ग़ुलाम वंश, जिसे मामलूक वंश भी कहते हैं, 1206 से 1290 तक दिल्ली सल्तनत पर राज करता रहा। दिल्ली सल्तनत को मिलाकर बनाने वाले पाँच वंशों में यह पहला है; बाक़ी चार हैं खिलजी, तुग़लक़, सैयद और लोदी। इसे ग़ुलाम वंश इसलिए कहा जाता है कि इसके तीन सबसे अहम शासक — क़ुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन — ग़ुलाम पैदाइश के थे, जिन्हें ख़रीदकर किसी पुराने मालिक के घर में तालीम दी गई थी। तेरहवीं सदी की तुर्की-फ़ारसी दुनिया में मामलूक कोई मज़दूर नहीं, बल्कि एक फ़ौजी ग़ुलाम-अफ़सर होता था, जिस पर अक्सर ख़ानदानी रईसों से ज़्यादा भरोसा किया जाता था — क्योंकि उसकी वफ़ादारी निजी थी और उसका पूरा भविष्य अपने आक़ा पर टिका था।
ग़ुलाम वंश के ये चौरासी साल उत्तर भारत में मुस्लिम राजनीतिक ताक़त की नींव के साल हैं। ऐबक ने क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू कराया। इल्तुतमिश ने सल्तनत को उसकी पहली पक्की संस्थाएँ दीं — इक़्ता व्यवस्था यानी लगान की जागीर, चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल, और चालीस बड़े अमीरों का समूह जिसे चहलगानी या तुर्कान-ए-चहलगानी कहा गया। रज़िया सुल्तान, इस पूरे दौर में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली अकेली महिला, 1230 के दशक में थोड़े समय के लिए शासक रहीं। बलबन, जो 1266 में गद्दी पर आए, ने सुल्तान को ख़ुदा का साया बताने वाला सिद्धांत और सिजदा तथा पाबोस की भारी-भरकम दरबारी रस्में पक्की कीं।
यह लेख शासकों को क्रम से देखता है, ग़ुलाम वंश के बड़े प्रशासनिक बदलाव सामने रखता है, और बताता है कि 1290 में यह वंश खिलजी अमीरों के हाथों क्यों गिरा।
एक नज़र में
- संस्थापक: क़ुतुबुद्दीन ऐबक, 1206
- आख़िरी शासक: शम्सुद्दीन कयूमर्स, 1290 में गद्दी से हटाए गए
- राजधानी: दिल्ली (ऐबक के समय पहले लाहौर मुख्य ठिकाना था)
- बड़े शासक: ऐबक, इल्तुतमिश, रज़िया सुल्तान, बलबन
- मुख्य संस्थाएँ: इक़्ता व्यवस्था, चाँदी का टंका, चहलगानी (चालीस अमीर), सिजदा और पाबोस की दरबारी रस्में
- बाहरी ख़तरा: मध्य एशिया से चंगेज़ ख़ान और उसके बाद वालों के मंगोल हमले
- स्थापत्य की विरासत: क़ुतुब मीनार (ऐबक के समय शुरू, इल्तुतमिश के समय पूरी), क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, इल्तुतमिश का मक़बरा
- अंत: 1290, जब जलालुद्दीन खिलजी ने आख़िरी ग़ुलाम शासक को गद्दी से हटाया
ग़ुलाम वंश की शुरुआत
ग़ुलाम वंश ग़ोरी साम्राज्य के पूर्वी सूबों से निकला। ग़ोरी सुल्तान मुहम्मद ग़ोरी ने 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया — पूरा सिलसिला हमारे मुहम्मद ग़ोरी और तराइन की लड़ाइयों वाले नोट्स में है। भारत जीतने के बाद ग़ोरी अपने सबसे भरोसेमंद ग़ुलाम-सेनापति क़ुतुबुद्दीन ऐबक को यहाँ के सूबों का ज़िम्मा देकर ख़ुद ग़ज़नी लौट गया।
1206 में जब मुहम्मद ग़ोरी की हत्या हुई, ऐबक पहले से लाहौर से उत्तर भारत सँभाल रहा था। उसी साल उसने ख़ुद को सुल्तान घोषित कर दिया। अफ़ग़ानिस्तान में ग़ोरी साम्राज्य बिखर गया, लेकिन उसका भारतीय हिस्सा ग़ुलाम वंश के तहत दिल्ली सल्तनत के रूप में बचा रहा। उत्तराधिकार पूरी तरह ख़ानदानी नहीं था। सत्ता कभी आक़ा से ग़ुलाम को मिली तो कभी ससुर से दामाद को, क्योंकि सबसे मज़बूत दावा हमेशा तुर्की ग़ुलाम अमीरों के समर्थन का ही होता था।
