IPCC AR6 रिपोर्ट यानी जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change) की छठी आकलन रिपोर्ट — जलवायु तंत्र पर अब तक का सबसे व्यापक वैज्ञानिक हिसाब-किताब। यह अगस्त 2021 से मार्च 2023 के बीच किस्तों में आई, और इसमें तीन कार्यसमूह रिपोर्टें, तीन विशेष रिपोर्टें, राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस सूची की पद्धति में एक संशोधन, और आख़िर में एक संश्लेषण रिपोर्ट शामिल थी, जिसने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के वार्ताकारों के लिए लगभग एक दशक का जलवायु विज्ञान निचोड़कर रख दिया। IPCC AR6 रिपोर्ट नीति नहीं बताती, लेकिन विकल्पों की सूची भी साफ़ करती है और कुछ न करने की क़ीमत भी।
IPCC AR6 रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष दो-टूक है। इंसानी असर ने धरती को औद्योगिक दौर से पहले के स्तर (1850–1900 आधार वर्ष) से क़रीब 1.1 °C गर्म कर दिया है, इसमें कोई शक नहीं बचा। और मौजूदा नीतियों पर चलते रहे तो 2100 तक दुनिया 2.7–3.1 °C गर्मी की राह पर है। पेरिस समझौते का ज़्यादा महत्वाकांक्षी लक्ष्य, यानी 1.5 °C पर रोक, अब यह माँगता है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 2025 से पहले चरम पर पहुँचकर घटना शुरू हो जाए और 2030 तक 2019 के स्तर से 43 प्रतिशत नीचे आ जाए।
IPCC क्या है और कैसे काम करता है
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल 1988 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने बनाया था। यह ख़ुद कोई मूल शोध नहीं करता। इसके बजाय सैकड़ों वैज्ञानिक बिना पैसे लिए छपे हुए साहित्य का आकलन करते हैं — भौतिक विज्ञान का, प्रभाव और अनुकूलन का, और जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपायों का। हर रिपोर्ट विशेषज्ञों और सरकारों की तीन दौर की समीक्षा से गुज़रती है, और उसे 195 सदस्य सरकारों की मौजूदगी वाली पूर्ण बैठक में लाइन-दर-लाइन आख़िरी शक्ल दी जाती है।
छह आकलन चक्र
पहली आकलन रिपोर्ट (FAR, 1990) से ही मूल UNFCCC का ढाँचा बना। इसके बाद के चक्रों — SAR (1995), TAR (2001), AR4 (2007), AR5 (2014) और अब AR6 (2021–2023) — ने कारण-निर्धारण, समुद्र-स्तर के अनुमान, क्षेत्रीय प्रभाव और शमन के रास्तों पर भरोसे का स्तर लगातार बेहतर किया। AR6 नए औज़ार लाई: साझा सामाजिक-आर्थिक रास्तों (SSPs) का ज़्यादा पूरा सेट, क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन का एक “एटलस”, और हानि तथा क्षति पर एक बहुत बड़ा अध्याय।
AR6 चक्र का ढाँचा
IPCC AR6 रिपोर्ट कोई एक किताब नहीं है। यह तीन कार्यसमूहों का मिला-जुला आकलन है, जिसके साथ विशेष रिपोर्टें और एक संश्लेषण रिपोर्ट जुड़ी हैं।
कार्यसमूह I: भौतिक विज्ञान का आधार
अगस्त 2021 में आई WG-I रिपोर्ट, Climate Change 2021: The Physical Science Basis, का निष्कर्ष था कि:
- इंसान से हुई गर्मी में कोई शक नहीं — पहली बार IPCC ने “unequivocal” शब्द बिना किसी शर्त के लिखा।
- 2011–2020 में वैश्विक सतही तापमान 1850–1900 के मुक़ाबले क़रीब 1.09 °C ज़्यादा था।
- 1850 के बाद का हर बीता दशक अपने पिछले हर दशक से ज़्यादा गर्म रहा है, लगातार चार दशकों तक।
