UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

खुली-अंत प्रापण नीति (Open-Ended Procurement) के दोष — यूपीएससी अर्थव्यवस्था

भारत की खुली-अंत प्रापण नीति FCI से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर असीमित चावल-गेहूँ ख़रीदवाती है। बफ़र मानक से कई गुना अधिक स्टॉक, राजकोषीय भार, फ़सल विकृति एवं भू-जल संकट — सुधार के विकल्प जानें।

Flaws in the Open-Ended Procurement Policy (UPSC Economy) — UPSC featured image

भारत की खुली-अंत प्रापण नीति (Open-Ended Procurement Policy) का अर्थ है कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) एवं राज्य एजेंसियाँ किसानों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर प्रस्तुत सम्पूर्ण चावल एवं गेहूँ की ख़रीद करती हैं — कोई ऊपरी सीमा नहीं है। इस नीति का उद्देश्य किसानों को उचित एवं लाभकारी मूल्य प्रदान करना तथा संकटग्रस्त बिक्री (distress sale) रोकना था। परंतु व्यवहार में यह बफ़र मानकों से कहीं अधिक अनाज भंडारों, बढ़ती राजकोषीय लागत, विकृत फ़सल पैटर्न, तथा परंपरागत अनाज-कटोरा राज्यों में भू-जल अति-दोहन का कारण बनी है। MSP एवं PDS के भविष्य पर बहस का यह केंद्रीय विषय है।

1960-70 के दशक में हरित क्रांति के दौर में अनाज-न्यूनता थी; तब “जो आ जाए, सब ख़रीद लो” की नीति न्यायसंगत थी। आज भारत सरप्लस-उत्पादक है — फिर भी नीति वही है। यूपीएससी जीएस-III में यह विषय खाद्य सुरक्षा, बफ़र भंडार, MSP विवाद, कृषि विविधीकरण एवं राजकोषीय अनुशासन — सभी से जुड़ता है।

पृष्ठभूमि: वर्तमान प्रापण ढाँचा

MSP की घोषणा 23 फ़सलों के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफ़ारिशों के आधार पर होती है, परंतु केवल चावल एवं गेहूँ की ही बड़े पैमाने पर ख़रीद होती है — मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों से। प्रापण FCI एवं राज्य-स्तरीय विकेंद्रीकृत प्रापण (DCP) एजेंसियों के माध्यम से होता है।

बफ़र भंडार मानक — तिमाही आधार पर परिभाषित — केंद्रीय पूल में लगभग 30 मिलियन टन चावल + गेहूँ की माँग करते हैं। वास्तविक भंडार प्रायः 60-80 मिलियन टन को पार कर जाते हैं — बफ़र आवश्यकता का दोगुने से अधिक। यह “अतिरिक्त बीमा” अनाज सरकार की तिजोरी पर सीधा बोझ है।

खुली-अंत प्रापण के दोष

1. FCI पर राजकोषीय बोझ

अधिक प्रापण FCI की आर्थिक लागत को प्रति वर्ष दसियों हज़ार करोड़ रुपए तक बढ़ा देता है — भंडारण, परिवहन एवं ब्याज वहन लागत। पहले FCI राष्ट्रीय लघु बचत निधि (NSSF) से उधार लेकर सब्सिडी जारी राशि एवं वास्तविक लागत के बीच के अंतर को भरता था, जिससे बजट से बाहर देयताएँ (off-budget liabilities) बनती थीं। 2021-22 से इन उधारों को बजट के भीतर लाया गया है, जिससे सब्सिडी का असली पैमाना दृश्य हुआ।

2024-25 में खाद्य सब्सिडी लगभग ₹2.05 लाख करोड़ बजट की गई — स्वास्थ्य एवं शिक्षा बजटों से कहीं अधिक। हर ₹1 के अनाज के पीछे लगभग ₹0.80 अप्रत्यक्ष लागत (भंडारण, ढुलाई, रख-रखाव) जुड़ती है।

