भारत का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) था, जिसे 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट (Regulating Act) के तहत 1773 में “बंगाल का गवर्नर जनरल” बनाया गया। 1833 के चार्टर एक्ट (Charter Act) के बाद यह पद “भारत का गवर्नर जनरल” बना और इसके पहले धारक लॉर्ड विलियम बेंटिंक (Lord William Bentinck) थे। 1858 के भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act) के बाद यही पद वायसराय कहलाया, जिसके पहले धारक लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) और अंतिम लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) थे। स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर जनरल C. राजगोपालाचारी (1948–50) थे। यह लेख तीनों चरणों की संपूर्ण सूची, सुधार और परीक्षा-केंद्रित तथ्य देता है।
परिचय

ब्रिटिश भारत में सर्वोच्च प्रशासनिक पद का नाम और शक्तियाँ समय के साथ बदलती रहीं। 1773 से 1833 तक केवल बंगाल का गवर्नर जनरल था जो अन्य प्रेसीडेंसियों — मद्रास और बंबई — पर सीमित नियंत्रण रखता था। 1833 में अंग्रेज़ों ने पूरे भारत के लिए एक केंद्रीकृत प्रशासन की स्थापना की और तब से वह “भारत का गवर्नर जनरल” बना।
1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) से भारत का प्रशासन सीधे अपने हाथ में ले लिया। तब से यही अधिकारी “वायसराय और गवर्नर जनरल” दोनों उपाधियाँ धारण करता था — वायसराय की हैसियत में वह ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि था और गवर्नर जनरल की हैसियत में सरकार का प्रमुख। स्वतंत्रता के बाद 1947–50 के संक्रमण काल में यह पद अल्पकालिक रूप से जारी रहा और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही समाप्त हो गया।
मुख्य तथ्य एक नज़र में
- प्रथम गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल: वारेन हेस्टिंग्स (1773–1785)
- अंतिम गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल: लॉर्ड विलियम बेंटिंक (1828–1833)
- प्रथम गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया: लॉर्ड विलियम बेंटिंक (1833–1835)
- अंतिम गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया (कंपनी काल): लॉर्ड कैनिंग (1856–1858)
- प्रथम वायसराय ऑफ इंडिया: लॉर्ड कैनिंग (1858–1862)
- अंतिम वायसराय ऑफ इंडिया (ब्रिटिश): लॉर्ड माउंटबेटन (मार्च–अगस्त 1947)
- स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल: लॉर्ड माउंटबेटन (15 अगस्त 1947 – 21 जून 1948)
- स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर जनरल: C. राजगोपालाचारी (21 जून 1948 – 26 जनवरी 1950)
- भारतीय मूल का प्रथम/एकमात्र गवर्नर जनरल: C. राजगोपालाचारी
- पद का अंत: 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर — अब राष्ट्रपति राज्य प्रमुख
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के युद्धों के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी (राजस्व-संग्रह का अधिकार, revenue-collection right) की मालिक बन गई। कंपनी के पास इतनी बड़ी क्षेत्रीय शक्ति आ जाने पर ब्रिटिश संसद ने उस पर नियंत्रण ज़रूरी समझा। यही पृष्ठभूमि 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की थी, जिसने पहली बार बंगाल के लिए एक “गवर्नर जनरल” का पद बनाया और चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद (Executive Council) नियुक्त की।
