भारत में भूमि अभिलेखों (Land Records) की खराब स्थिति विकास की राह में एक बड़ी बाधा है। अस्पष्ट स्वामित्व, पुराने अभिलेख और भ्रष्टाचार से ग्रामीण गरीब सबसे अधिक पीड़ित हैं। यह विषय यूपीएससी GS-III (कृषि) और GS-II (शासन) दोनों के लिए प्रासंगिक है।
भूमि अभिलेखों का महत्त्व
- ऋण और बीमा के लिए संपार्श्विक (Collateral) के रूप में भूमि
- कृषि सब्सिडी और सरकारी योजनाओं के लाभ पाने के लिए
- भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा
- विवाद निवारण और न्याय तक पहुँच
मौजूदा समस्याएँ
1. अस्पष्ट स्वामित्व
भारत में भूमि अभिलेखों का प्रबंधन राज्य का विषय है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रणालियाँ हैं। ज़मीन के अनेक उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा अक्सर अनौपचारिक रहता है और अभिलेखों में दर्ज नहीं होता।
2. पुराने और गलत अभिलेख
कई ज़िलों में अभिलेख दशकों पुराने हैं। ज़मीन के बदलते उपयोग, बिक्री और विरासत का नियमित अद्यतन नहीं होता।
3. भ्रष्टाचार
राजस्व अधिकारियों पर बहुत अधिक निर्भरता भ्रष्टाचार को जन्म देती है। छोटे-छोटे परिवर्तनों के लिए रिश्वत एक सामान्य शिकायत है।
DILRMP: डिजिटल भारत भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम
केंद्र सरकार की DILRMP (Digital India Land Records Modernisation Programme) योजना भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण, ऑनलाइन म्यूटेशन और एकीकृत भूमि डेटाबेस के लिए काम कर रही है। इसके तहत:
- Record of Rights (RoR) का डिजिटलीकरण
- भूकादास्त्र (Cadastral Survey) का आधुनिकीकरण
- GIS-आधारित भूमि मानचित्र
- ऑनलाइन म्यूटेशन प्रक्रिया
स्वामित्व योजना
2020 में शुरू की गई स्वामित्व (SVAMITVA) योजना ड्रोन तकनीक से ग्रामीण आवासीय भूमि का सर्वेक्षण करती है और संपत्ति कार्ड (Property Card) प्रदान करती है। यह ग्रामीण भारत में पहली बार औपचारिक भूमि दस्तावेज़ीकरण का प्रयास है।
चुनौतियाँ
- राज्यों में असमान प्रगति
- डेटा की सटीकता और अद्यतन की समस्या
- भूमि न्यायाधिकरणों में लंबित मामले
- वन अधिकार, आदिवासी भूमि और महिला स्वामित्व की जटिलताएँ
यूपीएससी की दृष्टि से
GS-III में कृषि भूमि, GS-II में शासन सुधार और GS-I में भारतीय समाज — तीनों दृष्टिकोणों से भूमि अभिलेख प्रबंधन महत्त्वपूर्ण है।