Opens in a new tab
Join Anantam IAS Channel on Telegram

भारत में मीडिया स्वतंत्रता: दबाव में स्वतंत्र प्रेस

RSF 2026 सूचकांक, सरकार की विधि संबंधी आपत्ति, अनुच्छेद 19, इंटरनेट रोक, तथ्य-जाँच इकाई, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और मीडिया सुधार आसान हिंदी में समझिए।

RSF 2026 में भारत की 157/180 रैंक और सरकार की विधि संबंधी आपत्ति का संतुलित हिंदी चित्र

स्वतंत्र प्रेस कोई विलासिता नहीं है जिसे लोकतंत्र सुरक्षित महसूस करने के बाद चालू करे। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल तारबंदी है। इसलिए रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders), यानी RSF, ने 30 अप्रैल को 2026 का विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी करके भारत को 180 देशों में 157वाँ स्थान दिया तो संख्या फैसले जैसी लगी। यह 2025 के 151वें स्थान से 6 पायदान नीचे और भारत की अब तक की सबसे कमजोर स्थिति थी। साथ ही दूसरा उतना ही जरूरी तथ्य सामने आया: भारत सरकार कई वर्षों से इस सूचकांक को छोटे नमूने और धारणा पर आधारित बताकर अस्वीकार करती है। दोनों बातें रिकॉर्ड पर हैं और ईमानदार मुख्य परीक्षा उत्तर को दोनों एक साथ रखनी चाहिए।

यही पूरे विषय का तनाव है। वैश्विक सूचकांक कहता है कि भारतीय प्रेस दबाव में है। सरकार कहती है कि सूचकांक की विधि कमजोर है और वास्तविकता नहीं दिखाती। किसी एक पक्ष को चुनकर यह विवाद हल नहीं होता। ऐसी कसौटी चाहिए जो दोनों में से किसी पर निर्भर न हो। भारत का अपना संविधान, सर्वोच्च न्यायालय और हाल का उच्च न्यायालय फैसला यही कसौटी देते हैं।

मुद्दे को ठीक तरह से समझें

पहले शब्दों का अर्थ तय करें, क्योंकि आधी उलझन ढीली भाषा से पैदा होती है।

चौथा स्तंभ (fourth estate) प्रेस को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ सत्ता पर अनौपचारिक चौथी निगरानी मानता है। उसे औपचारिक संवैधानिक दर्जा नहीं मिला। उसका अधिकार नागरिकों को जानकारी देने के काम से आता है, ताकि वे बाकी तीन संस्थाओं से जवाब माँग सकें। इसलिए कमजोर प्रेस केवल मीडिया की समस्या नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही की समस्या है।

भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता शब्द अलग से नहीं लिखा है। भाग III में यह वाक्य नहीं मिलेगा। वहाँ अनुच्छेद 19(1)(a) में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय लगातार मानता आया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी अधिकार में शामिल है। प्रकाशन, प्रसार और जानकारी पाने का अधिकार इसी एक स्वतंत्रता से निकलता है।

अनुच्छेद 19(1)(a) असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(2) राज्य को 8 बंद आधारों पर भाषण पर उचित रोक लगाने देता है: भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसाना। रोक इनमें से किसी आधार में आनी चाहिए और फिर भी उचित, अनुपातिक एवं जरूरत से अधिक नहीं होनी चाहिए। भारत की संप्रभुता और अखंडता वाला आधार 1963 के 16वें संशोधन से जुड़ा, लेकिन मूल सिद्धांत वही है: सूची बंद है, राज्य 9वाँ आधार नहीं बना सकता।

इसलिए भारतीय प्रेस स्वतंत्रता न नारा है, न केवल RSF अंक। यह संविधान से मिला अधिकार है जिसकी सीमाएँ भी लिखी हैं। वास्तविक सवाल यह है कि सीमाएँ संविधान की मंशा के अनुसार संकरे अपवाद हैं या वे अधिकार को ही दबाने लगी हैं।

आँकड़े क्या बताते हैं?

शुरुआत खबर वाले आँकड़े से करें, लेकिन स्रोत साफ लिखें। रैंकिंग वास्तविकता का सीधा तथ्य नहीं, माप है और हर माप की विधि होती है।

RSF के 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों और क्षेत्रों में 157वें स्थान पर है। 2025 में 151वें स्थान से 6 पायदान गिरकर यह सूचकांक शुरू होने के बाद भारत की सबसे कमजोर स्थिति है। RSF ने भारत को बहुत गंभीर (very serious) श्रेणी में रखा और करीब 32/100 का व्यापक रूप से बताया गया कुल अंक इस श्रेणी से मेल खाता है। 2026 के लिए RSF का वैश्विक निष्कर्ष भी गंभीर है। उसके अनुसार सूचकांक के 25 वर्ष के इतिहास में दुनिया का औसत प्रेस स्वतंत्रता अंक सबसे नीचे है और पहली बार आधे से अधिक देश कठिन या बहुत गंभीर श्रेणी में हैं।