क़ुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210)
क़ुतुबुद्दीन ऐबक मध्य एशिया का तुर्की ग़ुलाम था, जिसे पहले निशापुर के एक क़ाज़ी ने ख़रीदा और बाद में मुहम्मद ग़ोरी ने। वह फ़ौजी सेवा के रास्ते ऊपर उठा। 1192 की तराइन लड़ाई के बाद ग़ोरी ने उसे भारत में जीते इलाक़ों का सूबेदार बना दिया। ऐबक लाहौर से काम करता था। उसने ग़ोरी ताक़त को गंगा-यमुना दोआब तक, भीम द्वितीय के गुजरात तक, और अपने सेनापति बख़्तियार ख़िलजी के ज़रिए बंगाल तक पहुँचाया।
ऐबक ने 1199 में दिल्ली में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू कराया, हालाँकि उसके जीते-जी सिर्फ़ पहली मंज़िल बन पाई। उसने क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद भी बनवाई, जो भारत की पहली जुमा मस्जिद है। अपनी दरियादिली के लिए ऐबक को लाख बख़्श यानी “लाखों देने वाला” कहा जाता था। 1210 में लाहौर में चौगान, यानी पोलो के एक शुरुआती रूप, खेलते हुए गिरने से उसकी मौत हो गई। उसके बाद थोड़े समय के लिए उसका बेटा आरामशाह गद्दी पर बैठा, जिसे समर्थन नहीं मिला और साल भर के भीतर हटा दिया गया।
इल्तुतमिश (1211-1236)
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ऐबक का दामाद था और ग़ुलाम वंश को असल में मज़बूत उसी ने किया। वह इल्बरी तुर्क था, बचपन में ग़ुलाम बनाकर बेचा गया और ऐबक ने उसे ख़रीदा। 1211 में तुर्की अमीरों के समर्थन से उसने आरामशाह को हटाया और दिल्ली में उसका राजतिलक हुआ।
इक़्ता व्यवस्था
इक़्ता व्यवस्था को पक्की शक्ल इल्तुतमिश ने दी। इक़्ता किसी अमीर या अफ़सर को नक़द तनख़्वाह की जगह दी जाने वाली अस्थायी लगान-जागीर थी। इसे रखने वाला, जिसे इक़्तादार या मुक़्ती कहते थे, अपने इलाक़े से लगान वसूलता और सुल्तान के लिए फ़ौज रखता था। इक़्ता ख़ानदानी नहीं थी और उसे बदला जा सकता था। इससे दिल्ली में बड़ा तनख़्वाहदार अमला रखे बिना ही प्रशासन की पहुँच दूर तक बन गई। इल्तुतमिश ने क़रीब 2,000 तुर्की अमीरों को इक़्ता दीं, जिनमें वे 40 बड़े अमीर भी थे जो आगे चलकर चहलगानी कहलाए।
चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल
इल्तुतमिश ने दो नए सिक्के चलाए — क़रीब 175 ग्रेन का चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल। अगली डेढ़ सदी तक टंका ही सल्तनत का मानक चाँदी सिक्का रहा। इससे पहले तोमर और चौहान दौर के हिंदू शैली के बिलोन या ताँबे के सिक्के ही चलते रहे थे। नई मुद्रा ने सल्तनत को फ़ारसी दुनिया की चाँदी वाली अंतर-क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया।
चहलगानी (तुर्कान-ए-चहलगानी)
इल्तुतमिश ने अपने 40 सबसे बड़े तुर्की अमीरों को एक समूह में बाँधा, जिसे चहलगानी या चालीस का समूह कहा गया। सबसे अहम इक़्ता इन्हीं के पास थीं, फ़ौज की टुकड़ियाँ ये ही चलाते थे, और असल में ये राजा बनाने वाली मंडली की तरह काम करते थे। चहलगानी ग़ुलाम वंश की ताक़त भी थी और कमज़ोरी भी — ताक़त तब तक, जब तक कोई मज़बूत सुल्तान इन पर पकड़ रखे; कमज़ोरी तब, जब उत्तराधिकार पर झगड़ा हो।
