भारत की दशकीय जनगणना — विश्व की सबसे पुरानी सतत जनसांख्यिकीय कवायदों में से एक — अब चार वर्षों से स्थगित पड़ी है। मूलतः 2021 में होने वाली यह कवायद कोविड-19 और प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए बार-बार टाली गई। यह विलंब अब केवल तकनीकी मामला नहीं रहा: यह खाद्य अधिकारों, संसदीय परिसीमन, कल्याण-लक्ष्यीकरण और जातिगत जनगणना के राजनीतिक आग्रह — सबको छूता है।
जनगणना क्या है और कौन कराता है
- गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त (RGI) का कार्यालय जनगणना संचालित करता है।
- यह जनगणना अधिनियम, 1948 द्वारा शासित होती है और प्रत्येक 10 वर्ष पर आयोजित होती है।
- एकत्रित आँकड़ों में जनसांख्यिकी, साक्षरता, प्रवास, प्रजनन एवं मृत्यु दर, धर्म, भाषा, दिव्यांगता, आर्थिक गतिविधि, आवास सुविधाएँ तथा अनुसूचित जाति/जनजाति की जनसंख्या शामिल हैं।
जनगणना का महत्व
| उपयोग | जनगणना डेटा पर क्या निर्भर है |
|---|---|
| नीति-नियोजन | ICDS, PDS, स्वास्थ्य और शिक्षा हेतु आवंटन |
| कल्याण कवरेज | NFSA 2013 PDS कवरेज (जनसंख्या का 67%) को जनगणना आँकड़ों से जोड़ता है |
| परिसीमन (Delimitation) | संसदीय और राज्य निर्वाचन क्षेत्र जनसंख्या पर बनते हैं |
| वित्त आयोग | राज्यों को अनुदान जनसंख्या के आधार पर तय होते हैं |
| स्थानीय डेटा | गाँव/वार्ड स्तर पर प्राथमिक डेटा का एकमात्र स्रोत |
| सामाजिक-आर्थिक रुझान | प्रवास, शहरीकरण, प्रजनन-दर, लिंग-अनुपात |
| शोध | शैक्षणिक, व्यावसायिक और अंतरराष्ट्रीय उपयोग |
विलंब की कीमत
- कल्याण-बहिष्करण। NFSA 2013, 2011 की जनसंख्या (~121 करोड़) के आधार पर 80 करोड़ PDS लाभार्थियों की संख्या निर्धारित करता है। वर्तमान जनसंख्या ~140 करोड़ के निकट होने से लगभग 12 करोड़ लोग सब्सिडी वाले अनाज से वंचित हैं, जिसके वे अन्यथा हक़दार होते।
- ICDS और आँगनवाड़ी नियोजन। सही गणना के अभाव में राज्य आँगनवाड़ी लाभार्थियों की संख्या सीमित कर रहे हैं।
- संसदीय परिसीमन। महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 अधिनियम के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद के परिसीमन पर सशर्त है — जो प्रभावी रूप से इसे 2029 तक धकेल देता है।
- वित्त आयोग की सिफ़ारिशें अब भी पुराने जनसंख्या आँकड़ों पर आधारित हैं, जिससे हस्तांतरण विकृत हो रहे हैं।
- शहरी नियोजन। सेन्सस टाउन और स्टैच्युटरी टाउन का वर्गीकरण अटका हुआ है।
- SECC 2011 का आंशिक अप्रकाशित आँकड़ा समस्या और बढ़ाता है।
जनगणना से जुड़ी चिंताएँ
- तालिकाओं के प्रकाशन में विलंब। कई तालिकाएँ गणना के 5-7 वर्ष बाद आती हैं।
- ग़लत सूचना। लाभ खोने का भय या नागरिकता-संबंधी आशंकाएँ ग़लत-रिपोर्टिंग को बढ़ावा देती हैं।
- लागत। जनगणना हज़ार करोड़ की कवायद है; जनगणना 2021 का बजट लगभग 8,754 करोड़ रुपये निर्धारित है।
- डिजिटल सुरक्षा। जनगणना 2021 पहली बार मोबाइल ऐप के माध्यम से डिजिटल-केवल गणना करेगी; डेटा-सुरक्षा और बैकअप वास्तविक जोखिम हैं।
- स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म डेटा का दुरुपयोग — संवेदनशील विवरण (जाति, धर्म, व्यवसाय) एक स्थान पर होने के कारण।
जातिगत जनगणना का विवाद
जातिगत सामाजिक-आर्थिक जनगणना की माँग पुनः राजनीति के केंद्र में लौट आई है।
