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भारतीय संविधान पर लगे आरोप, और उनके जवाब

संविधान पर उधार लिए होने और 1935 के अधिनियम की नकल होने के दो आरोप लगते रहे हैं। जानिए आंबेडकर का जवाब और मेहता, खोसला और भार्गव के तर्क।

An open volume of constitutional law on a desk

संविधान सभा के समय से ही भारतीय संविधान पर दो आरोप चिपके हुए हैं: एक, कि यह उधार लिया हुआ, नकलची पैबंद है, और दूसरा, कि यह भारत सरकार अधिनियम, 1935 की हूबहू नकल है। दोनों आरोप गंभीर लोगों ने लगाए, सभा के भीतर भी और बाहर भी। भारतीय संविधान पर लगे आरोपों को समझना इसलिए जरूरी है कि इनके जवाब ही बताते हैं कि यह दस्तावेज असल में किस काम के लिए बना था।

आंबेडकर ने दोनों का जवाब दिया, और एक इंच भी पीछे हटे बिना दिया। इसके बाद के संवैधानिक अध्ययन ने इस बचाव को और मजबूत ही किया है।

आरोप 1: उधार लिया हुआ, नकलची, पैबंद

यह आरोप संविधान सभा के भीतर ही लगा था। लोकनाथ मिश्र ने मसौदे को पश्चिम की गुलामाना नकल कहा। के. हनुमंतैया ने कहा कि भारत को वीणा का संगीत चाहिए था, पर जो निकला वह अंग्रेजी बैंड का संगीत है।

आंबेडकर का जवाब

उनका जवाब सफाई देने वाला नहीं, ढांचागत था। उन्होंने कहा कि कोई पूछ सकता है कि विश्व इतिहास के इस मोड़ पर बनने वाले संविधान में नया हो भी क्या सकता है। पहले लिखित संविधान को बने सौ साल से ज्यादा बीत चुके थे। संविधान का दायरा क्या होना चाहिए, यह बहुत पहले तय हो चुका था। इन तथ्यों को देखते हुए सभी संविधान अपने मुख्य प्रावधानों में एक जैसे ही दिखेंगे। इतनी देर से बने संविधान में सचमुच नया सिर्फ वही होगा जो ज्ञात खामियों को दूर करने और देश की जरूरतों के मुताबिक ढालने के लिए बदला गया हो।

उनकी नजर में आंख मूंदकर नकल करने का आरोप दस्तावेज को ठीक से न पढ़ने से पैदा हुआ था।

यह तर्क पहली नजर में जितना दिखता है, उससे कहीं मजबूत है। यह मौलिकता को प्रावधानों से हटाकर उन बदलावों में ले जाता है जो देश के हिसाब से किए गए, और संविधान बनाने का असली हुनर वहीं बसता है।

विद्वानों के जवाब

प्रताप भानु मेहता दो अलग बातें कहते हैं। पहली, भारतीय संविधान संवैधानिकता का एक अनोखा प्रयोग है: जिन देशों में क्रांतियों ने संविधान पैदा किए, उनसे उलट भारत में संविधान खुद क्रांति पैदा करने की कोशिश करता है। जैसे दूसरी क्रांतियों का पारंपरिक समाज से कोई सीधा रिश्ता नहीं था, वैसे ही भारतीय संविधान का भी पारंपरिक भारतीय समाज से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। दूसरी, यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सार्वभौमिक मूल्यों के प्रति निष्ठा के कारण एक विश्वनागरिक संविधान (cosmopolitan constitution) है। सार्वभौमिक मूल्य अपनाना नकल नहीं, आकांक्षा है। मानवीय गरिमा पर किसी देश का पेटेंट नहीं है।

माधव खोसला अपनी किताब India’s Founding Moment में तर्क देते हैं कि आजाद होने का मतलब किसी खास परंपरा या किसी तय राजनीतिक अनुबंध से बंध जाना नहीं था। भारत का राष्ट्रवादी आंदोलन इस बात को लेकर साफ तौर पर सजग था कि संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठना है, और भारत ने सोच-समझकर उत्तर-राष्ट्रवादी संवैधानिक बुनियाद चुनी।

