जो किसान अपनी एक हेक्टेयर ज़मीन अनाज से हटाकर बागवानी में लगा दे, उसकी सालाना आमदनी क़रीब 80,000 रुपये बढ़ सकती है। यह अनुमान दलवई समिति का अपना है। फिर भी ज़्यादातर किसान यह बदलाव नहीं करते। इसलिए फ़सल विविधीकरण (crop diversification) जानकारी या खेती की तकनीक का मसला नहीं है। यह जोखिम का मसला है, और उस नीति ढाँचे का जो दो फ़सलों से जोखिम हटा देता है और बाक़ी हर फ़सल पर उसे जस का तस छोड़ देता है।
फ़सल विविधीकरण का मतलब है, जगह और समय दोनों के हिसाब से खेती का ढर्रा बदलना और ज़्यादा तरह की फ़सलें उगाना, ताकि खेत की आमदनी बढ़े, जोखिम घटे और खेती टिकाऊ बने।
इसके दो रूप
- समय के हिसाब से विविधीकरण (temporal diversification): एक ही ज़मीन पर एक के बाद एक मौसम में अलग-अलग फ़सलें, जैसे पहले धान, फिर गेहूँ, फिर मूँग। यही फ़सल चक्र है
- जगह के हिसाब से विविधीकरण (spatial diversification): एक ही खेत में एक साथ कई फ़सलें, अंतर-फ़सल या मिली-जुली खेती के ज़रिए, जैसे महाराष्ट्र में कपास के साथ अरहर
यह क्यों ज़रूरी है
- खेत की आमदनी बढ़ती है। फल, सब्ज़ी, मसाले, दालें और फूलों की खेती की तरफ़ जाने से हर हेक्टेयर पर कमाई बढ़ती है। दलवई समिति का अनुमान है कि अनाज से बागवानी में जाने पर हर हेक्टेयर पर साल भर में क़रीब 80,000 रुपये ज़्यादा मिल सकते हैं।
- जोखिम बँट जाता है। कई फ़सलों में फैल जाने से सूखा, बाढ़, कीड़े और किसी एक चीज़ के दाम गिरने का ख़तरा कम हो जाता है।
- काम पैदा होता है। बागवानी, पशुपालन और इनसे जुड़े धंधे अनाज की खेती से कहीं ज़्यादा मेहनत माँगते हैं। इससे साल भर काम मिलता है और मौसमी पलायन घटता है।
- ज़मीन और पानी बचते हैं। दलहन फ़सलें ख़ुद हवा की नाइट्रोजन मिट्टी में जमा करती हैं, फ़सल बदलने से कीड़ों और खरपतवार का चक्र टूटता है, और मिली-जुली खेती में पानी और पोषक तत्वों का इस्तेमाल बेहतर होता है।
- पोषण की सुरक्षा मिलती है। अनाज पर टिके ढाँचे से हटकर दालों, फलों, सब्ज़ियों और पशुपालन की तरफ़ जाना बदलते खानपान से मेल खाता है और प्रोटीन तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पर सीधे काम करता है।
- मौसम के झटके सहने की ताक़त आती है। मोटे अनाज, दालें और तिलहन धान के मुक़ाबले सूखा बेहतर झेलते हैं, इसलिए ज़्यादा पानी माँगने वाली फ़सलों पर निर्भरता घटती है।
- निर्यात बढ़ता है। अंगूर, आम, मसाले, फूल और औषधीय पौधे हर हेक्टेयर पर थोक अनाज से ज़्यादा विदेशी मुद्रा कमाते हैं।
फिर ऐसा होता क्यों नहीं
छह अड़चनें हैं, और वे एक-दूसरे को मज़बूत करती हैं।
MSP और सरकारी ख़रीद का झुकाव। धान और गेहूँ की पक्की ख़रीद इन दो फ़सलों को तय दाम पर एक पक्का ख़रीदार दे देती है। बागवानी में ऐसा कुछ नहीं मिलता। छोटी जोत पर, जहाँ जेब में कोई गुंजाइश नहीं होती, पक्की कमाई हर बार उस कमाई पर भारी पड़ती है जो ज़्यादा तो हो सकती है पर पक्की नहीं है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यही असली अड़चन है।