दक्षिण एशिया की तुलना सबसे अधिक चुभती है। RSF के 2026 आँकड़ों में भारत सूची के 5 पड़ोसी देशों से नीचे है: नेपाल करीब 87वाँ, श्रीलंका 134वाँ, भूटान 150वाँ, बांग्लादेश 152वाँ और पाकिस्तान 153वाँ। इनमें केवल नेपाल सबसे कमजोर श्रेणियों से बाहर है।

RSF भारत की स्थिति के 3 कारण बताता है। पहला सुरक्षा: उसके अनुसार काम के कारण हर वर्ष औसतन 2-3 पत्रकार मारे जाते हैं, जिससे भारत मीडिया पेशेवरों के लिए खतरनाक देशों में है। आलोचनात्मक पत्रकार उत्पीड़न, धमकी और आपराधिक मुकदमे झेलते हैं। दूसरा मीडिया मालिकाना हक का कुछ हाथों में सिमटना। RSF का मुख्य भारत संबंधी दावा है कि मुकेश अंबानी की रिलायंस और नेटवर्क18 70 से अधिक मीडिया संस्थान नियंत्रित करती हैं, जो कम से कम 80 करोड़ भारतीयों तक पहुँचते हैं। वह 2022 के आखिर में गौतम अडानी द्वारा NDTV खरीदने को मुख्यधारा मीडिया में बहुलता के अंत का संकेत कहता है। तीसरा राजनीतिक जुड़ाव है, जिसके लिए RSF गोदी मीडिया शब्द इस्तेमाल करता है। इस अंतिम दावे को RSF का आकलन लिखें, साबित तथ्य नहीं।

ईमानदार उत्तर में बारीकी जोड़नी होगी। इनमें कुछ आँकड़े और रूपरेखाएँ RSF की अपनी हैं। 70 से अधिक संस्थान और 80 करोड़ पहुँच उसकी गणना है; गोदी मीडिया उसका व्याख्यात्मक शब्द है। रैंकिंग से अलग सार्वजनिक रिकॉर्ड यह है कि 2022 में NDTV अडानी समूह के पास गया और नेटवर्क18 रिलायंस के भीतर है। इसलिए मालिकाना बदलाव को तथ्य की तरह और पहुँच तथा कब्जे वाले दावे को RSF के आकलन की तरह लिखें।

RSF से स्वतंत्र घरेलू आँकड़े भी हैं। इंटरनेट बंद होने का आदेश किसी क्षेत्र की मोबाइल या ब्रॉडबैंड सेवा रोककर डिजिटल खबर भी काट देता है। एक्सेस नाउ (Access Now) के कीप इट ऑन (#KeepItOn) आँकड़ों में 2024 में भारत में 84 बार इंटरनेट बंद हुआ। यह दुनिया में दूसरा सबसे अधिक और लोकतंत्रों में सबसे अधिक था। 2025 में संख्या 65 हुई, फिर भी लोकतंत्रों में सबसे अधिक। SFLC.in के आँकड़ा-पथ पर 2012 से 2024 तक करीब 848 मामले हैं। जेल में पत्रकारों पर पत्रकार सुरक्षा समिति (Committee to Protect Journalists) की 1 दिसंबर वाली सालाना गणना में 2024 में भारत में 3 और 2025 में 2 पत्रकार कैद थे। ये एक तारीख के चित्र हैं, इसलिए पूरे वर्ष का दबाव कम दिखाते हैं।

RSF 2026 सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर और सरकार की विधि संबंधी आपत्ति
RSF के 2026 सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है; सरकार इसकी विधि पर आपत्ति करती है।
प्रेस पर कानूनी, आर्थिक और डिजिटल दबाव
प्रेस पर कानूनी, आर्थिक और डिजिटल दबाव।

दबाव के पक्ष में प्रमाण

भारतीय प्रेस पर वास्तविक और दर्ज दबाव की दलील मजबूत है और इसे RSF की जरूरत नहीं। अदालत या कानून से जाँचे जा सकने वाले प्रमाण से शुरू करें। पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 124A वाला राजद्रोह औपनिवेशिक अपराध था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2022 में समीक्षा तक रोक दिया। यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita), यानी BNS, राजद्रोह शब्द हटाती है, लेकिन धारा 152 में भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे वाले कृत्यों पर दंड देती है। इसमें अलगाव या विघटनकारी गतिविधि उकसाने वाले शब्द और इलेक्ट्रॉनिक संचार भी हैं। निचली श्रेणी की अधिकतम सजा 3 से 7 वर्ष हुई और ऊपरी में आजीवन कारावास संभव है। आलोचक कहते हैं कि अपराध मूल रूप में बचा है और सामान्य आलोचनात्मक पत्रकारिता तक पहुँच सकता है। आपराधिक मानहानि तथा पत्रकारों पर आतंक-विरोधी एवं धनशोधन कानूनों का इस्तेमाल जोड़ें तो ऐसी कानूनी स्थिति बनती है जहाँ प्रक्रिया खुद दंड बन सकती है।

