आज़ादी के बाद पहली बार 2011 की जनगणना ने एक शांत लेकिन ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया। पिछले दशक में भारत ने अपने गाँवों में जितने लोग जोड़े, लगभग उतने ही क़स्बों और शहरों में जोड़े, करीब 9.1 करोड़-9.1 करोड़, कुल 18.2 करोड़ की बढ़त में। जो देश हमेशा मुख्य रूप से देहात में बढ़ता था, वह एक मोड़ तक पहुँच चुका था। आबादी में शहरी हिस्सा 31 प्रतिशत पार कर गया और जनगणना द्वारा क़स्बे गिने जाने वाली जगहों की संख्या 10 साल में 2,700 से ज़्यादा बढ़ गई। गिनती के हिसाब से भारत अब भी ग्रामीण देश था, लेकिन उसका गुरुत्व केंद्र खिसकना शुरू हो गया था।
इसी बदलाव का नाम शहरीकरण (urbanisation) है। इसका मतलब है कि आबादी का बढ़ता हिस्सा क़स्बों और शहरों में रहने लगे और ये बस्तियाँ बढ़ें, फैलें और बदलें। अभ्यर्थी के लिए यह पाठ्यक्रम के सबसे घने आपस में जुड़े विषयों में है। यह मानव भूगोल, भारतीय समाज की समाजशास्त्र, ढाँचे के बदलाव की अर्थशास्त्र और इस शासन बहस में आता है कि शहर को सच में चलाता कौन है। परिभाषाएँ बिल्कुल सही रखने, कुछ तीखे आँकड़े याद रखने और यह समझाने से उत्तर मज़बूत होता है कि भारत की शहरी बढ़ोतरी का आकार इतना अनोखा और ऊपर-भारी क्यों है।
भारत शहरी जगह को कैसे परिभाषित और गिनता है?
पहला सवाल आसान दिखता है लेकिन असल में कठिन है: क़स्बा क्या है? भारत में इसका जवाब जनगणना तय करती है और शहरी रेखा दो तरीकों से खींची जाती है। पहला है सांविधिक नगर (statutory town)। यह वह जगह है जहाँ अधिसूचित शहरी स्थानीय निकाय हो, जैसे नगर निगम, नगरपालिका, छावनी बोर्ड या अधिसूचित क़स्बा क्षेत्र समिति। जगह छोटी हो या बड़ी, अगर राज्य सरकार ने उसे नगरपालिका क्षेत्र घोषित किया है तो क़ानून के हिसाब से वह शहरी है। 2011 की जनगणना में ऐसे 4,041 सांविधिक नगर थे।
दूसरा प्रकार ज़्यादा दिलचस्प है। जनगणना नगर (census town) को शहरी स्थानीय निकाय नहीं मिली होती, फिर भी वह शहरी विशेषताएँ अपना चुका होता है। जनगणना इसे पहचानने के लिए 3 शर्तों का परीक्षण लगाती है: कम-से-कम 5,000 आबादी, पुरुष मुख्य कामकाजी आबादी का कम-से-कम 75 प्रतिशत ग़ैर-कृषि काम में और कम-से-कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर की आबादी घनत्व। जो बस्ती तीनों शर्तें पूरी करे, उसे शहरी गिना जाता है, भले ही काग़ज़ पर वह ग्राम पंचायत से चलता हो। इसका असर बड़ा है। शहरी भारत का एक बड़ा हिस्सा प्रशासनिक रूप से ग्रामीण है, यानी गाँव की संस्थाओं के साथ शहरी जीवन जी रहा है।
एक अकेले क़स्बे से ऊपर 2 बड़ी इकाइयाँ समझने लायक हैं। नगरीय समूह (urban agglomeration) एक लगातार शहरी फैलाव है जिसमें मुख्य क़स्बा और उससे भौतिक रूप से जुड़े बाहरी विस्तार, जैसे रेलवे कॉलोनियाँ, विश्वविद्यालय परिसर और बंदरगाह क्षेत्र, शामिल होते हैं। 2 या ज़्यादा क़स्बे भी एक-दूसरे में मिलकर नगरीय समूह बना सकते हैं। 2011 की जनगणना ने ऐसे 475 समूह पहचाने। महानगरीय शहर, या 10 लाख से अधिक आबादी वाला शहर (million-plus city), वह नगरीय समूह या क़स्बा है जिसकी आबादी 10 लाख से ऊपर हो। यही श्रेणियाँ पूरे विषय की शब्दावली हैं। इन्हें ठीक समझ लीजिए, बाकी विश्लेषण के नीचे मज़बूत आधार बन जाता है।
स्तर और रुझान क्या बताते हैं: बढ़ोतरी जारी है, लेकिन ऊपर-भारी?
