73वें और 74वें संशोधन ने स्थानीय सरकारें तो बना दीं, पर उन्हें काम, पैसा और अमला हक़ के तौर पर देने से इनकार कर दिया। ज़मीनी लोकतंत्र का हर आकलन इसी छूटी हुई बात पर टिकता है।
यह PSIR Optional Notes का 26वाँ अध्याय है, जो पेपर I के भारतीय शासन और राजनीति वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
ज़मीनी लोकतंत्र: पंचायती राज और नगरीय शासन; 73वें और 74वें संशोधनों का महत्व; ज़मीनी आंदोलन।
एक पन्ने में
- अनुच्छेद 40 ने ग्राम पंचायतों को नीति निदेशक तत्वों में रखा, जिन्हें अदालत में लागू नहीं कराया जा सकता। उन्हें संवैधानिक दर्जा दिलाने में चार दशक और दो संशोधन लग गए।
- बलवंतराय मेहता समिति (1957) ने तीन स्तर की व्यवस्था और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की सिफ़ारिश की; अशोक मेहता समिति (1978) ने दो स्तर सुझाए, साथ ही पार्टियों की खुली भागीदारी; एल.एम. सिंघवी (1986) ने सबसे पहले संवैधानिक दर्जे का सुझाव दिया, और ग्राम सभा को बुनियाद बताया।
- 73वें संशोधन (1992, लागू 24 अप्रैल 1993) ने भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी: 20 लाख से ऊपर की आबादी पर तीन स्तर, पाँच साल का कार्यकाल, भंग होने के छह महीने के भीतर चुनाव, और आरक्षण — SC, ST के लिए, साथ ही महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई।
- 74वें संशोधन (1992, लागू 1 जून 1993) ने नगरपालिकाओं के लिए भाग IXA और बारहवीं अनुसूची जोड़ी, जिसमें तीन तरह की संस्थाएँ, वार्ड समितियाँ, और वही आरक्षण की व्यवस्था है।
- अनुच्छेद 243A के तहत ग्राम सभा गाँव के सभी पंजीकृत मतदाताओं की संवैधानिक संस्था है, और भारतीय व्यवस्था में सीधे लोकतंत्र वाली यह अकेली संस्था है।
- अनुच्छेद 243ZD के तहत ज़िला योजना समितियाँ अनिवार्य हैं, और गाँव की योजना को शहर की योजना से जोड़ने वाला कब्ज़ा इन्हीं को माना गया था। ज़्यादातर काग़ज़ पर मौजूद हैं, योजना बहुत कम बनाती हैं।
- ढाँचे की गड़बड़ यह है कि अनुच्छेद 243G और 243W कहते हैं कि विधायिका स्थानीय निकायों को शक्तियाँ दे सकती है। यानी अधिकार सौंपना मर्ज़ी की बात रह गया, और राज्यों ने असमान रूप से सौंपा है, वापस भी लिया है।
- PESA (1996) भाग IX को पाँचवीं अनुसूची वाले इलाक़ों तक ले जाता है, जहाँ ग्राम सभा की शक्तियाँ ज़्यादा हैं — ज़मीन पर, लघु वन उपज पर, और अधिग्रहण के लिए सहमति देने पर।
संवैधानिक दर्जे तक का रास्ता
सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और राष्ट्रीय प्रसार सेवा (1953) ऊपर से प्रशासन के दम पर चलाए गए, और लोगों की भागीदारी न होने से नाकाम रहे। बलवंतराय मेहता समिति (1957) ने यही मर्ज़ पकड़ा। उसने तीन स्तर की व्यवस्था सुझाई — गाँव में ग्राम पंचायत, ब्लॉक पर पंचायत समिति, ज़िले पर ज़िला परिषद — जिसमें धुरी ब्लॉक को माना गया। इसे सबसे पहले राजस्थान ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में अपनाया, उसके बाद आंध्र प्रदेश ने।