सबसे ठोस प्रमाण विदेशी संस्था नहीं, भारतीय अदालत से आया। 2024 में सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 में संशोधन करके इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत तथ्य-जाँच इकाई (Fact Check Unit), यानी FCU, बनाई। यह सामाजिक मंचों पर केंद्र सरकार के अपने काम से जुड़ी नकली, झूठी या भ्रामक जानकारी चिन्हित करती। 20 सितंबर 2024 को कुणाल कामरा बनाम भारत संघ में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने संशोधन को असंवैधानिक रद्द किया। अदालत ने कहा कि यह अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(g) और 14 का उल्लंघन है, शब्द अस्पष्ट हैं और इसका डर पैदा करने वाला असर है। निर्णायक न्यायाधीश ने सरकार को अपने बारे में नकली खबर का अंतिम निर्णायक बनाने पर आपत्ति की। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया। देश की अपनी अदालत का हाल की प्रेस व्यवस्था को संविधान से अधिक मानना रैंकिंग से स्वतंत्र घरेलू संकेत है।

आर्थिक ढाँचा भी देखें। मालिकाना हक का सिमटना केवल RSF का आरोप नहीं; खरीद सार्वजनिक रिकॉर्ड है। 2022 में NDTV अडानी समूह के पास गया और नेटवर्क18 रिलायंस के भीतर है। कुछ बड़े कारोबारी समूह बहुत बड़ी पहुँच नियंत्रित करें तो चिंता षड्यंत्र की नहीं, बनावट की है। व्यावसायिक और राजनीतिक लाभ चुपचाप तय कर सकते हैं कि क्या खबर बने और अनेक स्वतंत्र आवाजों वाली बहुलता घट सकती है।

ऑनलाइन होते देश में डिजिटल रोक भी महत्त्वपूर्ण है। इंटरनेट बंद होने पर डिजिटल खबर स्रोत पर रुकती है। 2024 में दुनिया में दूसरे और 2024 तथा 2025 में लोकतंत्रों में सबसे अधिक मामले का अर्थ है कि कुछ जिलों में कुछ समय प्रेस अपने पाठक तक पहुँच ही नहीं सका। कानूनी खतरा, मालिकाना सिमटना और इंटरनेट बंद होने का रिकॉर्ड मिलकर RSF पर भरोसा किए बिना वास्तविक दबाव का मामला बनाते हैं।

विरोधी पक्ष की मजबूत दलील

अब दूसरे पक्ष को उसकी पूरी ताकत के साथ रखें। सरकार का रुख केवल बहाना नहीं, वास्तविक विधि संबंधी आपत्ति पर आधारित है।

सबसे मजबूत बात यह है कि RSF का सूचकांक अपनी शर्तों पर विवाद योग्य है। सरकार ने इसे रिकॉर्ड पर कहा है। 2022 में राज्यसभा में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि सरकार RSF के विचार या निष्कर्ष नहीं मानती। उन्होंने बहुत छोटा नमूना, लोकतंत्र की बुनियादी बातों को बहुत कम या कोई वजन न देना और संदिग्ध एवं अपारदर्शी विधि बताई। नीति आयोग ने विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक को समझना (Deciphering the World Press Freedom Index) नाम से आलोचना प्रकाशित की। उसका तर्क है कि करीब 150 उत्तरदाता और 18 गैर-सरकारी संस्थाएँ हर देश पर 83 प्रश्नों का उत्तर दें तो पक्षपात और वास्तविकता से दूरी की संभावना बड़ी है। हर प्रश्न एवं श्रेणी के अंक सार्वजनिक नहीं, उत्तरदाताओं की सूची नहीं और पत्रकारों के खिलाफ हिंसा के मात्रात्मक आँकड़ों का साफ सत्यापित स्रोत नहीं। विशेषज्ञ राय वाले धारणा-आधारित सूचकांक को बहस का एक संकेत मान सकते हैं, अंतिम फैसला नहीं। दूसरी तरफ RSF सार्वजनिक विधि दस्तावेज रखता है और कहता है कि 5 संकेतकों वाली विधि पारदर्शी एवं 180 क्षेत्रों पर समान है। 157वीं रैंक पर सरकार का नया 2026 का बिंदुवार जवाब नहीं है; लगातार रुख 2022 वक्तव्य और नीति आयोग की आलोचना पर आधारित है।

दूसरी बात, राज्य के वैध हित हैं जिन्हें स्वतंत्रता की बहस कभी हल्का मानती है। गलत सूचना वास्तविक नुकसान करती है। तेजी से फैली झूठी बातों ने भीड़ हिंसा और सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया। जानबूझकर गलत सूचना रोकना FCU बनाने का घोषित कारण था। बॉम्बे उच्च न्यायालय की तरह साधन गलत मानते हुए भी समस्या को वास्तविक मान सकते हैं।