अब वे आँकड़े देखिए जो बताते हैं कि भारत कहाँ है और कहाँ जा रहा है। शहरीकरण धीरे-धीरे लेकिन लगातार बढ़ा: 1951 में आबादी का करीब 17.3 प्रतिशत, 1991 में 25.7 प्रतिशत, 2001 में 28.5 प्रतिशत और 2011 में 31.16 प्रतिशत शहरी था। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2030 तक भारत करीब 40 प्रतिशत शहरी हो जाएगा और आबादी का आधे से ज़्यादा हिस्सा सदी के बीच के बाद ही शहरों में होगा। वैश्विक पैमानों पर यह धीमी रफ़्तार है। चीन की तुलना में भारत बाद में और धीमे शहरी हो रहा है, हालांकि निरपेक्ष आँकड़ों में दुनिया के लगभग किसी भी देश से ज़्यादा शहरवासी जोड़ रहा है।
लेकिन सुर्खी वाला प्रतिशत एक ज़्यादा महत्वपूर्ण पैटर्न छिपाता है। भारतीय शहरीकरण ऊपर-भारी (top-heavy) है। समय के साथ बढ़ोतरी सबसे बड़े शहरों और सबसे विकसित क्षेत्रों में जमा हुई है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 2001 के 35 से बढ़कर 2011 में 53 हो गई। इन बड़े समूहों ने शहरी बढ़ोतरी का असमान हिस्सा सोख लिया। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महाशहर तथा पश्चिम और दक्षिण के औद्योगिक राज्यों ने लोगों और निवेश दोनों खींचे। आबादी वाले हिंदी-पट्टी राज्यों के बड़े हिस्से अब भी ज़िद से ग्रामीण हैं। यानी शहरों की आकार-श्रेणी और नक्शा, दोनों में शहरीकरण एक तरफ़ झुका है।
महानगरीय कहानी के नीचे एक दूसरा, शांत रुझान भी चल रहा है और इसने जनसंख्याशास्त्रियों को चौंकाया। 2001 और 2011 के बीच जनगणना नगर 1,362 से बढ़कर 3,784 हो गए, यानी एक दशक में करीब 3 गुना। ये ऐसे गाँव हैं जो किसी औपचारिक घोषणा के बिना शहरी सीमा पार कर गए। खेती की जगह छोटा विनिर्माण, व्यापार और सेवाएँ मुख्य काम बन गया। इस “जगह-पर-ही” या नीचे से ऊपर शहरीकरण (in-situ urbanisation) में लोग पहले से बने शहर में गए बिना अपने गाँव में ही शहरी जीवन और काम बना रहे हैं। दशक की शहरी बढ़ोतरी में इसका हिस्सा उल्लेखनीय था। इससे दिखता है कि भारत सिर्फ़ शहरों की सीढ़ी में ऊपर उठते लोगों से शहरी नहीं हो रहा। ग्रामीण आधार भी धीरे-धीरे खुद बदल रहा है। Observer Research Foundation और दूसरे शोधकर्ताओं का तर्क है कि यह भी पूरी तस्वीर से कम है, क्योंकि जनगणना की सख़्त परिभाषा कई सचमुच शहरी जगहों को गाँव गिनती है।


भारत में शहरीकरण को कौन-सी ताकतें चलाती हैं?