1960 और 1970 के दशकों में यह व्यवस्था बिखर गई, क्योंकि राज्य चुनाव टालते रहे और निकायों को भंग करते रहे। अशोक मेहता समिति (1978) ने दो स्तर की व्यवस्था सुझाई, जिसमें बुनियाद मंडल पंचायत हो, राजनीतिक दल खुलकर हिस्सा लें, और कर लगाने की शक्ति अनिवार्य हो। जी.वी.के. राव समिति (1985) ने ज़िले को फिर से केंद्र में रखा, और एल.एम. सिंघवी समिति (1986) ने दो निर्णायक सुझाव दिए: संवैधानिक दर्जा, और ग्राम सभा को विकेंद्रित लोकतंत्र की बुनियाद के तौर पर मान्यता।
64वाँ संशोधन विधेयक (1989) राज्यसभा में गिर गया। 73वाँ और 74वाँ संशोधन 1992 में पास हुए। 73वाँ अप्रैल 1993 में लागू हुआ, 74वाँ जून 1993 में।
73वाँ संशोधन: भाग IX
अनिवार्य और मर्ज़ी वाले प्रावधान
परीक्षा के लिहाज़ से सबसे काम की बात यही फ़र्क़ है।
| अनिवार्य | मर्ज़ी पर | |
|---|---|---|
| ग्राम सभा (243A); 20 लाख से ऊपर की आबादी पर तीन स्तर (243B); हर स्तर की सभी सीटों पर सीधा चुनाव (243C); SC और ST के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण, और सभी सीटों में कम से कम एक-तिहाई महिलाओं के लिए (243D); पाँच साल का कार्यकाल, जिसमें चुनाव कार्यकाल पूरा होने से पहले और भंग होने के छह महीने के भीतर (243E); राज्य निर्वाचन आयोग (243K); हर पाँच साल पर राज्य वित्त आयोग (243I) | ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों पर योजना बनाने और कार्यक्रम चलाने की शक्तियाँ पंचायतों को देना (243G); कर, शुल्क और पथकर लगाने की छूट देना (243H); पंचायतों में सांसदों और विधायकों का प्रतिनिधित्व; पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण (243D(6)) |
अनुच्छेद 243O अदालतों को चुनाव से जुड़े मामलों में दख़ल देने से रोकता है, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और सीटों का बँटवारा भी आता है। रास्ता सिर्फ़ चुनाव याचिका का है।
ग्राम सभा
2024 के सवाल में ग्राम सभा को ऐसा मंच बताया गया था जो लोगों की सामूहिक समझ, उनकी आकांक्षाओं और उनकी इच्छा को आवाज़ देता है। उत्तर में इस बात को व्यवहार की कसौटी पर तौलना होगा।
डिज़ाइन में यह संविधान की पूरी योजना में सीधे लोकतंत्र वाली अकेली संस्था है: गाँव का हर पंजीकृत मतदाता इसका सदस्य है, और इसके सोचे गए कामों में सालाना योजना और बजट मंज़ूर करना, योजनाओं के लाभार्थी चुनना, सामाजिक अंकेक्षण करना, और उपयोगिता प्रमाणपत्र देना शामिल है। MGNREGA और वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत इसकी शक्तियाँ क़ानूनी हैं और ठोस भी। अनुसूचित इलाक़ों में PESA के तहत ज़मीन अधिग्रहण से पहले इससे सलाह लेनी होती है, और लघु वन उपज पर इसी का नियंत्रण है।
