भारतीय कृषि में जल सबसे अधिक दबाव में रहने वाला कारक है। भारत के पास विश्व के स्वच्छ जल का मात्र 4% है, परंतु यहाँ विश्व की 17-18% जनसंख्या निवास करती है; इस जल का 80% से अधिक हिस्सा अकेले कृषि में खर्च होता है। भूजल, वर्षा की अनियमितता, सिंचाई की अक्षमता और फसल-प्रतिरूप की विकृतियों ने मिलकर वह स्थिति उत्पन्न कर दी है जिसे नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) ने “भारत के इतिहास का सबसे गंभीर जल संकट” कहा है। यह मार्गदर्शिका स्थिति, समस्याओं और PMKSY, सूक्ष्म-सिंचाई तथा माँग-पक्ष जल प्रबंधन पर केंद्रित सुधार-एजेंडे को प्रस्तुत करती है।
वर्तमान स्थिति
- कृषि कुल जल का 80% से अधिक उपभोग करती है, जिसमें भूजल का वर्चस्व है (कृषि-जल का लगभग 60%)।
- शुद्ध बोया गया क्षेत्र का 52% हिस्सा अब भी वर्षा-आधारित है — यहाँ उत्पादकता सिंचित क्षेत्रों की तुलना में लगभग तीन गुना कम है।
- भूजल — भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है; प्रति वर्ष लगभग 250 घन किमी — जो अमेरिका और चीन के संयुक्त उपभोग से भी अधिक है।
- अत्यधिक-दोहन वाले प्रखंडों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है; केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) ने कई प्रखंडों को “अत्यधिक दोहित” या “संकटग्रस्त” घोषित किया है।
जल-उपयोग दक्षता का महत्व
- नीति आयोग की CWMI रिपोर्ट — 2030 तक पेयजल की माँग आपूर्ति से अधिक हो जाएगी।
- सुरक्षित पेयजल के अभाव में प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
- विश्व बैंक के आकलन के अनुसार 2050 तक जल संकट भारत की GDP का लगभग 6% तक क्षति कर सकता है।
- जलवायु परिवर्तन — अनियमित मॉनसून इस जोखिम को और बढ़ा देता है।
वर्तमान जल प्रबंधन की समस्याएँ
वर्षा-आधारित कृषि का बड़ा हिस्सा: शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 72 मिलियन हेक्टेयर (~52%) पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। वर्षा-आधारित कृषि की उत्पादकता सिंचित कृषि की तुलना में लगभग तीन गुना कम है।
क्षेत्रीय असंतुलन: वर्षा और सतही जल की उपलब्धता में कालिक और स्थानिक भिन्नताएँ अत्यधिक हैं। चेरापूंजी बनाम राजस्थान, पूर्वोत्तर बनाम दक्षिण — यह फैलाव बहुत विषम है।
निर्मित सिंचाई क्षमता का अल्प-उपयोग: सृजित सिंचाई क्षमता (IPC) और उपयोगी सिंचाई क्षमता (IPU) के बीच बड़ा अंतर है। कारण — नहरों का अपर्याप्त अनुरक्षण, भागीदारी-आधारित प्रबंधन का अभाव, भूमि-उपयोग में बदलाव, फसल-प्रतिरूप की विकृति, मृदा-क्षरण और कमांड एरिया डेवलपमेंट में विलंब।
अनुपयुक्त फसल और फसल-प्रणाली: अत्यधिक क्षेत्र धान, गन्ना और गेहूँ जैसी जल-गहन फसलों के अधीन है। भारत एक शुद्ध जल निर्यातक है क्योंकि वह जल-गहन धान और गेहूँ निर्यात करता है, जबकि कम जल-गहन दलहनें और तिलहनें आयात करता है (आर्थिक समीक्षा 2015-16)।