लोग और जगहें शहरी क्यों बनती हैं? भारत के लिए क्लासिक ढाँचा प्रवास का धक्का-खिंचाव मॉडल (push-pull model) है। देहात से बाहर धकेलने वाले धक्का कारक हैं: छोटी और बँटी हुई जोतें, कम और अनिश्चित खेती की आय, गाँव में अधूरी रोज़गार, कर्ज़ और सूखा तथा फ़सल नाकामी के समय-समय पर झटके। कृषि बढ़ती कामगार ताक़त को सोख न पाए तो गाँव अपने युवाओं को रोक नहीं पाता। खिंचाव कारक शहर की ओर खींचते हैं: नियमित मज़दूरी की उम्मीद, निर्माण, विनिर्माण और सेवाओं में नौकरियाँ, बेहतर स्कूल और अस्पताल तथा मौक़े की वह घनत्व जो शहर देता है। भारत में गाँव-से-शहर प्रवास की जड़ में ज़्यादातर काम की तलाश होती है।
व्यक्तिगत फ़ैसले के पीछे अर्थव्यवस्था का बड़ा इंजन है, जिसे ढाँचे का बदलाव (structural transformation) कहते हैं। देश के विकसित होने पर उत्पादन और रोज़गार का हिस्सा कृषि से उद्योग और, भारत के मामले में, सेवाओं की ओर खिसकता है। शहर वह ग़ैर-खेती अर्थव्यवस्था इकट्ठा करते हैं क्योंकि फ़र्म और मज़दूरों को एक-दूसरे के पास होने से फ़ायदा मिलता है। इसे अर्थशास्त्री समूह अर्थव्यवस्थाएँ (agglomeration economies) कहते हैं। भारत की सेवा-आधारित बढ़ोतरी में यह साफ़ दिखा। आईटी और बैक-ऑफ़िस उछाल ने एक पीढ़ी में बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम को शहरी चुंबक बना दिया। इसलिए शहरीकरण बढ़ोतरी का साइड-इफ़ेक्ट नहीं, उसका एक मुख्य रूप है। विविध होती अर्थव्यवस्था और बढ़ती शहरी आबादी एक ही प्रक्रिया के 2 चेहरे हैं।
बाकी 3 चालक तस्वीर पूरी करते हैं। शहरों में प्राकृतिक बढ़ोतरी, यानी पहले से शहरी लोगों में जन्म मृत्यु से ज़्यादा होना, शहरी बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा जोड़ता है और किसी दशक में प्रवास से भी अधिक हो सकता है। गाँवों का जनगणना नगरों में पुनर्वर्गीकरण भी बिना लोगों के स्थान बदले बस्तियों की संख्या बढ़ाता है। शहर की सीमाओं का भौतिक विस्तार आसपास के गाँवों को नगरपालिका क्षेत्र में खींच लाता है और प्रशासनिक क़लम के एक झटके से ग्रामीण लोगों को शहरी बना देता है। भारत का असल शहरीकरण प्रवास, प्राकृतिक बढ़ोतरी, पुनर्वर्गीकरण और सीमा विस्तार का मिश्रण है। प्रवास को अकेला कारण मानना अधूरा उत्तर होगा।
चुनौतियाँ क्या हैं: शहर शासन से तेज़ क्यों बढ़ रहे हैं?
