भारत में 86% से अधिक किसान लघु और सीमांत श्रेणी के हैं — जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है। इस खंडित भूमि जोत (Fragmented Land Holdings) की वास्तविकता भारतीय कृषि की उत्पादकता, आय और स्थिरता को गहराई से प्रभावित करती है।
भूमि जोत की समस्या
विखंडन के कारण
- उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार ज़मीन का बटवारा पीढ़ी दर पीढ़ी
- जनसंख्या वृद्धि
- भू-सुधार कानूनों का असमान कार्यान्वयन
विखंडन के प्रभाव
- आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग लाभकारी नहीं
- सिंचाई और इनपुट की लागत अधिक
- बाज़ार तक पहुँच में कठिनाई
- किसान की सौदेबाज़ी शक्ति कम
संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture)
संरक्षण कृषि FAO द्वारा परिभाषित एक टिकाऊ खेती पद्धति है जो तीन सिद्धांतों पर आधारित है:
- न्यूनतम जुताई (Minimum Tillage): मिट्टी की संरचना बनाए रखना
- स्थायी मिट्टी आवरण (Permanent Soil Cover): फसल अवशेष या आवरण फसल से मिट्टी ढकना
- फसल विविधता (Crop Rotation/Diversification): मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना
लाभ
- मिट्टी क्षरण में कमी
- जल संरक्षण
- CO₂ अवशोषण — जलवायु परिवर्तन शमन
- कम लागत, अधिक उत्पादकता
भूमि पुनर्गठन के प्रयास
किसान उत्पादक संगठन (FPO)
FPO (Farmer Producer Organisations) छोटे किसानों को एक साथ लाते हैं जिससे वे सामूहिक रूप से खरीद, बिक्री और ऋण की सुविधा प्राप्त कर सकें। सरकार ने 10,000 नए FPO बनाने का लक्ष्य रखा है।
भूमि लीज़िंग सुधार
NITI Aayog ने मॉडल कृषि भूमि लीज़ अधिनियम प्रस्तावित किया है। इससे बड़े किसान और निवेशक छोटी जोतों को एकत्र कर कुशल खेती कर सकते हैं।
यूपीएससी की दृष्टि से
भूमि जोत और संरक्षण कृषि GS-III (कृषि, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण) के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। FPO और भूमि सुधार पर मुख्य परीक्षा में प्रश्न आते रहे हैं।