UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारत में बफ़र स्टॉक: मानक, ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद और स्टॉक निकालने की दलील

भारत का बफ़र स्टॉक एक ही औज़ार से चार मक़सद पूरे करने की कोशिश करता है, इसलिए हर बार ज़रूरत से आगे निकल जाता है। मानक, ख़रीद का झुकाव, रख-रखाव का ख़र्च और असली सुधार क्या होगा।

Stacked grain sacks filling a procurement warehouse

भारत की खाद्य प्रबंधन व्यवस्था से एक साथ चार ऐसे काम कराए जाते हैं जो आपस में मेल नहीं खाते, और यह टकराव गोदामों में पड़े अनाज की शक्ल में बफ़र स्टॉक पर दिखता है। इस स्टॉक से उम्मीद है कि वह किसान को फ़ायदेमंद दाम दिलाए, आपात हालात के लिए अनाज बचाकर रखे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए सस्ता अनाज पहुँचाए और खुले बाज़ार के दाम भी क़ाबू में रखे। चार मक़सद, और औज़ार सिर्फ़ एक।

जब एक ही औज़ार पर चार ज़िम्मेदारियाँ लाद दी जाती हैं, तो वह किसी एक में भी अच्छा नहीं कर पाता। इस विषय को समझने की असली कुंजी यही है।

केंद्रीय पूल में क्या-क्या रखा जाना है

अनाज भंडारण के मानक तय करते हैं कि केंद्रीय पूल में किसी भी वक़्त कितना अनाज हो, ताकि रोज़ के काम और अचानक आने वाली ज़रूरतें, दोनों निपट सकें। इसके तीन हिस्से हैं।

  • परिचालन स्टॉक (operational stocks): सार्वजनिक वितरण प्रणाली से हर महीने बाँटे जाने वाले अनाज के लिए
  • रणनीतिक स्टॉक (strategic stocks): अचानक आने वाली मुसीबतों से निपटने और खाद्य सुरक्षा की गारंटी के लिए
  • बाज़ार दख़ल का स्टॉक (market intervention stocks): दाम नरम रखने के लिए खुले बाज़ार में उतारा जाने वाला अनाज, जो खुली बाज़ार बिक्री योजना (OMSS) से निकलता है

ये मानक हर तिमाही के लिए तय होते हैं और बताते हैं कि 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्तूबर की शुरुआत में कम से कम कितना गेहूँ और चावल रखा जाना चाहिए। तिमाही का यह ढाँचा इसलिए है, क्योंकि ख़रीद और बँटवारा दोनों मौसम के हिसाब से घटते-बढ़ते हैं।

व्यवस्था कहाँ टूटती है

ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद। ख़रीद आम तौर पर रोज़ के काम और बफ़र, दोनों की ज़रूरत से ऊपर चली जाती है। 2020-21 में भारतीय खाद्य निगम और राज्यों की एजेंसियों ने क़रीब 132 मिलियन टन अनाज ख़रीदा, जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत साल भर की ज़रूरत क़रीब 65 मिलियन टन थी। ज़रूरत से ज़्यादा भंडार का मतलब है भारी रख-रखाव ख़र्च, जगह की तंगी और वह अनाज जो इंतज़ार में ख़राब होता रहता है।

ख़रीद उल्टे चक्र में चलती है। बफ़र का काम है कि अच्छी पैदावार वाले साल में अनाज सोख ले और कमी वाले साल में उसे बाज़ार में उतार दे। होता उलटा है। बँटवारे के वादे पूरे करने के लिए कमी वाले साल में भी ख़रीद जारी रहती है। इससे ठीक उसी वक़्त बाज़ार से अनाज खिंच जाता है जब वह पहले ही कम है, और दाम और ऊपर चढ़ते हैं। जो औज़ार दाम थामने के लिए बना था, वही दाम बढ़ा देता है।

MSP ख़रीद का दाम बन गया। न्यूनतम समर्थन मूल्य सोचा गया था एक फ़र्श की तरह, जिसके नीचे दाम न गिरें। चावल और गेहूँ की पक्की ख़रीद ने इसे पक्की बिक्री की गारंटी बना दिया, जिससे ज़रूरत से ज़्यादा पैदावार होती है और वह भी गिने-चुने राज्यों में सिमट जाती है। खेती के ढर्रे पर इसका असर गहरा है: कम बारिश वाले पंजाब और हरियाणा में ज़्यादा पानी माँगने वाला धान इसलिए टिका हुआ है, क्योंकि सरकार उसकी ख़रीद की गारंटी देती है।

