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जंजीरा किला: सिद्दियों का वह द्वीप-किला जिसे शिवाजी और संभाजी भी नहीं जीत सके

जंजीरा किला आसान भाषा में: सिद्दी कौन थे, मुरुड के पास का यह द्वीप हर मराठा घेराबंदी को कैसे झेल गया, और खाड़ी के मुहाने पर समुद्र ने इसकी दीवारों का साथ कैसे दिया।

Dark stone walls and rounded bastions of Janjira Fort rising straight out of the Arabian Sea off Murud

जंजीरा किला समुद्र के बीच एक द्वीप पर बना समुद्री किला (जलदुर्ग) है। यह राजपुरी खाड़ी (creek) के मुहाने पर, महाराष्ट्र के रायगड जिले में मुरुड कस्बे के सामने खड़ा है, इसलिए लोग इसे मुरुड जंजीरा भी कहते हैं। करीब तीन सदियों तक यह सिद्दियों का ठिकाना रहा। सिद्दी अबीसीनियाई, यानी उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी, मूल के मुसलमान थे। शुरू में उन्होंने यह किला अहमदनगर के सुल्तानों की ओर से संभाला, और आखिर में वे एक छोटी रियासत के नवाब बन गए। यह रियासत 1948 में बंबई प्रांत में मिल गई। इस किले की साख एक ही रिकॉर्ड पर टिकी है: मराठा फौजों ने इसे एक सदी से ज्यादा समय तक घेरा, पहले छत्रपति शिवाजी महाराज के दौर में और फिर संभाजी के दौर में, लेकिन वे इसे कभी जीत नहीं पाईं।

जंजीरा किले का इतिहास पढ़ते समय तीन बातों पर लोग अक्सर गलती कर बैठते हैं। पहली बात नाम की है। “जंजीरा” अरबी शब्द जजीरा का मराठी रूप है, जिसका मतलब है द्वीप। यानी “जंजीरा किला” का सीधा अर्थ है द्वीप का किला। दूसरी गड़बड़ी तारीखों में होती है। लोकप्रिय किस्सों में कहा जाता है कि मलिक अंबर ने 1567 में यहाँ पत्थर का किला बनवाया, जबकि दरवाजे के ऊपर लगे तारीख वाले पत्थर पर 1694 लिखा है। तीसरी बात UNESCO की है। सिंधुदुर्ग और सुवर्णदुर्ग 2025 में UNESCO की सूची में आ गए, तो बहुत-से लोग मान लेते हैं कि जंजीरा भी आ गया होगा। ऐसा नहीं हुआ।

जंजीरा कहाँ है और किस बात के लिए जाना जाता है

किलेबंद यह द्वीप कोंकण तट पर राजपुरी खाड़ी के मुहाने के ठीक भीतर है, राजपुरी के किनारे से करीब आधा मील दूर। आज भी सैलानी राजपुरी जेटी से पाल वाली नावों में बैठकर यहाँ पहुँचते हैं। द्वीप मोटे तौर पर अंडाकार है। ऊँचे ज्वार के समय इसकी दीवारें सीधे पानी से उठती हैं, और उनकी ऊँचाई 45 से 50 फुट तक पहुँचती है। यहाँ से दो मील उत्तर-पश्चिम में, समुद्री खाड़ी की एक दूसरी चट्टान पर पद्मदुर्ग खड़ा है। यह मराठों का किला है, और इसकी नजर भी खाड़ी के उसी मुहाने पर रहती है।

तथ्यविवरण
जगहराजपुरी खाड़ी के मुहाने पर बना द्वीप, मुरुड के सामने, रायगड जिला, महाराष्ट्र
किसके कब्जे में रहासिद्दी, पहले अहमदनगर की ओर से कप्तान बनकर, बाद में जंजीरा रियासत के नवाब बनकर
मौजूदा दीवारें1694 में शुरू हुईं (दरवाजे के ऊपर तारीख वाला पत्थर) और 1707 में सिद्दी सुरुल खान के समय पूरी हुईं
प्रकारद्वीप पर बना समुद्री किला, कोलाबा गजेटियर की गिनती में उन्नीस बुर्ज (bastion)
झेली गई घेराबंदियाँशिवाजी (1661-1670 और 1676), संभाजी (1682), कोंकण का एक मराठा सूबेदार (1760)
नाम वाली तोपेंकलाल बांगडी, चावरी और लांडा कासम
संरक्षण की स्थितिभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), यानी केंद्रीय संरक्षण वाला स्मारक
UNESCO की स्थितिसूची में दर्ज नहीं, और 2025 के भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य (Maratha Military Landscapes of India) का हिस्सा भी नहीं
किस बात के लिए मशहूरघेराबंदी से कभी नहीं जीता गया; कोंकण तट पर सिद्दियों की नौसैनिक ताकत