व्यवहार में गणपूर्ति ही अक्सर पूरी नहीं होती, बैठकें रस्मी होती हैं या काग़ज़ पर गढ़ ली जाती हैं, दबंग जातियाँ और बड़े किसान कार्यवाही चलाते हैं, महिलाएँ आती तो हैं पर बोलती कम हैं, और सभा उस पंचायत सचिव के भरोसे रहती है जो राज्य के प्रशासन को जवाब देता है। 1996 से चला केरल का जन योजना अभियान और मध्य प्रदेश का ग्राम स्वराज प्रयोग वे उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि राज्य सचमुच अधिकार सौंप दे तो क्या होता है।
स्थानीय शासन में महिलाएँ
2025 के प्रश्नपत्र ने महिलाओं की भागीदारी में आने वाली अड़चनें पूछी थीं, इसलिए अड़चनों से पहले आरक्षण की बात रखनी होगी। अनुच्छेद 243D(3) महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटें और उतने ही अध्यक्ष पद आरक्षित करता है; क़रीब बीस राज्यों ने अपने क़ानून से इसे पचास प्रतिशत कर दिया है, और लगभग 14 लाख महिलाएँ स्थानीय पदों पर हैं — दुनिया में चुनी हुई महिलाओं का इससे बड़ा समूह कहीं नहीं है।
अड़चनें, महत्व के क्रम में:
- सरपंच पति, यानी पद पर महिला और काम पति या घर का कोई मर्द चलाए। यही सबसे बड़ी अड़चन है, और इसके सबूत हर तरफ़ दर्ज हैं।
- आरक्षित सीटों का हर चुनाव में बदल जाना, जिससे न पद पर बने रहने का फ़ायदा मिलता है, न तजुर्बा जमता है, न अपना जनाधार बनता है। इसीलिए महिलाएँ लगातार दो कार्यकाल कम ही कर पाती हैं।
- पढ़ाई और जानकारी की कमी, जिसे वे नियम और बढ़ा देते हैं जिनके तहत अफ़सर लिखित अंग्रेज़ी या दफ़्तरी हिंदी में बात करते हैं।
- जाति और वर्ग, जो लिंग के आर-पार काटते हैं: दबंग जाति वाले गाँव में दलित महिला सरपंच के सामने अड़चन का दर्जा ही अलग होता है।
- वक़्त की तंगी, जो घर और देखभाल के बिना पैसे वाले काम से आती है, साथ ही आने-जाने पर लगी रोकें, और मर्दों के साथ बैठक में जाने पर लगी रोकें।
- अविश्वास प्रस्ताव, जिनका इस्तेमाल महिला अध्यक्षों को हटाने में होता है, और हिंसा या उसका डर।
फिर भी असर के सबूत सकारात्मक हैं और इन्हें उत्तर में देना चाहिए: पश्चिम बंगाल और राजस्थान पर चट्टोपाध्याय-डुफ़्लो के काम में पाया गया कि आरक्षित पंचायतों ने उन सार्वजनिक सुविधाओं पर ज़्यादा ख़र्च किया जिन्हें महिलाओं ने अपनी प्राथमिकता बताया था, ख़ास तौर पर पीने के पानी पर। यह भी पाया गया कि महिला नेताओं को देख लेने के बाद उनके ख़िलाफ़ मतदाताओं का पूर्वाग्रह घट गया।
74वाँ संशोधन: भाग IXA
शहरी निकाय तीन तरह के हैं: नगर पंचायत उस इलाक़े के लिए जो गाँव से शहर बनने की राह पर है, छोटे शहरी इलाक़े के लिए नगर परिषद, और बड़े के लिए नगर निगम। अनुच्छेद 243S के तहत तीन लाख या उससे ज़्यादा आबादी वाली नगरपालिकाओं में वार्ड समितियाँ अनिवार्य हैं। बारहवीं अनुसूची अठारह काम गिनाती है — शहरी नियोजन और भूमि उपयोग के नियमन से लेकर जलापूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य, झुग्गी सुधार और शहरी ग़रीबी हटाने तक।