- दिखाई दे रहे कई बदलाव — भीषण गर्मी, समुद्री लू, भारी बारिश, खेती और पारिस्थितिकी वाला सूखा — हज़ारों साल में नहीं देखे गए थे।
- कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य (SSP1-1.9) में भी वैश्विक गर्मी 2030 के दशक की शुरुआत में 1.5 °C तक पहुँचेगी, उसके बाद शायद थम जाए।
कार्यसमूह II: प्रभाव, अनुकूलन और संवेदनशीलता
फ़रवरी 2022 में आई Climate Change 2022: Impacts, Adaptation and Vulnerability ने “जलवायु-सहनशील विकास” की भाषा दी और यह निष्कर्ष निकाला कि:
- क़रीब 3.3 से 3.6 अरब लोग ऐसे हालात में रहते हैं जो जलवायु परिवर्तन के आगे बहुत कमज़ोर हैं।
- सेहत, खाद्य सुरक्षा, पानी, पारिस्थितिकी तंत्र और रोज़ी-रोटी पर बुरा असर पहले से फैला हुआ है, और सबसे ज़्यादा बोझ ग़रीबों, औरतों, बच्चों और आदिवासी समुदायों पर पड़ रहा है।
- जलवायु-सहनशील विकास की खिड़की बंद होती जा रही है। क़रीब 1.5 °C के आगे कुछ पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए अनुकूलन के विकल्प बुरी तरह सिमट जाते हैं।
कार्यसमूह III: जलवायु परिवर्तन का शमन
अप्रैल 2022 में आई Climate Change 2022: Mitigation of Climate Change ने जवाबी उपायों का आकलन किया:
- 2019 में इंसानी गतिविधियों से कुल शुद्ध GHG उत्सर्जन क़रीब 59 गीगाटन CO₂-समकक्ष पहुँच गया, जो इंसानी इतिहास में सबसे ज़्यादा है।
- 2010 और 2019 के बीच उत्सर्जन 12 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन बढ़ने की रफ़्तार पिछले दशक के मुक़ाबले धीमी पड़ी।
- 2010 से 2019 के बीच सोलर PV, पवन और लिथियम-आयन बैटरी की प्रति इकाई लागत क्रमशः 85, 55 और 85 प्रतिशत गिरी, जिससे शमन के मुमकिन विकल्पों की सूची ही बदल गई।
- बिना या बहुत कम ओवरशूट के गर्मी 1.5 °C पर रोकने का मतलब है 2030 तक वैश्विक GHG उत्सर्जन में 43 प्रतिशत की कटौती और क़रीब 2050 तक शुद्ध-शून्य CO₂।
विशेष रिपोर्टें
AR6 चक्र में तीन विशेष रिपोर्टें आईं:
- Global Warming of 1.5 °C (SR1.5, 2018)।
- Climate Change and Land (SRCCL, 2019)।
- The Ocean and Cryosphere in a Changing Climate (SROCC, 2019)।
संश्लेषण रिपोर्ट
20 मार्च 2023 को आई AR6 संश्लेषण रिपोर्ट ने तीनों कार्यसमूहों और विशेष रिपोर्टों को नीति बनाने वालों के लिए एक जगह जोड़ा। इसका मूल संदेश: “इस दशक में जो चुनाव और जो काम किए जाएँगे, उनका असर अभी भी पड़ेगा और हज़ारों साल तक भी”।
1.5°C का रास्ता
1.5 °C का लक्ष्य राजनीतिक रूप से 2015 में पेरिस के COP21 में जन्मा और वैज्ञानिक रूप से 2018 की SR1.5 ने इसे पढ़ा। AR6 ने गणित की तस्दीक़ की, पर समय-सीमा और कस दी।
1.5°C के लिए क्या चाहिए
- वैश्विक CO₂ उत्सर्जन को 2030 तक 2019 के स्तर से क़रीब 48 प्रतिशत गिरना होगा और क़रीब 2050 तक शुद्ध शून्य पर पहुँचना होगा।
- सभी GHG उत्सर्जन को 2030 तक 2019 के मुक़ाबले क़रीब 43 प्रतिशत गिरना होगा।
- मीथेन, जो दूसरी सबसे अहम ग्रीनहाउस गैस है, 2030 तक क़रीब एक-तिहाई घटानी होगी।
- नवीकरणीय ऊर्जा को 2030 तक दुनिया की 60 प्रतिशत या उससे ज़्यादा बिजली देनी होगी।
- कोयला, जिसमें कार्बन कैप्चर नहीं है, OECD अर्थव्यवस्थाओं में 2030 तक और पूरी दुनिया में 2040 तक ख़त्म होना चाहिए।