मंगोलों के साथ कूटनीति
इल्तुतमिश का दौर मध्य एशिया में चंगेज़ ख़ान के उभार के साथ पड़ा। 1221 में चंगेज़ ख़ान की मंगोल फ़ौज ने आख़िरी ख़्वारज़्मशाह शासक जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा सिंधु तक किया। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश से दिल्ली में पनाह माँगी। इल्तुतमिश ने कूटनीतिक अंदाज़ में यह कहकर मना कर दिया कि दिल्ली की आबोहवा ठीक नहीं रहेगी, और इस तरह मंगोलों को सिंधु की सरहद पर ही रोके रखा, बिना उन्हें हमले का बहाना दिए। भारतीय शासकों द्वारा मंगोल ख़तरे से भिड़ने के बजाय उसे टालकर सँभालने की यह सबसे शुरुआती मिसालों में से एक है।
इल्तुतमिश की मौत 1236 में दिल्ली में हुई। क़ुतुब परिसर में बना उसका मक़बरा इंडो-इस्लामिक मक़बरा स्थापत्य के सबसे पुराने बचे हुए नमूनों में से एक है।
रज़िया सुल्तान (1236-1240)
रज़िया सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी थीं। मरने से पहले इल्तुतमिश ने अपने जीवित बेटों को छोड़कर औपचारिक रूप से उन्हें ही उत्तराधिकारी नामज़द किया। तुर्की-फ़ारसी दुनिया में यह अनोखी बात थी, लेकिन इल्तुतमिश का मानना था कि उसकी संतानों में सबसे क़ाबिल वही हैं। चहलगानी ने पहले उनके भाई रुक्नुद्दीन फ़िरोज़ को गद्दी पर बिठाया। वह नाकारा साबित हुआ। दिल्ली की जनता और अमीरों के एक धड़े ने उसे हटाकर 1236 के आख़िर में रज़िया को गद्दी पर बिठाया।
रज़िया सुल्तान ने क़रीब साढ़े तीन साल राज किया। दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठने वाली वह अकेली महिला हैं। वह खुले तौर पर मर्दाना पोशाक में घोड़े पर निकलती थीं, खुले दरबार में बैठती थीं, और उन्होंने याक़ूत नाम के एक हब्शी अमीर को अमीर-उल-उमरा (अमीरों का प्रमुख) बना दिया, जो तुर्की चहलगानी को नागवार गुज़रा। भटिंडा के सूबेदार मलिक अल्तूनिया की अगुवाई में तुर्की अमीरों ने बग़ावत कर दी। रज़िया पकड़ी गईं। उन्होंने अल्तूनिया से निकाह किया और दोनों ने मिलकर दिल्ली पर चढ़ाई की, लेकिन चहलगानी के एक दूसरे धड़े ने उन्हें हरा दिया। 1240 में कैथल के पास रज़िया और अल्तूनिया मारे गए। गद्दी फिर इल्तुतमिश के बेटों के पास चली गई, जो कमज़ोर साबित हुए।
बलबन (1266-1287)
ग़यासुद्दीन बलबन असल में इल्बरी तुर्क ग़ुलाम था, जिसे इल्तुतमिश ने ख़रीदा था। इल्तुतमिश के कमज़ोर बेटों के दौर में वह चहलगानी के भीतर ऊपर चढ़ा। 1246 से 1266 तक सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद शाह के नीचे वही असली शासक था और नाइब यानी उप-सुल्तान का ओहदा रखता था। 1266 में जब महमूद शाह बिना वारिस के मरा, बलबन ने अपने नाम से गद्दी सँभाल ली।
राजत्व का सिद्धांत
बलबन ने सासानी फ़ारसी दरबार की तर्ज़ पर राजत्व का विस्तृत सिद्धांत गढ़ा। उसने ऐलान किया कि सुल्तान ज़िल्ल-ए-इलाही यानी ज़मीन पर ख़ुदा का साया है, और नियाबत-ए-ख़ुदाई यानी ख़ुदा का नायब है। उसके सामने हँसना या हल्की-फुल्की बातचीत करना मना था। उसने सिजदा (सुल्तान के आगे झुककर माथा टेकना) और पाबोस (सुल्तान के पैर चूमना) की फ़ारसी रस्में अनिवार्य कीं। ये सीधे सासानी ईरान से आई थीं और रूढ़िवादी उलेमा को खटकती थीं, लेकिन बलबन ने इन्हें लागू करके ही माना।
