विनिवेश (Disinvestment) वह प्रक्रिया है जिसमें सरकार सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी बेचती है। जब सरकार अपनी 51% से अधिक हिस्सेदारी बेचकर प्रबंधन नियंत्रण छोड़ देती है, तो इसे निजीकरण (Privatisation) कहते हैं। 1991 की LPG सुधार यात्रा से लेकर आज तक विनिवेश भारतीय आर्थिक नीति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
विनिवेश का उद्देश्य
- राजस्व प्राप्त करना जो बजट घाटे को कम करे
- PSUs में कुशलता और प्रतिस्पर्धिता बढ़ाना
- निवेशकों के लिए पूँजी बाज़ार को गहरा करना
- सरकार को “सामरिक” क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने देना
ऐतिहासिक यात्रा
1991-92 में विनिवेश की शुरुआत हुई — 31 PSUs में अल्पांश हिस्सेदारी बेची गई। 1999-2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने Disinvestment Ministry बनाई और BALCO, IPCL, HZL जैसी कंपनियों में बड़ा विनिवेश किया।
NITI Aayog का सामरिक क्षेत्र ढाँचा
2021 में NITI Aayog ने सार्वजनिक क्षेत्र की नीति का नया ढाँचा घोषित किया:
- सामरिक क्षेत्र: परमाणु, अंतरिक्ष, रक्षा, परिवहन, बैंकिंग, बीमा — न्यूनतम 1 PSU रखना
- गैर-सामरिक क्षेत्र: पूर्ण निजीकरण
प्रमुख विनिवेश
- Air India: 2022 में टाटा समूह को बेचा गया — सफल निजीकरण का उदाहरण
- LIC IPO (2022): ₹21,000 करोड़ — भारत का सबसे बड़ा IPO
- BPCL निजीकरण: अभी प्रक्रियाधीन
विनिवेश लक्ष्य बनाम उपलब्धि
भारत सरकार प्रायः अपने विनिवेश लक्ष्यों से कम उपलब्धि करती है। 2021-22 में ₹1.75 लाख करोड़ का लक्ष्य था, वास्तविक प्राप्ति ₹13,500 करोड़। राजनीतिक प्रतिरोध, बाज़ार की स्थिति और प्रक्रियागत विलंब प्रमुख कारण हैं।
आलोचनाएँ
- सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारियों की नौकरी का खतरा
- लाभकारी PSUs बेचना “चांदी के बर्तन बेचना” जैसा
- आवश्यक सेवाओं (बीमा, बैंकिंग) में एकाधिकार का खतरा
यूपीएससी की दृष्टि से
विनिवेश GS-III (अर्थव्यवस्था — बजट, PSUs) और GS-II (शासन) के लिए महत्त्वपूर्ण है। Air India विनिवेश, LIC IPO और NITI Aayog का सामरिक क्षेत्र ढाँचा महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।