कार्बन बजट
1.5 °C से नीचे रहने के 50 प्रतिशत मौक़े के लिए बचा हुआ कार्बन बजट 2020 की शुरुआत से क़रीब 500 GtCO₂ आँका गया था — और दुनिया इसे लगभग 40 GtCO₂ सालाना की रफ़्तार से ख़र्च कर रही है। इसी रफ़्तार पर चले तो यह 2032 से पहले ख़त्म हो जाएगा।
ओवरशूट और हटाना
AR6 पाती है कि 1.5 °C के ज़्यादातर रास्तों में अब कुछ न कुछ ओवरशूट मानकर चला जा रहा है — यानी तापमान थोड़े वक़्त के लिए 1.5 °C पार करेगा और फिर कार्बन हटाकर उसे नीचे लाया जाएगा। हटाने की तकनीकों में वनरोपण, कार्बन कैप्चर और भंडारण के साथ जैव-ऊर्जा (BECCS), सीधे हवा से कार्बन खींचना, मिट्टी में कार्बन, ब्लू कार्बन और चट्टानों का बढ़ाया हुआ अपक्षय शामिल हैं। इनमें से कोई भी अब तक उस पैमाने पर नहीं लगी है जितना मॉडल वाले रास्ते मान लेते हैं।
AR6 रिपोर्ट में भारत
तीनों कार्यसमूहों में भारत का ज़िक्र बार-बार है — एक ऐसे क्षेत्र के रूप में भी जिस पर भौतिक ख़तरा भारी है, और एक बड़े उत्सर्जक के रूप में भी जिसके शमन वाले चुनाव पूरी दुनिया की दिशा तय करेंगे।
भारत के लिए भौतिक ख़तरे
WG-I और क्षेत्रीय एटलस भारत के लिए यह अनुमान लगाते हैं:
- हर परिदृश्य में दक्षिण एशियाई ग्रीष्मकालीन मानसून का तेज़ होना, और साल-दर-साल उतार-चढ़ाव का बढ़ना।
- लू की बारंबारता और तीव्रता का बढ़ना, जिसमें सिंधु-गंगा का मैदान सबसे गर्म बिंदु है।
- हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियरों का पीछे हटना, जिसका असर गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र घाटियों पर पड़ेगा।
- बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के तटों पर समुद्र-स्तर का बढ़ना, जहाँ मध्यम परिदृश्यों में सदी के मध्य तक 1995–2014 के स्तर से 25–35 सेमी ऊपर जाने का अनुमान है।
- अरब सागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का ज़्यादा तीव्र होना — यह रुझान 2000 के दशक से दर्ज हो चुका है।
प्रभाव और अनुकूलन
WG-II भारत को उन क्षेत्रों में गिनती है जिन पर एक साथ कई जलवायु ख़तरे पड़ते हैं। एक हद के बाद गेहूँ और चावल की पैदावार गिरती है; मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे तटीय शहरों पर समुद्र-स्तर और तूफ़ानी लहरों के मेल से बाढ़ का ख़तरा है; और सुंदरबन, पश्चिमी घाट तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्रों पर ऐसा ख़तरा है जो उन्हें बदलकर ही रख दे।
शमन के रास्ते
WG-III भारत की अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) वाली प्रतिबद्धताओं को मानती है:
- 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत नीचे लाना।
- 2030 तक कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करना।
- जंगल और पेड़ों से 2.5–3 GtCO₂-समकक्ष का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना।
- 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन पर पहुँचना — यह लक्ष्य ग्लासगो के COP26 में घोषित हुआ था।
भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन आज भी वैश्विक औसत का लगभग एक-तिहाई है, और ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन में उसका हिस्सा दुनिया के कुल का 4 प्रतिशत से भी कम है — AR6 रिपोर्ट इस बात को समानता और साझा लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारी तथा संबंधित क्षमता (CBDR-RC) के ढाँचे में स्वीकार करती है। इन मुद्दों पर भारत की कूटनीति के लिए देखिए UNFCCC का COP-28।
अनुकूलन, हानि और क्षति
AR6 का एक अलग योगदान यह था कि उसने अनुकूलन तथा हानि और क्षति को ज़्यादा साफ़ ढंग से सामने रखा।
अनुकूलन की सीमाएँ
रिपोर्ट नरम सीमाओं और कठोर सीमाओं में फ़र्क़ करती है। नरम सीमाएँ आम तौर पर पैसे, संस्थाओं या जानकारी की होती हैं; कठोर सीमा वह है जहाँ कोई भी अनुकूलन नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त ख़तरे को रोक नहीं सकता। मूँगा चट्टानें क़रीब 1.5 °C पर कठोर सीमा से टकरा जाती हैं; कुछ छोटे द्वीपीय देश और नीचे बसे तटीय समुदाय 2 °C के आगे इसी हाल में पहुँच जाते हैं।
हानि और क्षति
WG-II ने हानि और क्षति के लिए अब तक का सबसे मज़बूत वैज्ञानिक ढाँचा दिया — यानी वे आर्थिक और ग़ैर-आर्थिक नुक़सान जिन्हें अनुकूलन से बचाया नहीं जा सकता। यही ढाँचा सीधे COP27 (शर्म अल-शेख़, 2022) में हानि और क्षति कोष बनने और COP28 (दुबई, 2023) में उसके चालू होने की वजह बना।
AR6 में पद्धति के नए प्रयोग
साझा सामाजिक-आर्थिक रास्ते (SSPs)
पुराने RCP की जगह AR6 ने पाँच SSP इस्तेमाल किए, जो सामाजिक-आर्थिक कहानियों को उत्सर्जन की राहों से जोड़ते हैं: SSP1 (टिकाऊपन), SSP2 (बीच का रास्ता), SSP3 (क्षेत्रीय होड़), SSP4 (ग़ैर-बराबरी) और SSP5 (जीवाश्म ईंधन वाला विकास)। हर एक के साथ एक विकिरण बल का स्तर जुड़ा है — मसलन SSP1-1.9 गर्मी को 1.5 °C के आसपास रखता है, जबकि SSP5-8.5 उस भविष्य की लकीर खींचता है जिसमें 2100 तक क़रीब 4 °C की गर्मी है।
भरोसे और संभावना की भाषा
AR6 ने IPCC की अंशांकित भाषा बनाए रखी और उसे और पैना किया। “very likely” (90–100 प्रतिशत संभावना), “high confidence” और “robust evidence with high agreement” जैसे वाक्यांशों के तय मतलब हैं, जो अनिश्चितता को बिना पतला किए बताने के लिए बनाए गए हैं।
आलोचनाएँ और सीमाएँ
IPCC AR6 रिपोर्ट की वैज्ञानिक कड़ाई की तारीफ़ हुई है, पर उस पर सवाल भी उठे हैं:
- समानता का सवाल: विकासशील देशों की कई सरकारें और शोधकर्ता कहते हैं कि शमन वाले अध्यायों में संचयी उत्सर्जन की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को अब भी कम जगह मिली है।
- कार्बन हटाने पर निर्भरता: 1.5 °C के ज़्यादातर रास्ते ऐसी हटाने वाली तकनीकों के बड़े पैमाने पर लगने को मान लेते हैं, जो अभी उस पैमाने पर साबित ही नहीं हुई हैं।
- टिपिंग पॉइंट को कम आँकना: कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्कटिक समुद्री बर्फ़, ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिक बर्फ़ की चादरों, अमेज़न के सूखने और पर्माफ़्रॉस्ट से मीथेन निकलने पर AR6 का रुख़ बहुत सतर्क है।
- नीति में अनुवाद: नीति निर्माताओं के लिए बने सारांश सरकारों के साथ शब्द-दर-शब्द तय होते हैं, जिससे नीचे के तकनीकी अध्यायों में मौजूद कुछ बातें नरम पड़ जाती हैं।
आगे का रास्ता
2023 में तय हुआ AR7 चक्र क़रीब 2028 से रिपोर्ट देना शुरू करेगा। तब तक IPCC AR6 रिपोर्ट के नीतिगत मतलब साफ़ हैं:
- शमन का काम इसी दशक में आगे खींचिए। दुनिया भर में उत्सर्जन 2025 से पहले चरम पर पहुँचे।
- पैसा बढ़ाइए। अनुकूलन के लिए पैसा 2030 तक लगभग चार गुना होना चाहिए; शमन के लिए तीन से छह गुना।
- हानि और क्षति कोष को चालू कीजिए, ऐसे योगदान के साथ जिन पर भरोसा किया जा सके।
- जलवायु जोखिम को भीतर तक बिठाइए — समष्टि आर्थिक योजना, संप्रभु क़र्ज़ के ढाँचों, बुनियादी ढाँचे के मानकों और आपदा प्रतिक्रिया में।
- शमन और अनुकूलन को साथ जोड़िए, जलवायु-सहनशील विकास के रास्तों के ज़रिए — यह वाक्यांश AR6 ने ही गढ़ा और अब IPCC की बहस के केंद्र में है।
भारत के लिए IPCC AR6 रिपोर्ट चेतावनी भी है और नक़्शा भी। देश ठीक उस चौराहे पर खड़ा है जहाँ भौतिक ख़तरा ज़्यादा है, ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी कम है और शमन का मौक़ा बड़ा है। कोयले, नवीकरणीय ऊर्जा, खेती, शहरीकरण और वन क्षेत्र पर वह जो चुनाव करेगा, वह सिर्फ़ उसकी अपनी विकास यात्रा नहीं, वैश्विक कार्बन बजट का भी एक ठीक-ठाक हिस्सा तय करेगा।
सामान्य प्रश्न
IPCC AR6 रिपोर्ट क्या है?
यह जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की छठी आकलन रिपोर्ट है, जो अगस्त 2021 से मार्च 2023 के बीच आई। इसमें तीन कार्यसमूह रिपोर्टें, तीन विशेष रिपोर्टें, एक पद्धति संशोधन और आख़िर में एक संश्लेषण रिपोर्ट शामिल हैं।
AR6 संश्लेषण रिपोर्ट कब आई?
20 मार्च 2023 को, जिसमें तीनों कार्यसमूह रिपोर्टों और AR6 चक्र की विशेष रिपोर्टों के निष्कर्ष एक साथ जोड़े गए।
IPCC में कितने कार्यसमूह हैं?
तीन। WG-I भौतिक विज्ञान के आधार का आकलन करता है, WG-II प्रभाव, अनुकूलन और संवेदनशीलता का, और WG-III शमन का।
1.5°C का रास्ता क्या है?
यह उत्सर्जन की उन राहों का सेट है जो वैश्विक गर्मी को औद्योगिक दौर से पहले के स्तर से 1.5 °C तक रोकती हैं। AR6 ने पाया कि इसके लिए 2030 तक वैश्विक GHG उत्सर्जन 2019 के स्तर से 43 प्रतिशत घटाना होगा और क़रीब 2050 तक शुद्ध-शून्य CO₂ पर पहुँचना होगा।
भारत का शुद्ध-शून्य लक्ष्य क्या है?
भारत ने ग्लासगो के COP26 (2021) में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया था, और साथ में 2030 के लिए उत्सर्जन तीव्रता, ग़ैर-जीवाश्म बिजली क्षमता तथा कार्बन सिंक वाले नज़दीकी लक्ष्य भी रखे।
साझा सामाजिक-आर्थिक रास्ते क्या हैं?
SSP पाँच कहानियाँ हैं जो सामाजिक-आर्थिक हालात को उत्सर्जन की राहों से जोड़ती हैं। AR6 ने भविष्य की जलवायु का मॉडल बनाने के लिए इनका इस्तेमाल किया, जिससे अकेले पुराने RCP ढाँचे की जगह ले ली गई।
हानि और क्षति का एजेंडा क्या है?
हानि और क्षति उन जलवायु नुक़सानों को कहते हैं जिन्हें न शमन से टाला जा सकता है, न अनुकूलन से। AR6 ने इसका वैज्ञानिक ढाँचा मज़बूत किया, और उसी से COP27 में हानि और क्षति कोष बनने की राह खुली।
IPCC AR6 रिपोर्ट नीति के लिहाज़ से क्यों मायने रखती है?
रिपोर्ट नीति नहीं बताती, लेकिन वह वैज्ञानिक आधार देती है जिस पर सरकारें सहमत होती हैं — और उसी पर UNFCCC के फ़ैसले, देशों की NDC, केंद्रीय बैंकों के तनाव परीक्षण, अदालती फ़ैसले और कंपनियों के खुलासे के मानक टिके होते हैं।