कोयला आज भी भारत की विद्युत व्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। देश की लगभग 55% बिजली अब भी कोयला-आधारित संयंत्रों से आती है और कोयला से जुड़ी गतिविधियाँ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 1.3 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार देती हैं। साथ ही, भारत ने 2070 तक नेट-शून्य (Net Zero) और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य रखा है — अर्थात् बिजली-मिश्रण में कोयले का हिस्सा पहले अपने शिखर पर पहुँचेगा और फिर घटेगा। सस्ती व भरोसेमंद बिजली सुनिश्चित करते हुए यह परिवर्तन कर पाना भारत की सबसे कठिन नीतिगत चुनौतियों में से एक है। यूपीएससी GS III के लिए कोयला विद्युत ऊर्जा-अर्थव्यवस्था-पर्यावरण का एक प्रतिनिधि प्रश्न है।
वर्तमान स्थिति
- कोयला-आधारित क्षमता कुल स्थापित क्षमता का लगभग 50% है, परंतु वास्तविक उत्पादन का लगभग 55% इसी से आता है — क्योंकि कोयला संयंत्र नवीकरणीय ऊर्जा की तुलना में अधिक लोड फैक्टर पर चलते हैं।
- NITI Aayog के आकलन के अनुसार कोयला-आधारित क्षमता 2030 तक लगभग 250 GW पर अपने शिखर पर पहुँचेगी, जबकि कोयला-आधारित यूटिलिटी बिजली उत्पादन की रफ़्तार धीमी होगी और लगभग 2040 में चरम पर पहुँचने की संभावना है।
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और कोयला भंडारों के मामले में पाँचवाँ बड़ा देश है।
- वाणिज्यिक कोयला खनन (Commercial Coal Mining) 2020 में निजी क्षेत्र के लिए खोला गया, जिससे Coal India का ऐतिहासिक एकाधिकार समाप्त हो गया।
- उत्पादन प्रति वर्ष 1 अरब टन को पार कर चुका है, जिसे Coal India Limited के विस्तार और वाणिज्यिक खनन नीलामियों से बल मिला है।
कोयला क्यों प्रभुत्व में बना हुआ है
बढ़ती बिजली माँग को पूरा करना
- वित्त वर्ष 2024-25 में बिजली की माँग रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची और पीक डिमांड 240 GW से ऊपर चली गई — विनिर्माण, इलेक्ट्रिक वाहनों और डेटा सेंटरों के विस्तार के साथ यह और बढ़ने का अनुमान है।
- कोयला संयंत्र विश्वसनीय बेस लोड प्रदान करते हैं — वे मौसम की परवाह किए बिना चौबीसों घंटे चलते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिरता
- सौर और पवन ऊर्जा परिवर्तनशील हैं; पर्याप्त भंडारण एवं चौबीसों घंटे (RTC) नवीकरणीय अनुबंधों के अभाव में कोयला यह कमी पूरी करता है।
- ग्रिड स्थिरता के लिए जो जड़त्व (inertia) चाहिए, वह थर्मल संयंत्र स्वाभाविक रूप से देते हैं।
घरेलू भंडारों का उपयोग
- भारत के पास 350 अरब टन से अधिक कोयला भंडार हैं। घरेलू प्रचुरता आयात-निर्भरता कम करती है और चालू खाते को सहारा देती है।
भारी उद्योगों की निर्भरता
- इस्पात, सीमेंट, एल्यूमीनियम और उर्वरक क्षेत्र केवल बिजली के लिए नहीं, बल्कि प्रोसेस हीट के लिए भी कोयले का प्रत्यक्ष उपयोग करते हैं।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- कोयला खनन, परिवहन, बिजली, स्पंज आयरन और इस्पात में लगभग 1.3 करोड़ लोग कार्यरत हैं।
