सहिष्णुता को कभी-कभी एक निष्क्रिय गुण के रूप में देखा जाता है — जिन लोगों से हम नहीं मिलना चाहते उन्हें अनिच्छा से सहन करने की इच्छाशक्ति। लेकिन यह समझ सहिष्णुता की असली भूमिका को नज़रअंदाज़ करती है। एक विविधतापूर्ण समाज में सहिष्णुता वह सक्रिय अनुशासन है जिसके द्वारा बिल्कुल अलग-अलग लोग एक ही संस्थाओं, गलियों और सार्वजनिक जीवन को साझा करते हैं। यह अपनी मान्यताओं का अभाव नहीं है; यह दृढ़ विश्वास रखते हुए दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की क्षमता है।
सहिष्णुता की परिभाषा
सहिष्णुता का अर्थ है उन विचारों, प्रथाओं या व्यक्तियों को स्वीकार करना जिनसे आप असहमत हों — जब तक वे दूसरों को हानि न पहुँचाएँ। यह एक संतुलित स्थिति है, न पूर्ण अनुमोदन और न निरंतर दमन।
भारत के संदर्भ में सहिष्णुता
भारत एक असाधारण रूप से विविध राष्ट्र है — सैकड़ों भाषाएँ, दर्जनों धर्म, अनगिनत जातियाँ। इस विविधता के बावजूद एकता बनाए रखना संस्थागत व्यवस्था और नागरिकों की सहिष्णुता दोनों पर निर्भर है।
संविधान की उद्देशिका में “पंथनिरपेक्षता” और “बंधुत्व” का उल्लेख है। अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं। ये सभी सहिष्णुता को एक संवैधानिक मूल्य के रूप में स्थापित करते हैं।
सिविल सेवक और सहिष्णुता
एक सिविल सेवक विभिन्न पृष्ठभूमि, धर्म, जाति और विचारधारा के लोगों के साथ कार्य करता है। निम्नलिखित परिस्थितियों में सहिष्णुता अनिवार्य है:
- सामुदायिक तनाव के दौरान निष्पक्ष प्रशासन
- धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में समान भागीदारी
- नीति-निर्माण में विभिन्न समुदायों के हितों को संतुलित करना
- सहकर्मियों और अधीनस्थों के साथ निष्पक्ष व्यवहार
सहिष्णुता और अन्य मूल्यों का संबंध
सहिष्णुता और सहानुभूति: सहानुभूति दूसरे की भावनाओं को समझने की क्षमता है; सहिष्णुता में असहमति के बावजूद सह-अस्तित्व शामिल है।
सहिष्णुता की सीमाएँ: सहिष्णुता असीमित नहीं है। जो विचार या व्यवहार किसी की गरिमा को नुकसान पहुँचाएँ उन्हें सहन करना अनिवार्य नहीं।
दार्शनिक परिप्रेक्ष्य
जॉन लॉक ने धार्मिक सहिष्णुता पर लिखा। जॉन स्टुअर्ट मिल ने विचारों की विविधता को समाज की प्रगति की शर्त बताया। रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत की बहुलतावादी परंपरा को सहिष्णुता का आदर्श उदाहरण माना।
यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से
GS IV में सहिष्णुता पर प्रश्न अक्सर व्यावहारिक परिदृश्यों के रूप में आते हैं। परीक्षार्थियों को दिखाना चाहिए कि वे प्रशासनिक परिस्थितियों में इस मूल्य को कैसे लागू करेंगे।