सिंचाई की कमी। खेती का बड़ा हिस्सा आज भी बारिश के भरोसे है, इसलिए अलग-अलग पानी और अलग-अलग पकने की अवधि वाली फ़सलें उगाना मुश्किल हो जाता है। सिंचाई जितनी ज़्यादा, विविधीकरण उतना ज़्यादा। यह रिश्ता साफ़ दिखता है।
कटाई के बाद का ढाँचा कमज़ोर। ऊँची कीमत वाली फ़सलें जल्दी ख़राब होती हैं। कोल्ड चेन, छँटाई, भंडारण और प्रोसेसिंग न हो तो आमदनी का फ़ायदा किसान तक पहुँचने से पहले ही सड़ जाता है।
मंडियाँ ठीक से काम नहीं करतीं। बिखरी हुई मंडियाँ, कमज़ोर जुड़ाव और दाम का सही पता न चलना किसान को उन्हीं फ़सलों से बाँधे रखते हैं जिनकी माँग आसपास पक्की है।
ठेका खेती पर बंदिशें। कुछ राज्यों में ठेका लागू कराना मुश्किल है और नियम भी रोकते हैं, इसलिए निजी पैसा नहीं आता। वही पैसा आता तो किसान को पक्का बाज़ार मिल सकता था।
छोटी और बँटी हुई जोत। छोटे खेत पैदावार और बिक्री, दोनों का जोखिम बढ़ा देते हैं, इसलिए किसान ज़्यादा पूँजी माँगने वाली या जल्दी ख़राब होने वाली फ़सलों में हाथ डालने से हिचकते हैं।
असली बात यह है
छह में से पाँच अड़चनें भरोसे की हैं, काबिलियत की नहीं। किसान इसलिए नहीं रुके कि उन्हें सब्ज़ी उगानी नहीं आती। वे इसलिए नहीं बदलते कि सरकार ने दो फ़सलों से जोखिम हटा लिया है और बाक़ी सब पर उसे पूरा का पूरा छोड़ रखा है।
इसका मतलब यह है कि असली चाबी न कोई भाषण है, न कोई नया मिशन। चाबी है जोखिम का हाथ बदलना: ख़रीद कई फ़सलों की हो, कोल्ड चेन सच में चले, ठेके अदालत में टिकें और बीमा काम करे।
आगे का रास्ता
- पक्की सरकारी ख़रीद दालों, तिलहन और मोटे अनाज तक बढ़ाएँ, ताकि भरोसे का यह फ़ायदा सिर्फ़ धान और गेहूँ तक न रहे।
- फ़सल को बढ़ावा देने से पहले कोल्ड चेन खड़ी करें। भंडारण के बिना बागवानी बढ़ाने का मतलब है, बढ़ी हुई पैदावार को औने-पौने दाम में बिकवा देना।
- ठेका खेती को अदालत में टिकने लायक़ बनाएँ। झगड़ा तय तरीक़े से और जल्दी निपटे, तभी निजी ख़रीदार ऊँची कीमत वाली फ़सलों में आते हैं।
- किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के ज़रिए जोत जोड़ें, क्योंकि छोटे किसान इसी तरह उतना माल और उतना हिसाब-किताब जुटा पाते हैं जितना ख़रीदार माँगते हैं।
- सिंचाई के विस्तार को विविधीकरण के लक्ष्यों से जोड़ें, क्योंकि दोनों साथ-साथ चलते हैं।
विविधीकरण खेती का वह दुर्लभ सुधार है जो आमदनी, पोषण, मिट्टी और पानी, चारों को एक साथ सुधारता है। इसे रोके हुए है वह पुराना ढाँचा जो अनाज की कमी वाले भारत के लिए बना था। जिस समस्या के लिए वह बना था, वह समस्या कब की ख़त्म हो चुकी है।
सामान्य प्रश्न
फ़सल विविधीकरण क्या है?