सिद्दी कौन थे और जंजीरा उनके हाथ कैसे आया

सिद्दी उत्तर-पूर्वी अफ्रीका से सैनिक और नाविक बनकर दक्कन के दरबारों में पहुँचे थे। इनमें से बहुतों को गुलाम बनाकर लाया गया था, और फिर वे ऊँचे सैनिक पदों तक पहुँचे। गजेटियर उनके दोनों नामों की वजह भी बताते हैं। हब्शी शब्द उस अरबी शब्द से आया है जो अबीसीनिया के लोगों के लिए बोला जाता था। सिद्दी शुरू में इज्जत से पुकारने का एक शब्द था, जो सैयद का घिसा हुआ रूप है। बहमनी सल्तनत और उसके बाद बनी सल्तनतों के दौर में सिद्दी अफसर इतने आगे बढ़े कि कोंकण तट पर उनका अपना एक समुदाय बन गया।

उन्हें यह द्वीप पहली बार कैसे मिला, इस सवाल पर दस्तावेज और परंपरा अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं। अहमदनगर का एक इतिहास इसका श्रेय मलिक अहमद को देता है। वे निजामशाही राजवंश के संस्थापक थे, और उनका शासन 1490 से 1508 तक रहा। इस इतिहास के मुताबिक उन्होंने ही सबसे पहले अबीसीनियाई लोगों को इस द्वीप-किले का कप्तान बनाया। इतना तो तय है कि 1538 तक द्वीप पर एक किला मौजूद था, क्योंकि उस साल पुर्तगाली कप्तान डोम जोआओ डी कास्त्रो ने उसका वर्णन किया था।

कोली किला और संदूकों वाली कहानी

किले की शुरुआत की जो कहानी लोग सुनाते हैं, वह एक परंपरा है, और गजेटियर भी उसे परंपरा के तौर पर ही दर्ज करता है। क्लून्स की “इटिनरेरी” (यात्रा-पुस्तिका) में दिए एक ब्योरे के मुताबिक, उस समय द्वीप पर राम पाटिल नाम के एक कोली सरदार का कब्जा था। तभी पेरिम खान नाम का एक आदमी कुछ और अबीसीनियाई साथियों के साथ व्यापारियों के भेस में वहाँ पहुँचा। उसके जहाज पर बड़े-बड़े संदूक लदे थे, और कहा गया कि इनमें शराब और रेशम है। राम पाटिल ने उन्हें उतरने दिया, और किले के सिपाहियों ने वह शराब पी ली। फिर संदूकों से हथियारबंद लोग निकले और उन्होंने किले पर कब्जा कर लिया।

कहानी अच्छी है, और हो सकता है इसमें द्वीप पर बसे किसी कोली मछुआरा समुदाय की याद बची हो। फिर भी यह बाद के एक ही ब्योरे से आई कहानी है। किसी तारीख वाले स्रोत से न राम पाटिल की पुष्टि होती है, न संदूकों की। चाल से जीती गई किसी भी घेराबंदी के किस्से को आप जैसे देखते हैं, इसे भी वैसे ही देखिए: इसे परंपरा के तौर पर याद रखिए, किले की स्थापना की तारीख के तौर पर नहीं।

गवर्नर से शासक तक

स्थानीय दस्तावेज पहले सिद्दी गवर्नर का नाम सिद्दी सिरुल खान बताते हैं, जिनकी नियुक्ति 1618 में हुई। थोड़े अंतराल के बाद, 1621 में, उनकी जगह सिद्दी अंबर आए। उन्हें सनक, यानी “छोटा”, कहा जाता था, ताकि उन्हें उन बड़े मलिक अंबर से अलग पहचाना जा सके, जिन्होंने 1626 में अपनी मौत तक अहमदनगर की बागडोर संभाली। दो अंबरों की यही जोड़ी शायद उस लोकप्रिय धारणा की जड़ है कि जंजीरा मलिक अंबर ने बनवाया था।

अहमदनगर के पतन के बाद उसका कोंकण वाला इलाका बीजापुर के हाथ चला गया। बीजापुर के बेड़े के सबसे बड़े अबीसीनियाई अफसर को वजीर का दर्जा दिया गया, और साथ में नागोठाना से बाणकोट नदी तक का तट सौंपा गया। सिद्दियों की शासन-व्यवस्था का नियम अनोखा था। वजीर की मौत पर गद्दी उसके बेटे को नहीं मिलती थी, बल्कि बेड़े का पहला अफसर उसकी जगह लेता था। इसी वजह से यह द्वीप एक राजवंश से ज्यादा एक नौसैनिक कमान जैसा था।

शिवाजी जंजीरा क्यों नहीं जीत पाए

सीधा जवाब यह है: शिवाजी जंजीरा के आसपास की मुख्य भूमि तो जीत सकते थे, पर खुद द्वीप को नहीं। उनके पास न ऐसी भारी तोपें थीं जो इसकी दीवारें तोड़ सकें, न ऐसा बेड़ा था जो समुद्र के रास्ते इसकी रसद काट सके। दस्तावेज बताते हैं कि वे दस साल से ज्यादा समय तक पूरी ताकत से कोशिश करते रहे।