इसके बाद 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट (Pitt’s India Act), 1813, 1833 और 1853 के चार्टर एक्टों के माध्यम से कंपनी के अधिकारों को क्रमशः कम किया गया। 1857 के विद्रोह ने कंपनी शासन को असंभव बना दिया और 1858 के भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act 1858) ने सत्ता ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दी। यहाँ से वायसराय युग शुरू हुआ जो 90 वर्षों तक — 1858 से 1947 तक — चला।
चरण 1: बंगाल के गवर्नर जनरल (1773–1833)

| क्रम | नाम | कार्यकाल | प्रमुख घटनाएँ / सुधार |
|---|---|---|---|
| 1 | वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) | 1773–1785 | रेगुलेटिंग एक्ट 1773; प्रथम मराठा युद्ध; द्वैत शासन समाप्त; एशियाटिक सोसाइटी 1784 (विलियम जोन्स) |
| 2 | लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis) | 1786–1793 | स्थायी बंदोबस्त 1793 (Permanent Settlement); तृतीय मैसूर युद्ध; कॉर्नवालिस संहिता; सिविल सेवा का पिता |
| 3 | सर जॉन शोर (Sir John Shore) | 1793–1798 | अहस्तक्षेप नीति (non-intervention policy) |
| 4 | लॉर्ड वेलेज़ली (Lord Wellesley) | 1798–1805 | सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance); चतुर्थ मैसूर युद्ध; द्वितीय मराठा युद्ध; “बाघों का शिकारी” |
| 5 | सर जॉर्ज बार्लो (Sir George Barlow) | 1805–1807 | वेल्लोर विद्रोह 1806 |
| 6 | लॉर्ड मिंटो प्रथम (Lord Minto I) | 1807–1813 | अमृतसर की संधि (रणजीत सिंह) 1809; चार्टर एक्ट 1813 |
| 7 | लॉर्ड हेस्टिंग्स (Lord Hastings) | 1813–1823 | आंग्ल-नेपाल युद्ध 1814–16 (सुगौली संधि); तृतीय मराठा युद्ध; रैयतवाड़ी प्रणाली |
| 8 | लॉर्ड एमहर्स्ट (Lord Amherst) | 1823–1828 | प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध 1824–26 (यान्डबू संधि) |
| 9 | लॉर्ड विलियम बेंटिंक (Lord William Bentinck) | 1828–1833 | सती प्रथा का अंत 1829 (Article XVII); ठगी का दमन; अंग्रेज़ी शिक्षा (मेकॉले मिनट 1835 की पृष्ठभूमि) |
रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के मुख्य प्रावधान:
- बंगाल का गवर्नर “गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल” बना।
- 1774 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना।
- मद्रास और बंबई की प्रेसीडेंसियाँ बंगाल के अधीन कीं (सीमित मामलों में)।
चरण 2: भारत के गवर्नर जनरल (1833–1858)
1833 के चार्टर एक्ट ने पद का नाम “गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया” रखा और लॉर्ड विलियम बेंटिंक इस पदनाम के पहले धारक बने।
| क्रम | नाम | कार्यकाल | प्रमुख घटनाएँ / सुधार |
|---|---|---|---|
| 1 | लॉर्ड विलियम बेंटिंक | 1833–1835 | चार्टर एक्ट 1833; अंग्रेज़ी शिक्षा को आधिकारिक माध्यम |
| 2 | सर चार्ल्स मेटकाफ (Sir Charles Metcalfe) | 1835–1836 | “प्रेस का मुक्तिदाता” — प्रेस सेंसरशिप समाप्त 1835 |
| 3 | लॉर्ड ऑकलैंड (Lord Auckland) | 1836–1842 | प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (आपदा) |
| 4 | लॉर्ड एलेनबरो (Lord Ellenborough) | 1842–1844 | सिंध का विलय 1843 (चार्ल्स नेपियर) |
| 5 | लॉर्ड हार्डिंग प्रथम (Lord Hardinge I) | 1844–1848 | प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध 1845–46 |
| 6 | लॉर्ड डलहौज़ी (Lord Dalhousie) | 1848–1856 | व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse); रेलवे, टेलीग्राफ, डाक सुधार; 1853 की पहली रेलवे लाइन (बंबई–थाणे); विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 की पृष्ठभूमि; अवध का विलय 1856 |
| 7 | लॉर्ड कैनिंग (Lord Canning) | 1856–1858 | 1857 की क्रांति; भारत सरकार अधिनियम 1858 |
चार्टर एक्ट 1833 के मुख्य प्रावधान:
- कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त — विशुद्ध प्रशासनिक निकाय।