2023 के सवाल ने पूछा था कि क्या यह क़ानून आज भी अधूरा सपना है। ईमानदार जवाब है — काफ़ी हद तक हाँ, और इसकी वजहें ढाँचे में हैं।
- काम। अनुच्छेद 243W मर्ज़ी पर छोड़ता है। शहर में जो काम सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं — शहरी नियोजन, पानी, परिवहन — वे आम तौर पर राज्य के क़ब्ज़े वाले विकास प्राधिकरणों और सरकार के बनाए अलग निगमों के पास रहते हैं। यानी चुनी हुई नगरपालिका कोई योजना बनाती ही नहीं।
- पैसा। अपनी कमाई कमज़ोर है; संपत्ति कर का न ठीक से आकलन होता है, न ठीक से वसूली; और राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों पर अक्सर अमल ही नहीं होता। GDP के अनुपात में भारत की नगरपालिकाओं की आमदनी उन देशों से बहुत कम है जिनसे तुलना बनती है।
- अमला। कर्मचारी आम तौर पर राज्य के संवर्ग के होते हैं, जो चुनी हुई परिषद को नहीं, ऊपर जवाब देते हैं।
- महापौर। ज़्यादातर राज्यों में महापौर का कार्यकाल एक साल या ढाई साल का है, और उनके पास कार्यकारी अधिकार है ही नहीं; वह राज्य के नियुक्त किए नगर आयुक्त के पास होता है। शहर के लिए मुख्यमंत्री जैसा कोई पद है ही नहीं।
- चुनाव। अनुच्छेद 243U के बावजूद कई राज्यों में ये बार-बार टलते हैं, और अनुच्छेद 243ZG चुनावी मामलों में अदालत के दख़ल को सीमित करता है।
अनुच्छेद 243ZD के तहत ज़िला योजना समितियाँ, जिन पर 2023 में सवाल आया था, हर राज्य में अनिवार्य हैं। इनका काम पंचायतों और नगरपालिकाओं की बनाई योजनाओं को जोड़कर ज़िले के लिए एक मसौदा विकास योजना बनाना है, और इनके चार-पाँचवें सदस्य ज़िला पंचायत के चुने हुए सदस्यों में से चुने जाते हैं, या नगरपालिकाओं के, गाँव और शहर की आबादी के अनुपात में। अनुच्छेद 243ZE के तहत महानगर योजना समितियाँ दस लाख से ऊपर के इलाक़ों पर लागू होती हैं। दोनों ही लगभग बेकार पड़ी हैं: ज़्यादातर राज्यों ने इन्हें देर से बनाया, कई ने कभी कोई योजना बनाई ही नहीं, और जहाँ योजनाएँ हैं भी, वे राज्य के बजट से शायद ही जुड़ पाती हैं। केरल यहाँ भी जाना-पहचाना अपवाद है।
ज़मीनी आंदोलन
पाठ्यक्रम की इस पंक्ति में आंदोलन भी आते हैं, जिन्हें अध्याय 32 विस्तार से लेता है। यहाँ जोड़ने लायक़ बात यह है कि संशोधनों ने संस्थाएँ बनाईं और आंदोलनों ने ताक़त बनाई, और दोनों एक-दूसरे से टकराते-मिलते रहे हैं: सूचना के अधिकार का अभियान मज़दूर किसान शक्ति संगठन की उस माँग से शुरू हुआ था कि गाँव के स्तर पर मज़दूरी के रिकॉर्ड दिखाए जाएँ, और वही आगे चलकर RTI अधिनियम 2005 बना; MGNREGA में सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधान सीधे उसी से उतरे हैं; और वन अधिकार अधिनियम 2006 दावों का फ़ैसला ग्राम सभा के हाथ में देता है, जिससे एक आंदोलन की माँग क़ानूनी शक्ति बन जाती है।
बहस: क्या 73वाँ और 74वाँ संशोधन कामयाब रहे?