आर्थिक लागत और निर्गम मूल्य के बीच की खाई। ख़रीद, भंडारण और बँटवारे का ख़र्च लगातार बढ़ रहा है। दूसरी तरफ़ केंद्रीय निर्गम मूल्य (Central Issue Price) बहुत सस्ता बना हुआ है और मुफ़्त अनाज योजना के तहत तो असल में शून्य ही है। यही फ़ासला खाद्य सब्सिडी है, और यह चक्र के साथ घटता-बढ़ता नहीं, ढाँचे की वजह से लगातार चौड़ा होता जाता है।

भंडार का रख-रखाव ढीला। पुराना अनाज पहले निकालने का कोई पक्का तरीक़ा न होने से पुराना स्टॉक पड़ा रहता है और उसके ऊपर नया जुड़ता जाता है, और गोदाम में अनाज की गुणवत्ता गिरती रहती है।

विकेंद्रीकृत खरीद का दूसरा रास्ता

विकेंद्रीकृत खरीद योजना (Decentralised Procurement Scheme) राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों को अपने ही राज्य में चावल, गेहूँ और मोटा अनाज ख़रीदने, रखने और बाँटने देती है। यह काम लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली और दूसरी कल्याण योजनाओं के लिए भारत सरकार के तय हिस्से के बदले होता है, और तय लागत के हिसाब से राज्य को पैसा वापस मिल जाता है।

इसके फ़ायदे असली हैं।

  • कम ख़र्च: वहीं ख़रीद और वहीं बँटवारा होने से ढुलाई, चढ़ाई-उतराई और भंडारण का ख़र्च घटता है, जिससे खाद्य सब्सिडी भी घटती है
  • MSP ज़्यादा किसानों तक: स्थानीय ख़रीद से न्यूनतम समर्थन मूल्य का फ़ायदा उन किसानों तक भी पहुँचता है जो परंपरागत रूप से ज़्यादा पैदावार वाले राज्यों में नहीं हैं
  • इलाक़े के खानपान से मेल: ख़रीद वही हो सकती है जो उस राज्य के लोग सचमुच खाते हैं, मोटे अनाज समेत

दिक़्क़त यह है कि इसे अपनाया कम गया। योजना शुरू हुए बीस साल से ज़्यादा हो जाने के बाद एक संसदीय समिति ने पाया कि गेहूँ के लिए इसे गिने-चुने राज्यों ने और चावल के लिए क़रीब पंद्रह राज्यों ने ही अपनाया है। रुकावट सिद्धांत में नहीं, ढाँचे में है। मतलब यह कि इसका हल नई नीति नहीं, पैसा लगाना है।

ईमानदार सुधार कैसा दिखेगा

पहला क़दम यह है कि एक ही औज़ार से चार काम कराना बंद किया जाए।

  • दाम का सहारा और ख़रीद, दोनों अलग करें। कमी की भरपाई वाले भुगतान या दाम के अंतर की योजनाएँ किसान की आमदनी संभाल सकती हैं, और सरकार को वह अनाज उठाना ही नहीं पड़ेगा जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है।
  • अनाज निकालना अपने आप हो। OMSS से बिक्री को स्टॉक और मानक के अनुपात से बाँध दें, ताकि अनाज नियम के हिसाब से निकले, किसी की मर्ज़ी से नहीं। मर्ज़ी पर छोड़ी गई बिक्री ही स्टॉक जमा होने की वजह है।
  • विकेंद्रीकृत खरीद फैलाएँ। राज्यों में भंडारण के लिए पैसा दें, ताकि जो राज्य अब तक बाहर हैं वहाँ भी यह योजना चल सके।
  • ख़रीद की टोकरी चौड़ी करें। मोटे अनाज और दालें बड़े पैमाने पर ख़रीदी जाएँ तो धान और गेहूँ के जमावड़े से पानी और मिट्टी पर जो बोझ पड़ता है, वह हल्का होगा।
  • अनाज की जगह नक़द दें तो उसे महँगाई से जोड़ें। नक़द अगर अनाज की जगह लेता है तो उसे खाने-पीने की महँगाई से जोड़ना ज़रूरी है, वरना लाभार्थी की ख़रीद क्षमता चुपचाप घटती रहेगी।

आगे का रास्ता

बफ़र स्टॉक बेवजह नहीं है। जिस देश ने अकाल देखा हो, वह अनाज के भंडार को हल्के में नहीं ले सकता, और रणनीतिक हिस्से का बचाव किया ही जाना चाहिए। सवाल उस जमावड़े पर है जो किसी भी रणनीतिक ज़रूरत से कहीं आगे निकल चुका है, जिसका ख़र्च हर साल बढ़ती सब्सिडी से उठाया जा रहा है, और जिसमें रखा अनाज इंतज़ार करते-करते ख़राब होता जाता है।

जो बफ़र कभी ख़ाली ही न हो, वह बफ़र नहीं है। वह गोदाम है।

सामान्य प्रश्न

बफ़र स्टॉक क्या है?