भारतीय शहरीकरण की असहज सच्चाई यह है कि देश उसे सँभालने की क्षमता बनाने से तेज़ी से शहरी हो रहा है। सबसे दिखने वाला लक्षण झुग्गी है। ये अनौपचारिक और अक्सर अनधिकृत बस्तियाँ हैं जहाँ शहरी भारतीयों का बड़ा हिस्सा पक्की ज़मीन के अधिकार, पाइप से पानी या ठीक सैनिटेशन के बिना रहता है। मुंबई जैसे शहरों में आबादी का बड़ा हिस्सा ज़मीन के छोटे हिस्से पर झुग्गियों में रहता है। सस्ते आवास की कमी कई दस लाख इकाइयों तक है। योजना के बजाय यह फ़ासला अनौपचारिकता भरती है और शहरी ग़रीब को बाज़ार और सरकार द्वारा छोड़ी गई जगह में ठूँस देती है।
बुनियादी ढाँचा हर दिशा में दबाव में है। भारत के ज़्यादातर शहरों में पानी की आपूर्ति रुक-रुक कर है, सैनिटेशन और सीवेज उपचार आबादी की बढ़ोतरी से बहुत पीछे हैं और ठोस कचरा प्रबंधन पुरानी नाकामी है। ट्रैफ़िक जाम और वायु प्रदूषण ने कई भारतीय शहरों को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में ला दिया है। वही पक्की हो चुकी और नालियाँ-रहित बढ़ोतरी शहरी बाढ़ भी पैदा करती है। भारी बारिश जब कंक्रीट हो चुके बाढ़ मैदानों, घुसपैठ किए गए झीलों और बंद तूफ़ानी नालों से मिलती है, तो मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर ठप हो जाते हैं। ये अलग-अलग संकट नहीं हैं। ये उस बढ़ोतरी के लक्षण हैं जो उसे सोखने वाले तंत्र से आगे निकल गई है।
सबसे गहरी समस्या शासन की है। यहीं परीक्षक समस्याओं की सूची नहीं, विश्लेषण चाहता है। 1992 का 74वाँ संविधान संशोधन चुने हुए और अधिकार-सम्पन्न शहरी स्थानीय निकाय, यानी नगर निगम तथा नगरपालिकाएँ, देकर इसे ठीक करने के लिए था। इसमें वार्ड समितियाँ, राज्य वित्त आयोग और महानगरीय योजना समितियों का प्रावधान हुआ। 3 दशक बाद यह वादा आधा ही पूरा हुआ है। ज़्यादातर शहरी स्थानीय निकायों में धन, काम और कर्मचारी की कमी है, यानी वे “तीन एफ” (funds, functions, functionaries) जो उन्हें सौंपे जाने चाहिए थे। भूमि, पानी, पुलिसिंग और योजना पर असली ताक़त अक्सर चुने हुए महापौर के बजाय राज्य-स्तर की पैरास्टेटल एजेंसियों (parastatal agencies) के पास है। बड़े शहर आपस में ओवरलैप करने वाले निकायों की ऐसी उलझन से चलते हैं जहाँ एक जवाबदेह प्राधिकरण नहीं होता। जिस शहर की पूरी ज़िम्मेदारी किसी एक के पास न हो, वह योजना नहीं कर सकता। भारत के शहरी संकट के पीछे यही ढाँचागत वजह है।
नीति का जवाब क्या है: योजनाएँ और आगे का रास्ता?
