इंटरनेट तीन स्तरों में विभाजित है — सरफेस वेब (Surface Web), डीप वेब (Deep Web) और डार्क वेब (Dark Web)। डार्क वेब इंटरनेट का वह भाग है जो सामान्य ब्राउज़रों से दिखाई नहीं देता और जिस तक पहुँचने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर — जैसे Tor (The Onion Router) — की आवश्यकता होती है।
इंटरनेट की तीन परतें
| परत | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| सरफेस वेब | गूगल जैसे सर्च इंजन से दिखने वाला | Wikipedia, Google, समाचार |
| डीप वेब | सर्च इंजन से छुपा, पर सामान्यतः वैध | बैंक खाते, ईमेल, मेडिकल रिकॉर्ड |
| डार्क वेब | एन्क्रिप्टेड, Tor से पहुँच | अवैध बाज़ार, ड्रग्स, हथियार |
Tor नेटवर्क
Tor (The Onion Router) एक एन्क्रिप्टेड नेटवर्क है जो उपयोगकर्ता की पहचान छुपाता है। डेटा कई ‘प्याज की परतों’ की तरह एन्क्रिप्ट होकर विभिन्न सर्वरों से गुज़रता है। मूलतः US Navy ने गोपनीय संचार के लिए विकसित किया था।
डार्क वेब के खतरे
- साइबर अपराध: क्रेडिट कार्ड डेटा, व्यक्तिगत जानकारी की बिक्री।
- ड्रग्स और हथियार: अवैध बाज़ार (जैसे Silk Road)।
- Ransomware: साइबर हमलों का आयोजन।
- आतंकवाद: संचार और भर्ती।
- बाल शोषण सामग्री।
- मनी लॉन्ड्रिंग: क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से।
वैध उपयोग
- पत्रकारिता — सत्तावादी देशों में गोपनीय स्रोत।
- व्हिसिलब्लोअर — गुमनाम रूप से जानकारी साझा करना।
- राजनीतिक असंतुष्ट।
भारत में साइबर सुरक्षा और डार्क वेब
- CERT-In (Computer Emergency Response Team India): साइबर खतरों पर निगरानी।
- IT Act 2000 और IT Amendment Act 2008: साइबर अपराध का दंड।
- राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2013।
- I4C (Indian Cybercrime Coordination Centre)।
चुनौतियाँ
- गुमनामी के कारण अपराधियों की पहचान कठिन।
- क्रिप्टोकरेंसी से लेनदेन ट्रैक करना मुश्किल।
- न्यायिक अधिकार क्षेत्र — अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक।
यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु
- सरफेस → डीप → डार्क वेब: तीन परतें।
- Tor: प्याज राउटिंग एन्क्रिप्शन।
- खतरे: ड्रग्स, साइबर अपराध, आतंकवाद।
- भारत: CERT-In, IT Act, I4C।
- क्रिप्टोकरेंसी और मनी लॉन्ड्रिंग।
सामान्य प्रश्न
डार्क वेब क्या है?
डार्क वेब इंटरनेट का वह भाग है जो सामान्य ब्राउज़रों से दिखाई नहीं देता और जिस तक Tor जैसे विशेष सॉफ्टवेयर से पहुँचा जाता है।
Tor नेटवर्क क्या है?
Tor (The Onion Router) एक एन्क्रिप्टेड नेटवर्क है जो डेटा को कई परतों में एन्क्रिप्ट करके उपयोगकर्ता की पहचान छुपाता है। इसे मूलतः US Navy ने विकसित किया था।