सर्वोच्च न्यायालय में चार सीटें बढ़ें और एक ही महीने पांच न्यायाधीश आएं तो नियुक्ति तंत्र चलता दिखता है। मई-जून 2026 में यही हुआ। 16 मई के अध्यादेश ने स्वीकृत क्षमता 34 से 38 की। 27 मई को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कॉलेजियम ने पांच नाम सुझाए; राष्ट्रपति ने 1 जून को सभी नियुक्तियां मंजूर कीं और 2 जून से उन्होंने पद ग्रहण किया। फिर भी 40 वर्ष पुराना प्रश्न जस का तस है: भारत के न्यायाधीश कौन चुने और चयन कितना खुला हो? यह प्रश्न 1993 में कॉलेजियम बनने और 2015 में NJAC गिरने के बाद भी जीवित है।
तनाव यही है। सरकार के विरुद्ध फैसला देने वाले न्यायाधीश को सरकार से स्वतंत्र होना चाहिए। लेकिन बंद कमरे में न्यायाधीश ही न्यायाधीश चुनें और कारण न बताएं तो एक अनिर्वाचित समूह के निजी रूप से खुद को दोहराने का आरोप उठता है। स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों संवैधानिक मूल्य हैं। कठिनाई दोनों एक साथ देने की है, किसी एक को छोड़ने की नहीं।
मुद्दा क्या है
बहस यह नहीं कि न्यायाधीश स्वतंत्र हों या नहीं; सभी सहमत हैं। बहस नियुक्ति-विधि पर है, क्योंकि वहीं स्वतंत्रता और जवाबदेही टकराते हैं।
कॉलेजियम (collegium) सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों से बनी व्यवस्था है जिसमें वरिष्ठतम न्यायाधीश उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति चुनते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश और अगले चार वरिष्ठतम न्यायाधीश होते हैं। “कॉलेजियम” शब्द संविधान में नहीं है। 214वीं विधि आयोग रिपोर्ट 2008 ने भी कहा कि यह लिखित प्रावधान नहीं, न्यायिक व्याख्या से निकला शब्द है।
कॉलेजियम नाम सुझाता है; सरकार प्रक्रिया चलाकर नियुक्ति अधिसूचित करती है। इस आवाजाही की नियम-पुस्तिका प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) है। 1998 वाला प्रक्रिया ज्ञापन अभी नियुक्तियों में उपयोग होता है, लेकिन 2015 के बाद सुझाया संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन एक दशक बाद भी अंतिम रूप नहीं पा सका। इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां पुरानी नियम-पुस्तिका पर चलती हैं और सुधार वाली नई पुस्तक पर दोनों शाखाएं सहमत नहीं हैं।
दो विचार केंद्र में हैं। न्यायिक स्वतंत्रता (judicial independence) का अर्थ कार्यपालिका के भय के बिना फैसला और यह संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है। दूसरा है राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC), जिसे संसद ने 2014 में न्यायाधीशों, कानून मंत्री और बाहरी सदस्यों वाली मिश्रित संस्था के रूप में बनाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में इसे निरस्त कर दिया।
सरकार से सीट पाने वाला न्यायाधीश समस्या हो सकता है। अपने बाहर किसी को जवाब न देने वाला चयन समूह भी समस्या हो सकता है। संतुलित विधि को दोनों खतरे टालने होंगे।
आंकड़े क्या बताते हैं
नियुक्ति तंत्र केवल सिद्धांत में विवादित नहीं, व्यवहार में धीमा है। इसका सबसे साफ माप उच्च न्यायालयों में दिखता है। न्याय विभाग की 1 जून 2026 की आधिकारिक स्थिति में 1,122 स्वीकृत पदों के मुकाबले 789 न्यायाधीश कार्यरत और 333 पद खाली थे। यानी लगभग 29.7%, करीब दस में तीन सीटों पर न्यायाधीश नहीं था।
