यह प्रश्न कि “प्रशासन में नीतिशास्त्र और मूल्य क्यों?” अक्सर स्वयंसिद्ध प्रतीत होता है — किंतु यूपीएससी में इसका तर्कसंगत उत्तर देना आवश्यक है। नीतिशास्त्र का प्रशासन में होना केवल आदर्शवादी माँग नहीं है; इसके पीछे ठोस व्यावहारिक, दार्शनिक और संवैधानिक कारण हैं।
लोकतंत्र की रक्षा
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है। लोक सेवक जनता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उनके सेवक हैं। यदि प्रशासन में नैतिकता न हो, तो सत्ता का दुरुपयोग होता है और लोकतंत्र खोखला हो जाता है।
जवाबदेही और पारदर्शिता
नैतिक प्रशासन जवाबदेही और पारदर्शिता की माँग करता है। RTI अधिनियम, लोकपाल, और विभिन्न नागरिक चार्टर इसी की अभिव्यक्ति हैं। जब अधिकारी नैतिक मूल्यों से प्रेरित होते हैं, तब जवाबदेही केवल कानूनी बाध्यता नहीं बल्कि आंतरिक प्रेरणा बन जाती है।
लोककल्याण
प्रशासन का उद्देश्य लोककल्याण है। यह उद्देश्य तभी पूरा होता है जब अधिकारी नागरिकों के प्रति संवेदनशील, सहानुभूतिपूर्ण और निष्पक्ष हों। नीतिशास्त्र उन्हें इन गुणों को विकसित करने की दिशा देता है।
भ्रष्टाचार की रोकथाम
नैतिक मूल्यों के अभाव में भ्रष्टाचार पनपता है। जब एक अधिकारी ईमानदारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को आत्मसात करता है, तो वह भ्रष्टाचार के प्रलोभन का सामना कर सकता है।
संविधान की भावना
भारतीय संविधान की उद्देशिका न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता की बात करती है। ये मूल्य प्रशासन में तभी साकार होते हैं जब अधिकारी इन्हें आंतरिक रूप से आत्मसात करें।
नीतिशास्त्र का व्यावहारिक आयाम
नीतिशास्त्र केवल सिद्धांत नहीं है। एक लोक सेवक के लिए:
- निर्णय लेते समय पक्षपात न करना।
- दुर्लभ संसाधनों का न्यायोचित वितरण।
- संकट में सही प्राथमिकताओं का चयन।
- दीर्घकालिक जनहित को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर रखना।
ये सब नैतिक मूल्यों पर आधारित निर्णय हैं।
यूपीएससी प्रासंगिकता
GS IV में यह विषय “प्रशासन में नीतिशास्त्र की आवश्यकता” और “लोक सेवाओं में मूल्य” के प्रश्नों में आता है। तर्कसंगत उत्तर देने के लिए उपरोक्त कारणों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करें।