भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है, फिर भी प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों से बहुत कम है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से निपटने के लिए भारत ने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर महत्त्वाकांक्षी कदम उठाए हैं।
राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना (NAPCC)
2008 में भारत ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change — NAPCC) जारी की। इसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं:
- राष्ट्रीय सौर मिशन
- बढ़ी हुई ऊर्जा दक्षता मिशन
- टिकाऊ आवास मिशन
- राष्ट्रीय जल मिशन
- हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र रखरखाव मिशन
- हरित भारत मिशन
- टिकाऊ कृषि मिशन
- जलवायु परिवर्तन के लिए रणनीतिक ज्ञान मिशन
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ
INDCs और NDCs
पेरिस समझौते (2015) के तहत भारत ने अपने NDC (Nationally Determined Contributions) में निम्नलिखित प्रतिबद्धताएँ दीं:
- 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 2005 की तुलना में 45% कमी
- 2030 तक 50% बिजली गैर-जीवाश्म ईंधन से
- 2070 तक नेट-ज़ीरो (Net-Zero) उत्सर्जन
पंचामृत (Panchamrit)
COP26 (ग्लासगो, 2021) में प्रधानमंत्री मोदी ने पाँच लक्ष्य प्रस्तुत किए — “पंचामृत”:
- 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता
- 2030 तक 50% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से
- 2030 तक 1 बिलियन टन CO₂ में कमी
- 2030 तक GDP उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी
- 2070 तक नेट-ज़ीरो
प्रमुख नीतिगत पहलें
- LiFE मिशन (Lifestyle for Environment): नागरिकों को पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने हेतु प्रेरणा
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत की अगुवाई में 120 देशों का गठबंधन
- CDRI (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure): जलवायु-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे के लिए
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
भारत का जलवायु न्याय का तर्क
भारत का मानना है कि ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए विकसित देश मुख्यतः ज़िम्मेदार हैं। अतः विकासशील देशों को विकास का अधिकार है और विकसित देशों को तकनीक हस्तांतरण और वित्त प्रदान करना चाहिए। Climate Finance के रूप में $100 बिलियन प्रति वर्ष की माँग भारत करता रहा है।
यूपीएससी की दृष्टि से
जलवायु परिवर्तन GS-III (पर्यावरण) और GS-II (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) दोनों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। NAPCC के 8 मिशन, NDC लक्ष्य और COP प्रक्रिया — ये सभी याद करने योग्य हैं।