रिक्तियों के नीचे की प्रक्रिया भी देखें। 6 मार्च 2026 के संसदीय उत्तर में 312 रिक्तियों में 132 प्रस्ताव सरकार और सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम के बीच अलग चरणों में थे, जबकि 180 पर संबंधित उच्च न्यायालय कॉलेजियम से कोई सिफारिश नहीं आई थी। अलग तारीखों के कारण 312 और 333 को न मिलाएं। संकेत यह है कि देरी केवल सरकार में नहीं; बहुत-सी खाली सीटों पर नाम न्यायपालिका से शुरू ही नहीं हुआ था।
यह एक वर्ष की चूक नहीं। 1 अप्रैल 2024 को 25 उच्च न्यायालयों में केवल 3 पूरी क्षमता पर थे और उच्च न्यायालयों में 60 लाख से अधिक मामले लंबित थे। तारीख बदलती है, पर लंबे समय से बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने का ढाँचा कायम है।
सर्वोच्च न्यायालय की क्षमता 2019 से 34 थी। 16 मई 2026 के सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश ने इसे 38 किया। कारणों में 30 अप्रैल 2026 को 92,823 लंबित मामले और संविधान पीठों की जरूरत थी। 27 मई की कॉलेजियम सिफारिश में चार उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता वी. मोहना थीं। राष्ट्रपति ने 1 जून को पांचों की नियुक्ति मंजूर की; न्यायमूर्ति वी. मोहना के आधिकारिक परिचय के अनुसार उन्होंने 2 जून को पद ग्रहण किया।
इससे शीर्ष अदालत में गति आई, पर डेटा जो नहीं दिखाता वह भी महत्त्वपूर्ण है। संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन अंतिम नहीं हुआ, स्थायी सार्वजनिक चयन कसौटियां नहीं बनीं और 1 जून को उच्च न्यायालयों में 333 रिक्तियां थीं। शीर्ष पर क्षमता जोड़ना जरूरी है, पर नीचे की नियुक्ति बीमारी का पूरा इलाज नहीं।


कॉलेजियम के पक्ष में तर्क
कॉलेजियम का पक्ष आलोचकों की बात से अधिक मजबूत है। एक संतुलित उत्तर पहले उसका इतिहास और सबसे अच्छा तर्क रखता है।
कॉलेजियम अचानक नहीं बना। प्रथम न्यायाधीश मामला, एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ, 1981 में सात-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि “परामर्श सहमति नहीं” और राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह से बंधे नहीं; झुकाव कार्यपालिका की ओर गया। द्वितीय न्यायाधीश मामला, सर्वोच्च न्यायालय अधिवक्ता-अभिलेख संघ बनाम भारत संघ, 1993 में नौ-न्यायाधीश पीठ ने 1981 उलटकर मुख्य न्यायाधीश की राय को प्रधानता दी और कॉलेजियम बनाया। तृतीय न्यायाधीश मामला, विशेष संदर्भ 1, 1998 ने इसे मुख्य न्यायाधीश + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश किया। यह कार्यपालिका प्रभाव के विरुद्ध जान-बूझकर किया सुधार था।
स्वतंत्रता इसका केंद्र है और न्यायालय इसे मूल ढाँचे का हिस्सा मानता है। यदि सरकार अपने ही मामलों पर फैसला देने वाले न्यायाधीश चुने तो आज्ञाकारी को पुरस्कार और मुखर को नुकसान देने का खतरा रचना में आता है। न्यायपालिका को अंतिम प्रधानता उस कड़ी को तोड़ने के लिए है।
सरकार देश की सबसे बड़ी वादी है। इसलिए नियुक्ति में कार्यपालिका को नियंत्रक आवाज देने से सहयोगी न्यायासन चुनने का जोखिम बढ़ता है। NJAC निरस्त करते समय न्यायालय ने यही चिंता उठाई। समर्थक कार्यपालिका प्रधानता को बीमारी मानते हैं, उपचार नहीं।