तीसरी बात, प्रेस की ईमानदारी को केवल राज्य से खतरा नहीं। भारतीय प्रेस परिषद ने पैसे देकर खबर छपवाने और बिना बताए प्रायोजित सामग्री पर चिंता जताई है। व्यापारिक दबाव भी बहुलता घटाता है और उसका कुछ हिस्सा नियंत्रण के पक्ष में तर्क है।

चौथी और संवैधानिक रूप से निर्णायक बात है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से बाहर की चिंता नहीं। अनुच्छेद 19(2) संप्रभुता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए रोक की साफ अनुमति देता है। सुरक्षा से जुड़ी सीमा सिद्धांत रूप में असंवैधानिक नहीं। सवाल केवल यह है कि वह अनुपातिक, जरूरी और सबसे कम रोक वाला तरीका है या नहीं। इसलिए विवाद आम तौर पर रोक बनाम स्वतंत्रता नहीं, इस खास रोक की अनुपातिकता है।

अंत में प्रेस की रक्षा करने वाली संस्थाएँ काम कर रही हैं। रोमेश थापर और बेनेट कोलमैन फैसले देने वाली अदालतों ने 2024 में FCU रद्द किया। सक्रिय न्यायिक रोक अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि अधिकार व्यवस्था काम करती है, पूरी तरह ढही नहीं।

स्वतंत्र प्रेस के संवैधानिक और न्यायिक सुरक्षा उपाय
स्वतंत्र प्रेस के संवैधानिक और न्यायिक सुरक्षा उपाय।

गहरी संस्थागत समझ

रैंकिंग से आगे वास्तविक ढाँचा दिखाई देता है। इस विषय की निष्पक्ष रीढ़ RSF नहीं, 7 दशकों का सर्वोच्च न्यायालय का कानून है जिसने अनुच्छेद 19(1)(a) के भीतर प्रेस स्वतंत्रता बनाई। उत्तर इसी पर टिकना चाहिए।

रेखा 1950 से शुरू होती है। रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य में सर्वोच्च न्यायालय ने क्रॉस रोड्स पत्रिका के प्रसार पर रोक लगाने वाला मद्रास कानून रद्द किया। अदालत ने कहा कि प्रसार की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के भाषण का हिस्सा है और रोक 19(2) से अधिक चौड़ी थी। उसी वर्ष बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य में ऑर्गनाइज़र अखबार की प्रकाशन से पहले जाँच रद्द की गई। अखबार पर पूर्व रोक भाषण का उल्लंघन है। इन फैसलों ने आधार बनाया: प्रेस स्वतंत्रता वास्तविक है, 19(1)(a) में रहती है और पूर्व रोक सामान्यतः गलत है।

फिर आर्थिक दबाव के मामले आए, जो आज मालिकाना हक की चिंता से सबसे अधिक जुड़े हैं। 1962 के सकल पेपर्स बनाम भारत संघ में अदालत ने कीमत के अनुसार अखबार के पन्ने तय करने वाला कानून प्रसार और भाषण पर असंवैधानिक रोक मानकर रद्द किया। 1973 के बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम भारत संघ में पन्ने और अखबार शीर्षक सीमित करने वाला अखबारी कागज नियंत्रण आदेश रद्द हुआ। इसी से सीधा प्रभाव कसौटी मिली, जो उपाय के बताए उद्देश्य के बजाय भाषण पर वास्तविक असर देखती है। 1985 के इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स बनाम भारत संघ में माना गया कि प्रेस कर जैसे सामान्य कानून से बाहर नहीं, लेकिन उस पर प्रसार घटाने वाला असहनीय बोझ अलग से नहीं डाला जा सकता। तीनों साथ बताते हैं कि राज्य पन्ना सीमा, कागज कोटा या दंडात्मक कर से प्रेस का आर्थिक गला नहीं घोंट सकता।

इंटरनेट बंद होने के लिए डिजिटल युग का मामला सबसे महत्त्वपूर्ण है। 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ में कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक ने जम्मू-कश्मीर इंटरनेट रोक को चुनौती दी। न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट से जानकारी पाना अनुच्छेद 19(1)(a) से जुड़ा है, अनिश्चित समय की रोक स्वीकार नहीं, और आदेश अनुपातिक, समयबद्ध, लिखित कारण वाले, प्रकाशित तथा नियमित समीक्षा एवं न्यायिक जाँच के लिए खुले हों। ये अनुराधा भसीन दिशा-निर्देश इंटरनेट रोक के लिए भारत की अपनी अदालत की कसौटी हैं।

इसलिए भारत की समस्या सुरक्षा उपाय न होना नहीं है। संवैधानिक सिद्धांत मजबूत और अदालतें सक्रिय हैं। समस्या मजबूत मानक और कमजोर प्रशासनिक व्यवहार के बीच अमल का फर्क है। अनुराधा भसीन ने साफ कसौटी दी, फिर भी इंटरनेट रोक दुनिया में सबसे अधिक में है। FCU बना और बाद में अदालत ने रद्द किया। अनुच्छेद 19(2) के संकरे अपवाद नियमित साधन की तरह इस्तेमाल होते हैं। असली दरार संविधान के वादे और रोज की कार्यपालिका में है। भारतीय प्रेस परिषद की कमजोरी भी जुड़ी है। यह वैधानिक और अर्ध-न्यायिक है, लेकिन शक्ति सलाह की है। चेतावनी या निंदा कर सकती है, दंड नहीं। उसका अधिकार केवल मुद्रित प्रेस तक है; टीवी, रेडियो और ऑनलाइन खबर बाहर हैं।

क्या किया जाना चाहिए?