2. खुले बाज़ारों में कृत्रिम कमी

बड़े पैमाने पर प्रापण खुले बाज़ारों में कृत्रिम कमी उत्पन्न कर सकता है, जिससे ग़ैर-लाभार्थी परिवारों एवं निर्यातकों के लिए मूल्य बढ़ जाते हैं। 2022 का गेहूँ निर्यात प्रतिबंध इसी ग़लत-मूल्य भंडार स्थिति का एक परिणाम था। एक कृषि-निर्यातक देश में निर्यात-प्रतिबंध तभी आता है जब घरेलू-स्टॉक प्रबंधन विफल हो।

3. विकृत फ़सल पैटर्न

क्योंकि MSP-आधारित प्रापण चावल एवं गेहूँ पर केंद्रित है, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के किसान दलहन, तिलहन, मोटे अनाज एवं चारा फ़सलों की क़ीमत पर इन्हीं को उगाते रहते हैं। परिणाम:

  • भू-जल का ह्रास — पंजाब के 80% भू-जल ब्लॉक “अति-दोहित” श्रेणी में हैं।
  • मृदा का लवणीकरण (salinisation) एवं जलभराव (waterlogging)
  • कार्बनिक कार्बन एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों में गिरावट।
  • पराली जलाना (stubble burning) एवं उत्तर भारत में गंभीर वायु प्रदूषण
  • निरंतर बाढ़-सिंचित धान से मीथेन उत्सर्जन

यह “हरित क्रांति का पारिस्थितिक ऋण” है — अल्पकाल में अनाज सुरक्षा, परंतु दीर्घकाल में मिट्टी, जल एवं वायु की क़ीमत।

4. विविध फ़सलों एवं क्षेत्रों का बहिष्कार

तिलहन, दलहन, मोटे अनाज एवं ज्वार-बाजरा उगाने वाले पूर्वी, मध्य एवं दक्षिणी भारत के किसानों को बड़े पैमाने पर MSP प्रापण का लाभ नहीं मिलता, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन कायम रहते हैं। उदाहरणार्थ, बिहार में MSP प्रापण लगभग नगण्य है — जबकि वहाँ की आबादी पंजाब से कई गुना है।

5. निजी व्यापार के लिए हतोत्साहन

निरंतर राज्य-प्रभुत्व निजी क्षेत्र के निवेश को भंडारण, गोदाम एवं बाज़ार अवसंरचना में हतोत्साहित करता है। जब FCI ही सबसे बड़ा ख़रीदार है तो प्रतिस्पर्धा का अंत हो जाता है।

समस्या का समाधान

बंद-अंत प्रापण (Closed-Ended Procurement)

FCI प्रापण को बफ़र मानकों + एक छोटे सुरक्षा-मार्जिन पर सीमित किया जाए। उससे आगे, अधिशेष को निजी व्यापार ख़रीदे। यह वही मॉडल है जो ग्लोबल बेस्ट-प्रैक्टिस में है।

किसानों को संकट-बिक्री से सुरक्षा

जहाँ बाज़ार मूल्य MSP से नीचे गिरे, वहाँ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से मूल्य-अंतर के लिए किसानों को क्षतिपूर्ति दी जाए — जैसा कि भावांतर भुगतान योजना (मध्य प्रदेश, 2017) या PM-AASHA की मूल्य कमी भुगतान योजना में।

खुले बाज़ार बिक्री योजना (OMSS) को सशक्त करें

FCI e-नीलामी के माध्यम से OMSS के अंतर्गत पूर्व-निर्धारित मूल्यों पर अधिशेष भंडार बेचता है। OMSS का विस्तार सुनिश्चित करता है कि अधिशेष अनाज निजी व्यापारियों, मिलरों एवं निर्यातकों तक पहुँचे, जिससे भंडारण-दबाव कम हो।

e-NAM को मज़बूत करें

केवल लगभग 1,389 मंडियाँ (APMCs का ~20%) ही e-NAM से एकीकृत हैं। अधिक APMCs, FPOs एवं गोदामों को शामिल करने से मूल्य-खोज गहरी होगी एवं FCI पर किसान की निर्भरता घटेगी।