राजीव भार्गव सबसे तीखा तथ्यात्मक जवाब देते हैं। वे कहते हैं कि यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी कि ऐसे समय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया गया जब भारत की पारंपरिक ऊंच-नीच को आम तौर पर अटल माना जाता था, और जब कुछ पश्चिमी लोकतंत्रों में मताधिकार पर रोक अब भी लगी हुई थी। 1950 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देना अपने आप में गहरे अर्थों में नकल-विरोधी कदम था। वे यह भी कहते हैं कि भारत में राष्ट्र का विचार राज्य से पहले आया, जबकि यूरोप में राज्य का बनना राष्ट्रीय पहचान से पहले हुआ, और संविधान की बनावट इसी देसी राजनीतिक राह को दिखाती है।

स्वतंत्रता आंदोलन का विश्वनागरिक राष्ट्रवाद तस्वीर पूरी करता है। गांधी, नेहरू, आंबेडकर और टैगोर, सबने अंतरराष्ट्रीय विचार परंपराओं से लिया और उन्हें भारतीय हालात के साथ जोड़ा। संविधान उसी मेल को दिखाता है, किसी समर्पण को नहीं।

आरोप 2: भारत सरकार अधिनियम, 1935 की हूबहू नकल

यह आरोप एन. श्रीनिवासन ने लगाया, सर आइवर जेनिंग्स ने लगाया, और संविधान सभा में पी.आर. देशमुख ने, जिन्होंने कहा कि यह तो भारत सरकार अधिनियम ही है जिसमें बस वयस्क मताधिकार जोड़ दिया गया है।

आंबेडकर का जवाब दो टूक था और उसका सार याद रखने लायक है: इस आरोप पर कि मसौदा संविधान भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अच्छे-खासे हिस्से को दोहराता है, उन्होंने कोई माफी नहीं मांगी। उधार लेने में शर्म की कोई बात नहीं है। इसमें साहित्यिक चोरी जैसा कुछ नहीं है।

इस बचाव के तीन और हिस्से हैं।

निरंतरता सोची-समझी थी, आलस नहीं। 1935 का प्रशासनिक ढांचा वही मशीन थी जिस पर नए राज्य को पहले ही दिन से चलना था। 1947 में, बंटवारे और रियासतों के विलय के बीच, एक चलती हुई मशीन को फेंक देना मौलिकता नहीं, लापरवाही होती।

जो जोड़ा गया, वह सब कुछ बदल देने वाला था। अदालत से लागू कराए जा सकने वाले मौलिक अधिकार, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, अस्पृश्यता का अंत, और गणतांत्रिक राष्ट्राध्यक्ष, ये किसी औपनिवेशिक कानून में लगे मामूली संशोधन नहीं हैं। ये उसका मकसद ही उलट देते हैं। 1935 का अधिनियम औपनिवेशिक प्रशासन को व्यवस्थित करता था; संविधान ने एक संप्रभु जनता को गढ़ा।

देशमुख का वाक्य खुद ही हार मान लेता है। यह कहना कि इसमें 1935 के अधिनियम के साथ “बस” वयस्क मताधिकार जोड़ा गया है, बीसवीं सदी के सबसे बड़े लोकतांत्रिक फैसले को पादटिप्पणी बना देता है।

गहरा जवाब

सबसे काम का नजरिया यह है। प्रावधान उधार लेना और मकसद उधार लेना, दोनों एक बात नहीं हैं।

भारत ने ब्रिटेन से संसदीय शासन लिया, कनाडा से संघीय ढांचा, अमेरिका से मौलिक अधिकार, आयरलैंड से नीति निदेशक तत्व और जर्मनी से आपातकालीन प्रावधान। फिर उसने इस जुटाई हुई मशीन को ऐसे मकसद के लिए चलाया जो किसी भी स्रोत संविधान ने आजमाया ही नहीं था: एक गरीब, बड़े पैमाने पर निरक्षर और बेहद विविध समाज में, पहले ही दिन से सार्वभौमिक मताधिकार के साथ, संवैधानिक कानून के जरिए जड़ जमाई सामाजिक ऊंच-नीच को तोड़ना।

इससे पहले किसी संविधान से यह काम मांगा ही नहीं गया था। प्रावधान जाने-पहचाने हो सकते हैं। परियोजना नहीं थी।