संरचनात्मक रोक भी है। सरकार लौटाए नाम को कॉलेजियम दोबारा दोहराए तो सरकार उससे बंधी मानी जाती है। यह राजनीतिक “जेब वीटो” के विरुद्ध सुरक्षा है, जिसमें सरकार नाम को चुपचाप रोक दे। कॉलेजियम प्रस्तावों को देर से या टुकड़ों में मंजूर करने पर सार्वजनिक प्रतिरोध भी कर चुका है।
इतिहास की स्मृति वास्तविक है। एस.पी. गुप्ता वाले कार्यपालिका प्रधान काल में वरिष्ठता तोड़कर नियुक्तियां और दंडात्मक तबादले हुए। इसलिए कॉलेजियम समर्थक आरामदायक परंपरा नहीं, संघर्ष से मिली सीमा बचाने का दावा करते हैं।
कॉलेजियम के विरुद्ध तर्क
स्वतंत्रता का तर्क यह नहीं मिटाता कि बंद चयन जनता के प्रति असफल हो सकता है और न्यायासन खाली छोड़ सकता है। दोनों मोर्चों पर कॉलेजियम में गंभीर कमियां हैं।
सबसे तीखी आलोचना भीतर से आई। 2015 के NJAC फैसले में न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने असहमति में कॉलेजियम को “जनता और इतिहास, दोनों के लिए पूरी तरह अपारदर्शी और पहुंच से बाहर” कहा। 3 अक्टूबर 2017 को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कॉलेजियम ने कारण सहित प्रस्ताव वेबसाइट पर डालने का निर्णय किया, लेकिन दो वर्ष में कई दस्तावेज केवल नामों की सूची बन गए। पारदर्शिता का वादा पूरा स्थायी नहीं हुआ।
संरचनात्मक आपत्ति है कि न्यायाधीश ही न्यायाधीश चुनते हैं और बाहर का कोई सदस्य कमरे में नहीं। 214वीं विधि आयोग रिपोर्ट 2008 ने बाहरी जांच न होने की आलोचना की। न्यायिक प्रधानता मानते हुए भी लोकतंत्र में पूरी तरह आंतरिक प्रक्रिया की जवाबदेही कठिन है।
भाई-भतीजावाद का आरोप सावधानी से लिखें। आलोचक कानूनी परिवारों के बंद समूह और “अंकल जज” प्रवृत्ति की बात करते हैं; न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने भी व्यवस्था को भाई-भतीजावाद का दूसरा नाम कहा बताया गया। लेकिन “आधे उच्च न्यायालय न्यायाधीश वरिष्ठ न्यायपालिका के रिश्तेदार” वाली लोकप्रिय संख्या अधिवक्ता एम.जे. नेदुमपरा के कथन से आती है, आधिकारिक लेखा-परीक्षा से नहीं। इसे आरोप की तरह लिखें, सिद्ध तथ्य की तरह नहीं।
नियुक्ति देरी सामान्य वादी को सीधे चोट पहुंचाती है। 1 जून 2026 को 333 उच्च न्यायालय पद खाली थे; मार्च 2026 में 180 रिक्तियों पर नाम ही नहीं आया था। कुछ देरी सरकार द्वारा साफ नाम रोकने से, कुछ उच्च न्यायालय कॉलेजियम के समय पर प्रस्ताव न देने से। लागत उस नागरिक को मिलती है जो सुनवाई के लिए वर्षों प्रतीक्षा करता है।
निश्चित सार्वजनिक कसौटियां भी नहीं हैं। स्थायी नियुक्ति सचिवालय नहीं, योग्यता, वरिष्ठता और विविधता के प्रकाशित भार नहीं। इसलिए अच्छा चयन भी मनमाना दिख सकता है, क्योंकि जनता कारण नहीं देखती।
सरकार की देरी भी बराबर नाम लेती है। संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम न करना, नाम चुनकर मंजूर या लौटाना, 2017 से लंबित सौरभ कृपाल प्रस्ताव और सोमशेखर सुंदरेशन तथा आर. जॉन सत्यन नाम लौटाना, कार्यपालिका द्वारा 2015 के बाद भी प्रक्रिया से न्यायासन को आकार देने की आलोचना पैदा करते हैं। अपारदर्शिता केवल न्यायपालिका की और देरी केवल सरकार की समस्या नहीं; दोनों हिस्सा डालते हैं।

गहरी संवैधानिक तस्वीर
ताजा खबर से पीछे हटें तो असली प्रश्न “कॉलेजियम बनाम NJAC” से बड़ा है: कार्यपालिका से स्वतंत्र और जनता के प्रति जवाबदेह नियुक्ति एक साथ कैसे बने? संविधान प्रश्न रखता है, पूरा उत्तर नहीं। NJAC इस टकराव की सबसे साफ परीक्षा था।
