UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

ग्वालियर किला: गोपाचल के मंदिर, मान सिंह का महल और शून्य वाला शिलालेख

ग्वालियर किले का इतिहास परतों में: 6ठी सदी के मंदिर और शिलालेख, मान सिंह तोमर का महल, मुगलों की जेल, 1858 की लड़ाई और UNESCO की अस्थायी सूची में इसकी जगह।

Man Mandir palace on Gwalior Fort, its sandstone wall banded with blue, green and yellow tiles between round towers

ग्वालियर किला गोपाचल पहाड़ी पर फैला हुआ है। गोपाचल बलुआ पत्थर की एक सपाट चोटी वाली पहाड़ी है, जो करीब 3 किलोमीटर लंबी है और उत्तरी मध्य प्रदेश में ग्वालियर के मैदान से करीब 90 मीटर (300 फुट) ऊपर उठती है। इसे किसी एक राजा ने नहीं बनवाया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसके इतिहास को 5वीं सदी ईस्वी या उससे भी पहले तक ले जाता है। पहाड़ी पर खड़े स्मारक एक के बाद एक आई सत्ताओं की लंबी कहानी दर्ज करते हैं, हूणों से लेकर सिंधिया और अंग्रेजों तक। यह किला सबसे ज्यादा दो चीजों के लिए जाना जाता है। पहली है राजा मान सिंह तोमर का टाइलों से सजा महल, यानी मान मंदिर महल। दूसरी है 876 ईस्वी का एक मंदिर-शिलालेख, जिसमें भारत के सबसे पुराने तारीख वाले शून्यों में से एक लिखा है।

सबसे आम गलती उम्र को लेकर होती है। पहाड़ी की सबसे मशहूर इमारत करीब 1500 ईस्वी का एक तोमर महल है, इसलिए कई उत्तरों में ग्वालियर को उत्तर-मध्यकाल का किला मान लिया जाता है। असल में इसका सबसे पुराना शिलालेख उस महल से करीब एक हजार साल पुराना है, और इसका सबसे पुराना खड़ा मंदिर महल से कोई सात सदी पहले का है। दूसरी गलती मान्यता को लेकर होती है। ग्वालियर शहर UNESCO की “क्रिएटिव सिटी ऑफ म्यूजिक”, यानी संगीत नगरी है, और किला भारत की अस्थायी सूची (Tentative List) में है। लेकिन इन दोनों में से कोई भी बात इसे विश्व धरोहर स्थल नहीं बनाती। यह नोट इन परतों को सही क्रम में रखता है, और इन दर्जों को आपस में गड्डमड्ड नहीं होने देता।

ग्वालियर किला कहाँ है और किस-किस के कब्जे में रहा

ग्वालियर किला बलुआ पत्थर के एक अलग-थलग पठार पर बना पहाड़ी किला है, और ASI के संरक्षण में है। ग्वालियर किले का इतिहास कम से कम 6ठी सदी से 20वीं सदी तक दर्ज है। इसकी असली ताकत खुद पहाड़ी है। ब्रिटानिका इसे खड़ी चट्टानों वाला पठार बताता है, जो सीधा 90 मीटर ऊपर उठता है। एनेट बेवरिज ने कनिंघम के सर्वे से जो आँकड़े लिए, उनके मुताबिक पहाड़ी उत्तरी सिरे पर करीब 300 फुट और दक्षिणी सिरे पर 274 फुट ऊँची है, और करीब 1.75 मील लंबी है।

तथ्यविवरण
जगहगोपाचल पहाड़ी, ग्वालियर, उत्तरी मध्य प्रदेश; पठार करीब 3 किलोमीटर लंबा और मैदान से करीब 90 मीटर ऊँचा
सबसे पुराना रिकॉर्डकरीब 525 ईस्वी का एक मंदिर-शिलालेख (ब्रिटानिका); ग्वालियर से हूण शासक मिहिरकुल का एक शिलालेख भी मिला है
मुख्य दौर8वीं से 11वीं सदी के मंदिर; 1398 से 1518 तक तोमर शासन; मुगलों की राजकीय जेल; 1751 के बाद मराठों का गढ़
बाद के कब्जेदार1232 से दिल्ली सल्तनत; तोमर; 1518 से लोदी; मुगल; सिंधिया; 1780, 1843 और 1858 के बाद अंग्रेजी फौज की छावनियाँ, 1886 तक
प्रकारसपाट चोटी वाले पठार पर बना पहाड़ी किला, जिसके पूर्वी किनारे पर महल वाला गढ़ है
संरक्षण की स्थितिकेंद्र सरकार का संरक्षित स्मारक, ASI (भोपाल सर्कल) की देखरेख में
UNESCO में स्थितिविश्व धरोहर सूची में दर्ज नहीं; 8 फरवरी 2024 से भारत की अस्थायी सूची में
किस लिए मशहूरतेली का मंदिर, सास-बहू मंदिर, 876 ईस्वी का शून्य, मान मंदिर महल, चट्टान काटकर बनी विशाल जैन मूर्तियाँ, गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़