- कोयला-निर्भर राज्य — झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल — रॉयल्टी, उपकर और रोज़गार पर टिके हैं।
रेलवे माल-भाड़ा राजस्व
- भारतीय रेलवे के माल-भाड़ा राजस्व का लगभग 43-45% हिस्सा कोयले से आता है। यही राजस्व यात्री किराए को क्रॉस-सब्सिडी देता है — इसलिए यदि विकल्प विकसित नहीं हुए तो कोयला यातायात में गिरावट रेलवे की अर्थशास्त्र को नुकसान पहुँचाएगी।
चुनौतियाँ
- उत्सर्जन और स्थानीय प्रदूषण। भारत के विद्युत क्षेत्र के कार्बन एवं सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा कोयला संयंत्रों से आता है।
- जल संकट। कई कोयला संयंत्र जल-दुर्लभ क्षेत्रों में हैं; जल बनाम ताप के टकराव बढ़ रहे हैं।
- पुराने संयंत्र। थर्मल क्षमता का बड़ा हिस्सा 25 वर्ष से अधिक पुराना और कम दक्षता वाला है।
- स्ट्रैंडेड परिसंपत्ति का जोखिम। जैसे-जैसे नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती होती जा रही है, नए कोयला संयंत्रों के आर्थिक रूप से अनुपयोगी हो जाने का जोखिम बढ़ रहा है।
- न्यायपूर्ण परिवर्तन (Just Transition)। खदानें बंद होने और संयंत्र सेवानिवृत्त होने से कोयला-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर आर्थिक विस्थापन का सामना करना पड़ेगा।
- कोकिंग कोल पर आयात-निर्भरता। इस्पात निर्माण के लिए भारत अब भी अधिकांश कोकिंग कोल आयात करता है।
आगे का रास्ता
दक्षता और स्वच्छ कोयला
- अक्षम सबक्रिटिकल इकाइयों को सेवानिवृत्त करें और उनके स्थान पर सुपरक्रिटिकल व अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल (USC) संयंत्र लगाएँ, जो CO2 तीव्रता को 15-25% तक घटा देते हैं।
- मौजूदा संयंत्रों का नवीकरण एवं आधुनिकीकरण (R&M) — हीट रेट सुधार और सहायक खपत कम करना।
- लचीला संचालन — नवीकरणीय उत्पादन के पूरक के रूप में कोयला संयंत्रों को तेज़ी से बढ़ाने-घटाने में सक्षम होना पड़ेगा। इसके लिए नियंत्रण तंत्र का उन्नयन और संशोधित PPA आवश्यक हैं।
पर्यावरणीय नियंत्रण
- फ्लू गैस डीसल्फराइज़ेशन (FGD)। SO2 उत्सर्जन घटाने के लिए CPCB द्वारा अनिवार्य इस तकनीक की स्थापना थर्मल संयंत्रों में चरणबद्ध ढंग से की जा रही है। समयसीमा कई बार बढ़ाई गई है; कार्यान्वयन अब भी चिंता का विषय है।
- कण एवं NOx नियंत्रण। उन्नत ESP (इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर) तथा SCR/SNCR प्रणालियाँ।
- राख का उपयोग। फ्लाई ऐश का सीमेंट, सड़कों और खदानों की भरत में बढ़ता उपयोग — जिससे कचरा कम होता है।
कार्बन कैप्चर उपयोग एवं भंडारण (CCUS)
- CCUS फ्लू गैस से CO2 को पकड़कर या तो भूमिगत भंडारित करती है या उसे मूल्यवर्धित उत्पादों में बदल देती है। भारत का राष्ट्रीय CCUS रोडमैप NITI Aayog तथा IIT Bombay के संघ के माध्यम से तैयार किया जा रहा है।