भारत की जमीन पर गंभीर समाधान केवल अधिक स्वतंत्रता की माँग नहीं, बल्कि अदालत या मंत्रालय द्वारा लागू किए जा सकने वाले ऐसे सुधार हैं जो राज्य के वैध हित भी बचाएँ।

  1. राजद्रोह के उत्तराधिकारी को केवल वास्तविक उकसावे पर लागू करें और न्यायिक रोक रखें। BNS की धारा 152 को हिंसा या अलगाव के वास्तविक उकसावे तक सीमित पढ़ें, जैसा 1962 के केदार नाथ सिंह फैसले ने राजद्रोह को सीमित किया था, ताकि आलोचनात्मक पत्रकारिता न फँसे। सर्वोच्च न्यायालय का प्रेस स्वतंत्रता कानून भी इस संकरे अर्थ का समर्थन करता है। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।
  2. आपराधिक मानहानि की जगह नागरिक उपचार को मुख्य बनाएँ। मानहानि को अपराध से हटाना या मुख्य रूप से नागरिक मुकदमा बनाना रिपोर्ट रोकने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल घटाएगा। प्रेस संस्थाएँ और कानून सुधार समूह वर्षों से यह माँग करते हैं। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।
  3. इंटरनेट रोक पर अनुराधा भसीन अनुशासन लागू करें। अनुपातिकता, कड़ी समय सीमा, कारण वाला प्रकाशित आदेश और नियमित समीक्षा आकांक्षा नहीं, मौजूदा कानून हैं। इन्हें रोज लागू करना लोकतंत्रों में सबसे अधिक रोक घटाने का साफ तरीका है। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।
  4. मीडिया मालिकाना हक में पारदर्शिता जरूरी करें। असली लाभ पाने वाले मालिक और अलग माध्यमों में हिस्सेदारी का अनिवार्य खुलासा तथा विभिन्न मीडिया में मालिकाना सीमा की गंभीर जाँच रैंकिंग की बहस से हटकर बहुलता की चिंता सीधे हल करेगी। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।
  5. पत्रकार सुरक्षा नियम बनाएँ। हमलों की तेज जाँच, पुलिस व्यवहार का साफ मानक और संघर्ष एवं सांप्रदायिक परिस्थिति में सुरक्षा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन बचाने के राज्य के कर्तव्य से निकलते हैं। सुरक्षा स्वतंत्र रिपोर्टिंग की पहली शर्त है, एहसान नहीं। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।
  6. सरकारी तथ्य-जाँच की जगह स्वतंत्र स्व-नियंत्रण मजबूत करें। FCU रद्द होने के बाद संवैधानिक रास्ता स्वतंत्र, कई पक्षों वाला तथ्य-जाँच तंत्र और मुद्रित से आगे अधिकार वाली सचमुच स्वायत्त एवं मजबूत प्रेस परिषद है। सरकार अपने बारे में नकली खबर की खुद निर्णायक न बने। विस्तार के लिए भारत में प्रेस स्वतंत्रता देखें।

ये सुधार दोनों पक्ष मजबूत करते हैं। प्रेस की रक्षा होती है और अनुच्छेद 19(2) में हमेशा से मान्य अनुपातिक सुरक्षा रोक राज्य के पास रहती है। अच्छा सुधार संवैधानिक वादे और रोज के व्यवहार का फर्क घटाता है, यह दिखावा किए बिना कि राज्य का कोई वैध हित नहीं।

प्रसार भारती: भारत का सार्वजनिक प्रसारक

भारत की मीडिया स्वतंत्रता की चर्चा प्रसार भारती के बिना अधूरी है। प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) अधिनियम, 1990 से स्थापित और 1997 में काम शुरू करने वाला यह वैधानिक स्वायत्त निकाय दूरदर्शन एवं आकाशवाणी चलाता है। कानून का उद्देश्य सरकारी प्रसारण को सीधे सरकारी नियंत्रण से बचाना था। यह पुरानी माँग 1995 के सर्वोच्च न्यायालय फैसले से भी जुड़ी है कि वायु तरंगें सार्वजनिक संपत्ति हैं और सार्वजनिक हित में इस्तेमाल हों।

प्रसार भारती बोर्ड इसका संचालन करता है। चयन समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अध्यक्ष बोर्ड का प्रमुख होता है। अंशकालिक अध्यक्ष रणनीतिक दिशा तय करता है और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोज का काम संभालता है। लेखक, गीतकार और पूर्व विज्ञापन अधिकारी प्रसून जोशी 2026 में अध्यक्ष नियुक्त हुए। उनसे पहले मीडिया, कला और शिक्षा जगत के सार्वजनिक व्यक्तियों ने यह पद संभाला।

