सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 को संसद ने अनैतिक वाणिज्यिक सरोगेसी पर अंकुश लगाने तथा भारत के तेज़ी से बढ़ते सहायक-प्रजनन उद्योग को औपचारिक नियामक ढाँचे के अंतर्गत लाने के लिए पारित किया। इस क़ानून से पहले के दशक में भारत वैश्विक सरोगेसी केन्द्र के रूप में कार्य करता रहा, जहाँ कम लागत, कमज़ोर नियमन और आसानी से उपलब्ध ग़रीब महिलाओं की सरोगेट उपलब्धता के कारण पश्चिमी दंपत्ति आकर्षित होते रहे। शोषण, मानव-तस्करी तथा विकलांगता के साथ जन्मे बच्चों के परित्याग की शिकायतों ने सरकार को पहले दिशा-निर्देश, फिर विधेयक और अंततः यह क़ानून लाने के लिए विवश किया; इसे सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Assisted Reproductive Technology Regulation Act, 2021) के साथ पढ़ा जाता है। यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए यह अधिनियम GS I (महिलाएँ, समाज, परिवार), GS II (शासन, कल्याण विधान) तथा नीतिशास्त्र प्रश्नपत्र — तीनों को स्पर्श करता है।
सरोगेसी क्या है और इसका विनियमन क्यों?
सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला, जिसे सरोगेट कहा जाता है, किसी इच्छुक दंपत्ति के लिए बच्चे को गर्भ में रखने, जन्म देने और जन्म के बाद उसे सौंप देने पर सहमत होती है। मोटे तौर पर इसके दो प्रकार हैं: परोपकारी सरोगेसी (altruistic surrogacy) — जिसमें सरोगेट को चिकित्सा व बीमा लागत के अलावा कोई भुगतान नहीं मिलता, और वाणिज्यिक सरोगेसी (commercial surrogacy) — जिसमें उसे अलग से शुल्क मिलता है। 2021 का अधिनियम केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है और वाणिज्यिक व्यवस्था पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।
विनियमन अत्यावश्यक इसलिए हो गया क्योंकि भारत में अनियंत्रित सरोगेसी में दुर्व्यवहार का एक स्पष्ट ढाँचा उभर आया था: ग़रीब महिलाओं का बार-बार सरोगेट के रूप में प्रयोग, ऐसे अनुबंध जो उन्हें किसी भी निर्णय का अधिकार नहीं देते थे, और जटिलता के साथ जन्मे बच्चे को विदेशी कमीशनिंग माता-पिता द्वारा छोड़ देना।
अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
यह अधिनियम स्पष्ट पात्रता-फ़िल्टरों और धन-तत्व पर प्रतिबंध के साथ एक कसा हुआ, राज्य-निगरानी वाला ढाँचा स्थापित करता है।
| प्रावधान | अधिनियम क्या कहता है |
|---|---|
| अनुमत सरोगेसी का रूप | केवल परोपकारी; चिकित्सा लागत व बीमा के अतिरिक्त कोई मौद्रिक मुआवज़ा नहीं |
| इच्छुक माता-पिता | क़ानूनन विवाहित भारतीय दंपत्ति, जिनकी सिद्ध बांझपन स्थिति हो |
| सरोगेट माँ | दंपत्ति की निकट रिश्तेदार, जो विवाहित हो और उसका स्वयं का बच्चा हो; वह केवल एक बार सरोगेट बन सकती है |
| जनन-कोशिकाएँ (gametes) | सरोगेट अपनी जनन-कोशिकाएँ नहीं दे सकती |
| बच्चे की स्थिति | इच्छुक दंपत्ति का जैविक बच्चा माना जाएगा |
| गर्भपात | सरोगेट की लिखित सहमति और उपयुक्त प्राधिकारी का अनुमोदन आवश्यक |
| निरीक्षण | राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड (NSB) एवं राज्य सरोगेसी बोर्ड (SSBs) |
| क्लिनिक | सभी सरोगेसी क्लिनिकों को उपयुक्त प्राधिकारी के साथ पंजीकरण अनिवार्य |
दंड कठोर हैं: वाणिज्यिक सरोगेसी, बच्चे का परित्याग, सरोगेट का शोषण या लिंग-चयन के प्रयास पर दस वर्ष तक का कारावास और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।
चिंताएँ एवं आलोचनाएँ
सुरक्षात्मक मंशा के बावजूद इस अधिनियम पर महिला संगठनों, विधि-विशेषज्ञों तथा प्रजनन-अधिकार समुदाय की कड़ी आलोचना रही है।
- समाज के बड़े वर्गों का बहिष्कार। LGBTQ+ व्यक्ति, लिव-इन जोड़े, अकेले पुरुष और एकल अभिभावक अधिनियम के दायरे से बाहर हैं। 35 से 45 वर्ष की अकेली तलाक़शुदा व विधवा महिलाओं को बाद में जोड़ा गया, पर मूल बहिष्कार बना हुआ है।
- केवल-परोपकारी मॉडल संरक्षणवादी है। किसी निकट महिला रिश्तेदार से बिना मुआवज़े बच्चा गर्भ में रखने को कहना एक प्रकार के दबाव को दूसरे दबाव से बदल देता है। जब सरोगेट से परिवार की “करुणा” के नाम पर गर्भावस्था की अपेक्षा की जाती है, तो उसकी शारीरिक स्वायत्तता का वास्तविक सम्मान नहीं हो पाता।
