मुग़ल बादशाह अकबर (1556–1605) के दरबार के नौ विशिष्ट विद्वानों, कलाकारों और प्रशासकों को “नवरत्न” कहा जाता है। ये नौ रत्न थे — बीरबल, अबुल फज़ल, फ़ैज़ी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मानसिंह, अब्दुर रहीम खान-ए-खाना (Abdur Rahim Khan-i-Khanan), फकीर अज़ियाओ-दीन (Fakir Aziao-Din) और मुल्ला दो प्याज़ा (Mullah Do-Piyaza)। इनमें कोई इतिहासकार था, कोई संगीतज्ञ, कोई राजस्व-प्रशासक, कोई सेनापति और कोई दरबारी विदूषक। नवरत्नों की अवधारणा प्राचीन भारत में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार से प्रेरित मानी जाती है। यह लेख प्रत्येक रत्न का परिचय, योगदान और UPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य देता है।
परिचय

अकबर का दरबार तत्कालीन एशिया का सर्वाधिक संपन्न सांस्कृतिक केंद्र था। फ़तेहपुर सीकरी और बाद में आगरा में अकबर ने हर धर्म और क्षेत्र से प्रतिभाओं को आमंत्रित किया। उनकी “सुलह-ए-कुल” (सबके साथ शांति, peace with all) की नीति ने हिंदू, मुसलमान, जैन, पारसी, ईसाई — सबको दरबार में स्थान दिया।
नवरत्न शब्द संस्कृत साहित्य से आया है, जहाँ नौ बहुमूल्य रत्नों — माणिक, मोती, पन्ना, हीरा, मूँगा, गोमेद, पुखराज, नीलम और लहसुनिया — का प्रतीकात्मक उल्लेख है। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में भी कालिदास, धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर और वररुचि नामक नवरत्न थे। अकबर ने इसी परंपरा को मुग़ल संदर्भ में पुनर्जीवित किया।
मुख्य तथ्य एक नज़र में
- अकबर का शासनकाल: 1556–1605 (49 वर्ष)
- राजधानियाँ: आगरा, फ़तेहपुर सीकरी (1571–1585), लाहौर
- नवरत्न संख्या: नौ
- भाषाई परंपरा: फ़ारसी राजकीय भाषा, साथ में हिंदवी / ब्रजभाषा
- धार्मिक नीति: दीन-ए-इलाही 1582; जज़िया कर समाप्त 1564; तीर्थयात्रा कर समाप्त 1563
- राजस्व प्रणाली: टोडरमल का “ज़ब्त” (Zabt) तंत्र, “दहसाला” (Dahsala) बंदोबस्त 1580
- साहित्यिक धरोहर: अकबरनामा, आइन-ए-अकबरी (अबुल फज़ल), तुज़क-ए-बाबरी का फ़ारसी अनुवाद
- संगीत: ध्रुपद शैली का स्वर्ण काल — तानसेन
- स्थापत्य: बुलंद दरवाज़ा, फ़तेहपुर सीकरी, आगरा क़िला, हुमायूँ का मक़बरा
- प्रशासनिक ढाँचा: मनसबदारी प्रणाली (mansabdari system) — सैन्य-असैन्य अधिकारियों का संख्यात्मक श्रेणीकरण
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
13 वर्ष की आयु में 1556 में पानीपत के दूसरे युद्ध (हेमू बनाम बैरम खाँ) के बाद अकबर सिंहासन पर बैठा। आरंभिक वर्षों में बैरम खाँ संरक्षक रहा (1556–1560)। 18 वर्ष की उम्र में अकबर ने स्वतंत्र शासन सँभाला और 1564 के बाद से एक नई धार्मिक-सांस्कृतिक नीति की शुरुआत की।