सरकार ने शहरी मिशनों की एक श्रृंखला शुरू की है और अभ्यर्थी को मुख्य मिशन पता होने चाहिए। Smart Cities Mission 2015 में शुरू हुई। इसका लक्ष्य 100 चुने हुए शहरों में तकनीक-आधारित, क्षेत्र-आधारित पुनर्विकास और पूरे शहर के समाधान लाना था, जैसे एकीकृत कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र, ज़्यादा स्मार्ट उपयोगिताएँ और सार्वजनिक जगहें। इसके साथ चलने वाली Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation, या AMRUT, उन बुनियादी बातों पर केंद्रित थी जिन्हें स्मार्ट-सिटी की चमक छोड़ सकती है: पानी की आपूर्ति, सीवरेज, निकासी और हरित जगहें। AMRUT 2.0 को 1 अक्टूबर 2021 को करीब ₹3 लाख करोड़ के परिव्यय के साथ शुरू किया गया और यह 2025-26 तक चलना था। इसका लक्ष्य हज़ारों क़स्बों में सबको पानी का नल और सीवरेज कवरेज था। Pradhan Mantri Awas Yojana (Urban) ने सस्ते आवास निर्माण को बढ़ाया और Swachh Bharat Mission (Urban) ने सैनिटेशन तथा कचरे पर काम किया।
इन मिशनों ने असली संपत्तियाँ बनाई हैं, लेकिन इनकी साझी कमज़ोरी लिखना संतुलित उत्तर की पहचान है। ये ज़्यादातर परियोजना-चालित और केंद्र-प्रायोजित हैं। बुनियादी ढाँचे में पैसा जाता है, पर कमज़ोर और अधूरे अधिकार वाले शहरी स्थानीय निकायों की मूल समस्या ठीक नहीं होती। नया कमांड केंद्र या सीवेज प्लांट अपने आप ऐसी नगरपालिका नहीं बना देता जो उसे चलाए, रखरखाव करे और उसके लिए पैसा जुटाए। इसलिए आगे का रास्ता सिर्फ़ और योजनाएँ नहीं, गहरा सुधार है। 74वें संशोधन की भावना के तहत शहरों को असली राजकोषीय और कार्यात्मक अधिकार सौंपना, पेशेवर नगरपालिका काडर, संपत्ति कर जैसे अपने राजस्व स्रोत, असली शहरी क्षेत्रों के पैमाने से मेल खाती एकीकृत महानगरीय योजना और शहर के किनारे तथा छोटे जनगणना नगरों को भी शासन और निवेश देना ज़रूरी है। सिर्फ़ नामी महानगरों पर ध्यान काफ़ी नहीं।
बड़ी बात यह है कि शहरीकरण को रोकने की समस्या नहीं, भारत की आने वाली बढ़ोतरी का इंजन समझना चाहिए। शहर थोड़ी ज़मीन पर राष्ट्रीय उत्पादन का आधे से कहीं ज़्यादा पैदा करते हैं और यह हिस्सा बढ़ रहा है। सवाल यह नहीं कि भारत शहरी होगा या नहीं। वह आने वाले दशकों में साफ़ तौर पर शहरी होगा। असली सवाल है कि यह बढ़ोतरी योजनाबद्ध, रहने लायक और उत्पादक शहरों में होगी या बिखरे और अधूरी सेवा वाले शहरों में। इसका जवाब देश की सबसे बड़ी विकास चुनौतियों में है।
आपके मुख्य परीक्षा उत्तर के लिए
यह GS1 के लिए ऊँचे मूल्य वाला विषय है। इसमें दुनिया का भौतिक भूगोल, संसाधनों का वितरण और सीधे शहरीकरण, उसकी समस्याएँ और उपाय आते हैं। आबादी और बस्ती के सामाजिक-भूगोल विषय भी इससे जुड़ते हैं। 74वें संशोधन के अधिकार सौंपने और स्थानीय सरकार वाले GS2 और बुनियादी ढाँचा, नियोजित शहरी विकास और अर्थव्यवस्था वाले GS3 में भी यह काम आता है। परीक्षक जिस कौशल को इनाम देता है, वही इस लेख में है: परिभाषाएँ ठीक रखना, रुझान को कुछ सटीक आँकड़ों से बाँधना और समस्याएँ बताने से शासन की नाकामी के विश्लेषण तक जल्दी पहुँचना।
उत्तर कैसे बनाएँ?
