1993 में संसद ने मैला ढोने पर पहला कानून बनाया। 2013 में उसकी जगह सख्त अधिनियम लाया। 2023 में NAMASTE योजना शुरू हुई। तीन दशक की विधायी कोशिश — फिर भी 2019 से 2023 के बीच 377 स्वच्छता कर्मचारियों की खतरनाक सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई में मौत (सामाजिक न्याय मंत्रालय के अनुसार)। मैला ढोने की प्रथा भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक न्याय की सबसे दृश्यमान विफलताओं में से एक है।
मैला ढोना क्या है?
मैला ढोने के रूप में रोजगार का प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम 2013 (Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act 2013) के अनुसार मैला ढोने वाला वह व्यक्ति है जो निम्नलिखित कार्य करता है:
- अस्वास्थ्यकर शौचालयों में मानव मल-मूत्र की सफाई।
- खुले नाले या गड्ढों से मल की सफाई।
- रेलवे पटरियाँ।
- कोई भी स्थान जहाँ मल को विघटित होने से पहले साफ किया जाना हो।
जाति की जड़ें
मैला ढोना एक व्यवसाय नहीं — यह विरासत में मिला जाति-दायित्व है। यह मुख्यतः दलित समुदायों — वाल्मीकि, हेला, मेहतर, भंगी, चूहड़ा, डोम, महार और अन्य अनुसूचित जातियों — द्वारा किया जाता है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अस्पृश्यता और मैला ढोने को जाति-उत्पीड़न के एक ही सिक्के के दो पहलू बताया।
कानूनी विकास
- मैला ढोने का रोजगार और शुष्क शौचालय निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 — पहला राष्ट्रीय कानून। कमजोर दंड और राज्यों की अधिसूचना की शर्त ने इसे निष्प्रभावी किया।
- सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ (2014) — उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मैला ढोने की अनुमति अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
2013 अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
- शुष्क शौचालय, खुले नाले, रेलवे पटरियाँ, सेप्टिक टैंक और सीवर — सभी शामिल।
- बिना अपवाद के पूर्ण प्रतिषेध।
- स्थानीय प्राधिकरणों का दायित्व — अस्वास्थ्यकर शौचालय ध्वस्त या परिवर्तित करना।
- पुनर्वास पैकेज: ₹40,000 नकद सहायता, कौशल प्रशिक्षण, वैकल्पिक व्यवसाय के लिए सब्सिडी, बच्चों की छात्रवृत्ति, आवास।
- दंड: मैला ढुलाई नियोजन पर 2 वर्ष कारावास और ₹2 लाख जुर्माना; खतरनाक सीवर सफाई पर 5 वर्ष और ₹5 लाख।
मैला ढोना क्यों जारी है?
- जाति-कलंक: सफाई कार्य सामाजिक रूप से दलित कार्य के रूप में कोडित है।
- विकल्पों का अभाव: पुनर्वास पैकेज छोटे, कौशल प्रशिक्षण अपर्याप्त।
- अनौपचारिक ठेकेदारी: नियोक्ता को कानूनी दायित्व से बचाती है।
- कम रिपोर्टिंग: राज्य सर्वेक्षण में आँकड़े नागरिक समाज के अनुमान से कम।
- कमजोर प्रवर्तन: कुछ अभियोगों में सजा।
सीवर मौतें और न्यायालय निर्देश
डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ (अक्तूबर 2023) — उच्चतम न्यायालय के निर्देश:
- सीवर मौत पीड़ितों के लिए ₹30 लाख अनुग्रह राशि।
- स्थायी विकलांगता के लिए ₹10-20 लाख।
- यांत्रिकीकरण पर एकसमान राष्ट्रीय नीति।
NAMASTE योजना (2023)
राष्ट्रीय यंत्रीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र कार्रवाई (NAMASTE) — 2023 में शुरू, NSKFDC और सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित। NAMASTE पहले की SRMS योजना को प्रतिस्थापित करती है और सभी सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों (SSW) पर लागू होती है।
- 4,800+ ULB में SSW और उनके परिवारों की प्रोफाइलिंग।
- PPE किट — दस्ताने, गैस मास्क, सुरक्षा हार्नेस।
- सुरक्षा प्रशिक्षण और कौशल विकास।
- स्वच्छता उद्यमियों और SHG के लिए पूँजी सब्सिडी।
- SSW बच्चों के लिए PM-YASASVI छात्रवृत्ति।
- यांत्रिक सफाई ट्रक और PPE के लिए वित्त पोषण।
नीति सुझाव
- सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई का पूर्ण यांत्रिकीकरण।
- उच्च पुनर्वास परिव्यय — वर्तमान ₹40,000 को 5 वर्षीय औसत कमाई के अनुरूप बढ़ाना।
- 2013 अधिनियम के तहत ठेकेदारों और नगर अधिकारियों पर अभियोग।
- जाति कलंक मिटाने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव।
UPSC प्रासंगिकता
GS-I (भारतीय समाज): जाति; सामाजिक सशक्तिकरण। GS-II (शासन, सामाजिक न्याय): कमजोर वर्गों के लिए कल्याण योजनाएँ। प्रीलिम्स: 1993 अधिनियम, 2013 अधिनियम, सफाई कर्मचारी आंदोलन (1994, बेजवाड़ा विल्सन), SKA बनाम UoI (2014), डॉ. बलराम सिंह बनाम UoI (2023), NAMASTE (2023), NSKFDC।
सामान्य प्रश्न
2013 का मैला ढोना निषेध अधिनियम क्या है?
मैला ढोने के रूप में रोजगार का प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम 2013 ने शुष्क शौचालय, खुले नाले, सेप्टिक टैंक और सीवर में मैला ढोने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। इसमें ₹40,000 नकद सहायता, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास का प्रावधान है।
NAMASTE योजना क्या है?
National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem (NAMASTE) 2023 में शुरू हुई। यह सभी सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों (SSW) की प्रोफाइलिंग, PPE वितरण, कौशल विकास और यांत्रिकीकरण सुनिश्चित करती है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन क्या है?
1994 में बेजवाड़ा विल्सन (Ramon Magsaysay Award 2016) द्वारा स्थापित, यह मैला ढोने के उन्मूलन के लिए भारत का सबसे निरंतर आंदोलन है। इसकी 2003 की PIL के कारण 2014 में उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय आया।