राजपूतों के साथ वैवाहिक सम्बंध (1562 में आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाह) ने मुग़ल-राजपूत गठजोड़ को मज़बूत किया। यह गठजोड़ ही मानसिंह जैसे राजपूत सेनापति को दरबार में लाया। साथ ही अबुल फज़ल और फ़ैज़ी जैसे शिया-सूफ़ी विद्वानों ने उदार धार्मिक वातावरण बनाया।
1. राजा बीरबल (Birbal) — सलाहकार और विदूषक

- असली नाम: महेश दास
- जन्म: 1528, यमुना के किनारे टिकवानपुर (वर्तमान उत्तर प्रदेश)
- अकबर के दरबार में: लगभग 1556 से
- उपाधि: “राजा” और “कविप्रिया” (1583)
- मृत्यु: 1586, यूसुफ़ज़ई अभियान में
बीरबल अकबर के सबसे निकट मित्रों में थे और एकमात्र हिंदू “दीन-ए-इलाही” अनुयायी। वे ब्रजभाषा के कवि भी थे और उनकी हाज़िरजवाबी की कथाएँ लोक-स्मृति का अंग बन गईं — हालांकि अधिकतर लोककथाएँ ऐतिहासिक नहीं हैं। यूसुफ़ज़ई अफ़ग़ानों के विरुद्ध अभियान में उनकी मृत्यु से अकबर इतने व्यथित हुए कि कई दिनों तक भोजन त्याग दिया।
UPSC तथ्य: बीरबल अकबर के दीन-ए-इलाही (1582) के सबसे प्रमुख हिंदू अनुयायी थे।
2. अबुल फज़ल (Abul Fazl) — दरबारी इतिहासकार
- जन्म: 1551, आगरा
- पिता: शेख मुबारक
- भाई: फ़ैज़ी
- प्रमुख कृतियाँ: अकबरनामा (तीन खंड), आइन-ए-अकबरी (अकबरनामा का तीसरा खंड)
- मृत्यु: 1602, वीर सिंह बुंदेला द्वारा (शहज़ादा सलीम/जहाँगीर के इशारे पर)
अबुल फज़ल अकबर के सबसे विश्वस्त दरबारी और इतिहासकार थे। अकबरनामा अकबर के शासन का आधिकारिक इतिहास है और आइन-ए-अकबरी मुग़ल साम्राज्य के प्रशासन, राजस्व, सैन्य ढाँचे और सांस्कृतिक जीवन का विश्वकोष है। UPSC के लिए मुग़ल आर्थिक इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत यही है। उन्होंने “महज़र” (1579) के मसौदे में भी सहयोग दिया जिसने अकबर को धार्मिक मामलों का सर्वोच्च निर्णायक बनाया।
UPSC तथ्य: आइन-ए-अकबरी से अकबर-कालीन भू-राजस्व, मुद्रा-व्यवस्था, बाज़ार-नियंत्रण, सेना-संगठन की पूरी जानकारी मिलती है।
3. फ़ैज़ी (Faizi) — कवि और गणितज्ञ
- जन्म: 1547, आगरा (अबुल फज़ल के बड़े भाई)
- मृत्यु: 1595
- उपाधि: “मलिक-उल-शुअरा” (कविराज, 1588)
- प्रमुख कृति: “लीलावती” (भास्कराचार्य) का फ़ारसी अनुवाद; “नल-दमयंती” का फ़ारसी रूपांतर
फ़ैज़ी अकबर के दरबार के सबसे विद्वान फ़ारसी कवि थे और साथ ही गणित के जानकार। उन्होंने भारतीय गणितीय ग्रंथ “लीलावती” का फ़ारसी में अनुवाद कर मुग़ल विद्वानों को संस्कृत गणित से परिचित कराया। शाहज़ादे — सलीम (जहाँगीर), मुराद, दानियाल — के शिक्षक भी रहे।
4. तानसेन (Tansen) — संगीत-सम्राट
- असली नाम: रामतनु पांडे (बाद में मियाँ तानसेन)
- जन्म: 1500/1506 (विवादित), बेहट (ग्वालियर के निकट)
- गुरु: स्वामी हरिदास (वृंदावन), मोहम्मद ग़ौस (ग्वालियर)
- पूर्व आश्रयदाता: रीवा के राजा रामचंद्र
- दरबार में आगमन: 1562, अकबर ने उन्हें रीवा से बुलाया
- उपाधि: “मियाँ तानसेन”