- काले बाज़ार का जोखिम। वाणिज्यिक सरोगेसी पर पूर्ण प्रतिबंध इस प्रथा को भूमिगत कर सकता है, जिससे एक सुनियोजित वाणिज्यिक व्यवस्था की तुलना में अधिक शोषण हो सकता है।
- “निकट रिश्तेदार” अपरिभाषित है। सरोगेट की मुख्य पात्रता-शर्त अस्पष्ट छोड़ दी गई है, जो मनमाने प्रवर्तन को जन्म देती है।
- परिवार की संकीर्ण परिभाषा। केवल विवाहित विषमलैंगिक भारतीय दंपत्ति तक पहुँच सीमित करना अनेक संभावित माता-पिता को प्रजनन स्वतंत्रता से वंचित करता है।
- गर्भपात पर कमीशनिंग माता-पिता की कमज़ोर भूमिका। यदि भ्रूण में गंभीर असामान्यताएँ भी हों, तब भी वे गर्भपात के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
ART अधिनियम, 2021: सहयोगी क़ानून
सरोगेसी अधिनियम को सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021 के साथ पढ़ना आवश्यक है, जो IVF, युग्मक (gamete) बैंकों और ART क्लिनिकों को विनियमित करता है। दोनों मिलकर दो-स्तरीय व्यवस्था बनाते हैं: ART अधिनियम क्लिनिक व दाताओं को नियंत्रित करता है, जबकि सरोगेसी अधिनियम गर्भधारक महिला एवं अनुबंध को।
आज भारत की स्थिति
2021 से पहले भारत का सरोगेसी उद्योग प्रतिवर्ष 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का अनुमानित था। अधिनियम लागू होने के बाद पंजीकृत क्लिनिकों की संख्या में तीव्र गिरावट आई है क्योंकि कई या तो बंद हो गए या शुद्ध ART सेवाओं की ओर मुड़ गए। राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड ने नियम अधिसूचित करना आरंभ किया है और राज्यों ने धीरे-धीरे अपने बोर्ड स्थापित किए हैं, यद्यपि कार्यान्वयन क्षमता में व्यापक अंतर है।
हाल के घटनाक्रम (2024-26)
- मार्च 2023 संशोधन ने इच्छुक दंपत्ति में से किसी एक की विशिष्ट चिकित्सीय स्थिति होने पर दाता (donor) युग्मकों के उपयोग की अनुमति दी, जिससे पहले का विवादास्पद प्रतिबंध पलट दिया गया।
- 2024 के सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने पहुँच को विस्तारित किया है: न्यायालय ने कुछ मामलों में एकल अविवाहित महिला को सरोगेसी की अनुमति दी है, जो परिवार की संकीर्ण परिभाषा पर न्यायिक असुविधा का संकेत है।
- 2024 में वैश्विक लिंग-समानता एवं परिवार-नीति बहसों ने (Global Gender Gap Index 2024 में भारत 146 में से 129वें स्थान पर) महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता को सीमित करने वाले क़ानूनों की पुनः पड़ताल को जन्म दिया है।
- महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) ने इस प्रश्न पर व्यापक ध्यान दिलाया है कि कल्याणकारी क़ानून महिलाओं की कैसी कल्पना करते हैं — प्रजनन संदर्भों में भी।
- जाति-जनगणना आंदोलन तथा MPI 2024 के स्वास्थ्य-अभाव संबंधी निष्कर्षों ने उस असुरक्षित महिला वर्ग को नीति-केन्द्र में पुनः ला दिया है जो विशेष रूप से सरोगेट बनती है।
यूपीएससी प्रासंगिकता
| GS प्रश्नपत्र | संबंध |
|---|---|
| GS I | महिलाओं की भूमिका, परिवार संरचना, समाज |
| GS II | कल्याण योजनाएँ, संवेदनशील समूहों का शासन |
| GS IV | शरीर के व्यापारीकरण की नीतिशास्त्रीय चर्चा, स्वायत्तता बनाम संरक्षणवाद |
| निबंध | महिला स्वायत्तता, तकनीक और क़ानून |
नमूना प्रश्न:
- “परोपकारी सरोगेसी वाणिज्यिक सरोगेसी जितनी ही शोषणकारी है, बस बेहतर वेश में।” चर्चा कीजिए।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार के संदर्भ में सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की समीक्षा कीजिए।
संतुलित उत्तर में अधिनियम की वास्तविक उपलब्धियाँ (अनियंत्रित शोषण का अंत, पंजीकृत क्लिनिक, बच्चे के माता-पिता सम्बंध पर स्पष्टता) स्वीकार करने के साथ-साथ उसकी बहिष्कारवादी संरचना पर प्रश्न तथा LGBTQ+ समावेशन, स्पष्ट परिभाषाओं एवं स्थिति-आधारित के बजाय अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता रेखांकित होनी चाहिए।