असंतुलित भूजल-उपयोग: सुखसाध्यिकार अधिनियम, 1882 (Easement Act) प्रत्येक भूस्वामी को अपनी भूमि के नीचे के जल के दोहन का अधिकार देता है। यह कानूनी रूप से भूजल के अबाध दोहन का द्वार खोलता है। मालिकों पर ह्रास का कोई उत्तरदायित्व नहीं है। निःशुल्क या भारी सब्सिडी वाली बिजली के साथ मिलकर यह बेलगाम अत्यधिक-दोहन का कारण बन जाता है।
जलभराव और मृदा-क्षारीयता: क्षारीय मृदा पर बाढ़-सिंचाई के अत्यधिक प्रयोग से भूजल-स्तर ऊपर उठता है, जिससे लवण सतह पर आ जाते हैं और उत्पादकता नष्ट हो जाती है — पंजाब, हरियाणा और इंदिरा गांधी नहर के कमांड क्षेत्र इससे पीड़ित हैं।
इन समस्याओं का समाधान कैसे हो
सिंचित क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाना
- नियमित नहर-अनुरक्षण द्वारा IPC-IPU का अंतराल घटाना।
- भागीदारी-सिंचाई प्रबंधन के लिए जल उपयोगकर्ता संघ (WUAs)।
- जल शुल्कों का युक्तिसंगीकरण — जहाँ संभव हो, वॉल्यूमेट्रिक मूल्य-निर्धारण।
- कम जल-गहन फसलों की ओर फसल-प्रतिरूप परिवर्तन।
- सूक्ष्म-सिंचाई (ड्रिप व स्प्रिंकलर) का विस्तार।
वर्षा-आधारित क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाना
- वर्षाजल संचयन — चेक डैम, फार्म पॉन्ड, पर्कोलेशन टैंक।
- MGNREGA और जल-संरक्षण के बीच अभिसरण — MGNREGA-जल शक्ति के तहत अनेक जल-संरचनाएँ निर्मित।
- तालाबों और जल-निकायों से गाद निकालना — मिशन अमृत सरोवर के अंतर्गत 2024 तक 68,000+ जल-निकायों का निर्माण/पुनरुद्धार।
- संरक्षण कृषि — मल्चिंग (प्राकृतिक व कृत्रिम), शून्य जुताई, कवर फसलें।
भूजल का इष्टतम उपयोग
- भूजल दोहन के नियमन हेतु आदर्श विधेयक अपनाएँ — भूजल नियामक प्राधिकरण, नलकूप-स्वामियों का अनिवार्य पंजीकरण, नए नलकूपों हेतु अनुमति, गहराई की सीमाएँ।
- आंध्र प्रदेश किसान-प्रबंधित भूजल प्रणाली (APFAMGS) की पुनरावृत्ति — सामुदायिक जलभृत प्रबंधन, व्यवहार परिवर्तन, स्वनियमन।
- बिजली सब्सिडी का युक्तिकरण; दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के अंतर्गत फीडर पृथक्करण का क्रियान्वयन।
- सूक्ष्म-सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर) को प्रोत्साहन।
- अटल भूजल योजना — 7 राज्यों के प्राथमिक क्षेत्रों में समुदाय-नेतृत्व वाला भूजल प्रबंधन।
| पहल | मंत्रालय | फोकस |
|---|---|---|
| PMKSY – हर खेत को पानी | MoJS | छोर-से-छोर सिंचाई |
| PMKSY – प्रति बूँद अधिक फसल | MoA&FW | सूक्ष्म-सिंचाई |
| अटल भूजल योजना | MoJS | सामुदायिक भूजल प्रबंधन |
| जल जीवन मिशन | MoJS | कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन |
| जल शक्ति अभियान | MoJS | वार्षिक जल-संरक्षण अभियान |
| मिशन अमृत सरोवर | MoRD | ग्रामीण जल-निकायों का पुनरुद्धार |
| नमामि गंगे | MoJS | गंगा नदी का पुनर्जीवन |
| MGNREGA | MoRD | अनुमत परिसंपत्तियों के रूप में जल-संरक्षण कार्य |
प्रमुख योजना: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