बफ़र स्टॉक का मतलब है केंद्रीय पूल में रखा वह अनाज, जो रोज़ के कामकाज और अचानक आने वाली ज़रूरतों, दोनों के लिए काफ़ी हो। इसके तीन हिस्से हैं: सार्वजनिक वितरण के लिए हर महीने निकलने वाला परिचालन स्टॉक, आपात हालात के लिए रणनीतिक स्टॉक, और दाम नरम रखने के लिए खुली बाज़ार बिक्री योजना से निकाला जाने वाला बाज़ार दख़ल का स्टॉक।

बफ़र स्टॉक के मानक कैसे तय होते हैं?

सरकार तय करती है कि हर तिमाही की शुरुआत में, यानी 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्तूबर को, केंद्रीय पूल में कम से कम कितना गेहूँ और चावल होना चाहिए। हर तिमाही का मानक अलग होता है, क्योंकि ख़रीद और बँटवारा मौसम के हिसाब से घटते-बढ़ते हैं।

खुली बाज़ार बिक्री योजना क्या है?

OMSS वह तरीक़ा है जिससे भारतीय खाद्य निगम फ़ालतू स्टॉक खुले बाज़ार में बेचता है, ताकि दाम नरम रहें और रख-रखाव का ख़र्च घटे। यही बफ़र स्टॉक व्यवस्था का निकास वाल्व है, और जितना स्टॉक जमा होता है उस हिसाब से इसका इस्तेमाल कम ही किया जाता है।

ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद क्यों दिक़्क़त है?

क्योंकि ख़रीद बार-बार रोज़ के काम और बफ़र, दोनों की ज़रूरत से ऊपर चली जाती है। 2020-21 में भारतीय खाद्य निगम और राज्यों की एजेंसियों ने क़रीब 132 मिलियन टन अनाज ख़रीदा, जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत साल भर की ज़रूरत क़रीब 65 मिलियन टन थी। यह फ़ालतू अनाज रख-रखाव का ख़र्च, जगह की तंगी और गुणवत्ता गिरने की समस्या खड़ी करता है।

उल्टे चक्र वाली ख़रीद क्या होती है?

सही तरीक़ा यह है कि सरकार ज़्यादा पैदावार वाले साल में ख़रीदे और कमी वाले साल में बाज़ार में निकाले। असल में बँटवारे के वादे पूरे करने के लिए तंगी वाले साल में भी ख़रीद चलती रहती है, जिससे ठीक उसी वक़्त बाज़ार में अनाज और कम हो जाता है और दाम चढ़ जाते हैं। यही उल्टा चक्र है, और बफ़र का मक़सद इससे ठीक उलटा होता है।

MSP ख़रीद का दाम कैसे बन गया?

न्यूनतम समर्थन मूल्य एक फ़र्श के तौर पर बनाया गया था, जो बाज़ार गिरने पर दाम को थाम ले। चावल और गेहूँ की ख़रीद पक्की होने की वजह से आज MSP इन दो फ़सलों के लिए पक्की बिक्री का दाम बन गया है। इससे दाम संभालने वाला औज़ार पैदावार बढ़ाने का लालच बन जाता है, ज़रूरत से ज़्यादा उपज होती है और वह पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिमट जाती है।

आर्थिक लागत और केंद्रीय निर्गम मूल्य के बीच का फ़ासला क्या है?

आर्थिक लागत वह है जो सरकार को एक क्विंटल अनाज ख़रीदने, रखने और पहुँचाने में लगती है। केंद्रीय निर्गम मूल्य वह है जो पाने वाला चुकाता है। आर्थिक लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि निर्गम मूल्य बहुत सस्ता बना हुआ है और मुफ़्त अनाज योजना के तहत असल में शून्य है। इसीलिए खाद्य सब्सिडी का बोझ ढाँचे की वजह से बढ़ता जाता है।

विकेंद्रीकृत खरीद योजना क्या है?