2014 में संसद का उत्तर NJAC था। 99वें संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम ने अनुच्छेद 124A, 124B और 124C जोड़कर छह-सदस्यीय आयोग बनाया: मुख्य न्यायाधीश अध्यक्ष, दो वरिष्ठतम सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो “प्रतिष्ठित व्यक्ति”। प्रतिष्ठित व्यक्तियों का चुनाव मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता वाली समिति करती। कोई भी दो सदस्य नाम रोक सकते थे। कागज पर इससे बाहर के लोग और निर्वाचित कार्यपालिका कमरे में आए।
न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया। चतुर्थ न्यायाधीश मामला, सर्वोच्च न्यायालय अधिवक्ता-अभिलेख संघ बनाम भारत संघ, 16 अक्टूबर 2015 में पांच-न्यायाधीश संविधान पीठ ने 4:1 से संशोधन और कानून निरस्त किए। बहुमत ने न्यायिक स्वतंत्रता और मूल ढाँचा उल्लंघन माना। न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर ने दो-सदस्यीय वीटो को अत्यंत आपत्तिजनक कहा; सरकार सबसे बड़ी वादी होने के कारण कानून मंत्री की मौजूदगी और अस्पष्ट “प्रतिष्ठित व्यक्ति” श्रेणी पर आपत्ति की। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर असहमत थे।
2015 की सीमा यह है: न्यायपालिका की अपनी नियुक्तियों में प्रधानता हटाने वाला मॉडल मूल ढाँचा चुनौती में टिकेगा नहीं। लेकिन न्यायालय ने यह नहीं कहा कि कॉलेजियम ही एकमात्र संभव तरीका है; उसने न्यायिक प्रधानता बचाई। पारदर्शिता और बाहरी सूचना जोड़ते हुए भी न्यायपालिका को नियंत्रक आवाज देने वाला नया आयोग सिद्धांततः सीमा के भीतर हो सकता है।
अनसुलझा प्रश्न प्रक्रिया ज्ञापन में है। NJAC गिरने के बाद दिसंबर 2015 में न्यायालय ने सरकार और मुख्य न्यायाधीश से संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन अंतिम करने को कहा। जुलाई 2026 में सरकार ने संसद को बताया कि नियुक्तियां 1998 के प्रक्रिया ज्ञापन के अनुसार होती हैं; संशोधित पाठ पर सहमति नहीं हुई। विवाद का एक केंद्र “राष्ट्रीय सुरक्षा” आधार पर नाम रोकने की खुली सरकारी शक्ति है। इसलिए व्यवस्था पुरानी नियम-पुस्तिका से चलती है और नई सुधार-पुस्तिका अधूरी है।
भविष्य के प्रशासक को एक बात और परेशान करनी चाहिए। रिक्तियां केवल डिजाइन की बहस से नहीं, मौजूदा डिजाइन के भीतर दोनों शाखाओं की देरी से बनती हैं। सबसे अच्छा निकाय भी सीटें खाली छोड़ेगा यदि लोग समय पर काम न करें। विधि महत्त्वपूर्ण है; अनुशासन उतना ही।
क्या किया जाना चाहिए
व्यावहारिक समझौता अस्पष्ट “सहयोग” से नहीं, 2015 की संवैधानिक सीमा के भीतर ठोस कदमों से बनेगा। ये सार्वजनिक बहस के विकल्प हैं, अंतिम फैसला नहीं।
- संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन अंतिम करें। “राष्ट्रीय सुरक्षा” धारा को संकीर्ण, कारणयुक्त और न्यायिक समीक्षा योग्य बनाएं, खुला कार्यपालिका वीटो नहीं। दोनों शाखाओं की हस्ताक्षरित नियम-पुस्तिका देरी का बड़ा स्रोत हटाएगी।
- स्थायी नियुक्ति सचिवालय बनाएं। पेशेवर संस्था उम्मीदवार डेटा, समयसीमा और पृष्ठभूमि जांच संभाले। हर कॉलेजियम को लगभग शून्य से शुरू न करना पड़े और संस्थागत स्मृति बने।