विकेंद्रीकृत प्रापण (DCP) को प्रोत्साहित करें

राज्य FCI की ओर से TPDS के तहत प्रापण एवं वितरण करते हैं। राज्यों में DCP का विस्तार FCI की परिवहन एवं भंडारण लागत घटाता है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना एवं कर्नाटक ने सफलता दिखाई है।

निजी क्षेत्र की प्रापण को प्रोत्साहित करें

गोदाम रसीदें, eNWR, परक्राम्य गोदाम रसीद अधिनियम (Negotiable Warehouse Receipts Act) एवं कृषि अवसंरचना निधि (AIF) जैसे साधन प्रदान करें ताकि व्यापारी एवं प्रसंस्करणकर्ता MSP-तुल्य मूल्यों पर ख़रीद सकें।

फ़सल विविधीकरण प्रोत्साहन

MSP प्रापण को फ़सल चक्र, प्राकृतिक खेती (natural farming) एवं जल उपयोग से जोड़ा जाए — मोटे अनाज, दलहन, तिलहन के लिए अधिक प्रापण; अति-दोहित क्षेत्रों में जल-गहन धान के लिए कम।

तुलना — खुली-अंत बनाम बंद-अंत प्रापण

आयामखुली-अंत (वर्तमान)बंद-अंत (प्रस्तावित)
FCI लागतउच्च, बढ़तीनियंत्रित
बफ़र भंडारमानक का 2-3xमानक के निकट
फ़सल विविधीकरणहतोत्साहितप्रोत्साहित
निजी व्यापारदबाया गयासक्रिय
किसान सुरक्षासीमित फ़सलोंDBT से सर्व-फ़सल
भू-जलदबावराहत

प्रमुख योजनाएँ एवं संस्थान

योजना/संस्थानभूमिका
FCIनोडल प्रापण एजेंसी
CACPMSP सिफ़ारिशें
PM-AASHAमूल्य समर्थन + कमी भुगतान
OMSSअधिशेष अनाज का निपटान
e-NAMएकीकृत मंडी मंच
कृषि अवसंरचना निधिनिजी भंडारण/प्रापण

नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)

अद्यतन संदर्भ: केंद्रीय बजट 2024-25 ने नवीकृत दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की घोषणा की, जिसमें तुअर, उड़द एवं मसूर के लिए 2024-29 हेतु MSP-संबद्ध प्रापण गारंटी है। FCI के बकाया का एक-बार रोलओवर एवं निरंतर बजट-भीतर खाद्य सब्सिडी प्रदान की गई।

2024-25 में गेहूँ प्रापण लगभग 26-28 मिलियन टन एवं चावल लगभग 50-55 मिलियन टन रहा — बफ़र मानकों से बहुत अधिक। केंद्रीय बजट 2025-26 ने धन धान्य कृषि योजना को 100 कम-उत्पादकता ज़िलों तक बढ़ाया एवं अधिशेष चावल भंडारों को संभालने हेतु OMSS संचालन को गहराया।

MSP की क़ानूनी गारंटी पर बहस 2021 के कृषि-कानून आंदोलनों एवं 2024 में नए सिरे से उठे आंदोलन के बाद तीव्र हुई। सरकार ने पूर्व कृषि सचिव संजय अग्रवाल के अधीन MSP, प्राकृतिक खेती एवं विविधीकरण पर समिति स्थापित की है, जिसकी चर्चाएँ जारी हैं।

यूपीएससी प्रासंगिकता

जीएस पेपर-III से सीधे जुड़े विषय: बफ़र भंडार एवं खाद्य सुरक्षा; MSP एवं प्रापण; जल-न्यूनता; पर्यावरणीय संधारणीयता; कृषि विविधीकरण।

संभावित प्रश्न:

  • खुली-अंत प्रापण नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। क्या भारत को बंद-अंत प्रापण पर आना चाहिए?
  • वर्तमान MSP व्यवस्था ने फ़सल पैटर्न को कैसे विकृत किया है? सुधार सुझाइए।
  • MSP की क़ानूनी गारंटी के सार्वजनिक वित्त एवं कृषि विविधीकरण पर निहितार्थों की चर्चा कीजिए।
  • पंजाब-हरियाणा का “हरित क्रांति-पारिस्थितिकी-MSP” त्रिभुज समझाइए।