प्रसार भारती का काम संविधान के मूल्यों और देश की एकता एवं अखंडता रखते हुए सूचना, शिक्षा और मनोरंजन देना है। वह उन ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में दर्जनों भाषाओं में पहुँचता है जहाँ निजी चैनल अक्सर नहीं जाते। फिर भी स्वायत्तता पर विवाद है। संस्था सरकारी अनुदान पर काफी निर्भर है और समाचार की संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल रहते हैं। प्रेस स्वतंत्रता के छात्र के लिए यह कानून की सुरक्षा बनाम पैसा और नियुक्ति से व्यवहार में होने वाले असर का अच्छा उदाहरण है।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में कैसे इस्तेमाल करें?

यह GS2 का बहुत उपयोगी विषय है। मौलिक अधिकार, वैधानिक एवं अर्ध-न्यायिक निकाय, सरकारी हस्तक्षेप, न्यायपालिका का काम और वैश्विक सूचकांक पढ़ना यहाँ मिलते हैं। सवाल अधिकार, शासन या संस्था किसी रूप में आ सकता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र से संबंध: GS2 में भारतीय संविधान एवं मौलिक अधिकार; वैधानिक, नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय; सरकारी नीति एवं अमल; न्यायपालिका का काम; पारदर्शिता और जवाबदेही। GS4 में मीडिया नैतिकता, सत्य, निष्पक्षता और स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारी।

संभावित सवाल:

  • “भारत में प्रेस स्वतंत्रता साफ लिखा अधिकार नहीं, निकला हुआ अधिकार है।” अनुच्छेद 19 के तहत संवैधानिक आधार और राज्य द्वारा लगाई जा सकने वाली सीमाओं की जाँच कीजिए।
  • वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग विवादित है, फिर भी उठाई चिंताओं का घरेलू उत्तर जरूरी है। भारत के अपने संवैधानिक फैसलों के संदर्भ में मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
  • चर्चा कीजिए कि इंटरनेट रोक, डिजिटल समाचार का नियंत्रण और मीडिया मालिकाना हक का सिमटना अनुच्छेद 19(1)(a) की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कैसे परखते हैं।

उद्धरण योग्य आँकड़े:

  • RSF का 2026 सूचकांक भारत को 180 में 157वाँ रखता है, 2025 के 151वें से नीचे, अब तक सबसे कमजोर, बहुत गंभीर श्रेणी और करीब 32/100 अंक। स्रोत RSF लिखें।
  • RSF के 2026 आँकड़ों में भारत नेपाल करीब 87, श्रीलंका 134, भूटान 150, बांग्लादेश 152 और पाकिस्तान 153 से नीचे है।
  • एक्सेस नाउ ने 2024 में भारत में 84 इंटरनेट रोक दर्ज कीं, दुनिया में दूसरा और लोकतंत्रों में सबसे अधिक; 2025 में 65। SFLC.in ने 2012 से करीब 848 दर्ज कीं।
  • बॉम्बे उच्च न्यायालय ने 20 सितंबर 2024 को कुणाल कामरा बनाम भारत संघ में FCU को अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(g) और 14 का उल्लंघन बताकर रद्द किया; सर्वोच्च न्यायालय ने रोक नहीं लगाई।
  • राजद्रोह IPC 124A को 2022 में रोका गया और 1 जुलाई 2024 से BNS धारा 152 ने मूल रूप में जगह ली; निचली अधिकतम सजा 3 से 7 वर्ष हुई।
  • सरकार ने 2022 राज्यसभा में अनुराग ठाकुर और नीति आयोग की आलोचना के जरिए RSF सूचकांक को संदिग्ध एवं अपारदर्शी कहा। आधार करीब 150 उत्तरदाता, 18 गैर-सरकारी संस्थाएँ और हर देश पर 83 प्रश्न हैं।

मुख्य शब्द: अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(2), उचित रोक, चौथा स्तंभ, पूर्व रोक, अनुपातिकता, बहुलता, धारणा-आधारित सूचकांक, इंटरनेट रोक, आपराधिक मानहानि, मीडिया मालिकाना हक का सिमटना और स्व-नियंत्रण।

पाठ्यक्रम से जोड़: मौलिक अधिकार और उचित रोक; वैधानिक एवं अर्ध-न्यायिक निकाय, भारतीय प्रेस परिषद; सरकारी नीति एवं अमल, सूचना प्रौद्योगिकी नियम और FCU; अधिकार रक्षक के रूप में न्यायपालिका; पारदर्शिता, जवाबदेही और वैश्विक सूचकांक का आलोचनात्मक अध्ययन।

संतुलित निष्कर्ष: प्रेस इसलिए स्वतंत्र नहीं कि विदेशी सूचकांक ऐसा कहता है, बल्कि तब जब राज्य अनुच्छेद 19(2) के संकरे अपवादों को अपवाद ही रखे, रोज के साधन न बनाए। सबसे भरोसेमंद रास्ता भारत के अपने न्यायिक सिद्धांत से जाता है, विवादित रैंकिंग से नहीं।

उत्तर का ढाँचा कैसे बनाएँ?