- चयन कसौटियां और कारण प्रकाशित हों। योग्यता, वरिष्ठता, क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता का वजन साफ हो; हर सिफारिश का कारण रिकॉर्ड पर आए। 2017 के सुधार की भावना स्थायी हो।
- दोनों पक्षों पर बाध्यकारी समयसीमा हो। उच्च न्यायालय कॉलेजियम रिक्ति से छह महीने पहले नाम भेजे और सरकार तय समय में कार्रवाई करे; देरी पर लिखित कारण जरूरी हो।
- नई सर्वोच्च न्यायालय क्षमता बकाया घटाने में लगे। 38 स्वीकृत सीटों का उपयोग नियमित संविधान पीठ और निपटान में हो। क्षमता तभी उपयोगी है जब बैठती और सुनती है। इसका संबंध व्यापक न्यायिक लंबितता और सुधार से है।
- आयोग लौटे तो न्यायिक प्रधानता रहे। बाहरी सूचना और पारदर्शिता जोड़ी जा सकती है, पर गैर-न्यायिक सदस्य न्यायपालिका की नियंत्रक आवाज पलट सकें तो मॉडल 2015 के मूल ढाँचा परीक्षण में विफल होगा।
इन सुधारों में स्वतंत्रता और जवाबदेही में किसी एक का चुनाव नहीं करना पड़ता। अंतिम निर्णय न्यायपालिका के पास रहते हुए तय समय, प्रकाशित कसौटी और रिकॉर्ड पर कारण वाला चयन स्वतंत्र भी है और जवाबदेह भी। NJAC प्रकरण जिस समझौते की ओर इशारा कर गया, वह अब तक पूरा नहीं हुआ।
मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए
यह GS2 का महत्त्वपूर्ण विषय है। न्यायपालिका की संरचना, संवैधानिक पदों पर नियुक्ति, शक्तियों का पृथक्करण और मूल ढाँचा सिद्धांत एक ही ढाँचे में आते हैं; मई-जून 2026 घटनाएं ताजा तारीख देती हैं।
GS पत्र संबंध: GS2 में कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन तथा कामकाज; संवैधानिक पदों पर नियुक्ति; शक्तियों का पृथक्करण; अन्य देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं से तुलना।
संभावित प्रश्न:
- NJAC निरस्त होने से यह तय हुआ कि न्यायाधीश नियुक्ति में प्रधानता किसकी रहेगी, पर यह नहीं कि चयन कितना पारदर्शी हो। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों संवैधानिक मूल्य हैं। चतुर्थ न्यायाधीश मामला 2015 और अधूरे संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
- कॉलेजियम न्यायाधीश-निर्मित व्यवस्था है जिसे न्यायालय के भीतर से अपारदर्शी कहा गया। मूल ढाँचा बचाते हुए सुधार की जरूरत का मूल्यांकन कीजिए।
उद्धृत करने योग्य तथ्य और मामले:
- एस.पी. गुप्ता, 1981: “परामर्श सहमति नहीं”; कार्यपालिका प्रधानता, बाद में उलटी।
- द्वितीय न्यायाधीश मामला, 1993: मुख्य न्यायाधीश की राय प्रधान; मुख्य न्यायाधीश + 2 कॉलेजियम बना।
- तृतीय न्यायाधीश मामला, 1998: कॉलेजियम मुख्य न्यायाधीश + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश हुआ।
- चतुर्थ न्यायाधीश मामला, 16 अक्टूबर 2015: 99वां संशोधन और NJAC अधिनियम 4:1 से निरस्त; न्यायिक स्वतंत्रता और मूल ढाँचा।
- न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की 2015 असहमति: कॉलेजियम जनता और इतिहास के लिए पूरी तरह अपारदर्शी और पहुंच से बाहर।
- 1 जून 2026: उच्च न्यायालयों में 1,122 स्वीकृत के मुकाबले 333 खाली; मार्च 2026 में 180 रिक्तियों पर सिफारिश नहीं।
- 1 अप्रैल 2024 को 25 में केवल 3 उच्च न्यायालय पूरी क्षमता पर।
- 16 मई 2026 के अध्यादेश से सर्वोच्च न्यायालय क्षमता 34 से 38; 1 जून को पांच नियुक्तियां मंजूर और 2 जून से पद ग्रहण।