निबंध एवं साक्षात्कार कोण — राजकोषीय विवेक, हरित क्रांति की पारिस्थितिक लागत, एवं किसान आंदोलन। अभ्यर्थियों को बफ़र मानक आँकड़े, OMSS, PM-AASHA, एवं क़ानूनी MSP पर चल रही बहस याद रखनी चाहिए।

प्रीलिम्स बिंदु — CACP (23 फ़सलें); FCI; बफ़र मानक ~30 मिलियन टन; OMSS; PM-AASHA; eNWR; e-NAM (~1,389 मंडियाँ); भावांतर भुगतान योजना (मप्र 2017); संजय अग्रवाल समिति; धन धान्य कृषि योजना (बजट 2025-26)।

सामान्य प्रश्न

खुली-अंत प्रापण नीति क्या है?

यह वह नीति है जिसके तहत FCI एवं राज्य एजेंसियाँ MSP पर किसानों द्वारा लाए गए सम्पूर्ण चावल एवं गेहूँ की ख़रीद करती हैं — कोई ऊपरी सीमा नहीं। उद्देश्य था किसानों को संकट-बिक्री से बचाना।

बफ़र भंडार मानक क्या हैं?

तिमाही आधार पर परिभाषित, ये केंद्रीय पूल में लगभग 30 मिलियन टन चावल एवं गेहूँ की माँग करते हैं। वर्तमान भंडार प्रायः 60-80 मिलियन टन तक पहुँच जाते हैं।

बंद-अंत प्रापण क्या है?

यह वह सुधारित मॉडल है जिसमें FCI केवल बफ़र मानक + सुरक्षा-मार्जिन तक ख़रीद करता है; उससे ऊपर का अधिशेष निजी व्यापार ख़रीदे। यह राजकोषीय बोझ घटाता है।

PM-AASHA योजना क्या है?

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) तीन घटकों — मूल्य समर्थन योजना, मूल्य कमी भुगतान योजना एवं निजी प्रापण-स्टॉकिस्ट योजना — के माध्यम से MSP कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।

भावांतर भुगतान योजना क्या है?

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 2017 में आरंभ — जब बाज़ार मूल्य MSP से नीचे गिरता है तो किसानों को DBT के माध्यम से अंतर का भुगतान। PM-AASHA में इसे एक मॉडल माना गया।

e-NAM क्या है?

राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) एक एकीकृत ऑनलाइन व्यापार मंच है जो लगभग 1,389 मंडियों (APMCs के ~20%) को जोड़ता है तथा कृषि उपज की पारदर्शी मूल्य-खोज सुनिश्चित करता है।

OMSS क्या है?

खुले बाज़ार बिक्री योजना (Open Market Sale Scheme) के तहत FCI ई-नीलामी के माध्यम से अधिशेष चावल/गेहूँ निजी व्यापारियों, मिलरों एवं राज्यों को बेचता है — जिससे भंडारण दबाव घटता है।

खुली-अंत प्रापण से भू-जल पर क्या असर पड़ा है?

पंजाब के 80% भू-जल ब्लॉक “अति-दोहित” श्रेणी में हैं क्योंकि MSP-गारंटीशुदा धान-गेहूँ चक्र अत्यधिक जल-गहन है। यह हरित क्रांति का पारिस्थितिक ऋण है।

MSP की क़ानूनी गारंटी पर क्या बहस है?

किसान संगठनों की माँग है कि MSP को क़ानूनी अधिकार बनाया जाए। सरकार की चिंता है कि यह निजी व्यापार को विस्थापित करेगा एवं राजकोष पर असहनीय बोझ डालेगा। संजय अग्रवाल समिति विचार कर रही है।

DCP (विकेंद्रीकृत प्रापण) क्या है?

विकेंद्रीकृत प्रापण के तहत राज्य FCI की ओर से अनाज ख़रीदते एवं TPDS के तहत वितरित करते हैं। छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना एवं कर्नाटक प्रमुख DCP राज्य हैं।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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