इस योजना में राज्य सरकारें और उनकी एजेंसियाँ भारत सरकार के तय हिस्से के बदले अपने ही राज्य में अनाज ख़रीदती, रखती और बाँटती हैं, और उन्हें उसका पैसा वापस मिल जाता है। इससे ढुलाई और चढ़ाई-उतराई का ख़र्च घटता है, MSP का फ़ायदा स्थानीय किसानों तक पहुँचता है और बँटवारा इलाक़े के खानपान से मेल खाता है। दिक़्क़त यह है कि इसे अपनाया कम गया: शुरू हुए बीस साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी गेहूँ के लिए गिने-चुने राज्यों ने और चावल के लिए क़रीब पंद्रह राज्यों ने ही इसे लिया।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. भारत में बफ़र स्टॉक के मानक किन तारीख़ों के लिए तय किए जाते हैं?
    (a) 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई, 1 अक्तूबर
    (b) सिर्फ़ 1 मार्च और 1 सितंबर
    (c) सिर्फ़ 1 अप्रैल और 1 अक्तूबर
    (d) हर महीने की पहली तारीख़
    उत्तर: (a) मानक हर तिमाही के लिए तय होते हैं, यानी जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर की शुरुआत में।
  2. इनमें से कौन केंद्रीय पूल की भंडारण ज़रूरत का हिस्सा नहीं है?
    (a) परिचालन स्टॉक
    (b) रणनीतिक स्टॉक
    (c) बाज़ार दख़ल का स्टॉक
    (d) निर्यात बढ़ाने का स्टॉक
    उत्तर: (d) तीन हिस्से हैं, परिचालन, रणनीतिक और बाज़ार दख़ल का स्टॉक। निर्यात बढ़ाना भंडारण का मक़सद नहीं है।
  3. खुली बाज़ार बिक्री योजना का इस्तेमाल मुख्य रूप से किसलिए होता है
    (a) MSP पर अनाज ख़रीदने के लिए
    (b) खुले बाज़ार के दाम नरम रखने के लिए स्टॉक निकालने को
    (c) NFSA के तहत मुफ़्त अनाज बाँटने के लिए
    (d) फ़ालतू गेहूँ का निर्यात करने के लिए
    उत्तर: (b) OMSS से स्टॉक खुले बाज़ार में उतारा जाता है, ताकि दाम नरम रहें और रख-रखाव का ख़र्च घटे।
  4. विकेंद्रीकृत खरीद योजना के तहत ख़रीद कौन करता है
    (a) सिर्फ़ भारतीय खाद्य निगम
    (b) राज्य सरकारें और उनकी एजेंसियाँ
    (c) केंद्र से लाइसेंस पाए निजी व्यापारी
    (d) सहकारी बैंक
    उत्तर: (b) इस योजना में राज्य सरकारें और उनकी एजेंसियाँ केंद्र के तय हिस्से के बदले अपने ही राज्य में अनाज ख़रीदती, रखती और बाँटती हैं।
  5. उल्टे चक्र वाली ख़रीद (pro-cyclical procurement) का मतलब है
    (a) ज़्यादा पैदावार वाले साल में ख़रीदना और कमी वाले साल में निकालना
    (b) कमी वाले साल में भी ख़रीद जारी रखना
    (c) सिर्फ़ सहकारी समितियों से ख़रीदना
    (d) ख़रीद को निर्यात के दामों से जोड़ना
    उत्तर: (b) तंगी वाले साल में ख़रीद जारी रखने से बाज़ार से अनाज खिंचता है और दाम चढ़ते हैं, जो बफ़र के मक़सद से ठीक उलटा है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारत में बफ़र स्टॉक से एक ही औज़ार के ज़रिए चार मक़सद पूरे कराए जाते हैं। इसके नतीजों का परीक्षण कीजिए और इन मक़सदों को अलग करने का तरीक़ा सुझाइए। (250 शब्द)
  2. MSP पर टिकी ख़रीद ने दाम को सहारा देने वाले औज़ार को पैदावार बढ़ाने का लालच बना दिया है। खेती के ढर्रे और सरकारी ख़र्च पर इसके असर का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
  3. केंद्र से चलने वाले खाद्य प्रबंधन की ख़ामियों के हल के रूप में विकेंद्रीकृत खरीद योजना का आकलन कीजिए। इसे अपनाने वाले राज्य कम क्यों रहे? (150 शब्द)
  4. आर्थिक लागत और केंद्रीय निर्गम मूल्य के बीच बढ़ती खाई और सरकारी ख़र्च टिकाऊ रहने पर उसके असर की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
  5. भारत के अनाज बफ़र को उल्टे चक्र के बजाय चक्र के उलट काम करने वाला बनाने के लिए सुधार सुझाइए। (250 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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