आखिरी पंक्ति को सूची की तरह नहीं, समय-रेखा की तरह पढ़िए। इसमें एक ही पहाड़ी पर सात सदियों से भी ज्यादा का निर्माण समाया हुआ है।

सबसे पुरानी परत: हूण, मंदिर और शून्य

इस पहाड़ी का लिखित इतिहास 6ठी सदी से शुरू होता है। ब्रिटानिका के मुताबिक किले का पहला जिक्र करीब 525 ईस्वी के एक मंदिर-शिलालेख में मिलता है। हूण शासक मिहिरकुल ने भी ग्वालियर में एक शिलालेख छोड़ा था, जो आज “मिहिरकुल का ग्वालियर शिलालेख” नाम से दर्ज है। पहाड़ी के सारे नामों का मतलब एक ही है। गोप पर्वत, गोपाचल दुर्ग, गोपगिरि और गोपादिरि, ये सब “ग्वाले की पहाड़ी” के ही अलग-अलग रूप हैं।

अगली परत एक ऐसा मंदिर है, जैसा उत्तर भारत में शायद ही कोई दूसरा हो। तेली का मंदिर आयताकार नक्शे पर बना है और करीब 28 मीटर ऊँचा है। ASI इसके ऊपरी ढाँचे को मिली-जुली शैली का बताता है, यानी नागर आधार पर वलभी छत। वलभी छत ढोलनुमा मेहराबदार छत (barrel vault) होती है। इसकी शक्ल उलटी रखी नाव जैसी या ढकी हुई गाड़ी की छत जैसी होती है, इसलिए यह आयताकार गर्भगृह पर ठीक बैठती है। नागर आधार उत्तर भारत की उस परंपरा से आता है, जिसमें शिखर घुमावदार होता है। अगर आपने नागर मंदिर वास्तुकला को ऐसे मंदिरों के परिवार के रूप में पढ़ा है, जिनमें चौकोर गर्भगृह के ऊपर घुमावदार शिखर होता है, तो तेली का मंदिर वह अपवाद है जो इस नियम को परखता है।

इसकी तारीख तय करना ज्यादा मुश्किल सवाल है, और स्रोत इस पर एकमत नहीं हैं:

  • ASI इसे 8वीं सदी के मध्य का मानता है। इसके सबूत हैं इसके छोटे शिलालेखों की लिपि, इसकी कला-शैली और इसकी बनावट। ASI यह भी बताता है कि यह तारीख कन्नौज के राजा यशोवर्मन के समय से मेल खाती है।
  • ग्वालियर पर ब्रिटानिका की छोटी प्रविष्टि इसे 11वीं सदी का बताती है।

परीक्षा में ASI की 8वीं सदी के मध्य वाली तारीख ही लिखिए, क्योंकि वह खुद इमारत से मिले सबूतों पर टिकी है। इसके एक शिलालेख में कई भुजाओं वाली दुर्गा की छंदबद्ध स्तुति है। इससे पता चलता है कि इस मंदिर का इतिहास उससे कहीं ज्यादा परतदार है, जितना आज इसके शिव को समर्पित होने से लगता है।

तीसरी परत वह है, जिसे देखने गणितज्ञ दूर-दूर से आते हैं। छोटा-सा चतुर्भुज मंदिर चट्टान काटकर बनाया गया है। यह विष्णु को समर्पित है, यानी उन्हीं चार भुजाओं वाले देवता को, जिनके नाम पर मंदिर का नाम पड़ा। इसमें समर्पण का एक शिलापट्ट लगा है, जिस पर 57 ईसा पूर्व से शुरू होने वाले स्थानीय संवत का वर्ष 933 लिखा है, यानी 876 ईस्वी। इस पट्ट में फूलों के बगीचे के लिए 270 हस्त लंबी जमीन के दान का जिक्र है, और रोज 50 मालाओं के लिए एक स्थायी दान का भी। हस्त यानी कोहनी से उंगलियों के सिरे तक की लंबाई, मोटे तौर पर एक हाथ। 270 और 50 में लिखे शून्यों की वजह से ही गणितज्ञ बिल कैसलमैन ने अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के लिए लिखते हुए इसे भारत का सबसे पुराना “0” कहा, जिसकी पक्की तारीख तय की जा सकती है।