केवल रैंकिंग नहीं, दोहरे सच से शुरुआत करें। पहली पंक्ति में लिखें कि वैश्विक सूचकांक गिरावट दिखाता है और सरकार उसकी विधि अस्वीकार करती है। इससे परीक्षक को दिखेगा कि यह विवादित धारणा है, तय माप नहीं। दूसरी या तीसरी पंक्ति में अनुच्छेद 19(1)(a) और उससे निकली प्रेस स्वतंत्रता परिभाषित करें, ताकि उत्तर शुरुआत से संवैधानिक हो।

मुख्य भाग को RSF नहीं, भारतीय कानून पर टिकाएँ। रैंकिंग खबर का आधार है, अंक न्यायिक सिद्धांत में हैं। रोमेश थापर, बेनेट कोलमैन, इंडियन एक्सप्रेस और अनुराधा भसीन पर जल्दी आएँ, क्योंकि ये विवादित सर्वे से स्वतंत्र घरेलू कसौटियाँ हैं।

दोनों पक्ष मजबूत रूप में रखें। दबाव वाले पक्ष में रद्द FCU, इंटरनेट रोक और BNS धारा 152 जैसे प्रमाण दें। सरकारी पक्ष में विधि की आलोचना, गलत सूचना की समस्या और 19(2) की सुरक्षा सीमा की ताकत दें। केवल एक पक्ष वाला उत्तर संपादकीय लगेगा, विश्लेषण नहीं।

आगे के रास्ते को समूह में रखें: राजद्रोह उत्तराधिकारी सीमित करना, मानहानि को नागरिक बनाना, इंटरनेट रोक अनुशासन लागू करना, मालिकाना पारदर्शिता, पत्रकार सुरक्षा और स्वतंत्र स्व-नियंत्रण। हर सुधार में जिम्मेदार संस्था और संवैधानिक आधार बताएँ।

नारे के बजाय निर्णय से खत्म करें। अच्छा ढाँचा है: “प्रेस इसलिए स्वतंत्र नहीं कि कोई रैंकिंग ऐसा कहती है, बल्कि तब जब राज्य संवैधानिक रोक को वही अपवाद माने जिसके लिए वह बनी थी।” इससे अधिकार और वैध सीमा दोनों संतुलित होते हैं।

इन आम गलतियों से बचें

  • रैंकिंग को तथ्य न घोषित करें। लिखें “RSF भारत को 157वाँ रखता है”, यह नहीं कि “भारत 157वाँ सबसे स्वतंत्र है”। संख्या माप है और सरकार विधि पर विवाद करती है।
  • राजद्रोह खत्म हुआ न लिखें। 2022 में रोका गया और 2024 से BNS धारा 152 में मूल रूप से जारी है।
  • राजनीतिक हमला न लिखें। यह संविधान और शासन का सवाल है। विवादित दावे को स्रोत से जोड़ें और भाषा विश्लेषणात्मक रखें।
  • केवल RSF पर न टिकें। इंटरनेट रोक, FCU फैसला और अनुच्छेद 19 के मामले उत्तर को निष्पक्ष एवं भरोसेमंद बनाते हैं।
  • सीमा न भूलें। अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ 19(2) जरूरी है। 8 आधार और अनुपातिकता आधा विषय हैं।

उत्तर का संक्षिप्त आधार

  1. परिचय: RSF गिरावट और सरकार की विधि आपत्ति दोनों; प्रेस स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) से निकली।
  2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(2) के 8 आधार; अलग प्रेस स्वतंत्रता धारा नहीं।
  3. न्यायिक सिद्धांत: रोमेश थापर, सकल पेपर्स, बेनेट कोलमैन, इंडियन एक्सप्रेस और अनुराधा भसीन।
  4. दोनों पक्ष: दबाव, यानी FCU रद्द, इंटरनेट रोक और BNS 152; राज्य, यानी विधि आलोचना, गलत सूचना और 19(2) सुरक्षा।
  5. आगे का रास्ता: जिम्मेदार संस्था और संवैधानिक आधार वाले समूहबद्ध सुधार।
  6. निष्कर्ष: सवाल की भाषा के अनुसार संतुलित पंक्ति।

चित्र या प्रवाह-चित्र का सुझाव

15 अंक के सवाल में यह कड़ी बनाएँ: अनुच्छेद 19(1)(a) की अभिव्यक्ति → उससे निकली प्रेस स्वतंत्रता → अनुच्छेद 19(2) के 8 आधार → अनुपातिकता कसौटी → न्यायिक प्रयोग, अनुराधा भसीन में इंटरनेट रोक और कुणाल कामरा में FCU। इससे पूरा तर्क एक नजर में दिखेगा।

