पूँजी खाता परिवर्तनीयता (Capital Account Convertibility — CAC) वह व्यवस्था है जिसमें किसी देश की मुद्रा को वित्तीय परिसंपत्तियों (शेयर, बॉन्ड, अचल संपत्ति) में बिना किसी सरकारी अनुमति के विदेशी मुद्रा में बदला जा सके और विदेशी पूँजी देश में स्वतंत्र रूप से आ-जा सके। भारत ने अभी तक पूर्ण CAC नहीं अपनाया है।
चालू खाता बनाम पूँजी खाता
| खाता | विवरण | भारत की स्थिति |
|---|---|---|
| चालू खाता (Current Account) | वस्तु, सेवा, आय और हस्तांतरण | पूर्णतः परिवर्तनीय (1994 से) |
| पूँजी खाता (Capital Account) | FDI, FPI, ऋण, बैंकिंग, बाह्य वाणिज्यिक उधार | आंशिक रूप से परिवर्तनीय |
तारापोर समिति (Tarapore Committee)
प्रथम तारापोर समिति (1997)
RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर S.S. तारापोर की अध्यक्षता में गठित। पूर्ण CAC के लिए तीन पूर्व-शर्तें रखी:
- राजकोषीय समेकन: सकल राजकोषीय घाटा GDP का 3.5% से कम।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण: 3-5% की सीमा में।
- बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करना: NPA कम करना, पर्याप्त पूँजी।
द्वितीय तारापोर समिति (2006)
2011-12 तक क्रमिक पूर्ण CAC की सिफारिश की, लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इस प्रक्रिया को धीमा कर दिया।
पूँजी खाता परिवर्तनीयता के पक्ष
- विदेशी पूँजी का प्रवाह बढ़ता है — FDI और FPI को प्रोत्साहन।
- वित्तीय बाजारों की गहराई और कुशलता बढ़ती है।
- भारतीय कंपनियों को वैश्विक पूँजी बाजार तक पहुँच।
विरुद्ध तर्क
- वित्तीय अस्थिरता: अचानक पूँजी निकासी (Sudden Capital Outflow) रुपये को कमजोर कर सकती है।
- 1997 का एशियाई वित्तीय संकट — दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में CAC की जल्दबाजी का दुष्परिणाम।
- मौद्रिक नीति की स्वायत्तता कम होती है।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS III में पूँजी खाता परिवर्तनीयता बाह्य क्षेत्र, विदेशी निवेश, मुद्रा स्थिरता और भुगतान संतुलन के अंतर्गत आती है। तारापोर समिति की पूर्व-शर्तें, CAC और चालू खाता में अंतर — ये परीक्षा में पूछे जाते हैं।