तो क्या यह दुनिया का पहला शून्य है? नहीं, और यह फर्क मायने रखता है। 2017 में ऑक्सफोर्ड की बोडलियन लाइब्रेरीज ने बख्शाली पांडुलिपि की रेडियोकार्बन डेटिंग के नतीजे छापे, जिनमें उस पांडुलिपि के कुछ हिस्से सदियों पहले के निकले। ऑक्सफोर्ड ने यह भी कहा कि तब तक ग्वालियर के इसी शिलालेख को भारत में ऐसे शून्य का सबसे पुराना दर्ज उदाहरण माना जाता था, जो अंकों के बीच खाली जगह भरने का काम करता है। यहाँ असली शब्द है तारीख वाला। ग्वालियर के शून्य की तारीख खुद उसके शिलालेख से तय होती है, जबकि पांडुलिपि की उम्र उसकी सामग्री की प्रयोगशाला में हुई जाँच पर टिकी है।

मंदिरों की आखिरी परत है सास-बहू मंदिरों की जोड़ी। ASI के मुताबिक इन दो जुड़वाँ वैष्णव मंदिरों में से बड़ा मंदिर कच्छपघात राजा महिपाल ने 1093 में पूरा करवाया, जब ग्वालियर इसी राजवंश की मुख्य राजधानी था। इसके तीन मंजिला मंडप पर घंटी के आकार की छत है, जो करीब 24 मीटर ऊँची है। दरवाजों के ऊपर लगी पत्थर की पट्टियों (सिरदल) पर कृष्ण के जीवन के दृश्य बने हैं। ASI इस पर खरी-खरी राय देता है: इसकी कारीगरी तेली का मंदिर से कमजोर है, लेकिन यह मंदिर इसलिए अहम है क्योंकि इसकी तारीख पक्की है।

तोमरों की सदी और मान सिंह का महल

तोमरों ने ग्वालियर को अपने दम पर खड़ा एक राज्य बनाया। 1232 में इल्तुतमिश ने किला जीता, और उसके बाद करीब दो सदियों तक यह दिल्ली के सुल्तानों के हाथ में रहा। कनिंघम के सर्वे के मुताबिक सुल्तान इसे राजकीय जेल की तरह इस्तेमाल करते थे, उन रिश्तेदारों के लिए जिन्हें वे रास्ते से हटाना चाहते थे। फिर 1398 में तैमूर के हमले के दौरान तोमर सरदार वीर सिंह देव दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया और उसने ग्वालियर को आजाद कर लिया।

यह राज्य करीब 120 साल चला, और इस पूरे समय यह तीन बड़े मुस्लिम राज्यों के बीच घिरा रहा। कनिंघम का तर्क है कि इन तीनों की आपसी होड़ ने ही किसी एक को इसे निगलने नहीं दिया। इस राज्य का सबसे बड़ा निर्माता था राजा मान सिंह तोमर (1486-1516), जिसे ASI वास्तुकला और संगीत का बड़ा संरक्षक कहता है। उसका महल, मान मंदिर महल, इस किले की पहचान है:

  • इसका पूर्वी हिस्सा करीब 300 फुट लंबा है, और बीच-बीच में छह गोल बुर्ज इसे तोड़ते हैं, जिनके ऊपर गुंबददार छतरियाँ बनी हैं।
  • दीवार में रोगन चढ़ी नीली, हरी और पीली टाइलें जड़ी हैं। इनकी पट्टियों में इंसान, बत्तखें, हाथी, मगरमच्छ, बाघ और पेड़ बने हैं।
  • अंदर दो खुले आँगन हैं, जिनके चारों ओर कमरे बने हैं। इन कमरों में नक्काशीदार जालियाँ और टाइलों के नमूने हैं।

टाइलें इतनी ज्यादा थीं कि इस इमारत को चित मंदिर भी कहा जाता था, यानी चित्रों से सजा महल। गूजरी महल को ब्रिटानिका करीब 1500 का बताता है, और कनिंघम इसे मान सिंह की गूजर रानी मृगनयनी से जोड़ते हैं।

तोमर राज्य का अंत एक घेराबंदी से हुआ। कनिंघम दर्ज करते हैं कि मान सिंह की मौत के बाद इब्राहिम लोदी की फौज ने पूरे एक साल तक किले की घेराबंदी की। उसने एक-एक करके दरवाजे जीते और 1518 में बादलगढ़ का बाहरी मोर्चा भी कब्जे में ले लिया। आखिर में सिर्फ सबसे ऊपर वाला दरवाजा बचा, और तब मान सिंह के बेटे विक्रमादित्य ने अच्छी शर्तों पर हथियार डाल दिए। लोदी वंश ने उसे एक जागीर दी। यही आखिरी तोमर राजा 1526 में पानीपत की लड़ाइयों में से पहली लड़ाई में मारा गया, और वह उसी सुल्तान की तरफ से लड़ रहा था, जिसने उसका किला छीना था।