- भारत के लिए एक केंद्रीकृत विधायिका।
- विधि आयोग (Law Commission) की स्थापना — मेकॉले अध्यक्ष।
चरण 3: भारत के वायसराय (1858–1947)
1858 के अधिनियम के बाद वायसराय ब्रिटिश सम्राट का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बना। 1876 में रॉयल टाइटल्स एक्ट के बाद महारानी विक्टोरिया “केसर-ए-हिंद” बनीं और वायसराय का पद और प्रतिष्ठित हुआ।
| क्रम | नाम | कार्यकाल | प्रमुख घटनाएँ / सुधार |
|---|---|---|---|
| 1 | लॉर्ड कैनिंग | 1858–1862 | भारत सरकार अधिनियम 1858; भारतीय परिषद अधिनियम 1861; विश्वविद्यालय अधिनियम 1857 (कलकत्ता, बंबई, मद्रास) |
| 2 | लॉर्ड एल्गिन प्रथम (Lord Elgin I) | 1862–1863 | वहाबी आंदोलन का दमन |
| 3 | सर जॉन लॉरेंस (Sir John Lawrence) | 1864–1869 | भूटान युद्ध; अकाल आयोग |
| 4 | लॉर्ड मेयो (Lord Mayo) | 1869–1872 | राजकोषीय विकेन्द्रीकरण; 1871 की पहली जनगणना; अंडमान में हत्या (एकमात्र वायसराय जो पद पर मारा गया) |
| 5 | लॉर्ड नॉर्थब्रुक (Lord Northbrook) | 1872–1876 | कूच बिहार का विवाह विवाद |
| 6 | लॉर्ड लिटन (Lord Lytton) | 1876–1880 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट 1878; आर्म्स एक्ट 1878; द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध; 1877 का दिल्ली दरबार |
| 7 | लॉर्ड रिपन (Lord Ripon) | 1880–1884 | इल्बर्ट बिल विवाद 1883; प्रथम स्थानीय स्वशासन अधिनियम 1882 (“स्थानीय स्वशासन का जनक”); प्रथम कारखाना अधिनियम 1881; हंटर शिक्षा आयोग |
| 8 | लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin) | 1884–1888 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 (A. O. Hume); तृतीय आंग्ल-बर्मी युद्ध; ऊपरी बर्मा का विलय |
| 9 | लॉर्ड लैंसडाउन (Lord Lansdowne) | 1888–1894 | भारतीय परिषद अधिनियम 1892; ड्यूरंड रेखा 1893 |
| 10 | लॉर्ड एल्गिन द्वितीय (Lord Elgin II) | 1894–1899 | 1896–97 का अकाल और प्लेग; पूना में चापेकर बंधु |
| 11 | लॉर्ड कर्ज़न (Lord Curzon) | 1899–1905 | बंगाल विभाजन 1905; भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पुनर्गठन; पुलिस आयोग |
| 12 | लॉर्ड मिंटो द्वितीय (Lord Minto II) | 1905–1910 | मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909 (Morley-Minto Reforms); पृथक निर्वाचक मंडल; मुस्लिम लीग 1906 |
| 13 | लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय (Lord Hardinge II) | 1910–1916 | 1911 का दिल्ली दरबार और राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण; बंगाल विभाजन रद्द 1911; प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत |
| 14 | लॉर्ड चेम्सफोर्ड (Lord Chelmsford) | 1916–1921 | लखनऊ समझौता 1916; होम रूल लीग; मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 (Mont-Ford Reforms) — द्वैध शासन (dyarchy); रौलट एक्ट 1919; जलियाँवाला बाग़ 13 अप्रैल 1919; असहयोग आंदोलन |
| 15 | लॉर्ड रीडिंग (Lord Reading) | 1921–1926 | चौरी चौरा 1922; काकोरी 1925; हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन |
| 16 | लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) | 1926–1931 | साइमन कमीशन 1928; नेहरू रिपोर्ट 1928; पूर्ण स्वराज प्रस्ताव लाहौर 1929; नमक सत्याग्रह 1930; गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च 1931 |
| 17 | लॉर्ड वेलिंगडन (Lord Willingdon) | 1931–1936 | द्वितीय और तृतीय गोलमेज़ सम्मेलन; सांप्रदायिक अधिनिर्णय 1932; पूना समझौता 1932; भारत सरकार अधिनियम 1935 |