जंजीरा रियासत के 19वीं सदी के गजेटियर के हिसाब से घटनाओं का क्रम यह रहा:

  • 1648: छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिद्दी से कोलाबा के तीन किले जीते। इनमें रायरी भी था, वही पहाड़ी जो आगे चलकर रायगड बनी।
  • 1659: एक मराठा फौज ने सिद्दी के इलाके पर चढ़ाई की, और सिद्दी सेनापति फतेह खान ने उसे हरा दिया।
  • 1661: बरसात के मौसम में, बीजापुर के समुद्र के रास्ते मदद भेज पाने से पहले ही, शिवाजी ने मुख्य भूमि पर दंडा-राजपुरी जीत लिया। उन्होंने जंजीरा पर तोपों के मोर्चे खोले, लेकिन तोपें और तोपची न होने से वे कोई असर नहीं डाल पाए।
  • 1661-1670: वे हर मौसम में जंजीरा पर गोले बरसाते रहे, पर खास कामयाबी नहीं मिली।
  • 1670: एक जोरदार हमला, और साथ में फतेह खान को दिए गए प्रस्ताव, लगभग काम कर गए। फतेह खान ने हथियार डालने का फैसला कर लिया, लेकिन उनके तीन सिद्दी अफसरों ने, जिनमें संबल भी थे, उन्हें रोक दिया।
  • 1676: शिवाजी फिर से जंजीरा को घेरे हुए थे, तभी एक सिद्दी बेड़ा उसे छुड़ाने आ पहुँचा।

1670 के संकट ने सिद्दियों की राजनीति बदल दी। बीजापुर मदद नहीं कर पाया, तो वे मुगल साम्राज्य की ओर मुड़ गए। आगे चलकर सिद्दी सेनापति मुगल बेड़े के नौसेनापति बने। जिस किले को मराठा जीत नहीं पाए थे, अब उसके पीछे पूरा साम्राज्य खड़ा था।

जंजीरा की धाक तब तक जम चुकी थी। गजेटियर दर्ज करता है कि बंबई में बैठे अंग्रेज फैक्टरों, यानी कंपनी के व्यापारिक अफसरों, ने सूरत की अपनी काउंसिल को लिखा था कि बंबई छोड़ दी जाए और उसकी जगह जंजीरा ले लिया जाए। सोचिए, जिस कंपनी के हाथ में बंबई का बंदरगाह था, वही उसे मुरुड के सामने की एक चट्टान से बदलना चाहती थी। समुद्र की ओर से यह द्वीप इतना मजबूत दिखता था।

संभाजी की 1682 की घेराबंदी और वह जलमार्ग जिसे उन्होंने पाटने की कोशिश की

सबसे गंभीर कोशिश 1682 में छत्रपति संभाजी महाराज के समय हुई। उनके सेनापति दादाजी रघुनाथ देशपांडे को जंजीरा घेरने भेजा गया, और वादा किया गया कि किला जीतने पर उन्हें अष्टप्रधान, यानी आठ प्रमुख मंत्रियों, में जगह मिलेगी। फिर संभाजी खुद करीब 20,000 सैनिकों के साथ रायगड से घेराबंदी में शामिल हुए, और तीस दिन तक द्वीप पर गोले बरसाते रहे।

किला हाथ आते-आते रह गया। गोलाबारी से किलेबंदी को नुकसान पहुँचा। खंडोजी फर्जूद नाम के एक आदमी के जरिए किला सौंपने की एक साजिश भी लगभग कामयाब हो गई थी, तभी उसका भेद खुल गया। सिद्दी खैरियत की कमान में किले के सिपाही द्वीप के बीच की एक चट्टान की आड़ लेकर डटे रहे। उधर सिद्दी नौसेनापति कासिम ने संभाजी के बेड़े को समुद्री खाड़ी से खदेड़ दिया।

तब संभाजी ने सबसे साहसी तरकीब आजमाई। उन्होंने द्वीप और मुख्य भूमि के बीच की पानी की पट्टी को पत्थरों और चट्टानों के टुकड़ों से पाटना शुरू किया, ताकि एक पक्का रास्ता (causeway) बन जाए और उनकी फौज उस पर चलकर द्वीप तक पहुँच सके। गजेटियर के मुताबिक यह जलमार्ग करीब 800 गज चौड़ा था। काम पूरा होने से पहले ही उन्हें एक मुगल घुड़सवार फौज का सामना करने के लिए बुला लिया गया। उनके जाने के बाद दादाजी ने पाटने का काम छोड़ दिया। नावों से किया गया आखिरी हमला भी नाकाम रहा, और उसमें 200 सैनिक गँवाने पड़े।

इस पत्थर वाले रास्ते पर एक पल रुककर सोचिए। तरकीब सही थी, क्योंकि इससे द्वीप का किला जमीन का किला बन जाता। लेकिन इसके लिए दुश्मन की गोलाबारी के बीच महीनों की मेहनत चाहिए थी, और जमीन पर मुगलों के खतरे ने उनसे वही वक्त छीन लिया।