बाबर का दौरा और मुगलों की राजकीय जेल

मान सिंह के महल का सबसे अच्छा आँखों देखा ब्योरा उसके नए मालिक के परिवार से आता है। सितंबर 1528 में बाबर ने किले का दौरा किया। वह हाथी पोल से अंदर आया। इस दरवाजे का नाम उस नक्काशीदार हाथी पर पड़ा था, जिस पर दो सवार बैठे थे और जो इसके निकास पर खड़ा था। बाबर ने लिखा कि राजाओं की सारी इमारतों में “मान सिंह की इमारत सबसे अच्छी और सबसे ऊँची है”। उसने गौर किया कि हरी टाइलों को केले के पेड़ों की शक्ल में जड़ा गया है। सबसे निचली मंजिलें उसे इतनी अंधेरी लगीं कि उसके साथी मोमबत्तियाँ लेकर उनमें से गुजरे।

इन्हीं पन्नों में एक कड़वा पल भी दर्ज है। पहाड़ी के पश्चिमी तरफ उरवाही घाटी में बाबर ने चट्टानों में काटकर बनाई गई जैन मूर्तियाँ देखीं, और लिखा कि उसने “उन्हें नष्ट करने का हुक्म दिया”। ASI चट्टान काटकर बनी इन विशाल मूर्तियों को ज्यादातर 15वीं सदी का मानता है, और दर्ज करता है कि सबसे बड़ी खड़ी मूर्ति 57 फुट ऊँची है। ये मूर्तियाँ आज भी बची हुई हैं, और ASI इन्हें गिनती और आकार, दोनों के लिहाज से उत्तर भारत में अनोखा बताता है।

एक पंक्ति अक्सर बाबर के नाम से दोहराई जाती है, जिसमें ग्वालियर को हिंद के किलों में मोती कहा गया है। लेकिन यह पंक्ति बाबर के संस्मरण के एनेट बेवरिज वाले मानक अंग्रेजी अनुवाद में नहीं मिलती। जब तक आप वह अंश उद्धृत न कर सकें, तब तक इसे बाद में बाबर के नाम जोड़ी गई बात ही मानिए।

मुगलों के दौर में किले की जेल वाली पुरानी भूमिका फिर लौट आई। ब्रिटानिका के मुताबिक बादशाह जहाँगीर सिखों की बढ़ती ताकत से चौकन्ना था, और उसने गुरु हरगोबिंद को ग्वालियर के किले में कैद करवा दिया। उन्हें कितने समय तक कैद रखा गया, इस पर विवाद है। ब्रिटानिका बारह साल बताता है, जबकि “एनसाइक्लोपीडिया ऑफ सिखिज्म” कहता है कि इस पर इतिहासकारों की राय में बहुत फर्क है, और लगता है कि उन्हें 1617 से 1619 के बीच किसी समय बस कुछ महीनों के लिए रखा गया था।

उनकी रिहाई कैसे हुई, इसे सिख परंपरा याद रखती है। परंपरा के मुताबिक जब बादशाह ने गुरु को छोड़ने का हुक्म दिया, तो उन्होंने अकेले जाने से मना कर दिया। उनकी शर्त थी कि उनके साथ कैद 52 सरदारों को भी छोड़ा जाए। इसी वजह से उन्हें बंदी छोड़, यानी कैदियों को छुड़ाने वाला, कहकर याद किया जाता है। किले के अंदर बना गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ उसी जगह की निशानी है।

मराठा, अंग्रेज और 1858 की लड़ाई

मुगलों के बाद ग्वालियर मराठों के हाथ में गया और उनके सबसे बड़े घरानों में से एक की गद्दी बना। ब्रिटानिका के मुताबिक 1751 तक यह किला मुस्लिम और हिंदू शासकों के बीच हाथ बदलता रहा, और उसके बाद मराठों का गढ़ बना रहा। मराठा साम्राज्य के एक राजवंश, सिंधिया, ने करीब 1745 में राणोजी सिंधिया के समय ग्वालियर राज्य की नींव रखी। यह राज्य महादजी सिंधिया (शासनकाल 1761-94) के समय अपने सबसे बड़े फैलाव पर पहुँचा। ब्रिटानिका बताता है कि उनके अफसर जयपुर और जोधपुर के राजपूत राजाओं से भी खिराज वसूलते थे।

अंग्रेजों ने यह किला तीन बार जीता, 1780, 1843 और 1858 में। इस बीच 1803 और 1818 में राज्य को अपने कई इलाके अंग्रेजों के हाथों गँवाने पड़े, और 1840 के दशक में यह पूरी तरह अंग्रेजों के दबदबे में आ गया।

1857-58 के विद्रोह ने ग्वालियर को बीच से बाँट दिया। ब्रिटानिका के मुताबिक सिंधिया शासक अंग्रेजों के प्रति वफादार रहा, जबकि उसकी फौज विद्रोहियों से जा मिली। फिर तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर के किलेबंद शहर पर कामयाब हमला किया। उन्होंने इसका खजाना और शस्त्रागार अपने कब्जे में लिया, और नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया। जनरल ह्यू रोज की अगुवाई में अंग्रेजों ने जवाबी हमला किया, तो रानी उसका सामना करने घोड़े पर सवार होकर पूर्व की ओर मुरार गईं। जून 1858 में कोटा की सराय के पास लड़ते हुए वे मारी गईं। उनकी मौत 17 जून को हुई या 18 जून को, इस पर ब्योरे अलग-अलग हैं। आम तौर पर 18 जून की तारीख ही मनाई जाती है। उनका समाधि-स्थल लश्कर में है। लश्कर किले के दक्षिण में बसा वह शहर है, जो 1810 में एक फौजी छावनी के रूप में शुरू हुआ और बाद में रियासत की राजधानी बना।