| 18 | लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow) | 1936–1944 | 1937 के प्रांतीय चुनाव; द्वितीय विश्व युद्ध; अगस्त प्रस्ताव 1940; क्रिप्स मिशन 1942; भारत छोड़ो आंदोलन 9 अगस्त 1942 |
| 19 | लॉर्ड वेवेल (Lord Wavell) | 1944–1947 | वेवेल योजना; शिमला सम्मेलन 1945; INA परीक्षण; नौसेना विद्रोह 1946; कैबिनेट मिशन 1946; अंतरिम सरकार 2 सितंबर 1946; प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस |
| 20 | लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) | मार्च–अगस्त 1947 | माउंटबेटन योजना 3 जून 1947; भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947; विभाजन; 15 अगस्त 1947 — स्वतंत्रता |
स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल (1947–1950)
स्वतंत्रता के बाद भी 26 जनवरी 1950 तक भारत डोमिनियन (Dominion) था और राज्य प्रमुख “गवर्नर जनरल” कहलाता था। केवल दो लोगों ने यह पद धारण किया।
| क्रम | नाम | कार्यकाल | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1 | लॉर्ड माउंटबेटन | 15 अगस्त 1947 – 21 जून 1948 | स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल; एकमात्र विदेशी |
| 2 | C. राजगोपालाचारी (राजाजी) | 21 जून 1948 – 26 जनवरी 1950 | अंतिम गवर्नर जनरल; एकमात्र भारतीय; तमिलनाडु से, पूर्व मद्रास के मुख्यमंत्री |
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही गवर्नर जनरल का पद समाप्त हुआ और राष्ट्रपति का पद बना। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। इस संक्रमण के संवैधानिक पहलुओं पर विस्तृत समझ के लिए भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ का अध्ययन उपयोगी है।
प्रमुख संवैधानिक अधिनियम — एक नज़र में
| अधिनियम | वर्ष | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| रेगुलेटिंग एक्ट | 1773 | बंगाल का गवर्नर जनरल पद; सर्वोच्च न्यायालय कलकत्ता |
| पिट्स इंडिया एक्ट | 1784 | द्वैध नियंत्रण — कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स + बोर्ड ऑफ कंट्रोल |
| चार्टर एक्ट | 1813 | कंपनी के एकाधिकार में दरार; ईसाई मिशनरियों को अनुमति |
| चार्टर एक्ट | 1833 | “गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया”; विधि आयोग; कंपनी विशुद्ध प्रशासनिक |
| चार्टर एक्ट | 1853 | प्रतियोगी परीक्षा से सिविल सेवा; पृथक विधायिका |
| GoI Act | 1858 | कंपनी शासन समाप्त; क्राउन शासन; “वायसराय” पद; भारत सचिव (Secretary of State for India) |
| भारतीय परिषद अधिनियम | 1861 | विधायी विकेंद्रीकरण; पोर्टफोलियो प्रणाली (कैनिंग) |
| भारतीय परिषद अधिनियम | 1892 | परोक्ष चुनाव की सीमित शुरुआत |
| Morley-Minto Reforms | 1909 | पृथक निर्वाचक मंडल — सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व |
| Mont-Ford Reforms | 1919 | द्वैध शासन प्रांतों में; द्विसदनीय केंद्रीय विधायिका |
| GoI Act | 1935 | प्रांतीय स्वायत्तता; संघीय न्यायालय 1937; RBI 1935 |
| भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम | 1947 | भारत और पाकिस्तान का विभाजन; सत्ता हस्तांतरण |
महत्वपूर्ण व्यक्तित्व — विस्तृत विश्लेषण
वारेन हेस्टिंग्स (1773–1785): भारत में पहले अंग्रेज़ी अधिकारी जिन पर ब्रिटिश संसद ने महाभियोग (impeachment) चलाया (1788–1795)। 1784 में सर विलियम जोन्स के साथ एशियाटिक सोसाइटी (Asiatic Society) की नींव रखी।
लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786–1793): “भारतीय सिविल सेवा का जनक” कहलाते हैं। 1793 में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) लागू किया जिसने ज़मींदारी प्रथा की संरचना तय की।