चहलगानी की ताक़त तोड़ना
बलबन का मुख्य राजनीतिक काम चहलगानी की ताक़त तोड़ना था। उसने भ्रष्टाचार या बग़ावत के आरोप में बड़े तुर्की अमीरों को मरवाया, उनकी इक़्ता ज़ब्त कीं, और उनकी जगह ऐसे नए लोग बिठाए जिनका सब कुछ निजी तौर पर उसी का दिया हुआ था। उसके राज के आख़िर तक पुरानी चहलगानी एक राजनीतिक ताक़त के रूप में ख़त्म हो चुकी थी।
लोहे और ख़ून की नीति
बलबन ने दोआब, मेवात और बंगाल की बग़ावतों से बहुत सख़्ती से निपटा। दिल्ली को महफ़ूज़ करने के लिए उसने राजधानी के आसपास के मेवातियों का क़त्लेआम किया। 1279 में बंगाल में तुग़रिल ख़ान की बग़ावत उसने ख़ुद फ़ौज की कमान सँभालकर कुचली। बाग़ियों और उनके परिवारों को लखनौती में सरेआम मौत दी गई। इस नीति को कभी-कभी बलबन की लोहे और ख़ून वाली नीति कहा जाता है।
मंगोल सरहद
बलबन के दौर में फ़ारस के इलख़ानों की तरफ़ से मंगोल दबाव और बढ़ गया। मंगोल छापे व्यास नदी तक आ पहुँचे। बलबन ने अपने सबसे बड़े बेटे मुहम्मद के नीचे उत्तर-पश्चिमी सरहद पर क़िलों की क़तार खड़ी की। 1285 में मुल्तान के पास मंगोलों से लड़ते हुए मुहम्मद मारा गया। बेटे की मौत ने बलबन को भीतर से तोड़ दिया। 1287 में उसकी मौत हो गई।
पतन और खिलजी क्रांति
बलबन की मौत के बाद गद्दी उसके पोते कैक़ुबाद को मिली, जो नाकारा और बीमार था, और फिर थोड़े समय के लिए बच्चे सुल्तान शम्सुद्दीन कयूमर्स को। तुर्की अमीर वर्ग थक चुका था, चहलगानी नाम भर की रह गई थी, और फ़ौज में दम नहीं बचा था। खिलजी अमीर, जो मिली-जुली तुर्क-अफ़ग़ान पैदाइश के थे और जिन्हें ग़ुलाम वंश के भीतरी दायरे से बाहर रखा गया था, इस मौक़े का फ़ायदा उठा गए।
सबसे बड़े खिलजी अमीर जलालुद्दीन खिलजी ने 1290 में कयूमर्स को हटाकर खिलजी वंश की नींव रखी — दिल्ली सल्तनत का अगला अध्याय, जो हमारे खिलजी वंश वाले नोट्स में है। चौरासी साल बाद ग़ुलाम वंश ख़त्म हो गया।
ग़ुलाम वंश का प्रशासन
ग़ुलाम वंश ने ग़ोरी ढाँचा विरासत में लिया और उसे आगे बढ़ाया। केंद्रीय प्रशासन दिल्ली से चलता था। चार बड़े विभाग थे — दीवान-ए-वज़ारत (वित्त), दीवान-ए-अर्ज़ (सैन्य), दीवान-ए-इंशा (पत्राचार) और दीवान-ए-रिसालत (विदेश और धार्मिक मामले)। साम्राज्य मुक़्तियों के नीचे इक़्ताओं में बँटा था। मुख्य आमदनी लगान से आती थी, और उसके साथ ज़कात, ग़ैर-मुसलमानों पर जज़िया तथा चुंगी भी थी।
फ़ौज में ग़ुलाम सिपाही, इक़्तादारों की टुकड़ियाँ और आज़ाद तुर्की घुड़सवार, तीनों मिले-जुले थे। दिल्ली में खड़ी फ़ौज छोटी थी लेकिन बहुत अच्छी। बलबन के दौर में सल्तनत की कुल सैन्य ताक़त क़रीब 2,00,000 सिपाहियों की मानी जाती है, हालाँकि किसी एक अभियान के लिए इनमें से थोड़े ही उपलब्ध होते थे।
स्थापत्य और संस्कृति
