UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के चरण: छह चरणों की व्याख्या (यूपीएससी नीतिशास्त्र — GS IV)

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के छह चरण — पूर्व-परंपरागत, परंपरागत और उत्तर-परंपरागत स्तर — यूपीएससी GS IV के लिए सरल एवं विस्तृत व्याख्या।

Kohlberg's Stages of Moral Development: Six Stages Explained (UPSC Ethics — GS IV) — UPSC featured image

लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg, 1927–1987) एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने जीन पियागे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत को नैतिकता के क्षेत्र में विस्तारित किया। उनका सिद्धांत बताता है कि नैतिक तर्कशक्ति का विकास एक निश्चित क्रम में होता है जो तीन स्तरों और छह चरणों में विभाजित है।

यूपीएससी GS IV में कोहलबर्ग का सिद्धांत नैतिक विकास, सिविल सेवकों की नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में मूल्यों के संदर्भ में पूछा जाता है।

स्तर 1: पूर्व-परंपरागत नैतिकता (Pre-Conventional Morality)

यह नैतिकता का प्रारंभिक स्तर है, जो मुख्यतः बच्चों में पाया जाता है। इस स्तर पर नैतिकता बाहरी पुरस्कार और दंड पर आधारित होती है।

चरण 1: दंड और आज्ञाकारिता अभिमुखता

नैतिक निर्णय दंड से बचने पर आधारित होता है। जो कार्य दंड से बचाए वह सही है। “मैंने इसलिए झूठ नहीं बोला क्योंकि मुझे डाँट पड़ती।”

चरण 2: साधनात्मक अभिमुखता (Instrumental Orientation)

नैतिक निर्णय अपने स्वार्थ पर आधारित होता है। “मैं तुम्हारी मदद करूँगा यदि तुम मेरी मदद करो।” यह लेन-देन की नैतिकता है।

स्तर 2: परंपरागत नैतिकता (Conventional Morality)

यह स्तर अधिकांश किशोरों और वयस्कों में पाया जाता है। नैतिकता सामाजिक नियमों और अपेक्षाओं के अनुरूप होने पर आधारित होती है।

चरण 3: अच्छे लड़के/लड़की की अभिमुखता

नैतिकता दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने से जुड़ी है। “एक अच्छा इंसान वही करता है जो समाज उससे उम्मीद रखता है।” लोकप्रियता और स्वीकृति महत्त्वपूर्ण है।

चरण 4: कानून और व्यवस्था अभिमुखता

नैतिकता नियमों और कानूनों का पालन करने में है। “नियम बने हैं तो उनका पालन होना चाहिए।” अधिकांश वयस्क इसी चरण में रहते हैं।

स्तर 3: उत्तर-परंपरागत नैतिकता (Post-Conventional Morality)

यह उच्चतम स्तर है जो केवल कुछ वयस्कों में विकसित होता है। नैतिकता सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होती है।

चरण 5: सामाजिक अनुबंध अभिमुखता

कानून सामाजिक सहमति का परिणाम है और इसे बदला जा सकता है यदि यह न्यायसंगत न हो। “कानून सही होने चाहिए; अन्यायपूर्ण कानून को बदला जाना चाहिए।”

चरण 6: सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत

नैतिकता सार्वभौमिक न्याय-सिद्धांतों पर आधारित है — जैसे मानवीय गरिमा, समानता और न्याय। यह स्तर गाँधी, मार्टिन लूथर किंग और मंडेला जैसे व्यक्तित्वों में देखा जाता है।

हाइन्ज़ की दुविधा (Heinz Dilemma)

कोहलबर्ग ने अपने सिद्धांत को विकसित करने के लिए काल्पनिक नैतिक दुविधाओं का उपयोग किया। सबसे प्रसिद्ध है हाइन्ज़ की दुविधा: यदि किसी दवाई से पत्नी की जान बच सकती है लेकिन वह इसे खरीद नहीं सकता, तो क्या उसे दवाई चुरानी चाहिए? प्रत्येक चरण में व्यक्ति इस दुविधा का अलग-अलग तर्क से उत्तर देगा।

आलोचना

  • कैरल गिलिगन (Carol Gilligan) का आरोप: कोहलबर्ग का सिद्धांत पुरुष-केंद्रित है; महिलाओं की देखभाल-आधारित नैतिकता को नज़रअंदाज़ करता है।
  • पश्चिमी सांस्कृतिक पूर्वाग्रह।
  • नैतिक तर्क और नैतिक व्यवहार के बीच अंतर को नज़रअंदाज़ करना।

लोक सेवाओं में प्रासंगिकता

एक आदर्श लोक सेवक को कोहलबर्ग के चरण 5 और 6 पर कार्य करना चाहिए — नियमों का पालन इसलिए नहीं कि दंड का भय है, बल्कि इसलिए कि वे सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के अनुरूप हैं।

यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • तीन स्तर: पूर्व-परंपरागत, परंपरागत, उत्तर-परंपरागत।
  • छह चरण और उनकी विशेषताएँ।
  • हाइन्ज़ दुविधा: नैतिक तर्कशक्ति का परीक्षण।
  • गिलिगन की आलोचना: देखभाल-नैतिकता बनाम न्याय-नैतिकता।
  • लोक सेवा में आदर्श: चरण 5 और 6।

सामान्य प्रश्न

कोहलबर्ग के कितने चरण हैं?

कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के तीन स्तरों में छह चरण बताए हैं — पूर्व-परंपरागत (चरण 1-2), परंपरागत (चरण 3-4) और उत्तर-परंपरागत (चरण 5-6)।

हाइन्ज़ दुविधा क्या है?

हाइन्ज़ दुविधा एक काल्पनिक नैतिक समस्या है जिसमें पूछा जाता है कि क्या पत्नी की जान बचाने के लिए चोरी उचित है। इसका उत्तर प्रत्येक नैतिक चरण में भिन्न होता है।

कैरल गिलिगन ने कोहलबर्ग की किस बात की आलोचना की?

गिलिगन ने तर्क दिया कि कोहलबर्ग का सिद्धांत पुरुष-केंद्रित न्याय-आधारित नैतिकता को महत्त्व देता है और महिलाओं की देखभाल-आधारित नैतिकता को नज़रअंदाज़ करता है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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