शहरीकरण और भारत के क़स्बा-गिनने के तरीके को परिभाषित कीजिए। सांविधिक और जनगणना नगर, 3-भाग परीक्षण के साथ। फिर स्तर और रुझान लिखिए, यह ज़ोर देते हुए कि बढ़ोतरी ऊपर-भारी है और जनगणना नगर करीब 3 गुना हुए हैं। चालकों को धक्का-खिंचाव मॉडल और शहरी बढ़ोतरी के बाकी 3 स्रोतों से समझाइए। चुनौतियों में झुग्गियों और बुनियादी ढाँचे से शुरू करके शासन पर उतरिए। अंत में योजनाएँ और यह ईमानदार फ़ैसला दीजिए कि वे कहाँ कम पड़ती हैं। परिभाषित करो, मापो, समझाओ, निदान करो और उपाय बताओ वाला यह चाप लगभग हर शहरीकरण प्रश्न में काम करता है।
इन आम गलतियों से बचें
शहरीकरण को सिर्फ़ गाँव-से-शहर प्रवास मत मानिए। प्राकृतिक बढ़ोतरी, पुनर्वर्गीकरण और सीमा विस्तार भी महत्वपूर्ण हैं और किसी दशक में प्रवास सबसे बड़ा स्रोत न भी हो सकता है। सांविधिक नगर और जनगणना नगर को न मिलाएँ। क़ानूनी दर्जा और आर्थिक विशेषताओं का फ़र्क़ खुद परीक्षा के लायक है। शहरी समस्याओं की सूची देकर शासन का मूल कारण मत छोड़िए। 74वें संशोधन का विश्लेषण ही अंक लाता है। शहरीकरण को सिर्फ़ बोझ भी मत बनाइए। यह आर्थिक बढ़ोतरी का मुख्य चालक है, संतुलित उत्तर को यह भी कहना चाहिए।
एक छोटा उत्तर-ढाँचा
शहरीकरण = क़स्बों में रहने वाली आबादी का बढ़ता हिस्सा + बस्तियों का बढ़ना → जनगणना शहरी को सांविधिक नगरों (4,041) और जनगणना नगरों (5,000 आबादी, 75% ग़ैर-खेती पुरुष मज़दूर, 400 प्रति वर्ग किमी; 2011 में 3,784, 1,362 से बढ़कर) से परिभाषित करती है → स्तर 2011 में 31.16%, 2030 में करीब 40% की ओर, लेकिन ऊपर-भारी: 53 दस-लाख-से-अधिक शहर और बड़े शहर तथा विकसित क्षेत्रों में जमाव → चालक: धक्का-खिंचाव प्रवास + प्राकृतिक बढ़ोतरी + पुनर्वर्गीकरण + सीमा विस्तार, ढाँचे के बदलाव से जुड़े → चुनौतियाँ: झुग्गियाँ, आवास की कमी, पानी-सैनिटेशन-कचरा, शहरी बाढ़ और कमज़ोर शहरी स्थानीय निकाय → 74वाँ संशोधन अधूरा, तीन एफ सौंपे नहीं गए → योजनाएँ: Smart Cities Mission, AMRUT 2.0, PMAY (शहरी), Swachh Bharat Mission (शहरी) → फ़ैसला: सिर्फ़ परियोजनाएँ नहीं, शासन ठीक कीजिए।
डायग्राम या फ़्लोचार्ट का विचार
एक सादा 2-भाग दृश्य बनाइए। पहले चढ़ती रेखा या बार में शहरी हिस्सा 1951 के 17%, 2011 के 31% और 2030 के करीब 40% दिखाइए। इसके बगल में चालकों के 4 बक्से रखें: प्रवास, प्राकृतिक बढ़ोतरी, पुनर्वर्गीकरण और सीमा विस्तार। इन सबको “शहरी बढ़ोतरी” की ओर ले जाते दिखाएँ। एक नज़र में रुझान और कारण दोनों पर पकड़ दिखाई देगी।
संतुलित निष्कर्ष की एक लाइन
अंकों के लिए उपयोगी लाइन यह है: “भारत की चुनौती शहरी होना नहीं है। चुनौती यह है कि उसके शहर शासन से तेज़ी से बढ़ रहे हैं। रास्ता नई योजनाओं की सूची से कम और 74वें संशोधन को सच में लागू करने से ज़्यादा निकलेगा, यानी शहरों को अपना भविष्य योजना करने के लिए धन, काम और कर्मचारी देना होगा।”
आँकड़ों को रटने के बजाय कैसे इस्तेमाल करें?