दिल्ली का क़ुतुब परिसर ग़ुलाम वंश की स्थापत्य पहचान है। क़ुतुब मीनार ऐबक ने 1199 में शुरू कराई, इल्तुतमिश ने उसे चार मंज़िल तक पहुँचाया, और पाँचवीं मंज़िल बाद में फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के समय जुड़ी। ऐबक के समय शुरू हुई क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद उत्तर भारत की पहली जामा मस्जिद थी। इल्तुतमिश का मक़बरा, अपने कोर्बेल गुंबद और क़ुरआनी सुलेख के साथ, शुरुआती इंडो-इस्लामिक इमारत है जिसमें हिंदू और फ़ारसी सजावटी नमूने मिले-जुले दिखते हैं।
दरबार की भाषा फ़ारसी हो गई। लगान के काम में संस्कृत पढ़े हिंदू अधिकारी बने रहे। सूफ़ी सिलसिले, ख़ासकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती और आगे चलकर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के नीचे चिश्ती सिलसिला, इस दौर में संस्कृति पर गहरा असर रखने लगे।
प्रीलिम्स पॉइंटर
- ग़ुलाम वंश का काल: 1206-1290।
- ग़ुलाम वंश का संस्थापक क़ुतुबुद्दीन ऐबक था।
- ऐबक को लाख बख़्श यानी “लाखों देने वाला” कहा जाता था।
- क़ुतुब मीनार ऐबक ने 1199 में शुरू कराई और इल्तुतमिश ने पूरी कराई।
- इल्तुतमिश ने चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल चलाया।
- इल्तुतमिश ने चहलगानी या तुर्कान-ए-चहलगानी बनाई — 40 तुर्की अमीरों का समूह।
- रज़िया सुल्तान ने 1236 से 1240 तक राज किया और दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली अकेली महिला हैं।
- रज़िया ने हब्शी याक़ूत को अमीर-उल-उमरा बनाया।
- बलबन ने 1266 से 1287 तक राज किया और ज़िल्ल-ए-इलाही का सिद्धांत दिया।
- सिजदा और पाबोस बलबन की लागू की हुई दरबारी रस्में थीं।
- बलबन का बेटा मुहम्मद 1285 में मंगोलों से लड़ते हुए मारा गया।
- ग़ुलाम वंश को 1290 में जलालुद्दीन खिलजी ने ख़त्म किया।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “ग़ुलाम वंश ने दिल्ली सल्तनत की संस्थाओं की नींव रखी।” इक़्ता व्यवस्था, चाँदी के टंका और चहलगानी के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
- मध्यकालीन भारत के इतिहास में रज़िया सुल्तान का स्थान बताइए। उनका शासन दिल्ली सल्तनत में महिला शासन की सीमाओं के बारे में क्या बताता है? (GS पेपर I, 10 अंक)
- बलबन के राजत्व सिद्धांत और चहलगानी को तोड़ने की उसकी नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (GS पेपर I, 15 अंक)
विरासत और आगे की राह
ग़ुलाम वंश ने वह राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा खड़ा किया जो दिल्ली सल्तनत के बाद के सभी वंशों को विरासत में मिला। इक़्ता व्यवस्था, चाँदी का टंका, फ़ारसी दरबारी रस्में और इंडो-इस्लामिक स्थापत्य की शब्दावली, सबकी शुरुआत यहीं से है। इस वंश ने यह मिसाल भी क़ायम की कि तुर्की ग़ुलाम-अफ़सर राज्य के सबसे बड़े ओहदे तक पहुँच सकते हैं — यही मिसाल आगे खिलजी, तुग़लक़ और बाद में मुग़ल अमीर वर्ग की भर्ती की शक्ल तय करती रही।
ग़ुलाम वंश को खिलजी वंश, तुग़लक़ वंश और लोदी वंश के साथ पढ़िए, तो दिल्ली सल्तनत की पूरी कहानी सामने आ जाती है — नींव से लेकर 1526 में पानीपत की लड़ाइयों में पतन तक। इसी दौर के दक्षिण भारतीय राजवंशों से तुलना के लिए विजयनगर के कृष्णदेवराय और राजराज चोल प्रथम पर हमारे नोट्स देखिए।
सामान्य प्रश्न
इसे ग़ुलाम वंश क्यों कहते हैं?