10 अंक में दो खाने की सारणी बनाएँ: अधिकार, यानी अनुच्छेद 19(1)(a), चौथा स्तंभ और बहुलता; सीमा, यानी अनुच्छेद 19(2) के 8 आधार और अनुपातिकता। यह जल्दी जाँची जाती है और दोनों हिस्से दिखाने को मजबूर करती है।

नैतिकता और शासन का नजरिया

GS2 उत्तर में भी एक नैतिक पंक्ति जोड़ें। प्रेस स्वतंत्रता सार्वजनिक भलाई है, लेकिन उसके साथ सत्य, जाँच और ऐसी गलत सूचना न फैलाने की जिम्मेदारी है जिसे राज्य बाद में रोक का आधार बनाए। स्वतंत्रता बनाम जिम्मेदारी मीडिया नैतिकता का केंद्र है।

फिर इसे शासन में बदलें। गलत सूचना का नैतिक समाधान सरकार का अपने बारे में नकली खबर की निर्णायक बनना नहीं, इसी कारण बॉम्बे उच्च न्यायालय ने FCU रद्द किया। समाधान स्वतंत्र, कई पक्षों वाला तथ्य-जाँच और भरोसेमंद स्व-नियामक है। यह नैतिक भाषा को संस्था की बनावट में बदलता है।

उपयोगी वाक्य है: “उद्देश्य वैध है, लेकिन उसकी वैधता इस पर निर्भर है कि शक्ति कौन और किस निगरानी में इस्तेमाल करता है।” इससे गलत सूचना रोकने के राज्य हित को मानते हुए सच तय करने का खुला अधिकार नहीं दिया जाता।

आँकड़े कैसे इस्तेमाल करें ताकि उत्तर यांत्रिक न लगे?

जितने आँकड़े जानते हैं उससे कम लिखें। 10 बिखरी संख्याओं से 3 सही जगह बेहतर हैं। रैंक से शुरुआत करें, RSF के अनुसार 180 में 157। तुलना के लिए 2024 की 84 इंटरनेट रोक लिखें, लोकतंत्रों में सबसे अधिक। कानूनी मोड़ के लिए 20 सितंबर 2024 को FCU रद्द होने की तारीख दें। एक रैंक, एक कामकाजी आँकड़ा और एक कानूनी पड़ाव पर्याप्त हैं।

आँकड़ा अकेला न छोड़ें और रैंक बिना स्रोत न लिखें। हर बात के साथ “RSF के अनुसार”, “एक्सेस नाउ दर्ज करता है” या “बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा” लिखें, फिर उसका अर्थ बताएँ। इससे तथ्य सूची विश्लेषण बनती है और संवेदनशील विषय निष्पक्ष रहता है।

अंत में जाँचें कि थका परीक्षक एक बार में दोनों पक्ष देख सकता है या नहीं। प्रभावशाली सुनाई देने वाला लेकिन काम न करने वाला वाक्य हटाकर तथ्य, फैसला या सुधार रखें। इस विषय में स्पष्टता और संतुलन से ही गहराई दिखती है।

सामान्य प्रश्न

क्या भारतीय संविधान प्रेस स्वतंत्रता की साफ गारंटी देता है?

नहीं। प्रेस स्वतंत्रता की अलग धारा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय लगातार मानता है कि प्रेस स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) की भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में मुख्य हिस्से के रूप में शामिल है। यह निकला हुआ अधिकार है और दूसरे भाषण की तरह अनुच्छेद 19(2) की उचित रोक के अधीन है।

अनुच्छेद 19(2) में उचित रोक के 8 आधार क्या हैं?

राज्य केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसाने पर भाषण रोक सकता है। सूची बंद है और रोक वाला कानून उचित, अनुपातिक एवं जरूरत से अधिक नहीं होना चाहिए।

भारत सरकार RSF विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक क्यों अस्वीकार करती है?

सरकार ने 2022 में तत्कालीन मंत्री अनुराग ठाकुर और नीति आयोग की आलोचना के जरिए सूचकांक को संदिग्ध एवं अपारदर्शी कहा। आपत्ति है कि करीब 150 उत्तरदाता और 18 गैर-सरकारी संस्थाएँ हर देश पर 83 प्रश्नों का उत्तर देती हैं, प्रश्नवार अंक एवं उत्तरदाता सूची सार्वजनिक नहीं और हिंसा के आँकड़े सत्यापित नहीं। RSF कहता है कि उसकी विधि पारदर्शी और संकेतक आधारित है।

तथ्य-जाँच इकाई पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने क्या फैसला दिया?

20 सितंबर 2024 को कुणाल कामरा बनाम भारत संघ में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के काम से जुड़ी नकली, झूठी या भ्रामक सूचना चिन्हित करने वाली FCU बनाने का 2023 का सूचना प्रौद्योगिकी नियम संशोधन रद्द किया। अदालत ने इसे अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(g) और 14 का उल्लंघन, अस्पष्ट तथा डर पैदा करने वाला माना। सरकार अपने बारे में नकली खबर की अंतिम निर्णायक नहीं हो सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में आदेश पर रोक नहीं लगाई।

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास

न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।