हाँ। इनसे क़रीब 2.5 लाख स्थानीय सरकारें बनीं और तीस लाख से ज़्यादा चुने हुए प्रतिनिधि, जिनमें लगभग 14 लाख महिलाएँ हैं। स्थानीय प्रतिनिधि शासन का इससे बड़ा प्रयोग दुनिया में कहीं नहीं हुआ। इन्होंने चुनाव अनिवार्य और नियमित बनाए, जिससे निकायों को अनिश्चित काल तक भंग रखने का चलन ख़त्म हुआ। इन्होंने दलितों, आदिवासियों और महिलाओं को उतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक पद तक पहुँचाया जितना कोई और उपाय नहीं पहुँचा सका, और सबूत बताते हैं कि इससे यह भी बदल जाता है कि गाँव में बनता क्या है। नहीं। बिना ताक़त के प्रतिनिधित्व सीमित उपलब्धि है। तीन F — काम (functions), पैसा (funds) और अमला (functionaries) — इन तीनों का सौंपा जाना मर्ज़ी पर छोड़ दिया गया। इसलिए स्थानीय निकाय प्राथमिकता तय करने वाली सरकारें नहीं, राज्य की योजनाएँ चलाने वाली एजेंसियाँ बने रह गए। समानांतर संस्थाएँ इन्हें किनारे कर देती हैं; ज़िला योजना समितियाँ योजना बनाती ही नहीं; महापौर के पास कार्यकारी अधिकार नहीं; सरपंच पति महिलाओं के प्रतिनिधित्व को पतला कर देता है; और दबंग जातियों ने ख़ुद को इन नई संस्थाओं पर क़ब्ज़े के लिए ढाल लिया है। परीक्षक वाली पंक्ति। लोकतंत्र वाली उपलब्धि को शासन वाली उपलब्धि से अलग रखिए। राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के औज़ार के तौर पर ये संशोधन किसी भी तुलनीय उपाय से आगे निकले; विकेंद्रित सरकार खड़ी करने के औज़ार के तौर पर ये डिज़ाइन से ही अधूरे हैं, क्योंकि अनुच्छेद 243G और 243W वहाँ “सकती है” कहते हैं जहाँ उन्हें “करेगी” कहना चाहिए था। इलाज नई संस्थाएँ बनाने वाला एक और संशोधन नहीं है, बल्कि ऐसा संशोधन है जो अधिकार सौंपना बाध्यकारी बना दे — एक ऐसी सूची के साथ जो 29 और 18 में से हर विषय किसी एक तय स्तर के नाम कर दे।
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- यह लिखना कि संशोधनों ने 29 और 18 विषय सौंप दिए। उन्होंने इन्हें गिनाया भर, और सौंपना राज्य विधायिकाओं पर छोड़ दिया। पूरी दिक़्क़त यही है।
- ग्यारहवीं अनुसूची (पंचायतें, 29 विषय) को बारहवीं (नगरपालिकाएँ, 18 विषय) से गड्डमड्ड कर देना।
- ग्राम सभा को पंचायत का एक अंग मान लेना। यह सभी पंजीकृत मतदाताओं की संस्था है, और अनुच्छेद 243A के तहत संविधान में अलग खड़ी है।
- अनुसूचित इलाक़ों को छूने वाले किसी भी उत्तर में PESA (1996) छोड़ देना। इसके तहत ग्राम सभा की शक्तियाँ भाग IX वाली शक्तियों से ज़्यादा हैं।
- महिला आरक्षण को हल हो चुकी बात की तरह पेश करना। सरपंच पति और सीटों का बदलते रहना — परीक्षक इन्हीं दो अड़चनों के नाम की उम्मीद करता है।
- शहरी स्थानीय शासन पर महापौर बनाम आयुक्त वाली बात के बिना लिखना। कार्यकारी अधिकार राज्य के नियुक्त व्यक्ति के पास होना ही वह वजह है जिससे नगरपालिकाएँ शासन नहीं कर पातीं।
पहले पूछा जा चुका है
- राजनीतिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया में स्थानीय शासन में महिलाओं की भागीदारी की अड़चनें बताइए। (2025, पेपर I, 20 अंक)
- 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है कि यह अधिनियम आज भी एक अधूरा सपना है? अपना पक्ष रखिए। (2023, पेपर I, 20 अंक)
- पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभा एक ऐसा मंच है जो लोगों की सामूहिक समझ, आकांक्षाओं और इच्छा को आवाज़ देता है। टिप्पणी कीजिए। (2024, पेपर I, 10 अंक)
