इमैनुएल कांट (1724-1804) जर्मन दर्शन के सबसे प्रभावशाली विचारक थे। उनकी डिओन्टोलॉजिकल नैतिकता (Deontological Ethics) — जिसे कर्तव्य-आधारित नैतिकता भी कहते हैं — इस विचार पर आधारित है कि नैतिकता परिणामों पर नहीं, बल्कि कर्तव्य और नियम पर निर्भर करती है। UPSC GS IV में कांट की विचारधारा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. अच्छी इच्छाशक्ति (Good Will)
कांट के अनुसार केवल अच्छी इच्छाशक्ति (Good Will) बिना किसी शर्त के नैतिक रूप से अच्छी है। बुद्धि, साहस, धन — ये सभी अच्छी इच्छाशक्ति के बिना हानिकारक हो सकते हैं। एक व्यक्ति जो सही काम केवल परिणामों के भय से या इनाम की उम्मीद में करता है — वह वास्तव में नैतिक नहीं है।
2. श्रेणीबद्ध अनिवार्यता (Categorical Imperative)
कांट का सर्वप्रसिद्ध सिद्धांत श्रेणीबद्ध अनिवार्यता (Categorical Imperative) है। इसके तीन रूप हैं:
- सार्वभौमिकता का सूत्र: “केवल उस नियम के अनुसार कार्य करो जिसे तुम यह चाहते हो कि वह सार्वभौमिक नियम बन जाए।” (Act only according to that maxim by which you can also will that it should become a universal law.)
- मानवता का सूत्र: “मनुष्यों को सदैव साध्य (End) के रूप में व्यवहार करो, कभी केवल साधन (Means) के रूप में नहीं।”
- स्वायत्तता का सूत्र: नैतिक प्राणी स्वयं को कानून देते हैं — वे किसी बाहरी शक्ति से नहीं, अपनी तर्कशील प्रकृति से निर्देशित होते हैं।
3. सशर्त बनाम श्रेणीबद्ध अनिवार्यता
| सशर्त अनिवार्यता (Hypothetical Imperative) | श्रेणीबद्ध अनिवार्यता (Categorical Imperative) |
|---|---|
| “यदि तुम स्वस्थ रहना चाहते हो तो व्यायाम करो” | “झूठ मत बोलो” — बिना किसी शर्त के |
| साधन-साध्य संबंध पर आधारित | बिना शर्त, कर्तव्य-आधारित |
| परिस्थिति पर निर्भर | सार्वभौमिक और अपरिवर्तनीय |
कांट की आलोचना
- कठोरता: “झूठ मत बोलो” — भले ही झूठ बोलकर किसी की जान बच सकती हो?
- परिणामों की उपेक्षा: परिणाम पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हो सकते।
- नियमों का टकराव: जब दो कर्तव्य आपस में टकराएँ — “सत्य बोलो” और “जीवन बचाओ” — तो कांट के पास स्पष्ट उत्तर नहीं है।
UPSC सिविल सेवा और कांट
कांट की विचारधारा सिविल सेवा में प्रासंगिक है:
- नागरिकों को साध्य मानें, साधन नहीं — नीति निर्माण में जन-कल्याण सर्वोपरि।
- कर्तव्य-पालन अपरिहार्य है — लोकप्रियता या परिणाम की परवाह किए बिना।
- भ्रष्टाचार कांटीय दृष्टिकोण से दोहरा अपराध है — यह न केवल हानिकारक है, बल्कि किसी को साधन के रूप में इस्तेमाल करता है।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS IV में कांट की श्रेणीबद्ध अनिवार्यता, अच्छी इच्छाशक्ति, और “मनुष्य साध्य है” — ये अवधारणाएँ अक्सर पूछी जाती हैं। इन्हें परिणामवाद (Consequentialism) और सद्गुण नैतिकता (Virtue Ethics) से तुलना कर उत्तर देने से अंक बढ़ते हैं।