- मृत्यु: 1589, ग्वालियर में दफ़न (मोहम्मद ग़ौस के मक़बरे के पास)
तानसेन ध्रुपद शैली के अप्रतिम गायक थे और भारतीय शास्त्रीय संगीत के संस्थापक स्तंभों में गिने जाते हैं। राग दरबारी कान्हड़ा, राग मियाँ की मल्हार, राग मियाँ की तोड़ी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं। आइन-ए-अकबरी में अबुल फज़ल लिखते हैं — “तानसेन जैसा गायक हज़ार वर्षों में एक बार पैदा होता है।”
UPSC तथ्य: तानसेन ध्रुपद के प्रवर्तकों में से एक हैं; उनकी समाधि ग्वालियर में है जहाँ प्रति वर्ष “तानसेन समारोह” आयोजित होता है।
5. राजा टोडरमल (Raja Todar Mal) — राजस्व-प्रशासक
- जन्म: लगभग 1500, लहारपुर (अवध)
- पूर्व सेवा: शेर शाह सूरी के अधीन
- अकबर के दरबार में: 1560 के दशक से
- पद: दीवान (राजस्व-मंत्री); मुगल मनसब 4000 ज़ात
- मृत्यु: 1589, लाहौर
टोडरमल मुग़ल भू-राजस्व प्रणाली के स्थापक थे। 1580 में उन्होंने “दहसाला बंदोबस्त” (Dahsala Settlement) लागू किया जिसमें पिछले 10 वर्षों के औसत उत्पादन और कीमतों के आधार पर लगान तय किया जाता था। “ज़ब्त” प्रणाली (Zabt system) में हर बीघा भूमि का सर्वेक्षण कर भूमि को पोलज, परौती, चाचर, बंजर में वर्गीकृत किया गया।
UPSC तथ्य: टोडरमल ने राजस्व लगान को नकद (cash) में लेने की प्रथा को मानकीकृत किया, जो शेर शाह से शुरू हुई थी। इलाही संवत् और राजस्व-वर्ष को सिंक्रनाइज़ करने का श्रेय भी उन्हें है।
6. राजा मानसिंह (Raja Man Singh) — सेनापति
- जन्म: 1550, आमेर (वर्तमान जयपुर)
- पिता: भगवंत दास
- दादा: राजा भारमल (अकबर के ससुर)
- मनसब: 7000 (अकबर के दरबार का सर्वोच्च हिंदू मनसबदार)
- मृत्यु: 1614
राजा मानसिंह आमेर के कछवाहा राजवंश से थे और मुग़ल-राजपूत गठजोड़ की मानवीय छवि। उन्होंने अकबर की ओर से हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576) महाराणा प्रताप के विरुद्ध लड़ा (साथ में आसफ़ खाँ था)। काबुल, बंगाल, ओडिशा और बिहार के अभियानों का नेतृत्व किया।
स्थापत्य की दृष्टि से उन्होंने आमेर का किला, राजा मानसिंह महल (आमेर) और वृंदावन का गोविंद देव मंदिर बनवाया।
UPSC तथ्य: मानसिंह “फ़र्ज़न्द” (पुत्र-तुल्य) उपाधि पाने वाले एकमात्र राजपूत सेनापति थे।
7. अब्दुर रहीम खान-ए-खाना (Abdur Rahim Khan-i-Khanan) — कवि-योद्धा
- जन्म: 1556, लाहौर
- पिता: बैरम खाँ (अकबर के संरक्षक)
- उपाधि: “खान-ए-खाना” 1584
- मनसब: 7000
- मृत्यु: 1627
रहीम बैरम खाँ के पुत्र थे और अकबर ने उन्हें “मिर्ज़ा खाँ” कहकर अपने पुत्र-तुल्य पाला। मुग़ल सेनापति होते हुए वे ब्रजभाषा के सर्वोपरि भक्त-कवि बने। उनके दोहे (रहीम-दोहावली) आज भी हिंदी साहित्य की धरोहर हैं —
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।
उन्होंने “बाबरनामा” (तुज़क-ए-बाबरी) का फ़ारसी से चग़ताई-तुर्की में अनुवाद किया और संस्कृत श्लोक-संग्रह “मदनाष्टक” भी रचा। गुजरात विजय और सिंध अभियान में सेनापति रहे।