हाँ, मराठा इस समुद्री खाड़ी में एक स्थायी किला जरूर छोड़ गए। कोलाबा गजेटियर पद्मदुर्ग को, जिसे कासा या कांसा किला भी कहते हैं, करीब 1693 का बताता है। उस दौर के एक फारसी इतिहास-ग्रंथ में इसका नाम नए बने मराठा किलों में आता है। यह जंजीरा से दो मील उत्तर-पश्चिम में, तीन फैदम (fathom) गहरे पानी के बीच एक चट्टान पर खड़ा है, और इसमें छह बुर्ज हैं। फिर भी यह किला सिद्दियों को हटा नहीं पाया: जंजीरा उन्हीं का रहा, और इसकी दीवारें 1707 में सिद्दी सुरुल खान के समय पूरी हुईं।

पेशवा, अंग्रेज और जंजीरा रियासत का अंत

18वीं सदी में पेशवा जंजीरा के खिलाफ मैदान में उतरे। सिद्दी उनसे भी बच निकले, कभी संधि करके, कभी गठबंधन बनाकर। 1713 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ और कोलाबा के कान्होजी आंग्रे सिद्दियों के खिलाफ एक हो गए। उन्होंने सुरुल खान को झुकने पर मजबूर कर दिया, और 1714 की एक संधि में शर्तें तय हुईं। फिर 1736 की एक संधि ने तय किया कि सिद्दियों के पास कौन-सा इलाका बचेगा।

निर्णायक बचाव बाहर से आया। 1760 में कोंकण के मराठा सूबेदार रामाजी पंत ने एक पुर्तगाली टुकड़ी की मदद से मुख्य भूमि पर सिद्दियों की जमीनें छीन लीं और द्वीप को घेर लिया। जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों पर भारी मुसीबत टूटी। इसके बाद अंग्रेजों ने जंजीरा पर ब्रिटिश झंडा फहरा दिया, और मराठों को उस झंडे का लिहाज करने पर मजबूर किया। उसी साल सितंबर की एक संधि से सिद्दियों का इलाका उन्हें लौटा दिया गया।

उसके बाद जंजीरा एक आश्रित रियासत बनकर रह गया, और उसकी आजादी कदम-दर-कदम सिकुड़ती गई:

  • 1834: अंग्रेजों ने जंजीरा को ब्रिटिश सत्ता के अधीन घोषित किया और उसकी टकसाल बंद कर दी, जो खोटे सिक्के ढाल रही थी।
  • 1869: नवाब से फौजदारी मामलों का अधिकार छीन लिया गया, और एक रेजिडेंट ब्रिटिश अफसर ने राजनीतिक कामकाज अपने हाथ में ले लिया।
  • 1948: भारतीय रियासतों पर श्वेत पत्र में जंजीरा दक्कन स्टेट्स एजेंसी की रियासतों में गिना गया था, और इसी साल वह बंबई प्रांत में मिल गया। इन रियासतों ने 19 फरवरी 1948 से विलय समझौतों पर दस्तखत शुरू किए, और कोल्हापुर को छोड़कर बाकी सब बंबई में मिला दी गईं।

विलय के समय जंजीरा रियासत करीब 326 वर्ग मील में फैली थी, और उसकी आबादी 1 लाख से कुछ ज्यादा थी। गजेटियर के मुताबिक उसके शासक को नौ तोपों की सलामी मिलती थी। गजेटियर का आखिरी फैसला दो-टूक है: सिद्दी मराठों से ज्यादा दिन टिके, तो इसकी एक वजह यह भी थी कि उन्होंने होशियारी से कभी अंग्रेजों से, कभी पुर्तगालियों से दोस्ती गाँठे रखी। जंजीरा पर धावा बोलकर उसे कभी जीता नहीं गया, लेकिन उसे बचाने वाली सिर्फ उसकी दीवारें नहीं थीं।

समुद्र और खाड़ी ने जंजीरा की रक्षा कैसे की

जंजीरा चिनाई से पहले तटीय भूगोल का सबक है। द्वीप राजपुरी खाड़ी के मुहाने के ठीक भीतर है। यह उन बहुत-सी खाड़ियों में से एक है जो कोंकण के तटीय मैदान को जगह-जगह काटती हैं। खाड़ी घूमती हुई दक्षिण-पूर्व की ओर भीतर तक जाती है, इतना कि एक झील जैसी दिखने लगती है। और इसके मुहाने पर इसी चट्टानी द्वीप का पहरा है।

रक्षकों के लिए समुद्र ने चार काम किए:

  • इसने घेराबंदी की तोपों को दूर रखा। राजपुरी के किनारे पर लगी तोपों को पानी के पार से गोले दागने पड़ते थे। 1661 में शिवाजी के पास तोपें भी कम थीं और तोपची भी, इसलिए वे कोई असर नहीं डाल पाए।
  • इसने लड़ाई को ज्वार के हवाले कर दिया। गजेटियर नाविकों की एक दिशा-पुस्तिका के हवाले से बताता है कि बृहत ज्वार (spring tide) में पानी बारह फुट तक चढ़ जाता है। यानी दीवार का जो निचला हिस्सा भाटे के समय सूखा दिखता है, वह ज्वार के समय समुद्र के नीचे होता है। नावों से हमला करने वालों को चट्टानी नींव से भी जूझना पड़ता था, और पानी से 45 से 50 फुट ऊँची उठती दीवार से भी।
  • इसने किले को रसद का रास्ता दिया। जिस किले तक समुद्र से पहुँचा जा सकता था, उसे समुद्र से रसद भी पहुँचाई जा सकती थी, बशर्ते उसका अपना बेड़ा खाड़ी पर काबू रखे। और सिद्दी बेड़ा अक्सर काबू रखता था।
  • मानसून में यह रास्ता बंद हो जाता था। मानसून में मदद के लिए आने वाले बेड़ों के लिए समुद्र बंद हो जाता था। ठीक इसी वजह से शिवाजी ने 1661 की बरसात में दंडा-राजपुरी पर हमला किया, बीजापुर के मदद भेज पाने से पहले।

समुद्र के बीच टिके रहना एक और चीज से मुमकिन हुआ: मीठा पानी। रायगड जिला प्रशासन बताता है कि किले के भीतर मीठे पानी की दो छोटी प्राकृतिक झीलें हैं। नवाब का महल भी एक बड़े टांके (हौज) के चारों ओर बनाया गया था। चारों तरफ खारा पानी और भीतर मीठा पानी, इसी मेल ने किले के सिपाहियों को तीस दिन की गोलाबारी झेलने लायक बनाया।

मराठों के द्वीप-किलों से तुलना के लिए भी जंजीरा काम का उदाहरण है। 2025 की विश्व धरोहर सूची में मराठों के बनवाए या उनके कब्जे वाले तीन द्वीप-किले शामिल हैं। जंजीरा, जो कभी मराठों के हाथ नहीं आया, उनमें नहीं है।

जंजीरा की दीवारें, दरवाजे और तोपें

किले को समझने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप वैसे ही पहुँचिए जैसे कोई हमलावर पहुँचता, यानी राजपुरी से नाव में बैठकर।

मुख्य दरवाजा पूर्व की ओर है, राजपुरी के सामने, और यहाँ से सीढ़ियाँ नीचे पानी तक उतरती हैं। राज्य का पर्यटन विभाग बताता है कि इसे ऐसी जगह बनाया गया है कि नाव करीब 40 फुट पास आने पर ही यह दिखाई देता है। इसके बगल में एक नक्काशी है, जिसमें एक जानवर अपने पंजों में हाथियों को दबोचे हुए है। दरवाजे के ऊपर, लोहे की कीलों वाले भारी किवाड़ों के पास, एक सफेद पत्थर पर तारीख लिखी है: 1111 हिजरी, यानी 1694 ईस्वी। कोलाबा गजेटियर इसे मौजूदा दीवारों के बनने की शुरुआत मानता है। ये दीवारें 1707 में सिद्दी सुरुल खान के समय पूरी हुईं।

दीवारों पर कंगूरे बने हैं, और उनमें ढेर सारे मारक छेद हैं। मारक छेद (loophole) दीवार में बनी वह पतली झिरी है, जिससे रक्षक बाहर गोली चला सकता है, जबकि बाहर वाले को जवाबी वार के लिए लगभग कुछ भी खुला नहीं मिलता। दीवारों के सामने वाले हिस्सों की हिफाजत उन्नीस बुर्ज करते हैं। हर बुर्ज करीब अस्सी फुट चौड़ा और तीस फुट गहरा है, और दो बुर्जों के बीच करीब नब्बे फुट का फासला है। गिनती इस पर निर्भर करती है कि आप किसे गिन रहे हैं: राज्य का पर्यटन विभाग 26 तोप-बुर्जों की बात करता है।

पश्चिम में, खुले समुद्र की ओर, एक छोटा चोर दरवाजा (postern) है, यानी चुपके से आने-जाने के लिए बना पिछला दरवाजा। यह पानी से करीब बीस फुट ऊपर चिनाई के एक अर्धगोलाकार चबूतरे पर खुलता है, जिस पर बुर्जों की निगरानी रहती है। जिला प्रशासन इसे दरिया दरवाजा, यानी समुद्र की ओर का दरवाजा, कहता है। घेराबंदी के वक्त यही वह दरवाजा था, जिससे नावें चुपके से रसद अंदर ला सकती थीं या संदेशवाहक बाहर जा सकते थे। और यह उस तरफ था जहाँ जमीन पर लगी कोई तोप नहीं पहुँच सकती थी।

बुर्जों पर आज भी भारतीय और यूरोपीय बनावट की तोपें रखी हैं। जिला प्रशासन के ब्योरे में तीन बड़ी तोपों के नाम दर्ज हैं, और इनकी मार की दूरी से दुश्मन डरते थे:

  • कलाल बांगडी
  • चावरी
  • लांडा कासम

दीवारों के भीतर तराशे पत्थरों से बनी एक बड़ी हवेली के खंडहर हैं, और नवाब का महल भी, जो एक टांके के चारों ओर बना है। एक मस्जिद और मीठे पानी की दो झीलें भीतर की तस्वीर पूरी करती हैं। भीतर का ज्यादातर हिस्सा खंडहर है, और इसकी वजह गजेटियर ठीक-ठीक दर्ज करता है: 1860 में लगी एक आग ने इसका आधे से ज्यादा हिस्सा जला दिया, और रियासत के ढेरों कागजात नष्ट कर दिए। दीवारें आग से बच गईं, इसीलिए समुद्र की ओर से किला आज भी साबुत दिखता है।

जंजीरा आज: ASI का संरक्षण, पर UNESCO का दर्जा नहीं

जंजीरा किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत केंद्रीय संरक्षण वाला स्मारक है, और यहाँ काफी भीड़ रहती है। 2024-25 के ASI के टिकट आँकड़े 247,499 सैलानी दर्ज करते हैं, जबकि रायगड में यह संख्या 341,086 और लोहगड में 138,657 रही। साल भर में करीब ढाई लाख लोग, और सब के सब नाव से खारे पानी में खड़े एक खंडहर तक पहुँचते हैं। संरक्षण के लिहाज से यह सीढ़ियों वाले किसी पहाड़ी किले से बिल्कुल अलग समस्या है।

यह विश्व धरोहर स्थल नहीं है। भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य को 11 जुलाई 2025 को विश्व धरोहर समिति के 47वें सत्र में सूची में दर्ज किया गया। इसकी UNESCO सूची में बारह घटक हैं, और जंजीरा उनमें से एक नहीं है। हमारी साइट का इस सूचीकरण पर करेंट अफेयर्स नोट इन सभी घटकों के नाम देता है। भारत की बाकी सूची भारत में UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाली गाइड में है।

इतिहास जान लें तो यह गैरमौजूदगी समझ में आती है। 2025 की यह धरोहर उस सैन्य व्यवस्था का सम्मान करती है जो मराठों ने खड़ी की थी। जंजीरा वह किला है जिसे यही व्यवस्था जीत नहीं पाई, और इसके निर्माता सिद्दी थे। इसे सूची से बाहर रखना इसकी अहमियत पर कोई फैसला नहीं है। पर अगर आपके उत्तर में लिखा हो कि “जंजीरा मराठा UNESCO स्थल का हिस्सा है”, तो उसे गलत माना जाएगा।

परीक्षा के लिए जंजीरा कैसे पढ़ें

जंजीरा का किला आकार में छोटा है, पर सिलेबस में इसकी पहुँच उससे कहीं ज्यादा है:

  • मध्यकालीन इतिहास: सिद्दी, और समुद्र पर मराठा ताकत की सीमाएँ।
  • समाज और संस्कृति: भारत के अफ्रीकी प्रवासी समुदाय के एक अध्याय के रूप में सिद्दी।
  • आधुनिक इतिहास: एक छोटी समुद्री रियासत पर ब्रिटिश सर्वोच्चता, और 1948 में उसका विलय।
  • भूगोल: रक्षा-व्यवस्था के रूप में कोंकण तट की खाड़ियाँ और ज्वार।

मराठा वाला पहलू सबसे व्यापक रूप में पूछा जाता है। इतिहास ऑप्शनल 2026, पेपर I में यह प्रश्न आया: “शिवाजी से पेशवा बालाजी बाजीराव तक मराठा राजव्यवस्था के विकास-क्रम को रेखांकित कीजिए। मराठा राज्य पर पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) का क्या असर पड़ा? विश्लेषण कीजिए।” जंजीरा इस उत्तर को धार देता है। जिस राजव्यवस्था ने इतने सारे पहाड़ी किले जीते, वह एक द्वीप नहीं जीत पाई। और पानीपत ही वह मोड़ है, जिसके बाद अंग्रेज इस द्वीप को बचाने आगे आए।

इतिहास ऑप्शनल 2023, पेपर I ने इसका उल्टा सवाल पूछा: “मराठों ने मुगल साम्राज्य की अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा किया। चर्चा कीजिए।” जंजीरा इस उत्तर में भी जगह पाता है, क्योंकि 1670 के बाद सिद्दियों के मुगल सेवा में जाने से मराठा तट पर एक शाही बेड़ा आ खड़ा हुआ।

प्रीलिम्स की बात करें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति के तहत टैग हैं, यानी करीब पंद्रह में से एक। जंजीरा की UNESCO स्थिति जैसा दर्जे वाला जाल ठीक उसी तरह का कथन है, जिसे ये प्रश्न परखते हैं।

रिवीजन के लिए ये तथ्य साथ रखिए:

  • जंजीरा का मतलब है द्वीप, अरबी शब्द जजीरा से।
  • सिद्दी अबीसीनियाई मूल के थे; दस्तावेजों में दर्ज पहले सिद्दी गवर्नर की नियुक्ति 1618 में हुई।
  • मौजूदा दीवारें 1694 से 1707 के बीच की हैं, और गजेटियर की गिनती में इनमें उन्नीस बुर्ज हैं।
  • शिवाजी 1661 से 1670 तक और फिर 1676 में नाकाम रहे; संभाजी ने 1682 में जलमार्ग को पाटने की कोशिश की।
  • पद्मदुर्ग उसी खाड़ी में दो मील दूर का मराठा किला है, जो करीब 1693 का है।
  • ब्रिटिश झंडा 1761 में फहराया गया, और जंजीरा 1948 में बंबई में मिला।
  • ASI से संरक्षित, और UNESCO का घटक नहीं।

उलझनों को जोड़ियों में रखकर अलग-अलग याद कीजिए। मलिक अंबर अहमदनगर के रीजेंट थे, यानी सुल्तान के नाम पर राज चलाने वाले; “छोटा” कहलाने वाले सिद्दी अंबर जंजीरा के गवर्नर थे। जंजीरा सिद्दियों का किला था; 2025 की सूची वाले द्वीप-किले मराठों के किले थे। पद्मदुर्ग उसी खाड़ी पर नजर रखने वाला मराठा किला था, दोबारा बना जंजीरा नहीं।

किलाकिसने बनवाया या किसके कब्जे में रहाजगहसंरक्षण किसके पासUNESCO 2025
जंजीरासिद्दीखाड़ी के मुहाने पर द्वीपASIघटक नहीं
पद्मदुर्गमराठा, करीब 1693खाड़ी की चट्टान पर, जंजीरा से दो मील दूरपक्का पता नहींघटक नहीं
खांदेरीमराठाद्वीप-किलाराज्य का पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालयघटक
सुवर्णदुर्गमराठाद्वीप-किलाASIघटक
सिंधुदुर्गमराठाद्वीप-किलाASIघटक

किले हमेशा ताकतवर फौज के आगे गिर जाते हैं, इस धारणा को ठीक करने के लिए पूरे सिलेबस में जंजीरा से बेहतर उदाहरण नहीं है। लगभग पूरी सदी तक मराठा जमीन पर ज्यादा ताकतवर थे, फिर भी यहाँ नाकाम रहे, क्योंकि इस द्वीप ने मुकाबले को समुद्री ताकत का मुकाबला बना दिया। यह बात याद रखिए, तो मराठा ताकत पर और धरोहर सूचियों पर, दोनों तरह के आपके उत्तर ज्यादा धारदार होंगे।

सामान्य प्रश्न

जंजीरा किला किसने बनवाया?

जंजीरा किले की मौजूदा दीवारें इसके सिद्दी शासकों ने बनवाईं। दरवाजे के ऊपर लगे तारीख वाले पत्थर के मुताबिक काम 1694 में शुरू हुआ, और 1707 में सिद्दी सुरुल खान के समय पूरा हुआ। द्वीप पर इससे काफी पहले भी एक किला था, क्योंकि 1538 में एक पुर्तगाली कप्तान ने उसका वर्णन किया था। लोकप्रिय किस्से कहते हैं कि इसे मलिक अंबर ने 1567 में बनवाया, लेकिन गजेटियर के तारीख वाले सबूत इस बात का साथ नहीं देते।

जंजीरा किला कहाँ है?

जंजीरा किला राजपुरी खाड़ी के मुहाने पर एक द्वीप पर खड़ा है, महाराष्ट्र के रायगड जिले में मुरुड कस्बे के सामने। यह कोंकण तट पर राजपुरी के किनारे से करीब आधा मील दूर है। सैलानी राजपुरी जेटी से नाव लेकर यहाँ पहुँचते हैं।

जंजीरा के सिद्दी कौन थे?

सिद्दी अबीसीनियाई, यानी उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी, मूल के मुसलमान थे, जो सैनिक और नाविक बनकर दक्कन आए और ऊँचे पदों तक पहुँचे। जंजीरा पर उनका कब्जा पहले अहमदनगर के सुल्तानों की ओर से कप्तान के रूप में रहा, फिर बीजापुर के और उसके बाद मुगलों के अधीन। आगे चलकर उनके शासक जंजीरा रियासत के नवाब बने।

मराठा जंजीरा को कभी क्यों नहीं जीत पाए?

द्वीप की वजह से घेराबंदी की तोपें पानी के पार दूर ही रह जाती थीं, और ऊँचे ज्वार में इसकी दीवारें समुद्र से 45 से 50 फुट ऊपर उठती थीं। जब तक सिद्दी बेड़ा खाड़ी पर काबू रखता, समुद्र से रसद आती रहती थी, और किले के भीतर मीठा पानी भी था। सिद्दी गठबंधनों के सहारे भी बचे रहे, पहले मुगलों के साथ और बाद में अंग्रेजों के साथ।

क्या जंजीरा किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

नहीं। 2025 में दर्ज भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के बारह घटकों में जंजीरा शामिल नहीं है, और इसे अलग से भी सूची में दर्ज नहीं किया गया है। हाँ, इस सूची में मराठों के तीन द्वीप-किले जरूर हैं, जिनमें सिंधुदुर्ग और सुवर्णदुर्ग शामिल हैं।

जंजीरा किले की मशहूर तोपें कौन-सी हैं?

