मदर टेरेसा — कैथोलिक नन, मिशनरी और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता — को 20वीं सदी की सबसे प्रभावशाली मानवतावादी हस्तियों में गिना जाता है। उनका जीवन इस प्रश्न का जीवित उत्तर है: मनुष्य की पीड़ा के सामने नैतिक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? यूपीएससी GS IV के लिए मदर टेरेसा देखभाल की नीतिशास्त्र (Ethics of Care), निःस्वार्थता और सेवा-भाव के अध्ययन के लिए एक अनिवार्य संदर्भ हैं।
जीवन परिचय
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे (अब उत्तर मैसेडोनिया) में हुआ। उनका मूल नाम Agnes Gonxhe Bojaxhiu था। 1929 में वे भारत आईं और कलकत्ता (अब कोलकाता) में काम शुरू किया। 1948 में उन्होंने कलकत्ता की झुग्गियों में काम करने की अनुमति प्राप्त की। 1950 में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी (Missionaries of Charity) की स्थापना की।
1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला। 1997 में उनका निधन हुआ। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत घोषित किया।
मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी का कार्य
मदर टेरेसा ने कोलकाता में निर्मल हृदय — मृत्युशैया पर पड़े लोगों के लिए गृह — की स्थापना की। उन्होंने कुष्ठ रोगियों, अनाथ बच्चों और एड्स रोगियों की सेवा की। उनका संगठन आज 139 देशों में कार्यरत है।
देखभाल की नीतिशास्त्र (Ethics of Care)
मदर टेरेसा का जीवन देखभाल की नीतिशास्त्र का व्यावहारिक उदाहरण है। यह नीतिशास्त्रीय दृष्टिकोण नियम और सिद्धांतों की बजाय संबंधों और जिम्मेदारियों को नैतिकता का आधार मानता है।
इस दृष्टि से नैतिक कार्य वह है जो दूसरे की ज़रूरत और पीड़ा के प्रति संवेदनशील प्रतिक्रिया देता है — न कि वह जो केवल सिद्धांतों का पालन करता है।
आलोचनाएँ
मदर टेरेसा निर्विवाद नहीं रहीं। कुछ आलोचकों ने कहा कि उनके चिकित्सा गृहों में उचित चिकित्सीय देखभाल नहीं थी। क्रिस्टोफर हिचेन्स ने उनकी संस्था की वित्तीय पारदर्शिता पर प्रश्न उठाए। गर्भनिरोध और गर्भपात पर उनके कट्टर रुख की भी आलोचना हुई।
यूपीएससी GS IV की दृष्टि से
मदर टेरेसा निम्नलिखित विषयों के लिए उद्धरण-योग्य उदाहरण हैं:
- निःस्वार्थ सेवा: बिना पुरस्कार की इच्छा के कार्य
- करुणा: पीड़ित के प्रति सक्रिय संवेदनशीलता
- मानवीय गरिमा: प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन
- कठिन परिस्थितियों में नैतिकता: जब संसाधन कम हों, सेवा का संकल्प बना रहे
उनका प्रसिद्ध कथन है: “यदि आप एक सौ लोगों को नहीं खिला सकते, तो एक को खिलाइए।”