UPSC तथ्य: रहीम भक्तिकाल के सूफ़ी-संत-कवियों में अद्वितीय हैं — मुसलमान होकर कृष्ण-भक्ति के दोहे लिखे।
8. फकीर अज़ियाओ-दीन (Fakir Aziao-Din) — आध्यात्मिक सलाहकार
फकीर अज़ियाओ-दीन अकबर के सूफ़ी-दरवेश सलाहकार थे। ऐतिहासिक स्रोतों में इनके बारे में सीमित जानकारी मिलती है, लेकिन वे “इबादतख़ाना” (1575 में फ़तेहपुर सीकरी में स्थापित अंतर-धार्मिक संवाद-गृह) में सक्रिय थे। अकबर की सुलह-ए-कुल नीति और बाद में दीन-ए-इलाही (1582) के निर्माण में उनका आध्यात्मिक प्रभाव माना जाता है।
UPSC तथ्य: इबादतख़ाना — हर गुरुवार को सर्व-धर्म-संवाद; इसमें मुस्लिम उलमा, ब्राह्मण पंडित, जैन आचार्य (जैसे विजय-सेन सूरी) और जेसुइट पादरी (फ़ादर रिडॉल्फ़ो एक्वाविवा) भाग लेते थे।
अकबर की नैतिक-धार्मिक नीति की दार्शनिक तुलना गांधी और कांट जैसे नैतिक चिंतकों के व्यावहारिक उपयोग से की जा सकती है — दोनों परंपराएँ सहिष्णुता को नैतिक-राजनीतिक आदर्श मानती हैं।
9. मुल्ला दो प्याज़ा (Mullah Do-Piyaza) — विदूषक-दार्शनिक
मुल्ला दो प्याज़ा बीरबल के साथ मिलकर अकबर के दरबार के “हास्य-रत्न” थे। नाम का शाब्दिक अर्थ “दो प्याज़ वाला मुल्ला” है — प्याज़-प्रिय खाद्य-विशेषज्ञ। बीरबल और मुल्ला के बीच की हास्य-स्पर्धा की लोककथाएँ हिंदी-उर्दू दोनों परंपराओं में लोकप्रिय हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से इनकी ऐतिहासिकता विवादास्पद है — कई आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि यह एक काल्पनिक चरित्र हो सकता है जो बाद की लोक-स्मृति में जुड़ा। फिर भी पारंपरिक नवरत्न-सूची में इनका स्थान सुरक्षित है।
तुलनात्मक विश्लेषण — विक्रमादित्य के नवरत्न बनाम अकबर के नवरत्न
| आधार | विक्रमादित्य (पारंपरिक) | अकबर (1556–1605) |
|---|---|---|
| काल | चौथी–पाँचवीं शताब्दी (विवादित) | 16वीं शताब्दी (निर्विवाद) |
| भाषा | संस्कृत | फ़ारसी, हिंदवी, ब्रज |
| रत्नों के क्षेत्र | कविता, ज्योतिष, चिकित्सा, व्याकरण | कविता, इतिहास, संगीत, राजस्व, सेना, धर्म |
| प्रमुख नाम | कालिदास, वराहमिहिर, धन्वंतरि | बीरबल, अबुल फज़ल, तानसेन, टोडरमल |
| ऐतिहासिक प्रामाणिकता | परंपरा-आधारित, स्रोत सीमित | समकालीन स्रोत — आइन-ए-अकबरी, बदायूँनी |
महत्व और प्रभाव
अकबर के नवरत्नों ने भारतीय सांस्कृतिक इतिहास पर तीन प्रकार से गहरा प्रभाव डाला। पहला, समन्वयवादी संस्कृति का बीज बोया — हिंदू और मुसलमान विद्वान एक ही दरबार में कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे। दूसरा, प्रशासनिक नवाचार — टोडरमल का राजस्व-तंत्र अंग्रेज़ों के स्थायी बंदोबस्त तक का आधार बना। तीसरा, साहित्यिक-कलात्मक स्वर्ण-युग — रहीम के दोहे, तानसेन का संगीत, अबुल फज़ल का इतिहास-लेखन आज तक जीवित परंपरा है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से नवरत्नों की संरचना ने यह दिखाया कि एक बहु-सांस्कृतिक राज्य कैसे कार्य कर सकता है — यह विचार बाद में भारतीय समाज की विशेषताएँ और विविधता में निहित संवैधानिक “विविधता में एकता” के सिद्धांत का ऐतिहासिक पूर्वज माना जा सकता है।