- हर खेत को पानी — छोर-से-छोर सिंचाई समाधान।
- प्रति बूँद अधिक फसल (PDMC) — ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार।
- जलग्रहण विकास (WDC) — एकीकृत जलग्रहण कार्यक्रम।
- त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP) — प्रमुख/मध्यम परियोजनाओं का पूर्णीकरण।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
- जल जीवन मिशन (JJM) — 2024 तक ग्रामीण परिवारों में FHTC कवरेज 79% पार, जबकि लक्ष्य 2024 तक 100% था; बजट 2025-26 में शेष परिवारों के लिए मिशन-विस्तार की घोषणा।
- बजट 2025-26 में जल जीवन मिशन को 2028 तक विस्तारित किया गया; बढ़ी हुई राशि आवंटित।
- PMKSY को 93,068 करोड़ रुपये के केंद्रीय परिव्यय के साथ 2021-26 के लिए विस्तारित।
- मिशन अमृत सरोवर (चरण 1) — 68,000+ सरोवर निर्मित; चरण 2 की घोषणा, जिसमें प्रति जिले कम-से-कम 75 सरोवर अनिवार्य।
- अटल भूजल योजना — 7 राज्यों के 80 जिलों की 8,774 ग्राम पंचायतों में सामुदायिक भूजल प्रबंधन; 2025 तक पूर्णीकरण लक्ष्य।
- PM KUSUM — कृषि पंपों का सौर्यीकरण; लक्ष्य बढ़ाकर 49,315 मेगावाट — भूजल पर निःशुल्क-बिजली के दबाव में कमी का उद्देश्य।
- समग्र जल प्रबंधन सूचकांक 3.0 — नीति आयोग के अद्यतन सूचकांक (2024) में गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अग्रणी।
- ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ का कवरेज — संचयी सूक्ष्म-सिंचाई क्षेत्र 2024 तक 17 मिलियन हेक्टेयर पार, कुल संभाव्यता 70 मिलियन हेक्टेयर के विरुद्ध।
- केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की अधिसूचनाएँ — संकटग्रस्त प्रखंडों में उद्योगों के लिए दोहन-नियम कड़े।
यूपीएससी प्रासंगिकता
जीएस-III मानचित्रण
- कृषि — सिंचाई, जल-उपयोग दक्षता, फसल-प्रतिरूप।
- पर्यावरण — जल-संरक्षण, आर्द्रभूमि व तालाबों का पुनरुद्धार।
- भारतीय अर्थव्यवस्था — ग्रामीण अवसंरचना, MGNREGA का अभिसरण।
जीएस-II मानचित्रण
- अभिशासन — जल जीवन मिशन, जल पर संघीय सहयोग।
प्रारंभिक परीक्षा के बिंदु
- कुल जल-उपयोग में कृषि का हिस्सा: लगभग 80%।
- कृषि-जल में भूजल का हिस्सा: लगभग 60%।
- शुद्ध बोया गया क्षेत्र में वर्षा-आधारित भाग: लगभग 52%।
- PMKSY घटक: हर खेत को पानी, प्रति बूँद अधिक फसल, WDC, AIBP।
- अटल भूजल योजना — 7 राज्यों में क्रियान्वित।
- समग्र जल प्रबंधन सूचकांक — नीति आयोग।
- जल जीवन मिशन — लक्ष्य 100% FHTC; प्रारंभ 15 अगस्त 2019।
- सुखसाध्यिकार अधिनियम, 1882 — भूस्वामी को भूजल का अधिकार।
- APFAMGS — आंध्र प्रदेश किसान-प्रबंधित भूजल प्रणाली; सामुदायिक मॉडल।
मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण
- “भारत का जल संकट मूलतः दुर्लभता का संकट नहीं, बल्कि अभिशासन और प्रोत्साहन का संकट है।” परीक्षण कीजिए।
- “सूक्ष्म-सिंचाई कृषि-वृद्धि और जल-धारणीयता में सामंजस्य स्थापित करने वाला एकमात्र सबसे विस्तार-योग्य हस्तक्षेप है।” चर्चा कीजिए।