इसे उत्तर में कैसे इस्तेमाल करें

  • आरोप और उसे लगाने वालों के नाम ठीक-ठीक लिखें, क्योंकि सभा के आलोचक खुद राष्ट्रवादी थे, विरोधी नहीं।
  • दोनों आरोपों पर आंबेडकर का जवाब दें, क्योंकि पूरा बचाव उसी पर टिका है।
  • ऊपर से विद्वानों की परतें चढ़ाएं: विश्वनागरिकता और क्रांति पर मेहता, उत्तर-राष्ट्रवाद पर खोसला, मताधिकार और राष्ट्र-राज्य के क्रम पर भार्गव।
  • अंत मूल स्रोत पर नहीं, मकसद पर करें, क्योंकि तर्क सबसे मजबूत वहीं है।

संविधान की मौलिकता उसके अनुच्छेदों के नएपन में मिलनी थी ही नहीं। वह इसमें मिलती है कि संस्थाओं के उन्हीं पुराने औजारों से क्या हासिल करने को कहा गया।

सामान्य प्रश्न

उधार लिए हुए संविधान का आरोप क्या है?

यह वह आलोचना है जो संविधान सभा में लोकनाथ मिश्र जैसे सदस्यों ने की, जिन्होंने इसे पश्चिम की गुलामाना नकल कहा, और के. हनुमंतैया ने, जिन्होंने इसे अंग्रेजी बैंड का संगीत बताया। आरोप यह था कि संविधान ने भारतीय परंपराओं से लेने के बजाय दूसरे देशों के प्रावधान भर उतार लिए।

आंबेडकर ने उधार लेने के आरोप का क्या जवाब दिया?

उन्होंने पूछा कि संवैधानिक इतिहास में इतनी देर से बने संविधान में नया क्या हो सकता है। पहले लिखित संविधान को बने सौ साल से ज्यादा बीत चुके थे, संविधान का दायरा बहुत पहले तय हो चुका था, इसलिए सभी संविधान अपने मुख्य प्रावधानों में एक जैसे ही दिखेंगे। सचमुच नया सिर्फ वही होगा जो ज्ञात खामियों को दूर करने और देश की जरूरतों के मुताबिक ढालने के लिए बदला गया हो।

1935 के अधिनियम की हूबहू नकल वाला आरोप क्या है?

यह आलोचना एन. श्रीनिवासन, सर आइवर जेनिंग्स और पी.आर. देशमुख समेत कई लोगों ने की कि संविधान ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 का बड़ा हिस्सा दोहरा दिया और उसमें वयस्क मताधिकार से ज्यादा कुछ जोड़ा नहीं। आंबेडकर का जवाब सीधा था: उन्होंने कोई माफी नहीं मांगी, क्योंकि उधार लेना साहित्यिक चोरी नहीं है।

प्रताप भानु मेहता ने संविधान के बारे में क्या तर्क दिया?

दो बातें। एक, भारतीय संविधान एक अनोखा प्रयोग है, क्योंकि जिन देशों में क्रांतियों ने संविधान पैदा किए उनसे उलट भारत में संविधान खुद क्रांति पैदा करने की कोशिश करता है। दो, यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के प्रति निष्ठा के कारण एक विश्वनागरिक संविधान है, यानी सार्वभौमिक मूल्य अपनाना नकल नहीं बल्कि आकांक्षा है, क्योंकि मानवीय गरिमा पर किसी देश का पेटेंट नहीं है।

India’s Founding Moment में माधव खोसला का तर्क क्या है?

यह कि आजाद होने का मतलब किसी खास परंपरा या किसी तय राजनीतिक अनुबंध से बंध जाना नहीं था। भारत का राष्ट्रवादी आंदोलन इस बात को लेकर सजग था कि संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठना है, और भारत ने सोच-समझकर उत्तर-राष्ट्रवादी संवैधानिक बुनियाद चुनी।

राजीव भार्गव इन आरोपों का जवाब कैसे देते हैं?

वे 1950 में अपनाए गए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की ओर इशारा करते हैं, उस समय जब कुछ पश्चिमी लोकतंत्रों में मताधिकार पर रोक थी और भारत की पारंपरिक ऊंच-नीच को जड़ जमाई हुई माना जाता था। इसे अपनाना गहरे अर्थों में नकल-विरोधी कदम था। वे यह भी कहते हैं कि भारत में राष्ट्र का विचार राज्य से पहले आया, जबकि यूरोप में राज्य का बनना राष्ट्रीय पहचान से पहले हुआ।

इस बहस में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इतना अहम क्यों है?

