भारतीय समाज में धर्म और पितृसत्ता (Patriarchy) लंबे समय से सह-यात्री रहे हैं। पवित्र ग्रंथों, धार्मिक संस्थाओं और अनुष्ठान-प्रथाओं ने ऐतिहासिक रूप से लैंगिक पदानुक्रम को वैधता दी है — भले ही प्रत्येक परंपरा के भीतर प्रगतिशील सुधारकों ने इसे चुनौती दी हो। UPSC GS-I (महिला, धर्म) और निबंध के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए यह समझना आवश्यक है कि धर्म के माध्यम से पितृसत्ता का निर्माण और चुनौती कैसे होती है।
वैचारिक ढाँचा
पितृसत्ता एक सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुष प्राथमिक शक्ति रखते हैं — परिवार, राजनीति, आर्थिक जीवन और संपत्ति नियंत्रण में। धर्म, एक सांस्कृतिक प्रणाली के रूप में, तीन तंत्रों के माध्यम से पितृसत्तात्मक संरचनाओं को अक्सर सुदृढ़ करता है:
| तंत्र | उदाहरण |
|---|---|
| पवित्र ग्रंथ | लैंगिक भूमिकाएँ निर्धारित करने वाली व्याख्याएँ |
| धार्मिक संगठन | नेतृत्व से महिलाओं का बहिष्कार |
| धार्मिक कानून और रीति-रिवाज | विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार के नियम |
विद्वान उमा चक्रवर्ती (1993) की ब्राह्मणीय पितृसत्ता की अवधारणा बताती है कि कैसे जाति और पितृसत्ता एक-दूसरे को सुदृढ़ करती हैं — विशेषकर अंतर्विवाह (endogamy) के माध्यम से, जिसमें जाति-शुद्धता बनाए रखने के लिए महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण आवश्यक है। “ऑनर किलिंग” इसकी चरम अभिव्यक्ति है।
भारत में धर्म और लैंगिकता
हिंदू धर्म
- मनुस्मृति के प्रावधान — लैंगिक भूमिकाओं के लिए अक्सर उद्धृत।
- भक्ति परंपरा में महिलाओं की स्वायत्तता: मीराबाई, अंडाल, अक्का महादेवी ने आध्यात्मिक स्वतंत्रता का दावा किया।
- मंदिर प्रवेश: सबरीमाला, शनि शिंगणापुर विवाद।
- विधवा की स्थिति: सती प्रथा (1829 में उन्मूलन), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856।
- पिंडदान: पुत्र की आवश्यकता पुत्र-प्राथमिकता को पुष्ट करती है।
- दहेज: सामाजिक रीति जिसे कुछ व्याख्याओं में धार्मिक स्वीकृति।
इस्लाम
- तीन तलाक (तत्काल तलाक) — मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 द्वारा अपराध घोषित।
- बहुविवाह कुछ व्याख्याओं में चार तक पत्नियाँ।
- विरासत: बेटी का हिस्सा सामान्यतः बेटे का आधा।
- शाहबानो प्रकरण (1985) — उच्चतम न्यायालय ने CrPC 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता दिलाया।
- हिजाब विवाद — विशेषकर कर्नाटक के स्कूलों में (2022 से)।
ईसाई धर्म
- महिला पादरी — कैथोलिक चर्च महिलाओं को पुरोहित नहीं बनाता।
- विवाह अटूटता — तलाक पर प्रतिबंध।
- मुक्ति धर्मशास्त्र, दलित ईसाई नारीवाद — प्रगतिशील धाराएँ।
सिख धर्म
- गुरु नानक की समानता की शिक्षाओं के कारण धर्म-शास्त्रीय रूप से सर्वाधिक समतावादी।
- गुरुद्वारा सेवा में महिलाओं की भागीदारी अनुमत, पर कम प्रचलित।
सरकारी ढाँचा और ऐतिहासिक निर्णय
| साधन | उद्देश्य |
|---|---|
| हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 | बेटियों को समान विरासत |
| मुस्लिम महिला अधिनियम 2019 | तीन तलाक को अपराध घोषित |
| विशेष विवाह अधिनियम 1954 | अंतर-धार्मिक नागरिक विवाह |
| सबरीमाला निर्णय 2018 | SC ने 10-50 आयु की महिलाओं का प्रवेश अनुमत |
| शायरा बानो (2017) | SC ने तीन तलाक असंवैधानिक घोषित |
| नवतेज सिंह जौहर (2018) | धारा 377 विखंडित |
चुनौतियाँ
- वैयक्तिक विधि की बहुलता: हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी के लिए अलग-अलग कानून — असमान अधिकार।
- समान नागरिक संहिता बहस: उत्तराखंड UCC लागू करने वाला प्रथम राज्य (2024)।
- धार्मिक स्वतंत्रता बनाम लैंगिक समानता: संवैधानिक तनाव।
- अंतरसंबद्धता (Intersectionality): दलित-मुस्लिम, दलित-ईसाई और आदिवासी महिलाओं पर संयुक्त उत्पीड़न।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
- उत्तराखंड समान नागरिक संहिता 2024: विवाह, तलाक, विरासत, लिव-इन पंजीकरण।
- हिजाब विवाद: कर्नाटक HC (2022) ने स्कूलों में प्रतिबंध बरकरार रखा; SC में विभाजित फैसला; बड़ी पीठ को भेजा गया।
- सबरीमाला समीक्षा: 2018 के निर्णय को 9-न्यायाधीश पीठ के पास भेजा गया।
- महिला आरक्षण अधिनियम 2023: विधायिकाओं में 33% सीटें; परिसीमन के बाद लागू।
- वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2024: भारत 129वाँ/146 — धार्मिक और सांस्कृतिक कारकों का योगदान।
आगे का मार्ग
- परंपराओं के भीतर प्रगतिशील व्याख्याएँ।
- व्यापक सार्वजनिक परामर्श के साथ समान नागरिक संहिता।
- धार्मिक नेताओं के लिए लैंगिक-संवेदनशील प्रशिक्षण।
- महिलाओं को धार्मिक नेतृत्व में प्रोत्साहन।
- शिक्षा और जागरूकता — ग्रंथों की समतावादी धाराओं पर।
UPSC प्रासंगिकता
प्रीलिम्स: तीन तलाक अधिनियम 2019, हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005, सबरीमाला निर्णय। GS-I: महिलाओं की भूमिका, धर्म, पितृसत्ता। GS-II: मूल अधिकार, UCC, वैयक्तिक कानून। निबंध: “जहाँ धर्म और अधिकार मिलते हैं: भारत की यात्रा।”
सामान्य प्रश्न
ब्राह्मणीय पितृसत्ता (Brahmanical Patriarchy) क्या है?
उमा चक्रवर्ती (1993) की अवधारणा के अनुसार जाति और पितृसत्ता एक-दूसरे को सुदृढ़ करती हैं। जाति-शुद्धता बनाए रखने के लिए महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण आवश्यक है। ‘ऑनर किलिंग’ इसकी चरम अभिव्यक्ति है।
भारत में धर्म और लैंगिक समानता से जुड़े प्रमुख निर्णय कौन से हैं?
शायरा बानो (2017) — तीन तलाक असंवैधानिक; सबरीमाला (2018) — 10-50 आयु की महिलाओं का प्रवेश; नवतेज सिंह जौहर (2018) — धारा 377 विखंडित; शाहबानो (1985) — मुस्लिम महिला को गुज़ारा-भत्ता।
समान नागरिक संहिता (UCC) का महत्त्व क्या है?
UCC सभी नागरिकों पर उनकी धार्मिक पहचान से निरपेक्ष एकसमान कानून लागू करेगी — विवाह, तलाक, विरासत के लिए। उत्तराखंड 2024 में UCC लागू करने वाला प्रथम राज्य बना।