लॉर्ड डलहौज़ी (1848–1856): आधुनिक भारत के “नवनिर्माता” — रेलवे की पहली लाइन 1853, टेलीग्राफ, डाक सुधार और लोक निर्माण विभाग (PWD) की स्थापना। साथ ही व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse) से सतारा, झाँसी, नागपुर, संबलपुर का विलय।
लॉर्ड कर्ज़न (1899–1905): बंगाल विभाजन (1905) के लिए कुख्यात; इसने स्वदेशी आंदोलन और गरमपंथी राष्ट्रवाद को जन्म दिया। साथ ही ASI का पुनर्गठन और पुरातत्व-संरक्षण के नए नियम।
लॉर्ड माउंटबेटन (1947–1948): अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल। 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना ने विभाजन की रूपरेखा तय की।
C. राजगोपालाचारी: एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल (1948–50), तमिलनाडु से, पूर्व मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री और बाद में स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक। उन्होंने 1947 के बंगाल विभाजन-दंगों के बाद बंगाल के राज्यपाल के रूप में स्थिति संभाली थी।
चुनौतियाँ और आलोचना
ब्रिटिश गवर्नरों और वायसरायों का मूल्यांकन एकपक्षीय नहीं हो सकता। एक ओर रिपन और बेंटिंक जैसे “उदारवादी” थे जिन्होंने सती-प्रथा का अंत किया और स्थानीय स्वशासन की नींव रखी। दूसरी ओर लिटन, कर्ज़न जैसे “साम्राज्यवादी” थे जिन्होंने प्रेस-सेंसरशिप और बंगाल विभाजन से भारतीय जनभावना को गहरी ठेस पहुँचाई।
प्रमुख आलोचनाएँ — आर्थिक निकासी (drain of wealth), 1770/1876–78/1899–1900 के अकाल, औद्योगीकरण-विरोधी नीतियाँ, अंग्रेज़ी शिक्षा का सीमित विस्तार और सांप्रदायिक राजनीति का बीजारोपण (1909 के पृथक निर्वाचक मंडल)। यह वर्ग-संरचना और औपनिवेशिक शोषण जवाहरलाल नेहरू और लोकतांत्रिक समाजवाद में विस्तार से दर्ज है।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
- Prelims: “प्रथम/अंतिम” से जुड़े तथ्य अति महत्त्वपूर्ण — हेस्टिंग्स (1773), बेंटिंक (1833), कैनिंग (1858), माउंटबेटन (अंतिम वायसराय), C. राजगोपालाचारी (अंतिम GG)। साथ ही प्रत्येक से जुड़े अधिनियम और घटनाएँ।
- Mains GS-1: “ब्रिटिश शासन के विभिन्न चरणों का चरित्र” — व्यापारिक से लेकर औपनिवेशिक तक। डलहौज़ी की व्यपगत नीति और 1857; कर्ज़न का बंगाल विभाजन और राष्ट्रवाद का उभार।
- Mains GS-2: सत्ता हस्तांतरण की संवैधानिक प्रक्रिया — 1858 का GoI Act से लेकर 1947 के Indian Independence Act तक। डोमिनियन से गणराज्य का संक्रमण।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “लॉर्ड कर्ज़न का बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवाद के लिए वरदान साबित हुआ।” — टिप्पणी कीजिए। (150 शब्द)
- लॉर्ड डलहौज़ी की प्रशासनिक और आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन कीजिए। 1857 की क्रांति के संदर्भ में उनकी भूमिका कितनी ज़िम्मेदार थी? (250 शब्द)
निष्कर्ष
भारत के गवर्नर जनरल और वायसरायों की 177-वर्षीय शृंखला — वारेन हेस्टिंग्स से C. राजगोपालाचारी तक — केवल नामों की सूची नहीं है, यह औपनिवेशिक भारत के विकास, संघर्ष और स्वतंत्रता की कथा है। प्रत्येक पद-धारक ने या तो प्रशासनिक ढाँचे में नई परत जोड़ी या भारतीय राष्ट्रवाद को नया मोड़ दिया। UPSC के दृष्टिकोण से इस सूची को रट लेना पर्याप्त नहीं — हर नाम के साथ कम-से-कम एक “प्रमुख अधिनियम” और एक “प्रमुख घटना” याद रखना ज़रूरी है। 26 जनवरी 1950 को इस पद का अंत और राष्ट्रपति-शासित गणतंत्र की स्थापना भारतीय संविधान की सर्वोच्चता का प्रतीक है — यही समझ Mains के उत्तर-लेखन में अंक दिलाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भारत का प्रथम गवर्नर जनरल कौन था?