क्योंकि नकल के आरोप के खिलाफ यही सबसे साफ सबूत है। भारत ने आजादी मिलते ही, एक बड़े पैमाने पर गरीब और निरक्षर आबादी को, उस समय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार दिया जब पुराने लोकतंत्र लंबी रोक के बाद धीरे-धीरे ही उस मुकाम तक पहुंचे थे। इस पैमाने पर यह काम पहले किसी देश ने नहीं किया था।

इस बचाव का सबसे मजबूत रूप क्या है?

यह कि प्रावधान उधार लेना और मकसद उधार लेना दो अलग बातें हैं। भारत ने संस्थाओं के ढांचे दूसरी जगहों से लिए और उन्हें ऐसे मकसद पर लगाया जो किसी और संविधान ने आजमाया ही नहीं था: संवैधानिक कानून का इस्तेमाल राज्य की सत्ता को व्यवस्थित करने भर के लिए नहीं, बल्कि जड़ जमाई सामाजिक ऊंच-नीच को तोड़ने के लिए करना।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. मसौदा संविधान को अंग्रेजी बैंड का संगीत किसने कहा था?
    (a) लोकनाथ मिश्र
    (b) के. हनुमंतैया
    (c) पी.आर. देशमुख
    (d) एन. श्रीनिवासन
    उत्तर: (b) के. हनुमंतैया ने संविधान सभा में यह वाक्य कहा था; लोकनाथ मिश्र ने इसे पश्चिम की गुलामाना नकल कहा था।
  2. भारत सरकार अधिनियम, 1935 को दोहराने के आरोप पर आंबेडकर का जवाब क्या था?
    (a) आरोप तथ्यात्मक रूप से गलत है
    (b) उधार लेने में शर्म की कोई बात नहीं और इसमें साहित्यिक चोरी जैसा कुछ नहीं
    (c) 1935 का अधिनियम रद्द किया जा चुका था
    (d) प्रावधानों का मिलना महज संयोग था
    उत्तर: (b) उन्होंने कोई माफी नहीं मांगी और साफ कहा कि उधार लेना साहित्यिक चोरी नहीं है।
  3. भारतीय संविधान को विश्वनागरिक संविधान किस विद्वान ने कहा?
    (a) ग्रैनविल ऑस्टिन
    (b) प्रताप भानु मेहता
    (c) माधव खोसला
    (d) उपेंद्र बख्शी
    उत्तर: (b) मेहता ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सार्वभौमिक मूल्यों के प्रति इसकी निष्ठा को नकल नहीं, विश्वनागरिकता कहा।
  4. राजीव भार्गव के अनुसार भारत में क्या हुआ?
    (a) यूरोप की तरह राज्य राष्ट्र से पहले आया
    (b) राष्ट्र का विचार राज्य से पहले आया
    (c) 1947 से पहले न राष्ट्र था न राज्य
    (d) राष्ट्र और राज्य दोनों 1950 में एक साथ बने
    उत्तर: (b) वे भारत की तुलना यूरोप से करते हैं, जहां राज्य का बनना राष्ट्रीय पहचान से पहले हुआ, जबकि भारत में राष्ट्रीय पहचान पहले आई।
  5. इस बहस में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का जिक्र क्यों होता है?
    (a) यह ब्रिटेन से लिया गया था
    (b) इसे 1950 के बाद धीरे-धीरे अपनाया गया
    (c) इसे आजादी के साथ ही अपनाया गया, जब कई पश्चिमी लोकतंत्रों में मताधिकार पर रोक थी
    (d) इसकी सिफारिश भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने की थी
    उत्तर: (c) उस पैमाने पर इसे तुरंत अपनाने की कोई मिसाल नहीं थी, और यही नकल के आरोप के खिलाफ सबसे मजबूत सबूत है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय संविधान पर उधार लिया हुआ और नकलची होने के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों और इनके जवाबों की जांच कीजिए। (250 शब्द)
  2. आंबेडकर ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 से उधार लेने पर कोई माफी नहीं मांगी। उनके बचाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
  3. 1950 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार गहरे अर्थों में नकल-विरोधी कदम था। चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
  4. भारतीय संविधान किसी सामाजिक क्रांति को महज दर्ज करने के बजाय उसे पैदा करना चाहता है। इस कथन की जांच कीजिए। (250 शब्द)
  5. इस मत पर चर्चा कीजिए कि भारतीय संविधान नकलची नहीं, विश्वनागरिक है। (150 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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