अंग्रेजों ने 1858 में किला फिर जीत लिया और 1886 तक अपने पास रखा। उस साल उन्होंने झांसी शहर पर अंग्रेजी शासन के बदले यह किला खाली कर दिया। ग्वालियर रियासत 1948 में आजाद भारत में शामिल हुई।

छह दरवाजे, उसी क्रम में जिसमें हमलावर ऊपर चढ़ता है

ग्वालियर की असली सुरक्षा खुद खड़ी चट्टान है। दरवाजे तो बस उस एक रास्ते की हिफाजत करते हैं, जिससे सचमुच ऊपर पहुँचा जा सकता है। कनिंघम के सर्वे में पूर्वी चढ़ाई पर छह दरवाजे गिने गए हैं। नीचे से ऊपर की ओर ये हैं:

  • आलमगीरी दरवाजा, सबसे नीचे वाला। इसे मुगल सूबेदार मोतमिद खान ने 1660 में जोड़ा और इसका नाम बादशाह औरंगजेब (आलमगीर) पर रखा। कनिंघम इसे छहों में सबसे सादा बताते हैं।
  • बादलगढ़ या हिंडोला दरवाजा, जिसका नाम मान सिंह के चाचा बादल सिंह पर पड़ा। ASI इसे करीब 15वीं सदी का मानता है। यह दरवाजा बादलगढ़ के बाहरी मोर्चे में खुलता है।
  • भैरों दरवाजा, चढ़ाई में तीसरा।
  • गणेश दरवाजा, जिसे तोमर राजा डूंगर सिंह ने 15वीं सदी में बनवाया।
  • लक्ष्मण दरवाजा, जिसका नाम तोमर वंश के लक्ष्मण सिंह पर है। ASI का मानना है कि यहाँ 9वीं सदी में एक पुराना दरवाजा खड़ा था।
  • हाथी पोल, सबसे ऊपर वाला। यह मान सिंह के महल में ही बना है, और यहीं वह नक्काशीदार हाथी था, जिसका ब्योरा बाबर ने दिया।

यह क्रम सिर्फ किताबी बात नहीं है। कनिंघम दर्ज करते हैं कि इब्राहिम लोदी की घेराबंदी में नीचे के दरवाजे जमकर मुकाबले के बाद एक के बाद एक गिरे। लक्ष्मण दरवाजे पर पहले हमले में लोदी का एक बड़ा सरदार, ताज निजाम, मारा गया। कनिंघम इसे चौथा दरवाजा कहते हैं, क्योंकि तब तक आलमगीरी दरवाजा बना ही नहीं था। जब सिर्फ हाथी पोल बचा, तो तोमर राजा ने आखिरी हमला झेलने के बजाय शर्तें मान लीं। हर दरवाजे ने अपना काम कर दिया था, और वह काम था चढ़ाई के हर पड़ाव को समय और जानों के लिहाज से महँगा बनाना।

पश्चिमी तरफ की हिफाजत अलग ढंग से की गई थी। बाबर बताता है कि उरवाही घाटी का मुहाना ऊँची दीवार के दो घेरों से बंद था। इनमें से एक दीवार अंदर की ओर मुड़कर एक बावड़ी को घेरती थी, ताकि किले की फौज का पानी कोई काट न सके। बाबर ने इसके दरवाजे के ऊपर इल्तुतमिश का एक शिलालेख भी पढ़ा, जिस पर 630 हिजरी, यानी 1233 ईस्वी, की तारीख थी। ASI उरवाही दरवाजे को 1232 में इल्तुतमिश की जीत के बाद के सालों का मानता है। पहाड़ी की चोटी पर, जैसे दौलताबाद में, पानी का इंतजाम अपने आप में एक सुरक्षा कवच था।

ग्वालियर किला आज: अस्थायी सूची में, विश्व धरोहर नहीं

ग्वालियर किला ASI के तहत केंद्र से संरक्षित है, और विश्व धरोहर के लिए भारत की अस्थायी सूची में शामिल है, लेकिन इसे विश्व धरोहर सूची में दर्ज नहीं किया गया है। यहाँ तीन अलग-अलग दर्जे काम कर रहे हैं, और इन्हें आपस में मिला देना बहुत आसान है:

  • ASI संरक्षण: भोपाल सर्कल किले के स्मारकों को संरक्षण देता है। इनमें मान मंदिर महल, तेली का मंदिर, सास-बहू मंदिर, विशाल जैन मूर्तियाँ और दरवाजे शामिल हैं।
  • अस्थायी सूची: भारत ने “ग्वालियर किला, मध्य प्रदेश” को 8 फरवरी 2024 को मानदंड (ii) और (iv) के तहत एक सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में भेजा, जैसा UNESCO की प्रविष्टि में दिखता है। मानदंड (ii) वास्तुकला और कला में मानवीय मूल्यों के आदान-प्रदान से जुड़ा है। मानदंड (iv) किसी इमारत या इमारतों के समूह के ऐसे उत्कृष्ट उदाहरण से जुड़ा है, जो इतिहास के किसी अहम दौर को दिखाता हो।
  • क्रिएटिव सिटी: ग्वालियर शहर 2023 में संगीत के क्षेत्र में UNESCO क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क से जुड़ा। UNESCO की प्रोफाइल इसे ध्रुपद और खयाल शैलियों की जन्मभूमि बताती है, और यह भी बताती है कि तानसेन संगीत समारोह में रोज 4,000 से 5,000 लोग आते हैं।

अस्थायी सूची में नाम होना बस इरादे का ऐलान है, यानी नामांकन से पहले का कदम। भारत की सूची में आज भी 1998 में भेजी गई प्रविष्टियाँ मौजूद हैं। असल में कौन-से स्थल दर्ज हुए हैं, यह भारत के UNESCO विश्व धरोहर स्थलों वाली सूची में देखिए।

संगीत वाला यह खिताब घूमकर किले से ही जुड़ता है। ASI मान सिंह को जितना इमारतों का, उतना ही संगीत का संरक्षक मानता है। और ग्वालियर में ही तानसेन की कब्र भी है, शहर में बने 16वीं सदी के एक मकबरे में। क्रिएटिव सिटी का दर्जा उसी जीवित परंपरा का सम्मान है। किले की दीवारों के बारे में यह कुछ नहीं कहता।

परीक्षा के लिए ग्वालियर किला कैसे पढ़ें

ग्वालियर किला सिलेबस के जितने बड़े हिस्से को छूता है, वैसा बहुत कम किलों के साथ होता है:

  • आरंभिक मध्यकाल की मंदिर वास्तुकला, तेली का मंदिर और सास-बहू मंदिरों के जरिए।
  • भारतीय गणित का इतिहास, 876 ईस्वी के तारीख वाले शून्य के जरिए।
  • मध्यकालीन इतिहास में दिल्ली सल्तनत, तोमर, लोदी और मुगल।
  • सिख इतिहास, गुरु हरगोबिंद की कैद के जरिए।
  • 1857 का विद्रोह, ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के जरिए।
  • धरोहर को मिलने वाली मान्यता, अस्थायी सूची और क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क के जरिए।

मध्यकाल वाली परत में मुख्य परीक्षा स्रोतों के बारे में पूछती है। मुख्य परीक्षा 2020, GS पेपर I में पूछा गया: “मध्यकालीन भारत के फारसी साहित्यिक स्रोत उस युग की भावना को दर्शाते हैं। टिप्पणी कीजिए।” ग्वालियर का बाबर वाला ब्योरा यहाँ एक लुभावना उदाहरण है, लेकिन इसे सावधानी से इस्तेमाल कीजिए। बाबर ने अपना संस्मरण तुर्की भाषा में लिखा था, और विलियम अर्सकिन जैसे शुरुआती अंग्रेज अनुवादकों ने उसके फारसी रूप से काम किया था। एक पंक्ति में यह बात लिख देने से परीक्षक को पता चलता है कि आप अपने स्रोत को जानते हैं।

इन तथ्यों को तब तक दोहराइए, जब तक ये बिना जोर लगाए याद न आने लगें:

  • गोपाचल का मतलब है ग्वाले की पहाड़ी; किले का पहला जिक्र करीब 525 ईस्वी के एक मंदिर-शिलालेख में है।
  • तेली का मंदिर नागर आधार पर वलभी छत वाला मंदिर है, और ASI इसे 8वीं सदी के मध्य का मानता है।
  • चतुर्भुज मंदिर का शिलापट्ट 876 ईस्वी (स्थानीय संवत का वर्ष 933) का है, और इसमें 270 और 50 में शून्य लिखे हैं।
  • बड़ा सास-बहू मंदिर कच्छपघात राजा महिपाल ने 1093 में पूरा करवाया।
  • तोमरों का शासन 1398 से शुरू हुआ; मान सिंह (1486-1516) ने टाइलों वाला मान मंदिर महल बनवाया; इब्राहिम लोदी ने 1518 में किला जीता।
  • जहाँगीर के समय किले में गुरु हरगोबिंद कैद रहे, जिनकी याद गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ में बसी है।
  • 1858 में तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर जीता, और रानी 17 या 18 जून को कोटा की सराय के पास मारी गईं।