चुनौतियाँ और आलोचना
ऐतिहासिक रूप से नवरत्न की सूची एकमत नहीं है। बदायूँनी की “मुंतख़ब-उत-तवारीख” अकबर की उदार नीतियों की कटु आलोचक है — उसने अबुल फज़ल और फ़ैज़ी को “धर्म-च्युत” कहा। साथ ही “नवरत्न” शब्द अकबर के समकालीन फ़ारसी स्रोतों में नहीं मिलता; यह बाद की लोक-परंपरा का गठन है।
मुल्ला दो प्याज़ा और फकीर अज़ियाओ-दीन की ऐतिहासिकता विशेष रूप से संदिग्ध है। कुछ इतिहासकार (जैसे आर. पी. त्रिपाठी) इनकी जगह हकीम हुमाम, मीर फतहुल्लाह शीराज़ी (वैज्ञानिक), या अब्दुस-समद (चित्रकार) को रखने की वकालत करते हैं।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
- Prelims: “नवरत्न” सूची; अकबरनामा/आइन-ए-अकबरी के लेखक; ज़ब्त प्रणाली; तानसेन की राग-रचनाएँ; रहीम की भक्ति-कविता; मानसिंह का हल्दीघाटी युद्ध।
- Mains GS-1: अकबर की धार्मिक नीति (सुलह-ए-कुल, दीन-ए-इलाही, इबादतख़ाना); मुग़ल सांस्कृतिक संश्लेषण; भक्ति-सूफ़ी समन्वय।
- Mains GS-1 (कला-संस्कृति): ध्रुपद-संगीत; मुग़ल चित्रकला (फ़ारसी + भारतीय); स्थापत्य (फ़तेहपुर सीकरी, बुलंद दरवाज़ा)।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “अकबर के नवरत्न केवल नौ व्यक्ति नहीं, एक सांस्कृतिक नीति का प्रतीक थे।” — टिप्पणी कीजिए। (150 शब्द)
- राजा टोडरमल की राजस्व प्रणाली का परीक्षण कीजिए और मूल्यांकन कीजिए कि किस सीमा तक यह आधुनिक भू-राजस्व सुधारों का पूर्ववर्ती कही जा सकती है। (250 शब्द)
निष्कर्ष
अकबर के नवरत्न मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक उत्कर्ष के नौ स्तंभ थे। बीरबल की हाज़िरजवाबी, अबुल फज़ल का इतिहास-बोध, तानसेन का संगीत, टोडरमल का प्रशासनिक कौशल, मानसिंह की सेनापतित्व-कुशलता और रहीम की भक्ति — इन सब ने मिलकर एक ऐसा दरबार बनाया जो धार्मिक सहिष्णुता और मेधा-केंद्रित प्रतिभा-चयन का आदर्श था। UPSC के दृष्टिकोण से यह सूची केवल याद करने की वस्तु नहीं — यह “शासक-विद्वान संबंध” के एक मॉडल का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी “ज्ञान-आधारित शासन” (knowledge-based governance) की चर्चा में बनी हुई है। अकबर के नवरत्नों की कथा हमें यह भी याद दिलाती है कि सांस्कृतिक संश्लेषण भारत की चिर-परंपरा है — संविधान का “विविधता में एकता” इसी ऐतिहासिक अनुभव का आधुनिक संवैधानिक पुनर्कथन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
अकबर के नवरत्न कौन-कौन थे?
