पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) ने पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं (PRI) का विस्तार किया और ग्राम सभा को असाधारण शक्तियाँ दीं। यह जनजातीय स्वशासन का कानूनी आधार है।
PESA की पृष्ठभूमि
- 73वाँ संशोधन (1992) — पंचायती राज — स्वतः पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लागू नहीं हुआ।
- भूरिया समिति (1994) की सिफारिश पर PESA बना।
- 10 राज्यों में लागू: आंध्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल, झारखंड, MP, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान।
ग्राम सभा के विशेष अधिकार
- भूमि अधिग्रहण — ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य।
- लघु वन उपज — स्वामित्व और प्रबंधन।
- खनिज लीज — अनुशंसा का अधिकार।
- साहूकार विनियमन।
- प्रथागत कानून और सामाजिक प्रथाएँ — संरक्षण।
- विकास योजनाएँ — स्वीकृति का अधिकार।
PESA के कार्यान्वयन की चुनौतियाँ
- राज्यों की उपेक्षा — राज्य नियम देर से बने; कई अधूरे।
- अधिकारियों की जागरूकता कम।
- खनन कंपनियों का प्रभाव — ग्राम सभा की सहमति बाईपास।
- महिलाओं की भागीदारी कम।
- वाम उग्रवाद वाले क्षेत्रों में कार्यान्वयन और कठिन।
PESA बनाम FRA
- PESA: पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से स्वशासन।
- FRA: व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार।
- दोनों मिलकर जनजातीय आत्मनिर्भरता का ढाँचा बनाते हैं।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
- कई राज्यों ने 2022-24 में PESA नियम बनाए/अद्यतन किए।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय — ग्राम सभा सहमति पर जोर।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- GS-II: पंचायती राज, जनजातीय स्वशासन, संविधान।
- GS-I: भारतीय समाज, जनजातीय मुद्दे।
- मुख्य: “PESA के कार्यान्वयन में बाधाएँ और समाधान।”
PESA जनजातीय स्वशासन का संवैधानिक वादा है। इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य स्तर पर इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता और जनजातीय जागरूकता तीनों जरूरी हैं।