चार उलझनें बार-बार सामने आती हैं। ASI के हिसाब से तेली का मंदिर 8वीं सदी के मध्य का है, इसलिए छोटे संदर्भ-ग्रंथों से 11वीं सदी वाली तारीख न उतारिए। ग्वालियर का शून्य भारत में पक्की तारीख वाला सबसे पुराना शून्य है, दुनिया का सबसे पुराना शून्य नहीं। “किलों में मोती” वाली पंक्ति बेवरिज के अनुवाद वाले बाबर के संस्मरण में नहीं है। और संगीत की क्रिएटिव सिटी शहर को मिला खिताब है, किले को मिली धरोहर-मान्यता नहीं।

चारों दर्जों को साथ-साथ रखकर इस तरह देखिए:

मान्यताइसका मतलबग्वालियर की स्थिति
विश्व धरोहर सूचीउत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य के लिए दर्ज संपत्तियाँकिला दर्ज नहीं
अस्थायी सूचीवे स्थल, जिन्हें कोई देश नामांकित करना चाहता हैकिला 8 फरवरी 2024 को सूची में आया
क्रिएटिव सिटीज नेटवर्ककिसी रचनात्मक क्षेत्र के लिए मान्यता पाने वाले शहरग्वालियर, संगीत नगरी, 2023
ASI संरक्षणराष्ट्रीय कानून के तहत केंद्र से संरक्षित स्मारककिले के स्मारक संरक्षित, भोपाल सर्कल

ग्वालियर किला उस अभ्यर्थी को सबसे ज्यादा देता है, जो इसे परतों में पढ़ता है। एक ही पहाड़ी पर 6ठी सदी से 19वीं सदी तक के सबूत हैं, और बहुत कम जगहें ऐसी हैं जो एक ही पैराग्राफ में सिलेबस का इतना बड़ा हिस्सा समेट दें। परतों को क्रम से याद कीजिए, फिर हर परत एक ऐसा उदाहरण बन जाएगी जिसे आप अलग-अलग उत्तरों में लगा सकते हैं, मंदिर वास्तुकला से लेकर 1857 के विद्रोह तक।

सामान्य प्रश्न

ग्वालियर किला किसने बनवाया?

ग्वालियर किला किसी एक राजा ने नहीं बनवाया। ASI इसके इतिहास को 5वीं सदी ईस्वी या उससे भी पहले तक ले जाता है, और कई राजवंशों ने इसमें कुछ न कुछ जोड़ा। इसका सबसे मशहूर महल, मान मंदिर महल, राजा मान सिंह तोमर ने बनवाया, जिन्होंने 1486 से 1516 तक राज किया।

ग्वालियर का किला कितना पुराना है?

ब्रिटानिका के मुताबिक किले का पहला जिक्र करीब 525 ईस्वी के एक मंदिर-शिलालेख में है, और ASI इसका इतिहास 5वीं सदी या उससे भी पहले तक ले जाता है। इसके सबसे पुराने खड़े मंदिर, तेली का मंदिर, को ASI 8वीं सदी के मध्य का मानता है।

क्या ग्वालियर किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

नहीं। ग्वालियर किला भारत की अस्थायी सूची में है, जिसमें इसे 8 फरवरी 2024 को मानदंड (ii) और (iv) के तहत भेजा गया, लेकिन इसे विश्व धरोहर सूची में दर्ज नहीं किया गया है। इससे अलग एक बात यह है कि ग्वालियर शहर 2023 में UNESCO की संगीत की क्रिएटिव सिटी बना।

ग्वालियर किले के शून्य में ऐसा खास क्या है?

छोटे-से चतुर्भुज मंदिर में 876 ईस्वी का एक समर्पण-शिलापट्ट है, जिसमें 270 और 50 की संख्याएँ शून्य के चिह्न के साथ लिखी गई हैं। गणितज्ञ बिल कैसलमैन इसे भारत का सबसे पुराना शून्य कहते हैं, जिसकी पक्की तारीख तय की जा सकती है। हालाँकि 2017 में बख्शाली पांडुलिपि की रेडियोकार्बन डेटिंग से संकेत मिला कि उस पांडुलिपि में शून्य इससे पहले के हैं।

ग्वालियर किले में मान मंदिर महल किसने बनवाया?

मान मंदिर महल राजा मान सिंह तोमर ने बनवाया, जिन्होंने 1486 से 1516 तक ग्वालियर पर राज किया। इसके पूर्वी हिस्से पर नीली, हरी और पीली टाइलों की पट्टियाँ हैं, जिनमें जानवरों और पेड़ों की आकृतियाँ बनी हैं। बाबर ने 1528 में इसे देखा, तो इसे राजाओं की सारी इमारतों में सबसे अच्छा बताया।

सिख इतिहास में ग्वालियर किला क्यों अहम है?