इसे ग़ुलाम वंश इसलिए कहते हैं कि इसके तीन सबसे अहम शासकों — क़ुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन — ने अपनी ज़िंदगी तुर्की फ़ौजी ग़ुलाम के तौर पर शुरू की थी। तुर्की-फ़ारसी व्यवस्था में मामलूक वह ग़ुलाम-अफ़सर होता था जिसे किसी आक़ा के घर में तालीम दी जाती थी, और जिस पर अक्सर ख़ानदानी रईसों से ज़्यादा भरोसा किया जाता था। इसी वजह से इस वंश को मामलूक वंश भी कहा जाता है।
ग़ुलाम वंश की नींव किसने और कब रखी?
क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में, अपने आक़ा मुहम्मद ग़ोरी की हत्या के बाद, ग़ुलाम वंश की नींव रखी। उसी साल ऐबक ने लाहौर में ख़ुद को सुल्तान घोषित किया। उसके बाद वालों ने राजधानी दिल्ली कर दी।
इल्तुतमिश के बड़े सुधार क्या थे?
इल्तुतमिश ने लगान की जागीर वाली इक़्ता व्यवस्था को पक्की शक्ल दी, चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल मानक सिक्कों के तौर पर चलाए, अपने 40 सबसे बड़े तुर्की अमीरों को चहलगानी में बाँधा, और 1221 में ख़्वारज़्मशाह शासक जलालुद्दीन मंगबरनी को पनाह देने से मना करके मंगोल ख़तरे को सँभाला।
रज़िया सुल्तान कौन थीं?
रज़िया सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी थीं और उन्होंने 1236 से 1240 तक दिल्ली सल्तनत पर राज किया। दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठने वाली वह अकेली महिला हैं। 1240 में तुर्की अमीरों के एक धड़े ने उन्हें हटाकर मार डाला, और इसकी एक वजह हब्शी अमीर याक़ूत को अमीर-उल-उमरा बनाना भी था।
बलबन का राजत्व सिद्धांत क्या था?
बलबन ने कहा कि सुल्तान ज़िल्ल-ए-इलाही यानी ज़मीन पर ख़ुदा का साया और नियाबत-ए-ख़ुदाई यानी ख़ुदा का नायब है। उसने सिजदा (झुककर माथा टेकना) और पाबोस (सुल्तान के पैर चूमना) की फ़ारसी दरबारी रस्में लागू कीं। यह सिद्धांत सासानी फ़ारसी राजत्व की तर्ज़ पर बना था।
चहलगानी क्या थी?
चहलगानी या तुर्कान-ए-चहलगानी इल्तुतमिश की बनाई हुई 40 बड़े तुर्की अमीरों की मंडली थी। सबसे अहम इक़्ता इन्हीं के पास थीं और ये असल में राजा बनाने वाली मंडली की तरह काम करते थे। बलबन ने बड़े सदस्यों को मरवाकर और उनकी इक़्ता ज़ब्त करके इनकी ताक़त तोड़ दी।
ग़ुलाम वंश का अंत कैसे हुआ?
ग़ुलाम वंश 1290 में ख़त्म हुआ, जब बड़े खिलजी अमीर जलालुद्दीन खिलजी ने बच्चे सुल्तान शम्सुद्दीन कयूमर्स को गद्दी से हटा दिया — इससे पहले बलबन के पोते कैक़ुबाद का कमज़ोर शासन रह चुका था। इसके बाद खिलजी वंश आया।
UPSC के लिए ग़ुलाम वंश क्यों अहम है?
ग़ुलाम वंश दिल्ली सल्तनत का नींव रखने वाला वंश है और प्रीलिम्स तथा मेन्स दोनों में नियमित विषय है। सवाल इक़्ता व्यवस्था, चहलगानी, चाँदी के टंका, इल्तुतमिश, रज़िया और बलबन के शासन, और क़ुतुब परिसर की स्थापत्य विरासत पर आते हैं।