (c) डोड-फ़्रैंक अधिनियम
    (d) सर्बेन्स-ऑक्सले अधिनियम
    उत्तर: (b) एक जैसे प्रशासनिक प्रक्रिया क़ानून के अभाव में भारत का हर नियामक अपनी प्रक्रिया ख़ुद तय करता है।
  4. SEBI और IRDA के बीच अधिकार क्षेत्र का विवाद किससे जुड़ा था?
    (a) म्यूचुअल फ़ंड
    (b) यूनिट-लिंक्ड बीमा योजनाएँ
    (c) कमोडिटी डेरिवेटिव
    (d) कॉरपोरेट बॉन्ड
    उत्तर: (b) ULIP प्रतिभूति और बीमा नियमन की सीमा-रेखा पर बैठे थे, और विवाद के दौरान निवेशकों का पैसा अधर में लटका रहा।
  5. किसी नियामक की वित्तीय स्वतंत्रता किससे सुनिश्चित होती है?
    (a) सालाना संसदीय विनियोग
    (b) अपने संसाधनों या संचित निधि से ख़र्च पूरा करना
    (c) मंत्रालय के नियंत्रण वाली बजट व्यवस्था
    (d) सिर्फ़ उद्योग से मिलने वाला अंशदान
    उत्तर: (b) सालाना विनियोग कार्यपालिका को दबाव का मौक़ा देता है; स्वतंत्र फ़ंडिंग वह मौक़ा ख़त्म कर देती है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. स्वतंत्र नियामक विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक शक्ति एक ही निकाय में जोड़ देते हैं। जवाबदेही पर इसके असर की जाँच कीजिए। (250 शब्द)
  2. 1991 के बाद के उदारीकरण ने स्वतंत्र नियमन को ढाँचागत रूप से ज़रूरी बना दिया। चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  3. भारत को नियामकों के लिए एक सर्वव्यापी प्रशासनिक प्रक्रिया क़ानून चाहिए। आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
  4. नियामकों के बीच अधिकार क्षेत्र का टकराव नागरिकों और बाज़ारों पर लागत डालता है। उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
  5. नियामकों पर संसदीय निगरानी छिटपुट और संकट-प्रेरित है। सुधार सुझाइए। (150 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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