मुगल बादशाह जहाँगीर ने छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद, को ग्वालियर किले में कैद रखवाया। सिख परंपरा कहती है कि गुरु ने तब तक रिहाई लेने से मना कर दिया, जब तक उनके साथ कैद 52 सरदारों को भी न छोड़ा जाए, और किले के अंदर बना गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ इसी घटना की याद में है। उनकी कैद कितनी लंबी थी, इस पर विवाद है।

1858 में ग्वालियर में क्या हुआ?

1857-58 के विद्रोह के दौरान तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर के किलेबंद शहर पर कब्जा किया, उसका खजाना और शस्त्रागार अपने हाथ में लिया और नाना साहब को पेशवा घोषित किया। जून 1858 में रानी कोटा की सराय के पास लड़ते हुए मारी गईं, और उसी साल अंग्रेजों ने किला वापस ले लिया।

क्या ग्वालियर UNESCO की संगीत नगरी है?

हाँ। ग्वालियर 2023 में संगीत के क्षेत्र में UNESCO क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क से जुड़ा, और UNESCO इसे हिंदुस्तानी संगीत की ध्रुपद और खयाल शैलियों की जन्मभूमि बताता है। यह शहर को मिला खिताब है, किले को विश्व धरोहर सूची में मिली जगह नहीं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर के शिलालेख के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसकी तारीख 876 ईस्वी है, और इसमें 270 और 50 की संख्याएँ शून्य के चिह्न के साथ लिखी गई हैं।
2. यह दुनिया में कहीं भी शून्य के इस्तेमाल का सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) शिलालेख की तारीख 876 ईस्वी पक्की है, लेकिन 2017 में बख्शाली पांडुलिपि की रेडियोकार्बन डेटिंग से इससे पहले के शून्यों का संकेत मिला, इसलिए इसे दुनिया का सबसे पुराना शून्य नहीं कहा जा सकता।

2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ग्वालियर किले को 2024 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया गया।
2. ग्वालियर संगीत के क्षेत्र में UNESCO क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क का सदस्य है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b) किला 2024 में भारत की अस्थायी सूची में आया, लेकिन विश्व धरोहर सूची में दर्ज नहीं है; शहर 2023 में संगीत की क्रिएटिव सिटी बना।

3. ग्वालियर के सास-बहू मंदिरों में से बड़ा मंदिर, जो 1093 में पूरा हुआ, किस राजवंश के समय बना?

  • (a) गुर्जर-प्रतिहार
  • (b) कच्छपघात
  • (c) तोमर
  • (d) चंदेल

उत्तर: (b) ASI के मुताबिक कच्छपघात राजा महिपाल ने इसे 1093 में पूरा करवाया।

4. ग्वालियर किले के तेली का मंदिर के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसके ऊपरी ढाँचे में नागर आधार पर वलभी छत है।
2. ASI इसे 8वीं सदी के मध्य का मानता है।
3. इसे राजा मान सिंह तोमर ने बनवाया था।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) तेली का मंदिर मान सिंह से कोई सात सदी पुराना है; मान सिंह ने मान मंदिर महल बनवाया था।

5. ग्वालियर किले की पूर्वी चढ़ाई के दरवाजों में से कौन-सा दरवाजा 1660 में मुगल सूबेदार मोतमिद खान ने जोड़ा?

  • (a) हाथी पोल
  • (b) आलमगीरी दरवाजा
  • (c) गणेश दरवाजा
  • (d) लक्ष्मण दरवाजा

उत्तर: (b) आलमगीरी दरवाजा, जो छहों में सबसे नीचे है, उस समय के बादशाह औरंगजेब (आलमगीर) के नाम पर है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. आप कैसे समझाएँगे कि मध्यकालीन भारतीय मंदिरों की मूर्तियाँ उस समय के सामाजिक जीवन को दर्शाती हैं? (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर I।
  2. शैलकृत वास्तुकला प्रारंभिक भारतीय कला और इतिहास के बारे में हमारी जानकारी के सबसे अहम स्रोतों में से एक है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2020, GS पेपर I।
  3. “ग्वालियर किला कोई एक स्मारक कम, और भारतीय इतिहास का परतदार अभिलेखागार ज्यादा है।” इसके शिलालेखों, मंदिरों और महलों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  4. ग्वालियर को उदाहरण बनाकर UNESCO की विश्व धरोहर सूची, अस्थायी सूची और क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगलों तक ग्वालियर किले के राजकीय जेल के रूप में इस्तेमाल का पता लगाइए, और मूल्यांकन कीजिए कि यह भूमिका किले के सामरिक महत्व के बारे में क्या बताती है। (15 अंक, 250 शब्द)

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Written by

Ashish Shrivastav Sir

Ashish Shrivastav teaches Art and Culture and History at Anantam IAS. He works through temple architecture, painting, dance and the UNESCO sites the way Prelims actually asks about them, and links ancient and medieval material to GS I Mains answers.

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