अकबर के नवरत्न थे — बीरबल, अबुल फज़ल, फ़ैज़ी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मानसिंह, अब्दुर रहीम खान-ए-खाना, फकीर अज़ियाओ-दीन और मुल्ला दो प्याज़ा। ये नौ व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों — कविता, संगीत, इतिहास, राजस्व, सेना और धर्म — के विशेषज्ञ थे।
बीरबल का असली नाम क्या था?
बीरबल का असली नाम महेश दास था। वे 1528 में टिकवानपुर (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में जन्मे ब्रजभाषा कवि थे, जिन्हें अकबर ने 1583 में “राजा” और “कविप्रिया” की उपाधि दी।
अबुल फज़ल ने कौन-सा प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा?
अबुल फज़ल ने अकबरनामा (तीन खंड) लिखा, जिसका तीसरा खंड आइन-ए-अकबरी के नाम से जाना जाता है। आइन-ए-अकबरी मुग़ल प्रशासन, राजस्व, सेना, संस्कृति का विश्वकोष है और UPSC के लिए मुग़ल इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत है।
तानसेन का असली नाम क्या था?
तानसेन का असली नाम रामतनु पांडे था। बाद में उन्हें “मियाँ तानसेन” की उपाधि मिली। वे ध्रुपद शैली के सर्वोच्च गायक थे और राग दरबारी कान्हड़ा, मियाँ की मल्हार, मियाँ की तोड़ी जैसे राग उन्होंने रचे।
राजा टोडरमल किस लिए प्रसिद्ध हैं?
राजा टोडरमल अकबर के राजस्व-मंत्री (दीवान) थे और उन्होंने 1580 में “दहसाला बंदोबस्त” लागू किया। उनकी ज़ब्त प्रणाली ने मुग़ल भू-राजस्व का मानक तय किया जो लगभग 200 वर्षों तक चला।
अब्दुर रहीम खान-ए-खाना के पिता कौन थे?
रहीम के पिता बैरम खाँ थे, जो अकबर के संरक्षक (regent) थे। रहीम न केवल मुग़ल सेनापति थे बल्कि ब्रजभाषा के महान भक्ति-कवि भी — उनके दोहे आज भी हिंदी साहित्य में लोकप्रिय हैं।
अकबर के दरबार में राजा मानसिंह की क्या भूमिका थी?
राजा मानसिंह आमेर (जयपुर) के कछवाहा राजवंश से थे और अकबर के 7000 के मनसबदार। उन्होंने 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के विरुद्ध मुग़ल सेना का नेतृत्व किया और काबुल, बंगाल, बिहार, ओडिशा के अभियान सँभाले।
क्या नवरत्न शब्द ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक है?
“नवरत्न” शब्द अकबर के समकालीन फ़ारसी स्रोतों — आइन-ए-अकबरी, मुंतख़ब-उत-तवारीख — में नहीं मिलता। यह बाद की लोक-परंपरा द्वारा अकबर के दरबार के नौ प्रमुख विद्वानों के लिए गढ़ी गई संज्ञा है। फिर भी उल्लिखित नौ में से अधिकांश की ऐतिहासिकता निर्विवाद है।
इबादतख़ाना क्या था?
इबादतख़ाना अकबर द्वारा 1575 में फ़तेहपुर सीकरी में स्थापित अंतर-धार्मिक संवाद-गृह था। हर गुरुवार को मुस्लिम उलमा, हिंदू पंडित, जैन आचार्य और जेसुइट पादरी (फ़ादर एक्वाविवा) यहाँ धार्मिक-दार्शनिक बहस करते थे — जिसने अकबर की सुलह-ए-कुल नीति और दीन-ए-इलाही (1582) को आकार दिया।