फ़सल विविधीकरण का मतलब है, जगह और समय दोनों के हिसाब से खेती का ढर्रा बदलना और ज़्यादा तरह की फ़सलें उगाना, ताकि खेत की आमदनी बढ़े, जोखिम घटे और खेती ज़्यादा टिकाऊ बने। यह सिर्फ़ एक फ़सल की जगह दूसरी फ़सल उगा लेने से अलग बात है।
समय के हिसाब से और जगह के हिसाब से विविधीकरण में क्या फ़र्क़ है?
समय के हिसाब से विविधीकरण में एक ही ज़मीन पर एक के बाद एक मौसम में अलग-अलग फ़सलें उगाई जाती हैं, जैसे पहले धान, फिर गेहूँ, फिर मूँग। यही फ़सल चक्र है। जगह के हिसाब से विविधीकरण में एक ही खेत में एक साथ कई फ़सलें उगती हैं, अंतर-फ़सल या मिली-जुली खेती के ज़रिए, जैसे महाराष्ट्र में कपास के साथ अरहर।
विविधीकरण से खेत की आमदनी कितनी बढ़ सकती है?
किसानों की आय दोगुनी करने पर बनी दलवई समिति ने बताया था कि एक हेक्टेयर को अनाज से बागवानी में बदलने पर सालाना आमदनी क़रीब 80,000 रुपये बढ़ सकती है। यह फ़ायदा उसी फ़सल की पैदावार बढ़ने से नहीं, बल्कि हर हेक्टेयर की कीमत बढ़ने से आता है।
विविधीकरण से मौसम के झटके सहने की ताक़त क्यों बढ़ती है?
मोटे अनाज, दालें और तिलहन जैसी सूखा झेलने वाली फ़सलें उगाने से ज़्यादा पानी माँगने वाली फ़सलों पर निर्भरता घटती है। जिस खेत में अलग-अलग पानी और अलग-अलग पकने की अवधि वाली फ़सलें हों, वहाँ जोखिम बँट जाता है, इसलिए एक ही ख़राब मौसम पूरा सीज़न नहीं चौपट करता।
विविधीकरण से मिट्टी की सेहत कैसे सुधरती है?
फ़सल चक्र में दलहन शामिल करने से जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है और मिट्टी की उपजाऊ ताक़त लौटती है। फ़सल बदलते रहने से कीड़ों और खरपतवार का वह चक्र टूटता है जो एक ही फ़सल लगातार उगाने पर जम जाता है, और मिली-जुली खेती में पानी तथा पोषक तत्वों का इस्तेमाल बेहतर होता है।
MSP विविधीकरण के रास्ते में रुकावट कैसे बन जाता है?
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान और गेहूँ की पक्की सरकारी ख़रीद इन दो फ़सलों को तय दाम पर एक पक्का ख़रीदार दे देती है। ऊँची कीमत वाली किसी फ़सल में यह भरोसा नहीं मिलता। पक्की कमाई और ज़्यादा पर अनिश्चित कमाई में से किसान समझदारी से पक्की कमाई चुनता है, ख़ासकर छोटी जोत पर जहाँ जेब में कोई गुंजाइश नहीं होती।
इसमें सिंचाई की क्या भूमिका है?
भारत की खेती का बड़ा हिस्सा आज भी बारिश के भरोसे है, इसलिए अलग-अलग पानी और अलग-अलग पकने की अवधि वाली फ़सलें उगाना मुश्किल रहता है। सिंचाई का फैलाव और फ़सल विविधीकरण का स्तर, दोनों के बीच मज़बूत और सीधा रिश्ता दिखता है।
विविधीकरण के लिए कटाई के बाद का कौन-सा ढाँचा चाहिए?