- CCUS पूँजी-गहन है किंतु नेट-शून्य के पथ पर शेष कोयला उत्पादन के लिए यह आवश्यक हो सकती है।
न्यायपूर्ण परिवर्तन
- Coal India के कर्मचारियों का पुनःकौशल एवं पुनर्नियोजन। कोयला खनन जिलों में विविध आर्थिक आधार चाहिए — नवीकरणीय विनिर्माण, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण।
- सेवानिवृत्त संयंत्रों का पुनःउपयोग। सेवानिवृत्त कोयला संयंत्रों की भूमि, ट्रांसमिशन गलियारे और जल अधिकार सौर या भंडारण परियोजनाओं के लिए काम आ सकते हैं।
- राज्य राजस्व। वित्त आयोग और GST Council को कोयला-रॉयल्टी-निर्भर राज्यों के लिए वैकल्पिक राजस्व स्रोत विकसित करने होंगे।
नवीकरणीय ऊर्जा एवं भंडारण का विस्तार
- कोयला-निर्भरता का अंतिम उत्तर है — भंडारण (बैटरी, पम्प्ड हाइड्रो) सहित नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और दृढ़ (firm) निम्न-कार्बन स्रोत (परमाणु, जल, हाइड्रोजन)।
- RTC नवीकरणीय निविदाएँ और पीक-पावर निविदाएँ नवीकरणीय आपूर्ति को उस माँग-प्रोफ़ाइल से मिला रही हैं जिसे अभी कोयला संभाल रहा है।
हाल के घटनाक्रम (2024-26)
- कोयला उत्पादन वित्त वर्ष 2023-24 में 1 अरब टन को पार कर गया और 2030 तक 1.5 अरब टन का लक्ष्य है।
- वाणिज्यिक कोयला खनन नीलामियाँ जारी हैं — 100 से अधिक खदानें निजी ऑपरेटरों को आवंटित हो चुकी हैं।
- CCUS रोडमैप निर्माण के चरण में है; NTPC संयंत्रों में पायलट परियोजनाएँ चल रही हैं।
- FGD स्थापना का विस्तार हो रहा है, परंतु बड़ी क्षमता अब भी बिना FGD के है; CPCB/MoEFCC ने समयसीमा संशोधित की है।
- कोल गैसीफिकेशन मिशन। 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य, 8,500 करोड़ रुपये तक की वित्तीय प्रोत्साहन राशि के साथ।
- न्यूक्लियर एनर्जी मिशन बजट 2025-26 में घोषित — 2047 तक 100 GW — कोयले का एक दृढ़ निम्न-कार्बन विकल्प।
- ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इस्पात जैसे कठिन-क्षेत्रों के डीकार्बनीकरण का दूसरा रास्ता प्रदान करता है।
- NITI Aayog ने दोहराया है कि कोयला 2030 के दशक तक एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत बना रहेगा, परंतु उसका हिस्सा घटना चाहिए।
यूपीएससी प्रासंगिकता
कोयला विद्युत GS III का एक सघन, उच्च-उत्पादक विषय है। अभ्यर्थियों को 55% उत्पादन हिस्सेदारी, NITI Aayog का 2030 तक 250 GW शिखर, 2070 नेट-शून्य लक्ष्य तथा FGD रोलआउट, CCUS रोडमैप, कोल गैसीफिकेशन मिशन व वाणिज्यिक कोयला खनन जैसी प्रमुख पहलें याद रखनी चाहिए। मेन्स उत्तरों में विकास, ऊर्जा सुरक्षा, वहनीयता और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन होना चाहिए। मुख्य कड़ियाँ: न्यायपूर्ण परिवर्तन, रेलवे माल-भाड़ा राजस्व, नवीकरणीय का विस्तार, बैटरियों के लिए महत्वपूर्ण खनिज तथा संघीय वित्तीय निहितार्थ। प्रारंभिक परीक्षा विशिष्ट योजनाओं, तकनीकी परिभाषाओं (USC, CCUS, FGD) तथा संस्थागत संरचना (कोयला मंत्रालय, CIL, NTPC, CEA, CPCB) पर केन्द्रित होती है।