वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2023 (Forest Conservation Amendment Act, 2023) ने 1980 के मूल वन संरक्षण अधिनियम में महत्त्वपूर्ण बदलाव किए हैं। यह अधिनियम वनों के उपयोग, संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को फिर से परिभाषित करता है।
मूल वन संरक्षण अधिनियम, 1980
1980 के अधिनियम ने वनों की कटाई और वनेतर उपयोग के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य की। इससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई पर लगाम लगी। T.N. Godavarman बनाम भारत सरकार (1996) के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने “वन” की परिभाषा को व्यापक किया।
2023 के संशोधन के प्रमुख बदलाव
1. अधिनियम का दायरा सीमित
अब केवल वे भूमि अधिनियम के तहत आएगी जो 25 अक्टूबर 1980 के बाद सरकारी अभिलेखों में “वन” के रूप में दर्ज हैं। इससे कई भूमि-क्षेत्र जो व्यवहार में वन हैं लेकिन अभिलेखों में नहीं, अधिनियम के दायरे से बाहर हो जाएंगे।
2. छूट प्राप्त गतिविधियाँ
- अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के 100 km के भीतर रणनीतिक परियोजनाएँ
- 5 हेक्टेयर तक चिड़ियाघर, सफारी
- वन पट्टे के अंतर्गत वृक्षारोपण
- पर्यावरण-पर्यटन
3. कार्बन क्रेडिट
वनों को कार्बन सिंक के रूप में विकसित करने और कार्बन क्रेडिट व्यापार को प्रोत्साहित करने का प्रावधान।
आलोचनाएँ
आदिवासी और वन अधिकार
आलोचकों का कहना है कि यह संशोधन वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) की भावना के विरुद्ध है। अभिलेखों से बाहर हो जाने वाली भूमि पर रहने वाले आदिवासियों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।
पर्यावरणीय चिंताएँ
- सीमावर्ती क्षेत्रों में वन कटाई की गुंजाइश बढ़ी
- पर्यावरण प्रभाव आकलन की आवश्यकता कम हुई
- जैव-विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव
समर्थन के तर्क
- राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता
- वनीकरण और कार्बन बाज़ार को बढ़ावा
- प्रक्रियागत देरी में कमी
यूपीएससी की दृष्टि से
यह विषय GS-III (पर्यावरण, वन, जैव-विविधता) के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। FCA 1980, 2023 संशोधन, FRA 2006 और Godavarman निर्णय — इन सभी को एक साथ समझें।