सिर्फ़ 4 आधार काफ़ी हैं: 2011 का 31.16% शहरी हिस्सा, 2030 का करीब 40% अनुमान, जनगणना नगरों का 1,362 से 3,784 तक उछाल और 53 दस-लाख-से-अधिक शहर। इन्हें सही वाक्यों में रखें और स्रोत साफ़ बताइए, जैसे “2011 की जनगणना के अनुसार”। बिना संदर्भ के आँकड़े बिखेरने की ज़रूरत नहीं।
सामान्य प्रश्न
सांविधिक नगर और जनगणना नगर में क्या अंतर है?
सांविधिक नगर वह जगह है जहाँ अधिसूचित शहरी स्थानीय निकाय हो, जैसे नगर निगम, नगरपालिका या छावनी बोर्ड। यह आकार से अलग, क़ानून के हिसाब से शहरी है। जनगणना नगर के पास शहरी स्थानीय निकाय नहीं होती, लेकिन 3 आबादी संबंधी परीक्षण पूरे होते हैं: आबादी कम-से-कम 5,000, पुरुष मुख्य मज़दूरों में कम-से-कम 75 प्रतिशत ग़ैर-कृषि काम और घनत्व कम-से-कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर। मुख्य फ़र्क़ क़ानूनी दर्जा और आर्थिक तथा आबादी वाले चरित्र का है। जनगणना नगर शहरी जीवन जीता है, फिर भी गाँव की तरह चलाया जाता है।
भारत का शहरीकरण स्तर कितना है और क्या यह तेज़ी से बढ़ रहा है?
2011 की जनगणना के अनुसार 31.16 प्रतिशत भारतीय शहरी क्षेत्रों में रहते थे। 2001 के 28.5 प्रतिशत से यह बढ़त थी। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2030 तक यह करीब 40 प्रतिशत हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर रफ़्तार धीमी है, चीन से धीमी। लेकिन निरपेक्ष आँकड़ों में भारत दुनिया में शहरवासियों की सबसे बड़ी संख्या जोड़ रहा है और शहरी हिस्सा लगातार बढ़ रहा है।
भारतीय शहरीकरण को “ऊपर-भारी” क्यों कहा जाता है?
क्योंकि शहरी बढ़ोतरी बराबर फैलने के बजाय सबसे बड़े शहरों और सबसे विकसित क्षेत्रों में जमा हुई है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले महानगरीय शहर 2001 के 35 से बढ़कर 2011 में 53 हो गए। पश्चिम और दक्षिण के बड़े नगरीय समूहों ने आबादी और निवेश का असमान हिस्सा सोख लिया, जबकि ग्रामीण हिंदी पट्टी का बड़ा हिस्सा कम शहरी रहा।
74वाँ संविधान संशोधन क्या है और शहरों के लिए क्यों ज़रूरी है?
1992 का 74वाँ संशोधन शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा देता है। इसमें चुनी हुई नगरपालिकाएँ, वार्ड समितियाँ, राज्य वित्त आयोग और महानगरीय योजना समितियों का प्रावधान है। इसका लक्ष्य शहरों को स्व-शासित बनाना था। ज़मीन पर इसका अमल आधा-अधूरा है। ज़्यादातर नगरपालिकाओं में धन, काम और कर्मचारी पर्याप्त नहीं हैं। भारत के शहरी शासन संकट के पीछे यही ढाँचागत कमी है।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- 2011 भारत की जनगणना के अनुसार “जनगणना नगर” की पहचान के लिए 3 शर्तें कौन-सी हैं? (a) 5,000 आबादी, पुरुष मुख्य मज़दूरों में 75 प्रतिशत ग़ैर-कृषि काम और कम-से-कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी घनत्व (b) 10,000 आबादी, अधिसूचित नगरपालिका और 1,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी घनत्व (c) 5,000 आबादी और नगर निगम (d) 20,000 आबादी और दूसरे क़स्बे से जुड़ाव उत्तर: (a) जनगणना नगर को तीनों आबादी संबंधी परीक्षण पूरे करने होते हैं। अगर अधिसूचित शहरी स्थानीय निकाय हो तो वह सांविधिक नगर होता।