ऊँची कीमत वाली फ़सलें जल्दी ख़राब होती हैं। इनके लिए कोल्ड चेन, छँटाई, भंडारण और प्रोसेसिंग की क्षमता चाहिए। जहाँ यह ढाँचा कमज़ोर है, वहाँ फ़सल ज़्यादा सड़ती है और आमदनी का सोचा हुआ फ़ायदा मिलता ही नहीं, इसलिए किसान भंडारण लायक़ अनाज पर ही टिके रहते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- एक ही खेत में कपास और अरहर साथ उगाना उदाहरण है
(a) समय के हिसाब से विविधीकरण
(b) जगह के हिसाब से विविधीकरण
(c) एकल फ़सल खेती
(d) सिर्फ़ रिले क्रॉपिंग
उत्तर: (b) एक ही खेत में एक साथ कई फ़सलें उगाना जगह के हिसाब से विविधीकरण है, जो अंतर-फ़सल या मिली-जुली खेती से होता है। - दलवई समिति के मुताबिक़, एक हेक्टेयर को अनाज से बागवानी में बदलने पर सालाना आमदनी क़रीब कितनी बढ़ सकती है
(a) 20,000 रुपये
(b) 45,000 रुपये
(c) 80,000 रुपये
(d) 1,50,000 रुपये
उत्तर: (c) किसानों की आय दोगुनी करने पर बनी समिति ने इस बदलाव से हर हेक्टेयर पर साल भर में क़रीब 80,000 रुपये के फ़ायदे का ज़िक्र किया है। - पंजाब और हरियाणा में फ़सल विविधीकरण को सबसे सीधे तौर पर क्या रोकता है
(a) बिजली की सप्लाई न होना
(b) धान और गेहूँ की MSP पर पक्की सरकारी ख़रीद
(c) ट्रैक्टरों की कमी
(d) बहुत ज़्यादा बारिश
उत्तर: (b) धान और गेहूँ की पक्की ख़रीद कमाई का जो भरोसा देती है, ऊँची कीमत वाली फ़सलें वह नहीं दे पातीं। - फ़सल चक्र में दलहन शामिल करने से मिट्टी की उपजाऊ ताक़त मुख्य रूप से किस वजह से बढ़ती है
(a) ज़्यादा पराली जलाने से
(b) जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण से
(c) ज़्यादा गहरी जुताई से
(d) खाद के ज़्यादा सोखे जाने से
उत्तर: (b) दलहन जड़ों की गाँठों में हवा की नाइट्रोजन जमा करते हैं और मिट्टी को वह नाइट्रोजन लौटा देते हैं जो अनाज की फ़सलें खींच लेती हैं। - सिंचाई के फैलाव और फ़सल विविधीकरण का रिश्ता कैसा है
(a) बहुत नकारात्मक
(b) बहुत सकारात्मक
(c) कोई रिश्ता नहीं
(d) सिर्फ़ बारिश पर निर्भर इलाक़ों में सकारात्मक
उत्तर: (b) पक्की सिंचाई मिलने पर किसान अलग-अलग पानी और अलग-अलग अवधि वाली फ़सलें उगा पाते हैं, इसलिए सिंचाई बढ़ने के साथ विविधीकरण भी बढ़ता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- फ़सल विविधीकरण को किसान की पसंद से ज़्यादा नीति के ढाँचे ने रोक रखा है। MSP और सरकारी ख़रीद के संदर्भ में समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
- पोषण सुरक्षा के लिए फ़सल विविधीकरण का महत्व बताइए और आकलन कीजिए कि भारत की मौजूदा कृषि नीति इसका साथ देती है या नहीं। (250 शब्द)
- ऊँची कीमत वाली खेती की तरफ़ बढ़ने के लिए कटाई के बाद का ढाँचा पहली शर्त है। चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
- भारतीय खेती के लिए जलवायु से तालमेल बैठाने की रणनीति के रूप में फ़सल विविधीकरण का परीक्षण कीजिए। (150 शब्द)
- छोटी और बँटी हुई जोत विविधीकरण का जोखिम बढ़ा देती है। इस जोखिम को घटाने के लिए संस्थाओं के स्तर पर उपाय सुझाइए। (250 शब्द)