- ज़िला योजना समिति के कार्य। (2023, पेपर I, 10 अंक)
उत्तर का ढाँचा
74वें संविधान संशोधन अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है कि यह अधिनियम आज भी एक अधूरा सपना है? (20 अंक, 350 शब्द)
शुरुआत। उत्तर के दो हिस्से हैं। प्रावधान कसकर गिना दीजिए, फिर दूसरे हिस्से की दलील तीन F के ढाँचे पर खड़ी कीजिए।
प्रावधान। भाग IXA और बारहवीं अनुसूची; अनुच्छेद 243Q के तहत तीन तरह की नगरपालिकाएँ; 243R में सीधा चुनाव; तीन लाख से ऊपर के शहरों में वार्ड समितियाँ (243S); SC, ST के लिए और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण (243T); पाँच साल का कार्यकाल, चुनाव कार्यकाल पूरा होने से पहले (243U); राज्य निर्वाचन आयोग (243ZA); राज्य वित्त आयोग (243Y); ज़िला और महानगर योजना समितियाँ (243ZD, 243ZE)।
काम। अनुच्छेद 243W मर्ज़ी पर छोड़ता है। शहरी नियोजन, पानी और परिवहन राज्य के विकास प्राधिकरणों के पास हैं, या अलग निगमों के, इसलिए चुनी हुई संस्था योजना बहुत कम बनाती है।
पैसा। अपनी कमाई कमज़ोर, संपत्ति कर का आकलन कम, अनुदान पर निर्भरता, और राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशें अक्सर अनसुनी।
अमला। राज्य संवर्ग के कर्मचारी, जो ऊपर जवाब देते हैं; कार्यकारी अधिकार राज्य के नियुक्त नगर आयुक्त के पास, और महापौर का कार्यकाल छोटा, अधिकार शून्य।
जो सचमुच चला। नियमित चुनाव, निकायों को अनिश्चित काल तक भंग रखने का अंत, आरक्षण जिससे दलित और महिलाएँ शहरी पदों तक पहुँचीं, और एक संवैधानिक न्यूनतम, जिससे नीचे अब कोई राज्य नहीं जा सकता।
निष्कर्ष। यह नाकाम नहीं, अधूरा है। क़ानून ने संस्था बना दी और अधिकार रोक लिया। इलाज है — अधिकार सौंपना बाध्यकारी करना, हर विषय किसी एक स्तर के नाम करने वाली सूची, और सीधे चुना हुआ महापौर जिसके पास कार्यकारी शक्ति हो; और संस्थाएँ गिनाने से कुछ नहीं होगा।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- अनुच्छेद 40; बलवंतराय मेहता 1957 में तीन स्तर, नागौर 2 अक्टूबर 1959; अशोक मेहता 1978 में दो स्तर और मंडल; जी.वी.के. राव 1985; एल.एम. सिंघवी 1986 में संवैधानिक दर्जा और ग्राम सभा; 64वाँ संशोधन विधेयक 1989 में गिरा।
- 73वाँ संशोधन 1992, लागू 24 अप्रैल 1993, भाग IX और ग्यारहवीं अनुसूची, 29 विषय। 74वाँ संशोधन, लागू 1 जून 1993, भाग IXA और बारहवीं अनुसूची, 18 विषय।
- अनिवार्य: ग्राम सभा 243A, 20 लाख से ऊपर तीन स्तर 243B, सीधा चुनाव 243C, आरक्षण 243D, पाँच साल और छह महीने में दोबारा चुनाव 243E, राज्य निर्वाचन आयोग 243K, राज्य वित्त आयोग 243I। मर्ज़ी पर: 243G, 243H, पिछड़े वर्ग का आरक्षण।
- शहरी: नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम; तीन लाख से ऊपर वार्ड समितियाँ; ज़िला योजना समिति 243ZD; महानगर योजना समिति 243ZE, दस लाख से ऊपर।
- पाँचवीं अनुसूची वाले इलाक़ों के लिए PESA 1996; वन अधिकार अधिनियम 2006, जो दावों का फ़ैसला ग्राम सभा को देता है; MGNREGA का सामाजिक अंकेक्षण; MKSS के अभियान से निकला RTI 2005।
- महिलाएँ: कम से कम एक-तिहाई, क़रीब बीस राज्यों में पचास प्रतिशत, लगभग 14 लाख चुनी हुई महिलाएँ; अड़चनें — सरपंच पति, सीटों का बदलना, पढ़ाई, जाति, वक़्त की तंगी, अविश्वास प्रस्ताव से हटाया जाना।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।