- निम्नलिखित में से कौन जनगणना नगर के बजाय सांविधिक नगर है? (a) 5,000 आबादी पार कर चुका और ग़ैर-खेती काम वाला गाँव (b) नगर निगम या नगरपालिका द्वारा चलाया गया बस्ती (c) 10 लाख से अधिक आबादी वाला कोई नगरीय समूह (d) किसी शहर से जुड़ी रेलवे कॉलोनी उत्तर: (b) सांविधिक नगर की पहचान अधिसूचित शहरी स्थानीय निकाय से होती है, आकार या आबादी प्रोफ़ाइल से नहीं।
- 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का शहरीकरण स्तर कितना था? (a) 25.7 प्रतिशत (b) 28.5 प्रतिशत (c) 31.16 प्रतिशत (d) 40 प्रतिशत उत्तर: (c) 2011 में शहरी हिस्सा 31.16 प्रतिशत था, जो 2001 के 28.5 प्रतिशत से बढ़ा था। करीब 40 प्रतिशत 2030 का UN अनुमान है।
- 2001 और 2011 के बीच जनगणना नगरों का 1,362 से 3,784 तक करीब 3 गुना बढ़ना किस घटना को दिखाता है? (a) पहले से बने महानगरीय शहरों में बड़े पैमाने का प्रवास (b) जगह-पर-ही शहरीकरण, जिसमें ग्रामीण बस्तियाँ औपचारिक क़स्बा घोषणा के बिना शहरी विशेषताएँ अपना लेती हैं (c) राज्यों का विलय (d) महानगरीय शहर की परिभाषा में बदलाव उत्तर: (b) जनगणना नगर नीचे से ऊपर, जगह-पर-ही शहरीकरण दिखाते हैं। गाँव शहरी सीमा पार कर लेते हैं, लेकिन पंचायत के रूप में चलते रहते हैं।
- भारत में शहरी आबादी बढ़ने के स्रोतों के बारे में विचार कीजिए: 1. गाँव-से-शहर प्रवास 2. शहरों के भीतर प्राकृतिक बढ़ोतरी 3. गाँवों का जनगणना नगरों के रूप में पुनर्वर्गीकरण 4. नगरपालिका सीमाओं का विस्तार। सही उत्तर चुनिए: (a) केवल 1 और 2 (b) 1, 2 और 3 (c) 1, 3 और 4 (d) 1, 2, 3 और 4 उत्तर: (d) चारों शहरी बढ़ोतरी में योगदान करते हैं। किसी दशक में प्रवास सबसे बड़ा अकेला स्रोत न भी हो सकता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “भारतीय शहरीकरण ऊपर-भारी है और बड़े शहरों तथा विकसित क्षेत्रों में जमा है।” इस कथन के प्रकाश में भारत में शहरीकरण के रुझान और पैटर्न की जाँच कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- सांविधिक नगर और जनगणना नगर में अंतर स्पष्ट कीजिए। जनगणना नगरों की तेज़ बढ़ोतरी ने भारत में शहरीकरण की हमारी समझ को कैसे बदला है? (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत में शहरीकरण के मुख्य चालकों पर चर्चा कीजिए। दूसरे कारकों की तुलना में गाँव-से-शहर प्रवास शहरी बढ़ोतरी के लिए कितना ज़िम्मेदार है? (15 अंक, 250 शब्द)
- “भारत के शहर शासन से तेज़ी से बढ़ रहे हैं।” 74वें संविधान संशोधन के अमल के संदर्भ में शहरी भारत की चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- Smart Cities Mission और AMRUT समेत भारत में शुरू किए गए प्रमुख शहरी मिशनों का मूल्यांकन कीजिए। क्या ये शहरी शासन की ढाँचागत कमज़ोरियाँ ठीक करते हैं या सिर्फ़ लक्षण? (15 अंक, 250 शब्द)