मुख्य शब्द: कॉलेजियम, प्रक्रिया ज्ञापन, न्यायिक स्वतंत्रता, मूल ढाँचा, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक प्रधानता, कार्यपालिका अतिक्रमण, NJAC, प्रतिष्ठित व्यक्ति, पुनरावृत्ति।
पाठ्यक्रम संबंध: न्यायपालिका, संवैधानिक नियुक्तियां, शक्तियों का पृथक्करण, मूल ढाँचा, अनिर्वाचित संस्थाओं की जवाबदेही, ब्रिटेन के न्यायिक नियुक्ति आयोग और अमेरिका की सीनेट पुष्टि से तुलना।
संतुलित निष्कर्ष: चुनाव स्वतंत्र न्यायपालिका और जवाबदेह न्यायपालिका में कभी नहीं था; चुनाव कारण छिपाने और कारण स्वीकारने वाली प्रक्रिया में है। दोनों शाखाएं अपने बीच की खाली जगह को ढाल बनाना छोड़ें तो न्यायिक प्रधानता और पारदर्शिता साथ हो सकती हैं।
उत्तर कैसे बनाएं
परिभाषा से नहीं, तनाव से शुरू करें। पहली पंक्ति दिखाए कि स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों संवैधानिक मूल्य हैं जिन्हें नियुक्ति-विधि टकराव में लाती है। कॉलेजियम की छोटी परिभाषा दूसरी पंक्ति में दें।
चार मामलों को रीढ़ बनाएं, पर छोटा रखें। 1981 से 2015 तक हर मामले पर एक साफ पंक्ति सिद्धांत की पूरी यात्रा दिखाती है और विश्लेषण के लिए जगह बचाती है। “एस.पी. गुप्ता से चतुर्थ न्यायाधीश मामला” लिखते ही नक्शा स्पष्ट होता है।
दोनों पक्ष का सबसे मजबूत रूप दें। पहले स्वतंत्रता: सरकार सबसे बड़ी वादी और मूल ढाँचा। फिर जवाबदेही: अपारदर्शिता, बाहरी जांच नहीं और 333 रिक्तियां। केवल एक पक्ष रखने वाला उत्तर विश्लेषण नहीं, वकालत लगता है।
आगे का रास्ता समूह में रखें: संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन, सचिवालय, प्रकाशित कसौटियां, बाध्य समयसीमा, नई क्षमता का उपयोग और किसी नए मॉडल में न्यायिक प्रधानता। विषय के अपने शब्द इस्तेमाल करें।
आम गलतियां
- बहस को केवल कॉलेजियम बनाम NJAC न बनाएं। गहरा प्रश्न स्वतंत्रता और जवाबदेही साथ देने का है।
- भाई-भतीजावाद की संख्या को तथ्य न कहें। “आधे न्यायाधीश रिश्तेदार” आरोप है, आधिकारिक लेखा-परीक्षा नहीं।
- देरी का दोष केवल सरकार पर न डालें। मार्च 2026 में 180 रिक्तियों पर उच्च न्यायालय कॉलेजियम से नाम नहीं आया था।
- मूल ढाँचा तोड़ने वाला सुधार न सुझाएं। न्यायिक प्रधानता खत्म करने वाला आयोग 2015 परीक्षण में विफल होगा।
- नारे पर अंत न करें। संवैधानिक सिद्धांत या लागू करने योग्य उपाय पर निष्कर्ष दें।
उत्तर की छोटी रीढ़
- भूमिका: स्वतंत्रता-जवाबदेही तनाव; अगली पंक्ति में कॉलेजियम और प्रक्रिया ज्ञापन।
- विकास: तीन न्यायाधीश मामलों पर एक-एक पंक्ति, फिर NJAC और 2015 का चतुर्थ मामला।
- तर्क: कॉलेजियम पक्ष में स्वतंत्रता, मूल ढाँचा, सरकार सबसे बड़ी वादी; विरुद्ध अपारदर्शिता, बाहरी जांच नहीं, देरी और रिक्तियां।
- संरचनात्मक पहचान: 2015 न्यायिक प्रधानता बचाता है, कॉलेजियम को अकेला मॉडल नहीं; संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन में प्रश्न जीवित है।
- आगे का रास्ता: पांच-छह समूहबद्ध सुधार, हर एक का जिम्मेदार और मूल ढाँचा सीमा स्पष्ट।
- निष्कर्ष: संतुलित निष्कर्ष को प्रश्न के शब्दों के अनुसार ढालें।
आरेख या प्रवाह-चित्र
15 अंकों में साफ क्षैतिज यात्रा बनाएं: 1981 कार्यपालिका प्रधानता → 1993 कॉलेजियम → 1998 मुख्य न्यायाधीश + 4 → 2014 NJAC → 2015 निरस्त → संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन अभी अधूरा। पांच सेकंड में पूरा सिद्धांत पढ़ा जाएगा।