भारत का प्रथम गवर्नर जनरल (बंगाल का) वारेन हेस्टिंग्स था, जिसे 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत 1773 में नियुक्त किया गया। वह 1773 से 1785 तक इस पद पर रहा।
भारत का प्रथम गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया कौन था?
“गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया” (पूरे भारत का) पद 1833 के चार्टर एक्ट से बना, और इसके पहले धारक लॉर्ड विलियम बेंटिंक (1833–1835) थे। इससे पहले यह पद केवल “बंगाल का गवर्नर जनरल” था।
भारत का प्रथम वायसराय कौन था?
1858 के भारत सरकार अधिनियम के बाद पद का नाम “वायसराय” रखा गया। प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग (1858–1862) थे, जो उससे पहले अंतिम कंपनी-काल के गवर्नर जनरल भी थे।
भारत का अंतिम वायसराय कौन था?
ब्रिटिश भारत का अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन था, जो मार्च 1947 से 15 अगस्त 1947 तक इस पद पर रहा। इसके बाद वही व्यक्ति स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।
स्वतंत्र भारत का अंतिम गवर्नर जनरल कौन था?
स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर जनरल C. राजगोपालाचारी थे (21 जून 1948 – 26 जनवरी 1950)। वह इस पद पर बैठने वाले एकमात्र भारतीय थे।
वायसराय और गवर्नर जनरल में क्या अंतर है?
1858 से 1947 तक यह एक ही व्यक्ति था जो दो उपाधियाँ धारण करता था। “गवर्नर जनरल” प्रशासन का प्रमुख था और “वायसराय” ब्रिटिश सम्राट का राजनीतिक प्रतिनिधि। 1858 से पहले केवल “गवर्नर जनरल” था; 1947 के बाद डोमिनियन काल में फिर से केवल “गवर्नर जनरल” बचा।
सती प्रथा का अंत किसने किया?
सती प्रथा को लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 1829 में रेगुलेशन XVII (1829) के माध्यम से कानूनी रूप से समाप्त किया। राजा राम मोहन राय का सामाजिक समर्थन इसमें निर्णायक था।
भारत का गवर्नर जनरल पद कब समाप्त हुआ?
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होते ही गवर्नर जनरल का पद समाप्त हुआ और इसका स्थान राष्ट्रपति ने ले लिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति बने।
बंगाल विभाजन किसने किया था?
बंगाल विभाजन 1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने किया था, जिसका तर्क “प्रशासनिक सुविधा” था लेकिन वास्तविक उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम विभाजन था। जनदबाव में 1911 में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने इसे रद्द कर दिया।
गांधी-इरविन समझौता किस वायसराय के समय हुआ?
गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च 1931 को लॉर्ड इरविन के समय हुआ। यह सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में काँग्रेस की भागीदारी से जुड़ा था। विस्तार के लिए गांधी-इरविन समझौता देखें।