- बिहार जातिगत सर्वेक्षण 2023 ने OBC को 27.1%, EBC को 36%, SC को 19.7% और ST को 1.7% बताया, जिससे राजनीतिक गणित तेज़ी से बदल गया।
- कर्नाटक की कांतराज आयोग रिपोर्ट (2024) ने बहस को पुनर्जीवित किया।
- SECC 2011 ने जातिगत डेटा एकत्र किया, परन्तु उसके आँकड़े पूर्णतः कभी जारी नहीं हुए।
- समर्थक तर्क देते हैं कि यह तर्कसंगत आरक्षण नीति, कल्याण-लक्ष्यीकरण और साक्ष्य-आधारित समानता के लिए अनिवार्य है। सिन्हो आयोग और उच्चतम न्यायालय की कई टिप्पणियाँ इस तर्क का समर्थन करती हैं।
- आलोचक आगाह करते हैं कि एकत्रित जातिगत डेटा जातिगत पहचानों को मज़बूत कर सकता है और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों द्वारा भंग की गई आरक्षण-सीमाओं को अस्थिर कर सकता है।
डिजिटल जनगणना
2021 की कवायद पहली डिजिटल-केवल जनगणना होगी, जिसमें निम्न विकल्प होंगे:
- वेब पोर्टल के माध्यम से स्व-गणना
- मोबाइल ऐप से प्रगणकों द्वारा गणना
- GIS-सक्षम ब्लॉक टैगिंग
इससे गति और गुणवत्ता में सुधार आएगा, परन्तु डेटा-निजता, नेटवर्क-पहुँच की कमी और डिजिटल विभाजन की चिंताएँ भी जुड़ती हैं।
आगे का रास्ता
- सार्वजनिक रूप से घोषित ठोस समय-सीमा पर जनगणना कराई जाए; आवश्यक हो तो चरणबद्ध हो।
- जातिगत गणना शामिल की जाए, स्पष्ट डेटा-उपयोग नियमों और व्यक्ति-स्तर पर अनामीकरण के साथ।
- SECC और जनगणना डेटा को स्पष्ट प्रोटोकॉल के साथ जारी किया जाए — शोधकर्ताओं और नागरिक समाज के लिए।
- NFSA और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को जनगणना के बाद की अद्यतन जनसंख्या से संरेखित किया जाए।
- RGI की स्वायत्तता को मज़बूत किया जाए — जनगणना अधिनियम को वैधानिक समर्थन देकर।
- डेटा-संरक्षण ढाँचा — डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 के अनुरूप।
हालिया घटनाक्रम (2024-26)
- जातिगत जनगणना का आंदोलन 2023-24 में राजनीतिक रूप से तेज़ हुआ; कई राज्यों ने अपने स्वयं के जातिगत सर्वेक्षण कराए।
- MPI 2024 (नीति आयोग/UNDP) जनसंख्या-भार के लिए NFHS-5 प्रॉक्सी का प्रयोग करता है — क्योंकि जनगणना पुरानी हो चुकी है; यह 13.5% बहुआयामी ग़रीबी दर्शाता है।
- महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 का क्रियान्वयन अब जनगणना के बाद के परिसीमन पर निर्भर है — संभवतः 2029।
- वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2024 और अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें 2021 से पहले के भारतीय जनसांख्यिकीय आधारों पर निर्भर हैं।
- केंद्रीय बजट 2024-25 में आरंभिक धनराशि का आवंटन इस संकेत के साथ हुआ कि जनगणना की तैयारी पुनः आरंभ हो सकती है।
- उच्चतम न्यायालय में 2024 की याचिकाओं में समय-सीमा-बद्ध जनगणना अनुसूची की माँग की गई है।
यूपीएससी प्रासंगिकता
| GS पेपर | संबंध |
|---|---|
| GS I | जनसंख्या, समाज, सामाजिक संरचना |
| GS II | कल्याणकारी योजनाएँ, संघीय हस्तांतरण, परिसीमन |
| GS III | समावेशी विकास, साक्ष्य-आधारित नीति |
अभ्यास प्रश्न:
- “जनगणना 2021 का विलंब प्रशासनिक चूक नहीं — एक कल्याण-संकट है।” परीक्षण कीजिए।
- राष्ट्रव्यापी जातिगत जनगणना के पक्ष और विपक्ष में तर्कों की चर्चा कीजिए।
एक गुणवत्तापूर्ण उत्तर में NFSA बहिष्करण की संख्या (~12 करोड़), महिला आरक्षण अधिनियम की समय-सीमा, जातिगत जनगणना की राजनीति, तथा समय, दायरे और डेटा-शासन पर ठोस सुधार पैकेज शामिल होने चाहिए।