10 अंकों में दो-स्तंभी तालिका बेहतर है: “कॉलेजियम, लागू” बनाम “NJAC, 2015 में निरस्त”। निर्णयकर्ता, कार्यपालिका की भूमिका, बाहरी सदस्य और मुख्य आलोचना की तुलना करें।
नीतिशास्त्र और शासन
GS2 में एक प्रशासनिक नैतिकता पंक्ति जोड़ें। टकराते मूल्य स्वतंत्रता और जवाबदेही हैं; जब दस में करीब तीन उच्च न्यायालय सीटें खाली हों तो सुनवाई के लिए वर्षों प्रतीक्षा करता नागरिक दोनों की असफलता की कीमत देता है। उस वादी का नाम लें।
मूल्य को रचना में बदलें। केवल “पारदर्शी नियुक्ति” न कहें; कारणयुक्त प्रस्ताव प्रकाशित करना, देरी पर लिखित कारण सहित समयसीमा और स्थायी सचिवालय बताएं। यही नैतिक भावना से प्रशासनिक परिपक्वता की चाल है।
आंकड़े यांत्रिक लगे बिना
तीन आंकड़े पर्याप्त हैं: 1 जून 2026 को 1,122 में 333 रिक्त; 2024 में 25 में केवल 3 उच्च न्यायालय पूरी क्षमता पर; मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय क्षमता 34 से 38। एक संरचनात्मक, एक गंभीरता और एक ताजा घटना का आंकड़ा।
संख्या अकेली न छोड़ें। उसके बाद “इसका अर्थ” लिखें। रिक्ति ही मुद्दा नहीं; वह लंबितता और आम वादी की प्रतीक्षा में क्या करती है, वही अंक दिलाता है।
एक बार में पढ़ने की कसौटी लगाएं: छोटी भूमिका, चार मामलों की संक्षिप्त यात्रा, दोनों पक्ष साफ और सुधार समूह में। UPSC में स्पष्टता गहराई को दिखाई देने का तरीका है।
सामान्य प्रश्न
कॉलेजियम व्यवस्था आसान भाषा में क्या है?
यह सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों से बनी व्यवस्था है जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश उच्च न्यायपालिका के लिए नाम चुनते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश और अगले चार वरिष्ठतम न्यायाधीश; उच्च न्यायालय में उस न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम, फिर सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की प्रक्रिया। “कॉलेजियम” शब्द संविधान में नहीं।
2015 में NJAC क्यों निरस्त हुआ?
चतुर्थ न्यायाधीश मामले में पांच-न्यायाधीश पीठ ने 99वां संशोधन और NJAC अधिनियम 4:1 से निरस्त किए। बहुमत ने न्यायिक स्वतंत्रता और मूल ढाँचा उल्लंघन माना। सरकार सबसे बड़ी वादी होने पर कानून मंत्री की मौजूदगी, अस्पष्ट प्रतिष्ठित व्यक्ति और दो-सदस्यीय वीटो से न्यायिक प्रधानता पलटने पर आपत्ति थी।
प्रक्रिया ज्ञापन क्या है और क्यों महत्त्वपूर्ण है?
प्रक्रिया ज्ञापन नियुक्ति की सहमत नियम-पुस्तिका है: नाम कौन शुरू करता, सलाह किससे और समयसीमा क्या। 1998 वाला प्रक्रिया ज्ञापन इस्तेमाल होता है। NJAC गिरने के बाद मांगा संशोधित प्रक्रिया ज्ञापन एक दशक बाद भी अंतिम नहीं; राष्ट्रीय सुरक्षा धारा पर असहमति देरी और घर्षण का स्रोत है।
न्यायिक रिक्तियों की समस्या कितनी बड़ी है?
1 जून 2026 को 1,122 उच्च न्यायालय पदों में 333 खाली, यानी लगभग 29.7% थे। मार्च 2026 के संसदीय उत्तर में 180 रिक्तियों पर उच्च न्यायालय कॉलेजियम से सिफारिश नहीं आई थी। सर्वोच्च न्यायालय की क्षमता मई 2026 में 34 से 38 हुई और 1 जून को पांच नियुक्तियां मंजूर हुईं, पर गहरी कमी उच्च न्यायालयों में है।