जंजीरा के बुर्जों पर रखी सबसे मशहूर तोप कलाल बांगडी है, और उसके साथ दो और बड़ी तोपों, चावरी और लांडा कासम, के नाम लिए जाते हैं। रायगड जिला प्रशासन के मुताबिक इनकी मार की दूरी से दुश्मन डरते थे। बुर्जों पर भारतीय और यूरोपीय बनावट की दूसरी तोपें भी रखी हैं।

जंजीरा किले में कितने बुर्ज हैं?

कोलाबा जिला गजेटियर जंजीरा की दीवारों पर उन्नीस बुर्ज गिनता है। हर बुर्ज करीब अस्सी फुट चौड़ा है, और बुर्जों के बीच करीब नब्बे फुट का फासला है। राज्य का पर्यटन विभाग 26 तोप-बुर्जों की बात करता है, यानी संख्या इस पर निर्भर है कि गिना क्या जा रहा है। रिवीजन के लिए गजेटियर के उन्नीस बुर्ज ही दस्तावेजों में दर्ज संख्या है।

जंजीरा रियासत भारत में कब शामिल हुई?

जंजीरा रियासत 1948 में बंबई प्रांत में मिल गई, उन दक्कन रियासतों में से एक के तौर पर जिन्होंने फरवरी 1948 से विलय समझौतों पर दस्तखत किए। इसके नवाब को पेंशन देकर विदा किया गया, और यह इलाका बाद में कोलाबा जिले का हिस्सा बना, जिसे अब रायगड कहते हैं। विलय के समय रियासत करीब 326 वर्ग मील में फैली थी।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. जंजीरा किले के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जंजीरा नाम द्वीप के लिए इस्तेमाल होने वाले अरबी शब्द से आया है।
2. जंजीरा भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य के घटकों में से एक है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) जंजीरा शब्द जजीरा यानी द्वीप से बना है; यह 2025 में दर्ज बारह घटकों में शामिल नहीं है।

2. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वीप-किला भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य की 2025 की विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है?

  • (a) खांदेरी
  • (b) सुवर्णदुर्ग
  • (c) जंजीरा
  • (d) सिंधुदुर्ग

उत्तर: (c) जंजीरा सिद्दियों का किला था, और यह इस सूची का घटक नहीं है।

3. 1682 में संभाजी की जंजीरा घेराबंदी के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उन्होंने द्वीप और मुख्य भूमि के बीच के जलमार्ग को पत्थरों से पाटने की कोशिश की।
2. घेराबंदी सिद्दी सेना के आत्मसमर्पण के साथ खत्म हुई।
3. भीतर से किला सौंपने की एक साजिश पकड़ी गई।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 3
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) किले की सेना ने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया; पत्थरों का रास्ता पूरा होने से पहले ही संभाजी को वापस बुला लिया गया।

4. जंजीरा पर राज करने वाले सिद्दी किस मूल के थे?

  • (a) फारसी
  • (b) तुर्की
  • (c) अबीसीनियाई
  • (d) अरब

उत्तर: (c) सिद्दी, जिन्हें हब्शी भी कहा जाता था, अबीसीनियाई यानी उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी मूल के थे।

5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. कलाल बांगडी : जंजीरा की तोप
2. पद्मदुर्ग : जंजीरा के पास का मराठा किला
3. जाफराबाद : काठियावाड़ में जंजीरा के अधीन इलाका
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d) तीनों युग्म सही हैं; जंजीरा को 1759 में काठियावाड़ तट पर जाफराबाद मिला था।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. “जंजीरा जितना अपनी दीवारों के दम पर बचा, उतना ही कूटनीति के दम पर भी।” सिद्दियों के बदलते गठबंधनों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. जंजीरा की तटीय स्थिति ने उसकी रक्षा-व्यवस्था को कैसे आकार दिया और मराठा घेराबंदियों की नाकामी में कैसे योगदान दिया, इसका परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  3. जंजीरा के सिद्दी भारत के अफ्रीकी प्रवासी समुदाय का एक अध्याय हैं। दक्कन में और कोंकण तट पर उनके सत्ता तक पहुँचने की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
  5. 1947 के बाद जंजीरा जैसी छोटी रियासतों को भारतीय प्रांतों में किस प्रक्रिया से मिलाया गया, और इसका क्या महत्व था, चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

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Written by

Kaustubh Gaurh Sir

Kaustubh Gaurh teaches Ancient and Medieval History at Anantam IAS. He moves between dynasties, temple architecture and the Bhakti and Sufi traditions, and draws on Indian philosophical thought to ground GS IV ethics answers in more than the standard Western thinkers.

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